मंगलवार, 11 जून 2019

दान


"देने का मर्म"










"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।
अपने लिये जानवर जीते, परहित का  कुछ कर्ज़ चुकाओ॥  

खेल खेल मे बचपन  बीते, अक्षर ज्ञान सम  रिश्ते  सीखे।
कदम बढ़ाना, जिह्वा चलाना, इस  दुनियाँ के  रस्म अनूठे॥
साक्षर बन दुनियाँ को जताया, परहित का पर नाम न आया।
चतुर सुजान  जानकर  हमने युवा पहर  मे कदम  बढ़ाया॥ 
खुद ना पीकर नदियां बह कर, जल देने का मर्म बताओ।
"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।

युवा अवस्था, जीवन यापन,  सेवा वृत्ति अर्थ प्राप्ति।  
समझ न आई, इस समाज को बापस कुछ करने की रीति॥
दुनियाँ के इस जीवन क्रम मे, सुख सुविधा घरबार बनाये।
ओझल दुःखी  दरिद्र खड़ा  था, राह-निहारे,  आश लगाये॥   
आधा जीवन, ख़ातिर स्वजन, कहता समाज का कर्ज़ बटाओ।
"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।

जीवन की इस संध्या बेला, स्वार्थ की गठरी पथिक अकेला।
सारा जीवन ढोकर गठरी, नहीं समाज को बापस धेला॥ 
गीता का संदेश विश्व को, देश काल और पात्र का  कारण।
जिस वस्तु की जहां कमी हो, उस वस्तु का दान  अकारण॥
रोगी सेवा, दरिद्र को भोजन, निरक्षर का ज्ञान बढ़ाओ।
"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।


देने का सुख कुदरत देती, सीख न पाये हम सारी उमरिया।
दिन भर उजियारा फैला कर, सूरज जाये अपनी कुठरिया॥ 
नदी-मेघ,  नीर  बरसाते,  वृक्ष   खुद  के  फल खाते।
जन-जन के खातिर अपना वे सबकुछ न्योछावर कर जाते॥
समाज से लेकर बढ़े हुए हम, बापस इसे चुका कर जाओ।
"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।

विजय सहगल