रविवार, 3 फ़रवरी 2019

"चैक की वापसी"


"चैक की वापसी"



मुझे गायत्री परिवार के कलेंडर का वह सदवाक्य याद आता हैं जिसके अनुसार "दूसरों के साथ बैसा व्यवहार न करें जो आपको अपने लिये पसंद न हो"। एक बैंक अधिकारी स्वयं और अपने अधीनस्थ अधिकारी के साथ दो अलग-अलग  पैमाने कैसे लागू कर सकता हैं? जिसका अनुभव हमे 1992 मे ग्वालियर मे हुआ। उन दीनों मैं शाखा नया बाज़ार मे पदस्थ था। एक दिन शाखा के तत्कालीन मुख्य प्रबन्धक ने मुझ से  कहा कि एक चैक समाशोधन (क्लेयरिंग) मे आने बाला हैं जो एक खाता धारक द्वारा भारतीय जीवन बीमा निगम के पक्ष मे जारी किया गया हैं। खाता धारक की दुर्घटना मे देहांत हो गया हैं। उक्त चैक भारतीय जीवन बीमा की किश्त का था। जब चैक समाशोधन के माध्यम से बैंक मे प्रस्तुत हुआ तो हमारे मित्र श्री कमलेश गौतम जो उन दिनों करेंट अकाउंट के लेजर का कार्य देखते थे। उन्होने उस चैक को लेजर मे प्रिविष्टि कर पास करने हेतु हमारे पास भेजा। मैंने देखा खाते मे अपर्याप्त  धनराशि थी। उक्त चैक को पास करना हमारे अधिकार क्षेत्र मे न होने के कारण  मैंने उक्त चैक एवं लेजर को माननीय मुख्य प्रबन्धक के पास भेज दिया। लेजर देख कर मुख्य प्रबन्धक महोदय कुछ नाराज हो गये। उन्होने हमे अंदर कैबिन मे बुला भेजा और पूंछा इस चैक को आपने लेजर के साथ अंदर क्यों भेजा? मैंने कहा श्रीमान - खाताधारक का देहांत हो गया हैं एवं  खाते मे पर्याप्त राशि नहीं है।  इस पर उन्होने कुछ नाराजी भरे लहजे मे कहा मैं चैक पर लिखित मे अनुमति दे रहा  हूँ तो आपको चैक पास करने मे क्या आपत्ति हैं? मैंने निवेदन किया कि खाताधारक के खाते मे अपर्याप्त राशि और  चैक का  भा॰ जी॰ बी॰ नि॰ की किश्त का  संदिग्ध होने को अगर छोड़ भी दे तो खाता धारक की मृत्यु के बाद खाते मे कोई भी पृविष्ठी गैर कानूनी हैं और उससे उपर खाते मे पहले से ही क्लीन ओवेरड्राफ्ट हैं अर्थात पर्याप्त धनराशि नहीं हैं, अतः फिर भी आप चैक को पास करना चाहे तो अपने हस्ताक्षर से उसे पास कर दे? इतना सुनकर वह और क्रोधित होते हुए बोले "अपने आपको बड़ा CAIIB समझते हो, मैंने भी CAIIB किया हैं। मैं देखता हूँ तुम कैसे चैक पास नहीं करते? बातों ही बातों मे उन्होने मेरा  कैरियर नष्ट (स्पोइल) कर देने की धमकी देते हुए लेजर पुनः हमारी सीट पर भेज दिया। मैं काफी डरा और सहमा था फिर भी मायूस होकर कहा-आप वेशक हमारा कैरियर नष्ट कर दे मुझे ईश्वर पर भरोसा हैं आपको  जो करना हैं करें।  इतना कह कर मैं बापस अपनी सीट पर आगया। अब मौखिक बातचीत समाप्त हो चुकी थी। हमे लिखित मे निर्णय करना था। उन दिनो एक रैफर रजिस्टर होता था जिसमे ऐसे चैक की पृविष्ठी की जाती जिसे पास करने के लिये प्रबन्धक की अनुमति आवश्यक हैं। मैंने उस रजिस्टर मे चैक की सभी विवरण भर कर चैक बापस करने के मुख्य कारण "खाताधारक की मृत्यु" का कारण लिख अंदर मुख्य प्रबन्धक जी के पास भेजा। अफ़सोस इसके बाद भी उन्होने चैक को पास करने की अनुमति दे दी। अब बड़ी समस्या आ खड़ी हुई, क्या किया जाये। शाम के लगभग सारा स्टाफ जा चुका था हाल मे सिर्फ मैं और मेरे  एक मित्र श्री अजय गुप्ता जी ही थे जिनसे मैं चैक के बारे मे  बात कर रहा था। तभी  मुख्य प्रबन्धक जी हम दोनों की बात चीत को देख कर हमारी सीट पर आये। उन्होने गुप्ता जी को डांटते हुए कहा आप इनके "कानूनी सलाहकार" हैं और मुझसे पूंछा जब मैंने लिखित अनुमति दे दी तो अब क्या समस्या हैं। चैक यूं ही अब भी लेजर मे पड़ा था। मैंने कुछ मायूसी पूर्वक कहा श्रीमान आप के अनुमति देने से कानून तो नहीं बदल जायेगा, इसके बबजूद यदि  आप उस खाताधारक को सहयोग और सहायता  करना चाहते हो तो उसमे हमे क्यों शामिल करना चाहते हैं? आप ही चैक को पास क्यों नहीं कर देते। पता नहीं क्या चमत्कार हुआ कि उन्होने कुछ क्रोध और हिकारत से मुझे देखते हुए चैक पर हस्ताक्षर करते हुए चैक पास कर दिया। मैंने अंदर ही अंदर भगवान को धन्यवाद कर कहा चलो बला टली। हम लगभग रात 7.30- 8.00 बजे घर पहुंचे।

मेरा ऐसा मानना हैं, किसी अन्य बैंक का तो नहीं मालूम लेकिन हमारे बैंक की ये एक बड़ी कमजोरी हैं कि यदि आप अपने उच्च अधिकारी पर किसी कार्यालीन मुद्दे पर असहमति रखते हैं या उसके किसी सही या  गलत निर्णय पर मत भिन्नता रखते हैं तो वह उच्च अधिकारी इसे अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर आपका किसी भी सीमा तक अहित या आपको प्रताड़ित  कर सकता हैं, स्थानातरण तो एक साधारण बात हैं।  इस  कमी, बुराई, या दुर्भावनात्मक सांस्कृति ने हमारे बैंक का बहुत अहित कर मानव संसाधन का बड़ा नुकसान किया हैं।

रात लगभग 10.30-11.00 बजे मेरे घर कि घंटी बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देख कर आश्चर्य हुआ कि मुख्य प्रबन्धक महोदय अपनी कार से हमारे घर के  सामने खड़े थे। सुर्ख सर्दी मे भी उन्हे देख कर मेरे माथे पर पसीना आ गया और सोचा कि अब क्या समस्या आने बाली हैं। मैंने अभिवादन कर इतनी रात मे आने का कारण पूंछा। सुनकर हमे घोर आश्चर्य हुआ जब उन्होने बताया कि "उन्होने प्रधान कार्यालय, वकील और प्रादेशिक कार्यालय मे बात की हैं, उस चैक को बापस करना हैं"। मैं मन ही मन सकते मे था। वे बोले कल सुबह उस चैक को समाशोधन के माध्यम से बगैर किसी चूक के बापस करना हैं। पता नहीं क्यों मुझे उनके असमय घर आने मे किसी संकट के बादल दिखे। मैं उनके यहाँ पदस्थपना के पूर्व लखनऊ मे हुए स्टाफ के साथ हुए किस्से के बारे मे सुन चुका था। अचानक मेरे मुह से निकला सर, कल तो मैं छुट्टी रहूँगा। क्योंकि कल मुझे अपने छोटे बेटे को डी॰पी॰टी॰ का इंजेक्शन लगवाना हैं। तब उन्होने कहा, "कोई बात नहीं तुम इंजेक्शन लगवाने के बाद आ जाना"। मैंने कहा सर, आने मे 12-1 बज जाएंगे क्योंकि मुझे मालूम था क्लेयरिंग का समय दोपहर 12.00 बजे का हैं। इस तरह उनसे पीछा छूटा।

पर ये क्या दूसरे दिन सुबह 6.00 बजे फिर मेरे घर की घंटी बजी, मैंने देखा पुनः मुख्य प्रबन्धक महोदय कार से घर के सामने खड़े थे। मैंने मन ही मन भगवान को याद किया, फिर क्या आफ़त आ गई, कि इतनी सुबह ये महोदय क्या करने फिर से आ गये। मैंने अभिवादन कर उन्हे बैठने के लिये कहा वे बोले नहीं, अभी तुरंत बैंक चलना हैं। वे बोले "मुझे रात भर नींद नहीं आई", चैक को अभी तुरंत ही बापस करना हैं। मैंने चाय लेने का निवेदन किया किन्तु वे बोले नहीं, अभी तुरंत चलना हैं। मैं उस सर्द सुबह पजमा के उपर ही पेंट जैकेट आदि पहनकर उनके साथ कार मे बैठ कर बैंक की ओर चल दिया। बैंक की चाबी हमारे वरिष्ठ प्रबन्धक श्री जुगल किशोर खिच्ची के पास रहती थी। हैली पैड कॉलोनी स्थित उनके घर पर पहुँच कर उनको भी कार मे बिठलाया और इस तरह हम तीनों नया बाज़ार स्थित शाखा मे सुबह लगभग 6.30 बजे पहुंचे। मैंने और खिच्ची साहब ने मिल कार शाखा के ताले खोले। मेन स्विच को चालू कार लाइट जलायी। मुख्य प्रबन्धक महोदय तो अपनी कैबिन मे बैठ गये और बोले चैक के उपर बापसी का मीमो तैयार करो और लाओ। अविश्वास इतना हो चुका था की इस सब घटना क्रम के होते हुए भी उन्हे मैं लगातार शक की निगाह से देखे जा रहा था। न जाने क्यों मुझे कुछ अनिष्ट का आभास हो रहा था कि मुख्य प्रबन्धक खाता धारक के परिजनों को इस क्रत के लिये मुझे जिम्मेदार ठहरा कर अपना बचाव करेंगे।  चूंकि नया बाज़ार ब्रांच की गिनती  उन दिनो बैंक की कुछ बड़ी  गिनी-चुनी  शाखाओं मे की जाती थी अतः शाखा मे फोटो कॉपी मशीन उपलब्ध कराई गई थी। मैंने अपनी सीट पर पहुँचकर चैक को ढूंढा और उसकी फोटो कॉपी कर अपनी जेब मे डाली। चैक पर "खाताधारक की मृत्यु" का कारण लगा कर मेमो बना, चैक को बापस किया। मुख्य प्रबन्धक ने रजिस्टर से दी गई "अनुमति" को काट कर "अस्वीकृत" किया। लेजर से पृविष्टि  को काट कर सही बैलेन्स निकाला एवं चैक पर अपने हस्ताक्षर को निरस्त किया। इस तरह शाखा को  पुनः ताला लगा कर बंद कर उन्होने हम दोनों को बापस घर छोड़ा।

यदि चैक हमारे द्वारा पास होता तो शायद ही इतनी दौड़-भाग उनके द्वारा की जाती। इस पूरे घटनाक्रम मे हमने एक बार भी मुख्य प्रबन्धक जी के मुंह से इस घटना क्रम पर कोई अफ़सोस जनक एक शब्द सुनना  तो दूर हमने उनके  चेहरे पर कोई भी पश्चाताप या आत्मग्लानि के भाव नहीं देखे। इतना सब तो ठीक था उनका आगे का व्यवहार तो और भी निंदनीय था, एक व्यक्ति अपनी स्थिति से किस हद तक गिर सकता हैं जिसका अनुभव उक्त घटना के 1-2 दिन बाद देखने को मिला।  जिस बात का अंदेशा  था बही हुआ, जब खाता धारक के भाई जो शहर और बैंक की प्रभावशाली व्यक्ति थे, ने हमारे पास आकर कहा "मिस्टर सहगल", मुख्य प्रबन्धक साहब से पता चला कि  आपने  चैक बापस किया हैं, ये आपने  ठीक नहीं किया? उनके बात करने का लहज़ा कुछ तल्खी वाला था।  तब मैंने भी सारी लोक-लाज, नीति-अनीति, नियम-कानून भूल कर  उनको बताया कि मैंने तो साहब से निवेदन किया था कि आपकी जान पहचान हैं आप चैक पास कर उनकी सहायता कर सकते हैं, उन्होने ऐसा किया भी था पर रात मे बकील और प्रादेशिक कार्यालय से सलाह करने के बाद  उन्होने उक्त चैक को बापस कर दिया। मैंने सभी रजिस्टर, लेजर और चैक कि कॉपी उनको दिखा सारा घटना क्रम उनको सुनाया। उक्त चैक की कॉपी आज भी हमारे पास सुरक्षित रक्खी हैं।

किसी जिम्मेदार शाखा के मुखिया द्वारा किसी कार्य के लिये दोहरे मापदंड अपनाना और उस अप्रिय क्रत की ज़िम्मेदारी से बचते हुए अपने अधीनस्थ अधिकारी के सिर मढ़ना कहाँ तक उचित था? यह विचारणीय प्रश्न  हैं।

विजय सहगल     

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