"श्री
अष्टविनायक - महागणपती मंदिर, रंजनगाँव (पूना)"
पूना
से 13 जुलाई को प्रस्थान करते समय हमारे पारवारिक मित्र श्याम टंडन एवं श्रीमती
आशा टंडन ने राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 75 पर पूना से लगभग 50 किमी॰ दूर रंजनगाँव
गणपति मंदिर के दर्शन कर ही आगे बढ़ने का आग्रह किया। उन्होने बताया कि रंजनगाँव मे
स्थित गणपति मंदिर उन अष्ट विनायक मंदिरों मे से एक है जिसकी पूना सहित पूरे
महाराष्ट्र मे बड़ी मान्यता और महत्व है। महाराष्ट्र सहित देश के श्रद्धालु अष्ट विनायकों
के दर्शन हेतु आते हैं, यह मंदिर भगवान गणेश, को समर्पित इस क्षेत्र
के आठ मंदिरों से एक है। मंदिर का वास्तु निर्माण
इस तरह किया गया है कि सूर्य के
दक्षिणायान के समय, सूर्य की किरणे सीधे गणेश प्रतिमा पर
पड़ती हैं। भक्तजन पूरी श्रद्धा, प्रतिष्ठा और सम्मान से इस क्षेत्र मे स्थित इन आठों विनायक मंदिरों के
दर्शन करना अपनी धार्मिक प्रतिबद्धता और वचनबद्धता मानते हैं। ग्रामीण अपने परिवार और अन्य ग्रामीण भाई बहिनों के साथ
समूह मे अष्ट विनायक के दर्शन हेतु निकलते हैं। रंजनगाँव स्थित गणेश मंदिर के
दर्शन का, हमारे मित्र का आग्रह हमारे लिए, एक अनमोल पारितोषिक बन, एक अविस्मरणीय अनुभव रहा।
9वीं
और 10वीं शताब्दी के मध्य निर्मित इस मंदिर का निर्माण गाँव के ही एक सुनार परिवार
खोल्लम ने कराया था। पूर्वमुखी, भव्य और आकर्षक मुख्य प्रवेश द्वार पेशवा
वास्तु शैली मे बनाया प्रतीत होता हैं क्योंकि द्वार के उपर नगरखाना (नगाड़ खाना) बनाया गया है। नगाड खाना वह स्थान होता है जहां पर बैठ कर संगीतकर
मंगल बाद्ध्य अर्थात नगाढ़े और शहनाई बजाकर
मंगल ध्वनि उत्पन्न करते हैं। बचपन मे
मैंने झाँसी स्थित मुरलीमनोहर मंदिर स्थित मंदिर मे महाराष्ट्रीयन सांस्कृति और
रीतिरिवाज की पालन करती इस परंपरा मे मंदिर के बाहर शहनाई और नगाड़े को बजते देखा
है। ऐसी किवदंती है कि इस मंदिर मे स्थित भगवान विनायक की दस सूंड और 20 भुजाएँ
है। इस मंदिर के संबंध मे पुराणों मे एक कहानी प्रचलित हैं जिसके अनुसार ऋषि
गृत्समद का पुत्र त्रिपुरासुर जिसे भगवान गणेश के बरदान के फलस्वरूप शक्तिशाली
होने और केवल भगवान शिव के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने का बरदान था। असुर, त्रिपुरासुर के उत्पात और
अत्याचार पर सभी देवताओं ने दुखी होकर शिव की आराधना की। शिवजी ने अपने ही पुत्र
की स्तुति के पश्चात इस त्रिपुरासुर का वध कर उसे मोक्ष प्रदान किया। रंजनगाँव
वहीं स्थान है जहां भगवान शिव ने स्वयं गणेश का आशीर्वाद पा कर असुर त्रिपुरासुर
का वध किया था।
ऊंचे
चबूतरे पर बने मंदिर के आकर्षक प्रवेश द्वार के दोनों ओर सुदर हथिकद मूर्तियाँ
मंदिर के प्रवेश द्वार की सुंदरता की भव्यता को और आकर्षक बनाती हैं। मुख्य प्रवेश
द्वार के बाद एक अन्य द्वार से मंदिर परिसर मे प्रवेश करते ही सामने मंदिर का
सुंदर लकड़ी के नक्काशीदार स्तंभो से निर्मित
आयताकार रंग मंडप दिखाई दिया। प्रातः का समय था श्रद्धालुओं की संख्या
ज्यादा नहीं थी। 10-15 मिनिट मे ही हम लोग उस रंग मंडप के द्वार पर पहुँच गए।
मार्बल के चमकदार फर्श और उसके उपर लकड़ी के स्तंभों के उपर चमकदार पोलिश और लकड़ी ही की ही चमकदार छत्त
मंदिर के आकर्षण को दिव्य बना रही थी। प्रातः का समय होने के कारण मंदिर के सेवादार कहीं कहीं मंदिर की सफाई मे रत
थे। मंदिर एकदम साफ सुथरा दिखलाई पड़ रहा था। स्टील रेलिंग द्वारा बनाये पथ पर आगे
बढ़ते हुए अब हम गर्भ गृह मे थे।
गर्भ
गृह मे अष्टविनायक भगवान श्री महागणपती के दर्शन अद्भुद और अविषमरणीय थे। सिंदूरी
रंग मे अपने आसन पर विराजित प्रतिमा बड़ी नयनाभिराम और सुखदायक थी। श्री गणेश के
सिर पर स्वर्ण जड़ित मुकुट भगवान के साक्षात रूप के दर्शन करा रहा था। आसपास मंदिर
की पृष्ठभूमि मे चाँदी के पत्रों पर नक्काशीदार लता पुष्प उकेरे गए थे। सनातन
परंपरा के अनुसार मध्य मे सोने का छत्र मुकुट के उपर सुशोभित था। प्रतिमा के दोनों
ओर चाँदी के स्तम्भ बने थे जिनको अर्ध बलयाकार ने, दोनों स्तंभो से जोड़ कर सिंहासन का रूप दिया गया
था। कुछ क्षण महागणपती के एकटक दर्शन कर, प्रसाद लिया और
उनको प्रणाम कर आगे बढ़े। मुख्य मंदिर परिसर के चारों ओर खुला आँगन था। खुला
क्षेत्र जो मंदिर के दाहिनी तरफ ज्यादा और
बाएँ तरफ कम था। खुले रास्ते के दूसरी तरफ लंबे बरमादे बने थे, जहां पर दूर क्षेत्रों से आई हुई टोलियाँ महागणपती की स्तुति करती हुई भजन
गा रही थीं। जबकि विपरीत दिशा मे मंदिर के
कार्यालय और अन्य कमरे थे जहां से दान आदि देने और प्रसाद ग्रहण करने की व्यवस्था
थी। मंदिर के पीछे विशाल हाल बनाया गया था जहां शायद प्रवचन या अन्य धार्मिक
समारोह करने की व्यवस्था थी। पीछे ही एक पानी की अत्यंत प्राचीन बावड़ी थी जिसका जल श्रद्धालुओं द्वारा उपयोग मे
लाया जा रहा था। सभा कक्ष मे एक तरफ पूना के आसपास बने अष्टविनायक के आठों मंदिर का सड़क मानचित्र भी एक बड़े से
सूचना पटल पर लगाया गया था जिसमे अष्टविनायक मंदिरों की एक दूसरे से दूरी और अन्य सूचनाएँ
दर्शाई गई थी।
मंदिर
की प्रदक्षिणा कर पीछे बने निकासी द्वार
से होकर जब हम निकले तो निकासी पथ के दोनों ओर ग्रामीण परिवेश की झाँकियाँ यथा
किसान बैल गाड़ी, हल जोतता किसान, गौ पालन आदि की जागृत प्रतिमाएँ
बनाई गयी थी और साथ साथ सुंदर फूल पौधों की फुलवारी बनायी गयी थी। प्रायः प्रसाधन
सुविधा के आभाव के विपरीत यहाँ यह सुविधा और शीतल जल की उपलब्धता थी। कुछ समय स्वल्पाहार,
चाय आदि ग्रहण कर हम अगले पढ़ाव की ओर बढ़ चले।
गणेश
चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें, जय श्री गणेश!!, जय श्री अष्ट
विनायक!!
विजय
सहगल







6 टिप्पणियां:
अति उत्तम वर्णन
Enjoyed the descriptions.
बहुत अच्छा सर। मैंने भी दर्शन किये हैं।
गणपति बप्पा मोरया 🙏
जय गणेश जय गणेश 🙏गणपति बप्पा मोरया 🙏
*आपने "गणेश चतुर्थी" के पावन शुभ अवसर पर श्री अष्टविनायक - महागणपति मंदिर,रंजनगांव ,पुणे का इतना सजीव व विस्तार से सूक्ष्म चित्रण किया जैसे हम स्वयं भी अपने मनमंदिर में कल्पनालोक में साक्षात् दर्शन का लाभ अर्जित कर रहे हों।आप देश के विभिन्न स्थानों चाहे वो धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक या सैर-सपाटे से संबंधित हों उतनी ही मेहनत व शिद्दत से जानकारियां एकत्रित करते हैं और उन्हें रोचक व ज्ञानवर्धक बनाते हैं सचमुच अनुकरणीय है।आप ऐसे ही अपने जुनून को पल्लवित व पुष्पित करते रहें यही श्रीजी से कामना है।*
🌹🙏🌹👍👍👍👌👌👌
सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा, ग्वालियर
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