शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

श्रवणबेलगोला या गोमतेश्वर, कर्नाटक॰

 

"जैन तीर्थ-श्रवणबेलगोला या गोमतेश्वर"










7 जुलाई 2025 को मेरी बेंगलुरु से लगभग 2300 किमी॰ की बापसी यात्रा मे श्रवणबेलगोला पहला पढ़ाव था। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 75 से लगभग 15 किमी॰ हट कर हम 144 किमी दूर कर्नाटक राज्य के हसन जिले मे विंध्यगिरी पर स्थित विश्व प्रसिद्ध  जैन तीर्थ श्रवनवेलगोला अर्थात गोमतेश्वर पहुंचे, जहां भगवान बाहुबली की 57 फीट (17 मीटर) ऊंची विशाल प्रतिमा है, जिसे ग्रेनाइट के एक अखंड शिला पर तराश कर, शिल्पकारों ने वास्तु का अद्भुद उदाहरण प्रस्तुत किया है। भगवान बाहुबली की इस महाकाय प्रतिमा के दर्शन 30 किमी॰ दूर से होने लगते हैं।  तालाबों और मंदिरों के इस छोटे से नगर मे कई मंदिर हैं। दक्षिण दिशा मे स्थित इस पहाड़ को काट-काट कर  लगभग 650 सीढ़ियों को उनके प्रकृतिक रूप मे बनाया गया हैं। सुंदर और साफ सुथरे प्रवेश द्वार पर यूं तो उस समय गर्मी और उमस से बुरा हाल था और उस पर 650 सीढ़ियों के चढ़ने की सुन एक बारगी तो हिम्मत पस्त होती नज़र आयी। यध्यपि ऊपर मंदिर मे कुछ भी ले जाने की अनुमति नहीं थी क्योंकि श्रद्धालु अपनी श्रद्धा, भक्ति और समर्पण के साथ निराहार हो भगवान बाहुबली के दर्शनार्थ, पहाड़ पर चढ़ कर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। भगवान बाहुबली के दर्शन मे आयी इस बाधा से मन मे बड़ी निराशा थी पर मंदिर प्रबंधन से अपनी शुगर की समस्या के उल्लेख के  कारण उन्होने  हमे कुछ हल्का बिस्कुट, टोफ़्फ़ी  और पानी की बोतल ले जाने की  अनुमति के बाद शरीर मे हिम्मत, जोश  और उत्साह का संचार दौड़ पड़ा और हम सपत्नीक  पहाड़ की  650 सीढ़ियों पर विजय प्राप्त करने और  भगवान बाहुबली के दर्शनार्थ पहाड़ी पर चढ़ने के उद्देश्य  लिये, उत्साह के साथ आगे बढ्ने लगे। भगवान बाहुबली के दर्शनों की तीव्र अभिलाषा और उत्कंठा ने मौसम को भी सुहावना बना दिया, घने बादलों के छा जाने के साथ ही वर्षात होने लगी और धूप, उमस भरी गर्मी का प्रकोप स्वतः ही शांत हो गया। 

श्रवणबेलगोला मे स्थित भगवान बाहुबली की विश्व प्रसिद्ध विशाल प्रतिमा,  जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकार भगवान ऋषभनाथ के पुत्र बाहुबली को समर्पित है, यह मूर्ति जैन धर्म के मूल सिद्धांतों यथा शांति, अहिंसा, त्याग और सादा जीवन का प्रतीक है। इस मूर्ति का निर्माण गंग साम्राज्य के सेनापति चामुंड राय ने अपनी माँ की इच्छापूर्ति हेतु कराया था। माँ की, "भगवान बाहुबली के दर्शन के बिना, दूध ग्रहण ने करने की प्रतिज्ञा के साथ जब वे इस श्रवणबेलगोला स्थान पर रुकी तो रात मे यक्षिणी कुष्मांडिनीदेवी ने स्वपन मे छोटे पहाड़ी से बड़े पहाड़ पर बाण छोड़ने पर वहाँ भगवान बाहुबली के दर्शन की भविष्यवाणी की। ऐसा करने पर वहाँ भगवान बाहुबली का चित्र प्रतिविम्बित हुआ। राज्य के महाशिल्पि को बुलाकर प्रतिमा का निर्माण कराया गया। सेनापति द्वारा 1008 कलशों से जल, गन्ने का रस, दूध और चन्दन आदि के अभिषेक के बावजूद पवित्र द्रव्य हृदय स्थल के नीचे न पहुंचने के कारण अपूर्ण था। लोगो की आश्चर्य की सीमा उस समय न रही जब सेनापति चामुंड राय की दादी गुल्लिका अज्जी ने अपनी छोटी सी लुटिया से अभिषेक किया तो अभिषेक पूर्ण होकर भगवान के चरणों मे दूध की नदियाँ बहने लगी। जैन मुनियों द्वारा तपस्या के कारण स्थान को  श्रमण और श्वेत या धवल सरोवर को कन्नड मे बिलिकोला जो कालांतर मे श्रवणबेलगोला हुआ। विशाल प्रतिमा के चारों ओर बने बरामदे मे जहां एक ओर जैन धर्मावलंबियों अपने धार्मिक रीतिरिवाजों, अभिषेक आदि  को निष्पादित करते हैं वहीं जैन धर्म के तीर्थांकारों के साथ यक्षिणी कुष्मांडिनीदेवी एवं गुल्लिका अज्जी की प्रतिमा को भक्ति के प्रतीक के रूप भी पूजा की जाती है। महान शूरवीर, और शारीरिक सौष्ठव के कारण सेनापति चामुंड राय की माँ उन्हे गोम्मट बुलाती थी, इसी कारण बाहुबली को गोम्मट का ईश्वर अर्थात भगवान गोम्मटेश्वर  के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। ई॰ सन 981 मे प्रतिष्ठित प्रतिमा के एक हजार वर्ष के उपलक्ष मे 1981 मे सहस्राब्दी प्रतिष्ठापना समारोह मनाया गया। हर 12 वर्ष मे यहाँ पर एक वृहद महामस्तकाभिषेक का आयोजन किया जाता है जिसमे सारी दुनियाँ से जैन श्रद्धालु शामिल होने आते हैं, अगला  महामस्तकाभिषेक सन 1930 मे आयोजित किया जायेगा। प्रतिमा पर उकेरी गयी बेलें  भगवान बहुवली के गहन, दीर्घ और लंबे ध्यान को दर्शाती हैं, प्रतिमा के दोनों ओर यक्ष और यक्षणी की प्रतिमाएँ हैं।

दर्शन और परिक्रमा के पश्चात कुछ क्षण मंदिर प्रांगण मे प्रतिमा को निहारते हुए भगवान का चिंतन, मनन, स्मरण करना मन को सुकून और शांति प्रदान करने वाले क्षण थे। दर्शन पश्चात मंदिर के प्रवेश द्वार से निकलते ही पहाड़ के चारों तरफ और विशेषतः नीचे दिखलाई पड़ने वाले सरोवर का दृश्य बड़ा सुंदर और मनोहारी था। ठंडी वर्षाती हवाओं ने शरीर मे शीतलता और उमंग का संचार कर दिया। इस पहाड़ के सामने ही चंद्रागिरी पर स्थित अन्य अनेक जैन मंदिर दृष्टिगोचर हो रहे थे। दोनों पर्वतों के बीच हरियाली और नगर के दर्शन भी बड़े मनोहारी थे। रास्ते मे सीढ़ियों से उतरने पर रास्ते के शुरुआत, बीच और अंत मे कुछ भव्य, पुरातन और शिल्पकारी का अद्भुद नज़ारा भी देखने को मिला। मंदिर के गर्भगिरह के बाहर एक काफी चौड़ा गलियारा बनाया गया था जिस पर समस्त श्रद्धालु परिक्रमा कर मुख्य प्रवेश द्वार पर पुनः भगवान बहुवली के चरणों मे अपना प्रणाम सिर झुका कर कर रहे थे। मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार भी पाषाण के गोल स्तंभों से बनाया गया था जिन पर शानदार नक्काशी की गयी थे। मंदिर का बरामदा भी अपने पुरातन शिल्प निर्माण की कहानी कह रहा था। पहाड़ से बापसी सहज थी अतः, इस  तरह विन्ध्यागिरी पर्वत से चारों ओर की प्रकृति छटा के दर्शन करते हुए हम दोनों बापस आधार केंद्र पर पहुँच गये।

लगभग ढाई घंटे की यात्रा के पश्चात जब मंदिर के बाहर आए तो भूख से बेहाल भोजन तो बनता था। भोजन की तलाश भी एक दो लोगों से पूंछ कर मंदिर के पास ही सुरंगा जैन, मारवाड़ी भोजनालय के रूप मे पूरी हुई। भोजनालय था तो छोटा पर स्वादिष्ट और ताजे बने भोजन ने इस कमी को पूरा कर दिया। इस तरह एक विश्व प्रसिद्ध जैन तीर्थ की यात्रा और भगवान बाहुबली के दर्शन जीवन को कृत्य कृत्य करने वाले थे।

विजय सहगल                    

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