"मेंगलुरु-दक्षिण
कर्नाटक का एक महत्वपूर्ण समुद्र तटीय शहर"
7 जुलाई
2025 को बेंगलुरु से चल कर वाया
श्रवनवेलगोला, भ्रमण के पश्चात 362
किमी॰ दूर मेंगलुरु पहुँचते पहुंचते शाम के लगभग 6 बज चुके था। लंबी यात्रा और
श्रवनवेलगोला मे भगवान बहुवली के दर्शन के लिए पहाड़ की 650 सीढ़ियाँ चढ़ने-उतरने की थकावट
तो हो ही रही थी। पर फिर ये सोच कर कि विश्राम तो रात मे हो
जायेगा क्यों ने अभी शाम को ही मेंगलुरु के प्रसिद्ध भगवान शिव को समर्पित "कादरी
मंजूनाथ मंदिर" के दर्शन के साथ "श्री वेंकट रमन मंदिर" के दर्शन
के लक्ष्य को हांसिल करने का प्रयास किया जाय। होटल मे सामान आदि,
रखने और कुछ ही देर मे पुनः तरोताजा हो कादरी मंजूनाथ मंदिर की ओर प्रस्थान किया।
शहर अजनबी था मंदिर कुछ किमी॰ ही दूर था,
लेकिन व्यवस्थाएं अच्छी थी। घनी भीड़-भाड़ से होते हुए,
पार्किंग मे कार को खड़ा कर तुरंत ही मंदिर परिसर मे थे। हल्के आसमानी रंग मे रंगा
प्रवेश द्वार की सीढ़ियाँ इस बात का अहसास करा रहीं थीं कि मंदिर किसी छोटी पहाड़ी
पर स्थित है। विशाल प्रांगण के मध्य मे सफ़ेद रंग मे रंगा
आयताकार, मुख्य मंदिर बड़ा ही
भव्य और आकर्षक था। मंदिर के चारों ओर बना बरामदा और मंदिर, कर्नाटक के समुद्र तटीय वास्तु शैली मे बनाया
गया जो पारंपरिक दक्षिण भारतीय शैली से अलग था। मेंगलुरु जिला कर्नाटक राज्य के
दक्षिण मे स्थित एक समुद्र तटीय क्षेत्र है लेकिन यहाँ की जीवन शैली मे कन्नड के
साथ तुलु और कोकणी भाषा भी बोली जाती हैं इसिलिये इस समुद्रतटीय इलाके का रहन सहन,
खान पान और परिधान भी शेष कर्नाटक से कुछ अलग हैं। लोग बड़े सरल,
सहज, मिलनसार और सहयोगात्मक मिजाज के हैं। यहाँ
के मंदिरों का वास्तु भी दक्षिण भारतीय मंदिर से कुछ अलग है जिसे विजयनगरी वास्तु
शैली कहा जाता है। कादरी मंजूनाथ मंदिर की तरह ही मंदिर के विशाल आँगन
के बीच मुख्य मंदिर आयताकार या वर्गाकार मे बनाये गए हैं। मेंगलुरु कर्नाटक राज्य
का एक अति महत्वपूर्ण समुद्र तटीय जिला हैं जिसकी सीमाएं जहां एक ओर दक्षिण मे केरल और उत्तर मे गोवा के कोकंकण क्षेत्र और महाराष्ट्र से लगती हैं।
हल्के आसमानी रंग मे रंगे कादरी मंजूनाथ
मंदिर एक छोटी, ऊंची पहाड़ी पर स्थित है
जिन्हे कदरी पहाड़ियाँ कहा जाता है।
मेंगलुरु स्थित इस मंदिर का निर्माण 10-11
वी शताब्दी मे अलोप राजवंश के राजा कुंडवर्मा ने कराया था। मंदिर के प्रवेश द्वार पर
ही आदमक़द भगवान शिव की दोनों और स्वर्ण रंग मे त्रिशूल,
गदा और शंख लिए रक्खी गयी थी। ऐसा कहा जाता है कि भगवान परशुराम ने क्षत्रियों का
वध करने के पश्चात, अपने फरसे को समुद्र मे
फेंक कर समस्त भूमि मुनि कश्यप को दान कर दी और रहने के लिए एक स्थान के लिये भगवान शिव से प्रार्थना की। इन कदरी की पहाड़ियों
मे तपस्या करते हुए भगवान शिव और पार्वती
ने मंजूनाथ के रूप मे परशुराम को
दर्शन दिये। इसलिए ही इसे कदरी मंजूनाथ मंदिर के रूप मे प्रसिद्धि मिली। इस मंदिर
मे मकर संक्रांति पर नौ दिवसीय वार्षिक महोत्सव और विशाल भंडारे का योजन किया जाता
है। मुख्य मंदिर की प्रदक्षिणा कर मंदिर मे भगवान मंजूनाथ के अद्भुद दर्शन कर अपने
को कृतार्थ किया। हिन्दू और बौद्ध धर्म की संयुक्त संस्कृति के इस मंदिर मे अन्य देवी देवताओं के
दर्शन कर हम बीच शहर मे स्थित एक अन्य महत्वपूर्ण मंदिर श्री वेंकटरमना मंदिर की
ओर बढ़े।
श्री वेंकटरमना मंदिर शहर के बीचों बीच
रेल्वे स्टेशन के करीब हैं। अपने चौपहिया वाहन से चलने के कुछ फायदे और कुछ नुकसान
भी हैं। पार्किंग की समस्या तो थी लेकिन कुछ वाहनों से रिक्त हुई जगह मे अपनी कार
को पार्क कर दर्शन हेतु मंदिर मे प्रवेश किया। घनी भीड़ और यातायात के वाहनों के
बीच मंदिर मे प्रवेश किया। बाहर से तो मंदिर का भवन साधारण लेकिन अंदर प्रवेश करते
ही मंदिर के अद्भुद छटा देख कर मन प्रसन्न हो गया। मंदिर की वस्तु शैली भी कदरी
मंजूनाथ मंदिर की तरह ही थी पर गलियारे के बीच मे बने मंदिर भवन के चारों ओर लकड़ी
की छोटी-छोटी फ़्रामों से मंदिर का आयताकार संरचना बनायी गयी थी। लकड़ी के हर फ्रेम
पर पुरानों, महाभारत और रामचरित
मानस के प्रसंगों की तस्वीर उकेरी गई थी। हर फ्रेम पर उस प्रसंग का संक्षित विवरण भी
कन्नड और हिन्दी मे लिखा था। हर पट्टिका
पर उकेरी गया धार्मिक प्रसंग अपनी सुंदर कलात्मक शैली और के लिये जाना जाएगा। इन
पट्टिकाओं मे शबरी का प्रसंग, कृष्ण सुदामा
प्रसंग, रामवन गमन प्रसंग,
कृष्ण कथाओं के अनेक प्रसंग भी उकेरे गए हैं। भगवान वेंकट रमण की चाँदी की प्रतिमा
अप्रीतिम और नयनाभिराम थी। सुंदर गहोनों और फूलों की सजावट ने पूरे दृश्य को
अविषमरणीय बना दिया था। मंदिर के बाहर दीप स्तम्भ सहित पूरे मंदिर परिसर मे दीपों
की श्रंखला बनायी गयी थी जो शायद विशेष अवसरों पर प्रकाशित की जाती होगी। प्रत्येक
आगंतुक श्रद्धालु के सिर पर चाँदी के मुकुट को रक्ख पुरोहित ईश्वर आशीर्वाद को प्रदान कर रहे थे जो प्रायः
दक्षिण भारत, विशेषकर आंध्रा,
तेलंगाना और कर्नाटक राज्य के मंदिरों मे यह पृक्रिया अपनाई जाती है। यूं तो मंगलुरु
मे कुछ चर्च और मंदिर शेष थे, लेकिन समय आभाव के
कारण न जा सका। चूंकि मेरी काफी लंबी यात्रा समुद्र तट से होकर होनी थी इसलिये मेंगलुरु
के समुद्र बीचों की भी अनदेखी हुई।
मंदिर परिसर की प्रदक्षिणा पश्चात अब समय था
कुछ पेट पूजा करने का। हमारे एक मित्र ने मेंगलुरु की पब्बास आइस क्रीम का सेवन की
सलाह भी दी थी जो ठीक ठाक ही थी। भोजन और आइस क्रीम के बाद रात के दस बज चुके थे।
कल सुबह आगे की यात्रा भी शुरू करनी थी इसलिए अपने होटल मे रात्री विश्राम हेतु
रवाना हो गए।
विजय सहगल








2 टिप्पणियां:
Sehgal ji aap tathyon (facts) ko itani bariki se pesh karte hain. It feels amazing.
I suggest you to start a tourist/ travel agency as you can prove a best guide to explore the places.
P.S. : It is my suggestion please.
All the best.🌹🌹🌹
Sir you present the factsin such a way that we feel that we are also walking with you.
Happy Janamashtmi to you with all family members.
I S Kadiyan, chandigarh
सूंदर दर्शन संथाली
एक टिप्पणी भेजें