शनिवार, 31 मई 2025

वीज़ा वाले, चिरकुल बालाजी मंदिर-हैदराबाद

 

"वीज़ा वाले, चिरकुल बालाजी मंदिर-हैदराबाद"




भूटान यात्रा की खुमारी अभी ठीक से उतरी भी न थी कि 11 मई 2025 को प्रातः काल हैदराबाद से 27-28 किमी दूर यहाँ के प्रसिद्ध मंदिर चिरकुल बालाजी जाने का सुखद संयोग बन गया। इसलिये भूटान यात्रा के संस्मरण को कुछ विराम देते हुए आइये आपको भगवान चिरकुल बालाजी के दर्शन कराते हैं।  भगवान बालाजी वेंकटेश्वर को समर्पित   इस मंदिर के बारे मे मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्ची श्रद्धा और भक्ति से इस मंदिर के गर्भगृह के बाहर की 11 बार परिक्रमा करता है, उसकी इच्छा भगवान श्री बालाजी पूर्ण करते हैं। इस मंदिर को वीसा वाले बालाजी भी कहते हैं। भगवान बालाजी मे श्रद्धा और समर्पण रखने बाले लोगों, विशेषतः विध्यार्थियों का  मानना हैं कि भगवान बालाजी की 11 बार प्रदक्षिणा  करने वाले भक्तों का विदेश प्रवास पर पढ़ने या नौकरी पर जाने हेतु वीसा लग जाता हैं, अतः सामान्य दिनों की अपेक्षा,  सप्ताहांत मे बड़ी संख्या मे लोग रंगारेड्डी जिले के इस छोटे से गाँव चिरकुल मे बालाजी भगवान के दर्शनों और परिक्रमा  हेतु पधारते हैं। ऐसी मान्यता हैं कि जिस श्रद्धालु भक्त की मनोकामना पूर्ण हो जाती है वह पुनः मंदिर के गर्भगृह के बाहर की 108 परिक्रमा करते हुए भगवान बालाजी के प्रति ज्ञपित करते  हैं।

अति प्राचीन साधारण दक्षिण भारतीय वास्तु के इस मंदिर का निर्माण लगभग 500 वर्ष पूर्ण एक भक्त श्री रामदास के चाचा द्वय अकन्ना और मदन्ना ने कराया था। वर्गाकार आकृति मे बने स्तंभों पर अभिलंभित प्रांगण और उसके अंदर गर्भ  गृह मे  स्थापित भगवान वेंक्टेश्वर के अप्रितिम सुंदर प्रतिमा के नयनाभिरम दर्शन अद्भुद और अविस्मरणीय थे। मंदिर के चारों ओर एक छोटा परिक्रमा पथ या आँगन हैं जहां अवकाश के दिनों को छोड़ कर, यहाँ पर दर्शनार्थी परिक्रमा लगाते हैं।  यह मंदिर तेलंगाना राज्य के अति प्राचीन मंदिरों मे से एक है।  ऐसी किवदंती हैं कि एक भक्त जो हर वर्ष तिरुपति बालाजी भगवान के दर्शन हेतु जाया करते थे, एक बार गंभीर रूप से बीमार होने के कारण तिरुपति नहीं जा सके। तभी  रात, भगवान बालाजी उनके सपने मे आए और कहा, मैं यही पास के जंगल मे हूँ, चिंता करने की जरूरत नहीं। भक्त ने तुरंत बतलाये गये स्थान पर जाकर खुदाई की जिसमे भगवान वेंकटेशवेर की एक छोटी प्रतिमा निकली। खोदते समय मूर्ति पर दो जगह हल्का घाव हो गया जिससे खून निकलने लगा और आसपास की धरती लाल हो गयी। तभी किसी अदृश्य शक्ति ने गाय के दूध से प्रतिमा को स्नान के सुझाव के  पश्चात रक्त का रिसाव बंद हो गया। इस तरह भगवान वेंकटेशवेर की चिरकुल गाँव मे समुचित अनुष्ठान के पश्चात,  स्थापना की गयी तत्पश्चात मंदिर का निर्माण हुआ।   


प्रायः ग्रामीण परिवेश या ऐसी ही अन्य छोटी  जगहों  पर मै कबीर दास के उस दोहे के वशीभूत होकर यात्रा या भ्रमण करता हूँ  जिसमे वे कहते हैं कि-:

कबीरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय।।

आप ऐसे ग्रामीण परिवेश मे बैठे छोटे बिक्रेताओं, आजीविका कमाने वालों  या हस्तरेखा देखने भविष्य बतलाने वाले सेवा प्रदाताओं की सेवा के बदले लुटने के हिसाब से जाइए उनको मोलभाव कर  लूटने के हिसाब से न जायें?  हम परिवार सहित कुछ दूर पैदल चल कर मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे। मंदिर के आस पास एक छोटे से ग्रामीण परिवेश का सा दृश्य था। फूल-मालाओं, नारियल प्रसाद की दुकानों के साथ घरेलू सामानों, चाट  पकौड़ी के स्टालों, पुराने पत्थरों के पाटों से बनी घेरेलु आटा चक्की और तोता राम द्वारा लोगो के भविष्य बताने वाले शास्त्रियों को देख कर अति प्रसन्नता हुई कि ग्रामीण जन जीवन मे हम कैसे एक दूसरे का सहयोग कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुचारु रूप से चलाते हैं। काशी राम जी के तोताराम से अपना भविष्य जानना बचपन मे अपने अतीत मे  झाँसी के पंचकुइयां मेले को देखने सरीखा था। काशी राम जी जो मूलतः  सोलापुर महाराष्ट्र से थे, उन्होने बताया उनके दादा, परदादा भी तोते के माध्यम से या हस्तरेखा देख, लोगो का भविष्य बतलाकर  कर अपना जीवन यापन करते हैं। ईश्वर की कृपा से आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती हैं। इसी गाँव मे सालों से रह रहे हैं, जीवन से संतुष्ट हैं। उनके परिवार मे पांचों बेटे, चिरकुल गाँव मे यहीं, ये ही  काम कर रहे हैं। काशी राम के बारे मे जानकार और मिलकर बात करना अच्छा लगा। एक ठेले पर ताज़ा जामुन और शहतूत को लेने मे छत्तीसगढ़ की उस सब्जी मंडी की याद हो आयी,  जब सब्जी विक्रेताओं से स्थानीय छत्तिसगढ़ी भाषा मे, "मोला छत्तिसगढ़ी नी आवे दाई" कह कर उनसे सब्जियों की पूंछ परख  किया करता था और वो मुस्करा कर अच्छी और बढ़िया सब्जियाँ देती थी।


मंदिर परिसर की सफाई करने वाली महिला कर्मियों के कार्य की प्रशासा पर उन कर्मियों ने टूटी फूटी हिन्दी मे अपनी कृतज्ञता प्रकट करने का प्रयास किया जो उनकी भाषा से कम लेकिन उनके चेहरों पर उभरे भावों से ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे रहा था।  वे उसी चिरकुल गाँव के रहने वाली थी और जान कर प्रसन्नता हुई की उनके बच्चे स्कूल मे पढ़ने जाते हैं। हमे मंदिर के सामने ही एक पुरातन कुएँ को देखना भी अच्छा लगा जिसके  जल से भगवान  बालाजी का   स्नान और अभिषेक किया जाता हैं। पास के मैदान मे ही समाज के अंग थर्ड जेंडर  गुरु, रानी, सुल्तान आदि आराम करते दिखे जो आसपास के गाँव से थे और जीवाका उपार्जन के लिए भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण होने के आशीर्वाद देते दिखे। परिक्रमा पथ  पर ही गौशाला देखने हेतु चला गया। गौशाला के सेवक लक्ष्मण सफाई कार्यों मे रत थे ताकि गायों के चारागाहों से बापसी के पूर्व उनके स्थलों की सफाई हो जाय। इसी बीच गायों के दो नन्हें छौने जो 5-7 दिनों के थे को देखना किसी आनंद कौतूहल से कम न था। इसीबीच दो नन्हें बाल गोपाल बाग से कुछ तोतापरी आम को अपने दोनों हाथों से समेटने की असफल कोशिश करते दिखाई दिये जो किसी विजेता की तरह आमों को समेटे चले आ रहे थे,  मानों कोई बड़ा युद्ध जीत कर  गर्वोन्माद भरे विजेता की तरह आ रहे हों।  

स्थानीय  लोगो और पुलिस की मिलीभगत से, चंद पैसों के लिए लोग कार और दोपहिया वाहनों को मंदिर परिसर तक लाते और ले जाते दिखे। अपने देश मे ऐसे नव धनाढ्यों मूढ़ों  का एक ऐसा वर्ग, वाहनों को बिल्कुल मंदिर तक ले जाने मे अपनी शेख़ी, अकड़ और घमंड दिखलाता मिल जाएगा जो पैदल चलने वालों को कठिनाई और यातायात मे बाधा उत्पन्न कर अपने राजनैतिक रसूख का घटिया प्रदर्शन करता नज़र आयेगा। उनके चेहरों पर, अपने इस भौड़े  दिखावे से वे समाज मे अपने श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित नज़र आते हैं,  जिसके कारण परिक्रमा कर रहे आम श्रद्धालुओं को आवागमन मे अव्यवस्था और कठिनाइयों का सामना करना  पड़ता हैं। प्रशासन को पार्किंग स्थल पर ही वाहनों को, रखवा कर इस समस्या का समाधान सख्ती से  करना चाहिये।

कुल मिला कर तेलेंगाना के रंगारेड्डी जिले के इस अति प्राचीन मंदिर के दर्शन  और ग्रामीण परिवेश मे घूमना मन को अति प्रसन्नता और आनंद का भाव दे गया जो दशकों तक मेरे स्मृति पटल पर अंकित रहेगा।

चिरकुल बालाजी की जय!     गोविंदा!!  गो..........विंदा!!!  

विजय सहगल   

 

   

गुरुवार, 29 मई 2025

मानवीय संवेदनाओं का शहर, भूटान की राजधानी थिंपु

 

"मानवीय संवेदनाओं का शहर, भूटान की  राजधानी थिंपु"






26 अप्रैल 2025 की दोपहर बागडोगरा  से भूटान के फुएंत्शोलिंग की लगभग 155 किमी की थकाऊ यात्रा के पश्चात, रात मे, भूटान के फुएंत्शोलिंग मे  एक अच्छी नींद आयी। 27 अप्रैल 2025 को प्रातः 7 बजे,  ग्रुप के लोग फुएंत्शोलिंग  से भूटान की राजधानी थिंपु की लगभग 145 किमी की यात्रा पर जाने के लिए उत्साह और उमंग से तरोताजा हो तैयार थे।  पिछले दिन पहली विदेश यात्रा का कौतूहल, जोश  या यूं कहें कि नशा उतरना शुरू हो चुका था। ग्रुप के कुछ लोग तो आपस मे  पूर्व परिचित थे, फिर  भी कल के मुक़ाबले आपसी भाईचारा और समंजस्य कुछ ज्यादा और घनिष्ठ  हो चुका था। महिला मण्डल के सदस्य  भी आपस मे शक्ल सूरत के साथ, नाम और उपनाम से भी  परिचित होकर एक दूसरे से घुलमिल गये थे। यात्रा की उमंग और जोश इतना था कि हमारे ग्रुप के एक सदस्य राकेश चतुर्वेदी का एक सूटकेस किसी दूसरी बस मे चढ़कर आगे चला गया, उनका इस तरफ ध्यान ही नहीं गया।  गनीमत थी कि वह अपरिचित बस भी थिंपु जा रही थी और उनका सूटकेस वहाँ मिल गया।

कैसे एक समान सोच के लोगो द्वारा मिलजुल कर ऊंचे  लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है, सफाई के मामले मे जिसका सटीक उदाहरण  मैंने अपने ब्लॉग दिनांक 13 अप्रैल 2025 मे शेगाँव मे गजानन महाराज मंदिर के प्रबंधन की भूरि-भूरि प्रशंसा कर किया था। (https://sahgalvk.blogspot.com/2025/04/blog-post_13.html) बड़े से बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये कैसे समान विचारों के लोगो के  समूहिक प्रयास से, किसी छोटे से गाँव को एशिया का सबसे साफ सुथरा  गाँव बनाया जा सकता है, ये मेघालय के एक छोटे से गाँव मौलिन्नोंग को देख कर सहज ही लगाया जा सकता हैं। ब्लॉग दिनांक 21 जनवरी 2023  (https://sahgalvk.blogspot.com/2023/01/blog-post_21.html)। लेकिन कैसे एक देश की जनता द्वारा अपने समूहिक सद्प्रयास से साफ सफाई जैसे, सर्वोच्च लक्ष्यो की प्राप्ति के लिए किए गए सार्थक प्रयासों के नतीजों का एक सटीक उदाहरण आज मैंने भूटान यात्रा के दौरान देखा।    

लगभग तीन साढ़े तीन घंटे की यात्रा के दौरान या यूं भी हर पैमाने पर दोनों देशों की तुलना करना एक मानवीय स्वभाव होता हैं और निष्पक्ष भाव से हर विषय की  समीक्षा करना, उसे स्वीकारना और उसे प्रदर्शित करना एक आदर्श स्थिति होती हैं। हो सकता है कि हम लोगों मे  से, बहुतों ने विभिन्न देशों की यात्रा की हो जहां साफ सफाई की अच्छी और आदर्श  व्यवस्था देखी हो, लेकिन देश के बाहर किसी देश मे साफ सफाई की इतनी अच्छी स्थिति को अवलोकन, मेरे लिये पहला अनुभव था। सड़क के दोनों ओर कहीं कोई पन्नी, प्लास्टिक बोतल, चिप्स नमकीन के खाली पाउच, सिगरेट के पैकेट या पान तंबाकू की पुड़ियाँ  दूर दूर तक कहीं  नज़र नहीं आयी। लोगो के समूहिक प्रयास से, घर की साफ-सफाई से लेकर, पड़ौस फिर नगर और देश की सफाई तक के परिणाम ऐसे ही सद् प्रयासों से संभव हो सकते हैं जिसे मैंने भूटान मे साक्षात देखा।

पैमाना मात्र साफ सफाई ही नहीं था, रास्ते मे कहीं बहुत भारी यातायात नहीं था। दक्षिण एशिया के हिमालय क्षृंखला मे स्थित यह एक  बहुत छोटा देश हैं जिसकी जनसंख्या आठ लाख से भी कम हैं। राजधानी थिंपु की तरफ जाने या आने वाले वाहनों मे कहीं कोई हॉर्न सुनने को नहीं मिला। पता चला हॉर्न वर्जित का निशान भी  भूटान मे कहीं  देखने को नहीं मिलेगा क्योंकि अनावश्यक रूप से हॉर्न बजाना भूटान के नागरिकों के संस्कार मे ही नहीं है।   

  



रास्ते मे करीब साढ़े ग्यारह बजे जब हम चाय पान हेतु एक रेस्टुरेंट मे रुके तो उसके बोर्ड पर उसके  नाम को सरसरी तौर पर पढ़ने की भूल  कर बैठा और  कुछ चौंका! बोर्ड पर सहगलों, रेस्टुरेंट एंड  बार देख कर सोचने को मजबूर होना पड़ा कि इस दूर दराज भूटान मे "सहगल साहब" कहाँ से आ टपके? जब ध्यान से देखा तो दरअसल उस पर शेलगोन (Shelgoen) रेस्टुरेंट एंड बार लिखा था। खैर...। भूटान मे दो  शहरों के बीच राष्ट्रीय राजमार्गों मे दुकाने, मकान आदि काफी कम हैं। लेकिन जितने भी व्यापारिक संस्थान हैं उन पर सभी कुछ उपलब्ध रहता है जैसे कच्ची सब्जी-भाजी, खाना-नाश्ता, चाय-कॉफी, स्नेक्स, स्टेशनरी  और साथ मे सिगरेट, अँग्रेजी शराब तो आवश्यक रूप से उपलब्ध रहेगी ही। कहीं भी दीर्घ या लघु शंका का निवारण यहाँ अपराध है अतः सरकार और लोगो की सहभागिता के आधार पर व्यापारिक संस्थानों या सार्वजनिक स्थानों पर सशुल्क/निशुल्क टॉइलेट की व्यवस्था उपलब्ध रहती है।

सामान्य शिष्टाचार भूटान की सांस्कृति का एक अंग हैं। मैंने भूटान की भाषा एक शब्द "कुजूजाम्बो" या "कुजूजाम्बोला" अपने भूटानी गाइड से सीख लिया था जिसका अभिप्राय अभिवादन से था। किसी भी भूटानी नागरिक से यदि आप भूटानी भाषा का शब्द  "कुजूजाम्बो" या "कुजूजाम्बोला" कहेंगे तो चेहरे पर मुस्कराहट के साथ, वह भी आपका अभिवादन "कुजूजाम्बो" या "कुजूजाम्बोला" बोल कर कहेगा। इस रामबाण शब्द का उपयोग मैंने अपनी भूटान की यात्रा मे होटल स्टाफ, बौद्ध भिक्षुओं, स्कूली बच्चों, बाज़ारों एवं  अन्य  बूढ़े और नौजवानों  से  खूब किया, जिससे भूटान के लोगो से परस्पर बातचीत की शुरुआत करने मे और उनके बारे मे जानने समझने मे  काफी सहजता से सहायता मिली।





लगभग दो बजे, दोपहर तक हम लोग भूटान की राजधानी थिंपु पहुँच गये थे। खाली पेट राजधानी थिंपु का सौन्दर्य आँखों से ओझल था, क्योंकि कहावत हैं कि भूंखे भजन न होय गोपाला.......। एक अच्छे रेस्टोरेन्ट मे जब स्वादिष्ट भोजन से तृप्ति हुई, तब कहीं जा कर भूटान की राजधानी थिंपु की शोभा, सुंदरता और सौन्दर्य  दिखलाई दिया। खाने की बात चली तो लगे हाथ अपने पाठकों को ये भी बतलाते चलें कि, अपने दिल से ये गलतफहमी निकाल दे कि भूटान मे शाकाहारी खाना मिलने मे कठिनाई होती होगी। शाकाहारी तो था ही, साथ ही   आपको बगैर लहसुन-प्याज का जैन खाना भी पूर्व सूचना पर उपलब्ध हो सकता है वह भी एक बेहतरीन स्वाद के साथ, क्योंकि हमारे ग्रुप मे कुछ सदस्य जैन खाना ही खाने वाले थे।



भीड़-भाड़ से दूर, थिंपु एक छोटा सा लेकिन अनुशासित शहर है। एक दम शांत और सरल लोग। देश की राजधानी के मुख्य बाज़ार क्लॉक टावर के नजदीक, मुख्य चौराहे पर, बिना हॉर्न के, वाहनों की आवाजाही, चौराहे पर बिना लाल हरी बत्ती के शांत आवागमन देखने को मिला।  अपने देश की राजधानी दिल्ली की तुलना मे, यहाँ भूटान, यातायात पुलिस, की आँख के इशारे से बेहद धीमी गति से वाहनों को चौराहे के आर-पार, जाता देखना कल्पना के परे थे। आपने सड़क पार करने के लिये जैसे ही ज़ेब्रा क्रॉसिंग पार पैर रक्खा नहीं, कि सामने से आने वाले कार ड्राईवर स्वतः ही अपने वाहन को आपके, सड़क क्रॉस करने तक रोके रहेंगे। पैदल चलने वाले लोगो को सड़क पार करने को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के नियम को भूटान मे बड़ी तव्वजों दी जाती है। इस बात के परीक्षण हेतु मैंने अपने एक साथी राकेश सिन्हा को जान बूझ कर ऐसा करने के लिये सड़क पार भेजा, मुझे खुशी है भूटान इस परीक्षा मे पूरी तरह सफल रह। दो वाहनों के बीच समुचित दूरी रखने का रिवाज़ को देखना भी अच्छा लगा।  

भूटान की अपनी पारंपरिक वेषभूषा मे नज़र आएंगे। भूटान के लोग अपने पहनावे के प्रति भी काफी सजग हैं। देश के सर्वोच्च पदासीन राजा से लेकर सरकारी अधिकारी, कर्मचारी पुरुषों द्वारा पूरी बाहों का, घुटनों तक पहने जाने वाले वस्त्र को "घो" कहा जाता है जिसको कमर पर एक बेल्ट ("केरा") से बांधा जाता है। महिलाओं द्वारा पैरों तक लपेट कर पहने जाने वाले वस्त्र को किरा कहते हैं। भूटान के नागरिक अपनी वेषभूषा और अपने राजा-रानी के प्रति बड़े भावुक और संवेदनशील हैं। वे राजपरिवार के प्रति गहरी निष्ठा और सम्मान का भाव रखते हैं। शाही परिवार के प्रति किसी भी तरह के असम्मान और अनादर को गंभीरता से लेते हैं। भूटान मे आए पर्यटकों, आगंतुकों और अतिथियों के प्रति भी भूटान के लोगों के मन मे गहरा  आदर भाव है। भूटान मे, भारतीय सांस्कृति के "अतिथि देवो भवः" को सही मायनों मे धरातल पर कार्यरूप मे परिणित होते देखना एक सुखद अनुभव था।



इन्ही दिनों थाईलैंड के राजा का आगमन भूटान मे था। पूरे रास्ते मे शुभागमन का शुभ संदेश देते भूटान के रंगबिरंगे झंडे, थाई नरेश के स्वागत मे लगाये गये थे। जगह जगह भूटान राज परिवार की  आदम कद फोटो, थाई किंग के साथ चौराहों, भवनों और अन्य सरकारी इमारतों पार लगाई गयी थी। इसी कारण जगह जगह सड़कों का मार्ग परिवर्तित कर वाहनों को ले जाया जा रहा था। आज थाई राजा की स्वदेश बापसी थी।  अतः स्कूली बच्चों को उनकी बिदाइ के रास्ते मे दोनों राष्ट्रों के ध्वजों के साथ बड़ी संख्या मे देखा गया। गाइड ताशी ने बताया भारत के प्रधानमंत्री मोदी के बाद किसी राष्ट्र प्रमुख के राष्ट्रगमन पर, ऐसा शाही स्वागत  दूसरी बार हुआ है।                                                     

                                                               ..................जारी।

विजय सहगल

                        

  

शनिवार, 24 मई 2025

सेना के शौर्य पर, नेताओं के बिगड़े बोल

 

"सेना के शौर्य पर, नेताओं के बिगड़े बोल"





पहलगाम मे पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा 22 अप्रैल 2025 को 26 निर्दोष पर्यटकों की जघन्य हत्या से उपजे ऑपरेशन सिंदूर के तहत 6-7 मई 2025 की रात  को भारत ने पाकिस्तान के 9 आतंकवादि ठिकानों पर एक साथ भारतीय ड्रोन और मिसाइलों से आक्रमण कर उन्हे मिट्टी मे मिला दिया। यही नहीं 10 मई 20225 को भारतीय ड्रोन और मिसाइलों, जिनमे ब्रह्मोस मिसाइल भी शामिल थी, ने पाकिस्तान के अनेकों  हवाई अड्डों को भी तहस नहस कर धूल धूसरित कर दिया। भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने अपने  सटीक निशाने और अचूक  लक्ष्यों को भेद कर अपने अदम्य  साहस और शौर्य का परिचय देते हुए, पाकिस्तान के एक सौ से भी ज्यादा उग्रवादियों को मौत के घाट उतार दिया। भारतीय सेनाओं के अटूट  पराक्रम, वीरता और दिलेरी पर सारे राष्ट्र ने एक स्वर से उन्हे नमन करते हुए  उनका अभिनंदन और अभिवादन  किया।

जब भारतीय सेना की दिन प्रति  दिन की कार्यवाही की सूचना, प्रेस के माध्यम से देश और दुनियाँ को देने की ज़िम्मेदारी  कर्नल सोफिया कुरैशी और वायु सेना की विंग कमांडर व्योमिका सिंह द्वारा  दी गयी तो सारी दुनियाँ ने भारत के इस कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की। एक ओर  जिन पाकिस्तान परस्त, आतंकवादियों ने, धूर्तता पूर्वक, पहलगाम मे उन 26 महिलाओं के सुहाग को उजाड़ कर अपनी राक्षसी हैवानियत के माध्यम से पाकिस्तानी समाज मे स्त्रियों की दिशा और दशा के   हालातों पर अपनी कुसांस्कृति और कुसंस्कारों  के स्याह पक्ष को  उजागर किया, वहीं दूसरी ओर भारतीय सेना और सरकार ने भारतीय वीरांगनाओं को, सेना के साहस और पराक्रम की  रिपोर्टिंग की ज़िम्मेदारी देकर,  महिलाओं को भारतीय संस्कृति और संस्कारों के उस कथन, "यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" को चरितार्थ किया।

भारतीय राजनीति का ये दुर्योग हैं कि देश के चंद  राजनैतिक दल और उनके नेताओं ने अपनी संकीर्ण सोच और संकुचित मानसिकता के चलते अपनी बुद्धि और विवेक का परित्याग कर, अपने राजनैतिक हितों की स्वार्थ पूर्ति और हितलाभ  के चलते सार्वजनिक मंचों से, जो मन मे आया, उल-जलूल बोला। दल और विचारधारा से परे देश  के राजनैतिज्ञों को हर विषय मे निरंतर बोलने की बुरी आदत हैं, फिर वे चाहे उस विषय विशेष मे प्रवीण भले ही न हों। अपनी  ओछी  नैतिकता और घृणित मानसिकता के चलते इन महारथियों ने  सारी मर्यादाएं तार-तार कर दी। इन अवांछित आरोप-प्रत्यारोप मे, विपक्ष के राष्ट्रीय स्तर के नेता ही नहीं अपितु सत्ता और सरकार के वे नेतागण भी शामिल हैं जिनकी नैतिक ज़िम्मेदारी थी कि सामान्य बोलचाल मे वे मर्यादाओं का पालन करते हुए राजनीति मे एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करते।

यहाँ तक तो फिर भी  ठीक था लेकिन दुःख और संताप तो तब हुआ जब ऑपरेशन सिंदूर के चलते इन अशिष्ट और निर्लज्ज नेताओं ने भारतीय सेना को अपनी तुच्छ और छुद्र राजनीति के चलते, जाति और धर्म के आधार पर बांटने की ढीठ और बेशरम  कोशिश की। भारत की जिस एक सौ चालीस करोड़ जनता ने सेना की वीरता और बहदुरी को नमन किया, वहीं  मध्य प्रदेश सरकार के उपमुख्यमंत्री विजय शाह ने अपने अविवेक पूर्ण वक्तव्य मे भारतीय सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी को आतंकी दुश्मनों के साथ उद्धृत कर अपने अल्पज्ञान का परिचय दिया। विजय शाह के वक्तव्य की गंभीरता और विषय की नाजुकता को इस बात से आँका जा सकता हैं कि उनकी  इस कुत्सित टिप्पड़ी का स्वतः संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा न केवल उनके विरुद्ध पुलिस एफ़आईआर दर्ज़ करने का आदेश दिये अपितु उनके वक्तव्य की भर्त्सना भी की। वे जब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो उन्हे वहाँ से भी बुरी तरह फटकार मिली। सुप्रीम कोर्ट ने  पुलिस प्रशासन की विजय शाह के विरुद्ध ढुलमुल एफ़आईआर पर भी नाराजगी प्रकट की। विजय शाह द्वारा दिया गया ये गैरजिम्मेदाराना   ब्यान उनकी अभिव्यक्ति नहीं अपितु  किसी उन्मादी व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध है, जो अक्षम्य है, और जिसकी सजा अवश्य ही मिलनी चाहिये। अभी प्रकरण माननीय सुप्रीम कोर्ट मे विचारधीन हैं और संभावना हैं कि आने वाले दिनों मे मध्यप्रदेश के उन माननीय की मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं। विजय शाह के भारतीय सेना की, कर्नल सोफिया कुरैशी पर दिये  जिस वक्तव्य के लिये  माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लिया गया हो और उच्चतम न्यायालय द्वारा जिस पर  नाराजगी प्रकट कर उनकी फटकार लगायी गयी हो, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा अपने उपमुख्यमंत्री के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करना राजनैतिक अधोपतन, अवनति और अवसाद की पराकाष्ठा  को ही दर्शाता हैं।

इसी क्रम मे समाजवादी पार्टी के सांसद प्रोफेसर राम गोपाल यादव ने वायु सेना की विंग कमांडर व्योमिका सिंह (जिनके नाम का सही उच्चारण तक माननीय प्रोफेसर साहब नहीं कर सके) और एयर मार्शल ए के भारती की जाति का उल्लेख कर सारी नैतिक मर्यादाएं तार-तार कर, अपनी घृणित मानसिकता और संकुचित सोच का परिचय दिया, जिसकी जितनी भी निंदा की जाय कम है। सेना मे शामिल होने का एक मात्र आधार सैनिकों की शूरवीरता, साहस और शौर्य ही हैं। देश के लिये समय आने पर अपने प्राणों की आत्मोत्सर्ग ही भारतीय सेना के वीर जवानों की एक मात्र पहचान हैं जिसके लिये  देश का सम्पूर्ण जनमानस उनके सामने नतमस्तक हो उनका वंदन और अभिनंदन करता हैं।      

जिम्मेदार पदों पर विराजमान व्यक्तियों, नेताओं और गणमान्य हस्तियों द्वारा किसी भी विषय मे टिप्पड़ी करते समय देश, काल और पात्रों को दृष्टिगत अपने  शब्दों, वाक्यों और वाक्यांशों के क्रम का  ही नहीं अपितु विराम, पूर्ण विराम और अर्ध विराम का भी ध्यान रखना चाहिये अन्यथा अर्थ का अनर्थ होने से विवाद और तकरार की पूरी संभावना बनी रह  सकती हैं। मध्य प्रदेश के एक अन्य मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा भी इसी का शिकार हुए। उन्होने ऑपरेशन सिंदूर की प्रशंसा का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को देते हुए न केवल देश के नागरिकों अपितु सेना के जवानों को, उनके चरणों मे नतमस्तक होने का श्रेय भी  दे दिया। यदि उन्होने  शब्दों और वाक्यों  का चयन सही तरह से किया होता, तो ऐसी अवांछित और अप्रिय स्थिति का सामना न करना पड़ता।

पाकिस्तान के  अनेकों हवाई अड्डों को नेस्तनाबूद कर सैकड़ों आतंकवादियों और पाकिस्तान के अनेकों सैनिकों को मारने के बाद,  पाकिस्तान के डीजीएमओ के अनुनय विनय पर भारतीय सेना के डीजीएमओ द्वारा युद्ध विराम स्वीकृत करने के निर्णय से समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी  अप्रसन्नता और असहमति प्रकट की। यूं भी सरकार के हर कदम और निर्णय की मुखालफत करने वाले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष ने, अमेठी मे 15 मई 2025 को अपने वक्तव्य मे युद्ध विराम की आलोचना करते हुए कहा, कि "जीत का जश्न मनाया जाता है, युद्ध विराम का नहीं"। उन्हे आतंकी अड्डों, सैकड़ों  आतंकवादियों और पाकिस्तान के हवाई अड्डों को मिट्टी मे मिलाये जाने पर उस भारतीय सेना की जीत दिखाई नहीं दी जिसके मुखिया,  कभी उनके पिता स्वयं  श्री मुलायम सिंह यादव हुआ करते थे।            

आशा की जानी चाहिये कि  देश के राजनैतिक दल अपनी निजिस्वार्थ और संकीर्ण मानसिकता से उपर उठ एक स्वर मे उस  सेना के शौर्य और साहस को नमन करेंगे जिसकी प्रशंसा सारी दुनियाँ कर रही है। सेना के साहस और शौर्य को नमन करते हुए,  हम सभी देशवासी अपनी सेना के साथ एकजुटता का परिचय देंगे।  

विजय सहगल

              

बुधवार, 21 मई 2025

भूटान - गरजते ड्रेगन की भूमि" (शहर-फुएंत्शोलिंग)

 

"भूटान - गरजते ड्रेगन की भूमि" (शहर-फुएंत्शोलिंग)"









भूटान मेरे लिए दो मायनों मे विशेष महत्व रखता है। पहला सन् 1965 मे पहली कक्षा के दौरान  हमारे साथ एक छात्र था जिसके पिता सेना के किसी उपक्रम मे पदस्थ थे उसका नाम तो याद नहीं लेकिन और उस का  उपनाम भूटानी था, तब मेरा  पहली बार भूटान शब्द से परिचय हुआ था। दूसरा  आज, 26 अप्रैल  2025 मे मुझे पहली बार आधिकारिक रूप से विदेश यात्रा के रूप मे  भूटान से रु-ब-रु होने का अवसर मिला। यूं तो अनाधिकारिक रूप से सिक्किम यात्रा के दौरान मित्र राष्ट्र होने के कारण नेपाल के पशुपति नगर मे 1-2 घंटे भ्रमण करने का सौभाग्य, आधार और मोबाइल नंबर की बुनियाद पर  मिला था, पर पासपोर्ट पर अधकारिक रूप से मित्र राष्ट्र भूटान की "आगमन पर वीज़ा" नीति के तहत बकायदा सील ठप्पा लगा कर आधिकारिक अनुमति से मिलने वाली  खुशी और  रोमांच के  अनुभव की  कुछ अलग ही बात थी।

यूं तो मैंने अपने यात्रा प्रवासों के दौरान अमृतसर और तुरतुक मे पाकिस्तान सीमा, नाथुला पास मे चीन सीमा, मेघालय की उमंगोट या दावकी नदी मे बांग्लादेश की सीमा और मिरिक मे नेपाल सीमा को अपने देश की सीमाओं से खड़े होकर, गर्व से  देखने का जो सुख, सौभाग्य और संतुष्टि से उत्पन्न  रोमांच  को देखा उसे  शब्दों मे बयान नहीं किया जा सकता। ऐसा ही कुछ गर्वोन्माद, उल्लास और उत्साह भूटान देश की यात्रा के दौरान मैंने अनुभव किया। ऐसी मंगल भावनाएं यूं ही नहीं थी क्योंकि भूटान हमारा सबसे निकटस्थ और विश्वसनीय, मित्र राष्ट्र जो ठहरा!!

हम 11 परिवारों के 22 सदस्यों की तैयारी हमारे मित्र श्याम टंडन के नेतृत्व मे बैसे तो 2-3 महीने पहले से चल रही थी पर एन वक्त पर यात्रा इन्शुरेंस के आभाव मे यात्रा की उम्मीदों  पर  तुषारपात होने वाला था लेकिन उनकी तत्परता से उक्त संकट से उबर कर हमारे ग्रुप ने  26 अप्रैल 2025 को जलपाई गुड़ी के बागडोगरा से अपनी भूटान यात्रा आरंभ की। दोपहर मे भूटान मे प्रवेश के लिए हमे भारत के पश्चिमी बंगाल के जयगाँव तक की लगभग 140 किमी की यात्रा करनी थी। राष्ट्रीय राजमार्ग तो ठीक था पर जयगाँव शहर मे घुसते ही अहसास हो गया कि हम सचमुच ही किसी गाँव मे हैं। रास्ता गड्ढों, टूटी सड़कों और उड़ती धूल से धूल-धूसरित था। नाम भले ही जयगाँव हो लेकिन भूटान के प्रवेश द्वार और उससे लगती सीमा के कारण इसे बड़ा शहर कहना न्यायोचित होगा। लगभग आधा-पौना घंटे हिचकोले खाते हुए हमे हमारे टूर गाइड ने सूचित किया कि अब हमे बस और उसमे अपना सामान  छोड़ कर,  सौ-दो सौ कदम पैदल चल कर भूटान मे प्रवेश करना पड़ेगा। पहचान के लिए पासपोर्ट साथ मे रखने की भी सलाह गाइड ने दे दी थी। जयगाँव के बाजार की गली कूँचों से हमारा ग्रुप एक साथ ऐसे आगे बढ़ रहा था जैसे बगैर दूल्हे की छोटी सी बारात! एक 7-8 फुट चौड़ी गली मे स्टेशनरी किराने की दुकान के सामने बने एक छोटे से दरवाजे के अंदर प्रवेश करते ही भारतीय सीमा सुरक्षा दल के कर्मी द्वारा हमारे  पासपोर्ट से हमारी पहचान की गई। कहीं कोई ऐसा तामझाम देखने को नहीं मिला जो ये महसूस हो कि भारत-भूटान देशों की सीमा से भूटान मे प्रवेश कर रहें हों।  चंद कदमों के बाद ऐसी ही पहचान की औपचारिकता  भूटान की रॉयल पुलिस द्वारा की गई और अब  हम भूटान मे थे। इतनी सहजता और सरलता से किसी देश की सीमा मे प्रवेश करना, सहसा विश्वास नहीं हुआ। एक लंबे गलियारे से होकर भूटान के एक दूसरे काउंटर पर एक-एक करके पासपोर्ट की प्रविष्टि कर फोटो खींची गयी। अब हम आधिकारिक रूप से भूटान मे प्रवेश के लिए तैयार थे। भूटान मे प्रवेश करते समय पास ही के एक हाल से बड़ी संख्या मे लोगो का आना जाना देख कर जिज्ञासा हुई कि ये कौन लोग हैं जो हमारे साथ आते जाते तो नहीं दिखे? मेरे गाइड टाशी ने हमे बताया कि ये  भारत/भूटान  के  वो नागरिक हैं जो मतदाता पहचान पत्र के आधार पर भूटान मे प्रवेश करते हैं, जो भूटान आना चाहते हैं। ऐसे भारतीय नागरिकों को सिर्फ 24 घंटे के लिए बिना किसी औपचारिकता के भूटान आने और रुकने की अनुमति हैं। इन भारतीय नागरिकों को 24 घंटे से ज्यादा एक मिनिट भी अतिरिक्त रुकने पर भूटान के क़ानूनों के अंतर्गत आवश्यक आव्रजन शुल्क जो लगभग   सौ बारह रुपए प्रतिदिन होता है भूटान सरकार को देना पड़ेगा अन्यथा अनधिकृत प्रवेश के आधार पर कानूनी कार्यवाही किए जाने का प्रावधान है। इसलिए भूटान की सीमा पर मेट्रो स्टेशन की तरह, यहाँ मशीने लगा कर प्रवेश/निकासी का रिकॉर्ड रक्खा जाता हैं। इसके विपरीत भूटान के नागरिकों को भारत मे कभी भी कितने दिन, महीनों और वर्ष तक भारत मे रहने की अनुमति हैं। वे भारत मे शिक्षा, संपत्ति और व्यापार विना किसी पूर्व अनुमति के ग्रहण कर सकते हैं। ऐसा भारत मे भूटान की विशेष स्थिति और अति घनिष्ठ/पसंदीदा  राष्ट्र होने के कारण भूटान को प्राप्त हैं।  यही कारण हैं कि भूटान की विदेश नीति, दोनों राष्ट्रों के आपसी सहयोग और विचार विमर्श कर, तय की जाती हैं। इसलिए ही दोनों देशों के नागरिक मुक्त रूप से बारंबार आवागमन कर सकते हैं।   

इस औपचारिकता के बाद अब हम भूटान के फुएंत्शोलिंग शहर मे थे। सामने दिखे बाज़ार, होटल और अन्य व्यापारिक संस्थानों, ट्रेफिक के अनुशासन, भूटान की नागरिकों के पहनावे  और भीड़-भाड़ मे एक दम कमी दिखना का, स्पष्ट बदलाव महसूस किया जा सकता था। पास मे ही पैदल हम लोग  अप्रवासन कार्यालय मे  भूटान आगमन से  3 मई 2025 तक के प्रवास  की अनुमति की औपचारिकता शीघ्र अतिशीघ्र सम्पन्न कर बाज़ार मे चहल कदमी करने लगे। हमारा सामान भी बस सहित भूटान मे वाहनों के आवागमन के लिए बने एक बड़े प्रवेश द्वार से पहुँच चुका था। सामने ही भारत पेट्रोलियम के पेट्रोल पंप पर वाहनों की लंबी कतार को देख पूंछना लाज़मी था। भूटानी गाइड टाशी द्वारा बताया गया कि भूटान मे पेट्रोल, डीज़ल का रेट लगभग 59 रुपए/लीटर हैं।  अतः भारत से आने वाले प्रायः सारे दोपहिया और चार पहिया वाहन, भूटान से पूरा ईधन भरा कर बापस जाते हैं, जहां ईधन 107 रुपए लगभग हैं। इस शहर से आगे भारतीय वाहनों को भूटान मे प्रवेश की अनुमति साधारत: नहीं हैं अन्यथा लगभग ढाई हजार रुपए प्रतिदिन का शुल्क देय है। अब तक रात के 7 बज (भूटान मे 7.30, भूटान का समय भारतीय समय से आधा घंटे आगे हैं) चुके थे। फुएंत्शोलिंग मे ही हमारे रात्री रुकने की व्यवस्था थी, अतः फुएंत्शोलिंग मे ही रात्री भोजन कर हम लोग अपने अपने कमरों मे प्रस्थान कर गये।

उन दिनों, जब भूटान और भारत की सीमा स्पष्ट नहीं थी तब भूटान के रॉयल परिवार की राजमाता आशी फुंटशो   ने 1967 मे भूटान की सांस्कृति, सभ्यता और संस्कार को प्रदर्शित करने के लिए भारत भूटान सीमा पर खरबंदी गोम्पा बौद्ध मठ को बनवाया था। बौद्ध मठ से लगे हुए परिसर मे ही भूटान के शाही परिवार का महल भी बना हुआ है जिसका वास्तु भूटान शैली मे ही बनाया गया हैं। यहाँ बने एक व्यू पॉइंट से भारत और भूटान की सीमाओं, तीस्ता नदी और उसके पीछे भूटान के हरे भरे पर्वतों को स्पष्ट देखा जा सकता हैं। पूरे भूटान मे सभी घरों, बहुमंज़िली इमारतों व्यापारिक संस्थानों के ऊपरी मंजिल की बनावट एक तरह से हैं। टीन की रंगबिरंगी इमारतों की छत्तों को एक रूप से ढांक कर बनाया गया हैं जो भूटान की एक विशेष पहचान हैं। यही पहचान यहाँ फुएंत्शोलिंग मे भारत-भूटान सीमा पर बने  घरों, आवासों, बहू मंजिली इमारतों को भी इस व्यू पॉइंट से स्पष्ट रूप से विभाजित किया जा सकता हैं।

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विजय सहगल