#शेगाँव
(जिला बुलढाणा)-महाराष्ट्र#
यूं तो महाराष्ट्र की भूमि मे अनेक
साधू-संत-महात्मा हुए हैं जिन्होने अपने कार्यों द्वारा श्रीमद्भगवत गीता मे भगवान
श्री कृष्ण के बताए अनासक्त भाव से कर्म करने के भाव को कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन.........के माध्यम
से साकार कर मानव मात्र का पथ प्रशस्त
किया हैं। संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत तुकाराम, संत एकनाथ, समर्थ रामदास, संत
गजानन महाराज सहित एक लंबी सूची हैं। 1988-89 मे ग्वालियर सेवा के दौरान माधव नगर
मे अपने प्रवास के दौरान मैंने अपने भवन स्वामी, श्री सुरेश
शंकर सोमनी के घर एक फोटो देखी थी जिसमे एक संत चिलम पीते हुए दिखाई दिये थे।
उन्होने बताया था कि ये महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत श्री गजानन महाराज जी का चित्र
हैं जिनकी महाराष्ट्र मे काफी मान्यता हैं और हम लोग इनके प्रति बड़ा श्रद्धा और
समर्पण का भाव रखते हैं। 23 और 24 मार्च
2025 को स्वामी श्री गजानन महाराज की कर्मस्थली शेगाँव के
दर्शन का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ।
बुरहानपुर से 125 किमी की सड़क यात्रा आराम से तीन लगभग घंटे मे
पूरी कर हम महाराष्ट्र स्थित स्वामी श्री
गजानन महाराज की कर्म भूमि, शेगाँव
पहुँच गये। किसी भी शहर मे पहुँचने के पहले सबसे पहला काम आवास की व्यवस्था करना
होता हैं। कुछ लोगो से मुझे जानकारी मिली थी कि शेगाँव
मे श्री गजानन महाराज मंदिर ट्रस्ट की अति उत्तम व्यवस्था हैं। यूं तो शेगाँव एक
छोटा सा कस्बा हैं पर यहाँ की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं पर
ही निर्भर हैं। एकादशी या अन्य हिन्दू पर्वों पर यहाँ दर्शनार्थियों की काफी भीड़
आती हैं। समान्यतः 15-20 हजार भक्त शेगाँव मे हर रोज ही आते हैं और इन सामान्य
दिनों मे शेगाँव मे मंदिर दर्शन और मंदिर ट्रस्ट के आवास की कोई बहुत समस्या नहीं
रहती, परंतु पूरे संवाद के अभाव मे मै मंदिर के
पास स्थित भक्त निवास मे आवास के तलाश मे पहुँच गया। आवास हेतु दर्शनार्थियों की
लंबी लाइन थी, बताया गया कि 3-4 घंटे
का प्रतीक्षा समय लग सकता हैं।
ट्रस्ट के कुछ अन्य लोगो से पूंछ-तांछ करने
पर पता चला कि इस भक्ति निवास के अलावा 1-2 किमी पर अन्य आवास गृह आनंद-बिहार और
विश्रांवा मे वातानुकूलित व्यवस्था भी हैं। हम भक्तिनिवास से आनंद बिहार मे आवास
हेतु पहुंचे। संस्थान के कर्मचारियों का व्यवहार सहयोगात्मक था। उन्होने बताया कि
यहाँ सुविधा जनक आवास कुछ ज्यादा राशि पर लगभग आधा घंटे मे पहले आओ-पहले पाओं की
नीति पर सभी को उपलब्ध हो जाते हैं। लगभग 20-25 मिनिट मे एक साधारण फॉर्म भरकर
देने पर मुझे वातानुकूलित 3 बेड रूम उपलब्ध हो गया। तीन,
चार, पाँच,
छह विस्तर वाले इस परिसर मे यहाँ 550 कमरे थे।
पूरे परिसर की सफाई की सफाई व्यवस्था देख कर मै आश्चर्य चकित था। नजदीक ही रूम था पूरा परिसर एक विशाल हाउसिंग
सोसाइटी की तरह था, जहां तीन तीन मंज़िला
आवास की हर मंजिल पर 4-से- 6 तक कमरे थे।
कमरा एक-दम साफ सुथरा था जिसमे एक सोफा,
टेबल, अलमिरा था,
दो तौलिया, साबुन,
कपड़े सुखाने के लिए स्टैंड के साथ अटैच
लैट्रीन बाथरूम थी। हर फ्लोर पर ठंडे पानी की समूहिक व्यवस्था थी। मेरा
मानना हैं कि 850/- रुपए मे इतनी सुविधाओं युक्त कमरा सामान्यतः यहाँ की कीमत से
तीन गुना कीमत पर भी शायद ही मिले और कमरा सहित पूरे परिसर की इतनी सफाई,
किसी पाँच सितारा होटल से कम न थी। परिसर
मे ही कार पार्किंग और कैंटीन की व्यवस्था थी जहां नाममात्र की कीमत पर स्वल्पाहार,
भोजन, चाय नाश्ता श्रद्धालुओं के लिये उपलब्ध
था। इस परिसर से चौवीसों घंटे भक्तजनों का आना जाना लगा रहता हैं।
कुछ समय बाद फ्रेश होकर हम लोगो ने मंदिर
दर्शन के लिए प्रस्थान करने का निश्चय किया। परिसर से ही मंदिर तक श्रद्धालुओं को
लाने-ले जाने की निशुल्क बस सुविधा उपलब्ध थी। कार पार्किंग के झंझट से बचने के
लिए हमने बस से ही मंदिर जाने के निश्चय किया। बस संस्थान के अन्य आवासीय गृहों से
यात्रियों को छोड़ने और लेने के कारण यात्रियों से भरी थी। बस मे ही एक सहयात्री
श्री संजय शर्मा मिल गये जो परभानी से थे और पहले भी शेगाँव आते रहे थे। जब कार
पार्किंग की बात चली तो उन्होने बताया कि मंदिर ट्रस्ट का एक निशुल्क कार पार्किंग
हैं जिसमे छह हजार कार पार्क की जा सकती हैं। बहुत उत्तम व्यवस्था हैं। लगभग आधा
घंटे मे बस सभी सहयात्रियों को लेकर मंदिर के पास स्थित भक्ति निवास पहुंची जहां
से मंदिर पैदल 10 मिनिट का रास्ता था। शर्मा जी के सहयोग से पहले हम लोगों ने जूते
चप्पल स्टैंड पर रक्खी जहां मंदिर के सेवादार बड़ी श्र्द्धा से इस कार्य को संपादित
कर रहे थे। अब बारी थी मंदिर मे श्री गजानन महाराज की समाधि और मंदिर के दर्शन की जिसे
हम, लाइन का हिस्सा बन आगे बढे। बाहर ही एक
डिजिटल बोर्ड लगा था जिसमे दर्शन का संभावित समय 20 मिनिट दर्शा रहा था। 23 मार्च
रविवार होने के कारण भक्त जनों की भीड़ कुछ ज्यादा थी। धीरे धीरे आगे बढ़ते हुए हम
लोग समाधि की गुफा की ओर बढ़े। विशाल मंदिर प्रांगढ़ मे भी साफ सफाई का पूरा ध्यान
रक्खा जा रहा था। ठंडे पानी की व्यवस्था थी। लाइन मे लगे श्रद्धालुओं के पथ के ऊपर
पंखे, कूलर जगह जगह थे ताकि लोगो को गर्मी उमस
आदि से कष्ट न हो।
श्री गजानन महाराज का जन्म कब और कहाँ हुआ
और उनके माता-पिता कौन थे ये कोई नहीं जनता। पहली बार 23 फरवरी 1878 को शेगाँव के
दो व्यक्तियों श्री बनकट लाला और दामोदर ने गाँव मे एक श्वेत वर्ण बालक को झूठी
पत्तल मे से चावल खाते देखा। बालक मुँह से गं गं गणात बूते,
का मंत्र जाप कर रहा था इसलिये ही बालक को गजानन के नाम से जानने लगे। गजानन के
गाँव मे प्रवास के दौरान लोगों ने बड़े चमत्कार देखें। ईश्वर मे भक्ति,
इंद्रियों मे नियंत्रण एवं जैसे तैसे अपने जीवन से संतुष्टि के कारण लोगो की श्री
गजानन महाराज मे श्रद्धा, समर्पण और भक्ति
बढ़ने लगी। शेगाँव और आसपास के दूर दराज के लोगो के प्रति अनुराग और अपनत्व के कारण
वे नाथ संप्रदाय के एक पहुंचे हुए संत कहलाये। एक बार पंढरपुर मे भगवान बिट्ठल के
समक्ष अपने भक्तों के बीच उन्होने समाधि
लेने के निर्णय की घोषणा कर दी। ऐसा सुन भक्तों मे उदासी छा गयी पर उन्होने अपने
अनुयायियों को समझा कर समाधि के दिन को अवगत करा कर,
8 सितम्बर 1910 मे शेगाँव गाँव के इसी
स्थान पर समाधि ले ली। इस तरह अब हम गजानन महाराज की समाधि के सामने खड़े थे। समाधि
के उपर गजानन स्वामी के सिर की संगमरमर की एक सुंदर प्रतिमा रक्खी थी जिसका उसके
चारों ओर सफ़ेद, नारंगी,
हरे फूलों से सजाया गया था। मध्य मे एक गुलाब के फूल के नीचे वेल्पत्री की तीन
पत्तियों से मूर्ति और उसकी सुंदरता मे एक
अलग ही आध्यात्मिक तेज था। समाधि स्थल के पास ही महाराज की पादुका,
महाराज का चिमटा, औज़ार और चिलम के भी
दर्शन किया। स्थल के सामने ही भगवान शिवलिंग बनाया गया था। साथ ही चाँदी से जड़ित
दंड भी मूर्ति के समीप ही रक्खा था। सैकड़ों
लोग गजानन महाराज के जयकारों के बीच अपनी प्रार्थना उन तक पहुंचा रहा था। लोगो की
ऐसी आस्था और विश्वास हैं कि गजानन महाराज अपने भक्तवत्सल भक्तों की हरेक मनोकामना
पूर्ण करते हैं। गुफा के उपरी तल पर एक
सुंदर श्री राम, सीता और लक्ष्मण का
मंदिर बनाया गया था। सामने ही हनुमान की वो प्रतिमा विरजित थी जिसकी गजानन महाराज
पूजा करते थे। मंदिर के एक अन्य कक्ष मे उनकी गद्दी थी जहां वे अपने भक्तों के साथ
मिलते और बाते किया करते थे।
अब हमलोग मंदिर के दर्शन पश्चात मुख्य मंदिर
के बाहर आँगन मे थे। गर्मी के कारण मंदिर को बड़े से पंडाल से ढँक दिया गया था।
आँगन के चारों ओर बने बरामदे मे मंदिर के साहित्य भंडार,
प्रसाद गृह, चरणामृत कक्ष,
कार्यालय आदि थे जिसके एक तरफ श्रद्धालुओं द्वारा भजन किया जा रहा था। संगीत की
स्वर लहरियों और बाध्य यंत्रों की मधुर आवाज से एक दिव्य आध्यात्मिक वातावरण बन
गया था। स्वर्ण पताका के दर्शन और परिक्रमा कर हम लोग अपने आवास आनंद बिहार बापस आ
गए।
24 मार्च 2025 को प्रातः ही हमने एक बार
पुनः अपनी कार से ही मंदिर मे जाकर गजानन महाराज के मुख दर्शन किये। कार को
संस्थान के पार्किंग मे रक्खा जहाँ बड़े भारी क्षेत्र मे मुख्य सड़क के दोनों ओर कारों के निशुल्क पार्किंग की व्यवस्था थी। मंदिर के विशाल रसोई मे अन्न प्रसाद ग्रहण किया जिसमे एक बार मे टेबल
कुर्सी पर हजारों लोगो के बैठ कर भोजन करने की शुद्ध और सात्विक व्यवस्था थी। शेगाँव
के पास गजानन महाराज के गुरु के नगझरी मे अत्यंत पुराने और दर्शनीय शैली के मंदिर
के दर्शन करना एक अद्भुद अनुभव था।
मंदिर से दो किमी दूर आनंद सागर नामक
कृत्रिम झील का निर्माण भी ट्रस्ट द्वारा कराया गया हैं। जिसमे ध्यान केंद्र,
उद्धयान और आध्यात्मिक केंद्र भी बनाया गया हैं। एक वृत्ताकार जगह मे भारत के संत
महात्माओं आदि की सफ़ेद संगमरमर की प्रितमायेँ लगी हैं जिनमे आदि शंकराचार्य,
गोस्वामी तुलसी दास, संत कबीर सूरदास सहित
अनेक संतों की मूर्तियाँ हैं। 325 एकड़ मे फैले इस झील मे बच्चों के मनोरंजन,
पीने के ठंडे पानी और नाममात्र की दर पर खाने पीने की सुविधा भी हैं। पशु पक्षियों
के कलरव के बीच झील के बीच मे बने टापू पर ध्यान केंद्र को देखना अंत्यन्त ही मनोहारी दृश्य था।
क्षेत्र के श्रद्धालुओं और भक्तों के समर्पण
और सम्मान को इस बात से भी देखा जा सकता हैं कि नगझरी जाते मे एक लगभग दो सौ लोगो
का जलूस अमरावती से प्रभात फेरी करते हुए,
भजनों के भक्ति रस मे डूबे शेगाँव की ओर बढ़ते हुए दिखा। इस जलूस मे पानी का टैंकर
और सम्पूर्ण भोजन सामाग्री लिए ट्रैक्टर दिखे। जो अपने पंद्रह दिन की यात्रा के
बाद शेगाँव पहुँचते दिखे। हर जगह अति उत्तम सफाई के बारे मे जब हमने पूंछ तांछ की
तो पता चला श्री गजानन महाराज के भक्त जो सफ़ेद कुर्ता,
पायजामा और टोपी पहने अलग ही दिखलाई पड़ जाते,
हैं बड़े ही त्याग और समर्पण भाव से संस्थान की हर सेवा,
मंदिर भक्त निवास, आनंद सागर,
और अन्य भवनों की साफ सफाई करते हुये,
हर दस कदम पर लगभग चौबीसों घंटे दिखाई दे जाते हैं। उनमे से एक गणेश पाटिल ने
बताया कि गजानन महाराज के अनुयायियों वाले हर गाँव मे मण्डल बने हुए हैं। तीस व्यक्तियों का मण्डल,
माह मे पाँच दिन के लिए शेगाँव मे सेवा देने आते है और सफाई,
भोजन प्रसाद सहित मंदिर की हर व्यवस्था मे
सहभागिता करते हैं। एक समय मे लगभग ढाई हजार व्यक्ति शेगाँव मे सेवा के लिये हर
समय उपस्थित रहते हैं। कुछ पूर्ण कालिक
स्टाफ आदि भी हैं। गजानन महाराज के भक्तों का ऐसा निस्वार्थ समर्पण कदाचित ही
मैंने कहीं देखा हो। साफ सफाई से लेकर,
खाने पीने, ठहरने,
पार्किंग आदि की सारी व्यवस्थाओं का उच्च कोटि
का होने के पीछे इन सेवकों की निस्वार्थ सेवा और समर्पण ही हैं।
शेगाँव
की एक और बात ने हमे प्रभावित किया
वह थी सभी के साथ बिना किसी पक्षपात के समानता का व्यवहार। शेगाँव मे कहीं वीआईपी
कल्चर देखने को नहीं मिली। चाहे आवास की व्यवस्था हो,
मंदिर के दर्शन की व्यवस्था या खान पान और वाहन पार्किंग की व्यवस्था,
किसी भी व्यक्ति को कहीं कोई वरीयता नहीं दी जाती हैं। जो क्रम मे पहले है उसे ही
प्रथम वरीयता प्राप्त हैं,
यहीं कारण है कि शेगाँव मे श्री गजानन महाराज के किसी भी संस्थान मे नेताओं-अभिनेताओं
या धनवानों को कहीं भी किसी कार्यक्रम,
वस्तु या स्थान मे कोई प्राथमिकता नहीं दी जाती है और शायद यही कारण हैं कि यहाँ वीआईपी लोगो की
उपस्थिती नहीं दिखाई देती।








3 टिप्पणियां:
बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है आपने। हम तो इस जगह से प्रचलित है अभी गए साल ही यहां फैमिली के साथ आकर गए हैं। आपने इस जगह के बारे में यहां सेवा देने वाले सेवा भावी स्वार्थी के बारेमे जो भी लिखा है शत प्रतिशत सही है। यहाकी व्यवस्था और स्वच्छता शायद ही देश के किसी और मंदिर में देखने को मिली।
।। जय गजानन।।
🙏गण गण गणात बोते 🙏
आप ब्लॉग में जिस भाषा शैली में यात्राओं का वर्णन करते हैं इसे पढ़कर ऐसा लगता है जैसे हम स्वयं ही यह यात्रा कर रहे हैं। आपका लिखने का अंदाज बहुत ही उत्तम है। हमें आपके नए ब्लॉग का इंतजार रहता है। धन्यवाद
बहुत ही सुंदर वर्णन किया है आपने, इस दिव्य स्थान का दर्शन करने की लालसा मेरे मन में भी आ गई है I प्रभु की कृपा हुई तो निकट भविष्य में हम भी दर्शन कर पुण्य लाभ प्राप्त करेंगे ।
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