"आरक्षण-सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अप्रभावी बनाने का षड्यंत्र
?"
सनातन
धर्म के सबसे पुरातन, पवित्र और प्रामाणिक ग्रंथ श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 18 का एक, श्लोक संख्या 41 मे कहा गया हैं:-
ब्राह्मणक्षत्रियविशां
शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि
प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।। (18.41) अर्थात
हे परन्तप!। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य
तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के द्वारा विभक्त किये गये हैं। उक्त
श्लोक से स्पष्ट हैं कि वर्ण व्यवस्था मे व्यक्ति के कर्म स्वभाव के अनुसार विभक्त
किये गये थे न कि जन्म पर आधारित। खेद और अफसोस हैं इस पवित्रतम ग्रंथ के, ईश्वरीय निर्देशों की अवेहलना कर, हमारे पूर्वजों
ने, सैकड़ों वर्षों पूर्व, विदेशी
आक्रमणकारियों, इस्लामी आक्रांताओं,
अँग्रेजी गोरों के कृपापात्र बनने की लालसा और अपने छद्म मान प्रतिष्ठा के
स्वार्थवश, अपने ही एक सामाजिक वर्ग,
अपने ही एक शरीरांग से, ऊँचनीच और छुआछूत का व्यवहार कर
व्यवस्था से विलग कर दिया और बड़ी चतुराई से, स्वभाव आधारित
वर्ण व्यवस्था को जन्माधारित बतला कर उनको सामाजिक, मानवीय
और समानता के अधिकार से वंचित कर, घोर अनैतिक और अमानवीय कर्म
कर हम लोगों से अलग कर दिया। अफसोस तो इस
बात का है कि हमारे कुछ धर्माचार्यों ने भी स्वभावगत वर्ण व्यवस्था को जन्म आधारित
बतलाने वाली इस निष्ठुर निर्दयी व्यवस्था के उन्मूलन के लिये कोई सार्थक और
प्रभावी प्रयास नहीं किये। मेरा तो मानना है कि हमारे संविधान मे यदि आरक्षण की
व्यवस्था न होती तो कदाचित ही अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगो को सरकारी पदों मे
उच्चपद तो क्या माध्यम और तृतीय श्रेणी के पदों पर नियुक्ति के लाले पड़े होते। यहां
तक राजनीति मे भी यदि एससी-एसटी वर्ग के लिये आरक्षण के प्रावधान की बात हैं, यदि
यहाँ भी आरक्षण न किया गया होता तो शायद ही इस वर्ग के लोग सांसद, विधायक तो छोड़िए नगर और ग्राम पंचायत के पारिषद या सदस्य भी न बन पाते। इसलिये
संविधान मे एससी-एसटी वर्ग के आरक्षण के प्रावधान, इस वर्ग
के उत्थान, विकास और प्रगति के लिये आवश्यक था।
लेकिन स्वतन्त्रता के 77 वर्ष के बात जब इस आरक्षण व्यवस्था पर
दृष्टिपात करते हैं तो थोड़ा दुःख होता है कि अनुसूचित जाति और जनजाति का एक बहुत
बड़ा वर्ग, अब भी आरक्षण के इस लाभ से वंचित हैं। इसका मुख्य
कारण आरक्षण के लाभ का असमान वितरण हैं। ऐसे अनेकों परिवार हैं जिनका कोई भी सदस्य
तृतीय श्रेणी के बाबू होना तो दूर चतुर्थ श्रेणी के लाभ को नहीं पा सका। क्या ऐसी
व्यवस्था नहीं बनाई जानी चाहिये थी कि इन
वंचित परिवारों के एक सदस्य को सरकारी विभाग के तृतीय या चतुर्थ वर्ग की नौकरी की
गारंटी दी जा सकती होती? मै अनुसूचित वर्ग के डाल चंद को जानता हूँ जो मेरे प्राथमिक विध्यालय, पारेश्वर स्कूल, झाँसी का सहपाठी था और जो चर्मकार वर्ग से आता था।
उसके पिता भी मेरे पिता के स्कूली सहचर
थे। पिछले दिनों जब झाँसी शहर स्थित मुरली
मनोहर मंदिर के सामने उससे मुलाक़ात हुई जो वहाँ अपनी मोची के अस्थाई ठिये पर आज भी
बैठता हैं। उसके बच्चे शिक्षित होने के बावजूद दिहाड़ी मजदूरी करने के लिये बाध्य
हैं। क्या कारण हैं कि डाल चंद के बच्चों को चतुर्थ श्रेणी तक की नौकरी से भी वंचित होना पड़ा? यध्यपि उसके समाज के अनेक लोग आरक्षण का लाभ लेकर,
आर्थिक और सामाजिक स्तर मे बदलाब ले, घर के पास स्थित
चमरयाना मुहल्ले को छोड़ कर अन्यत्र वस गये। आरक्षण का मूल मकसद भी एससी-एसटी वर्ग
के लोगो का चहुंमुखी विकास ही था। आज आवश्यकता है कि सरकार और समाज द्वारा आरक्षण की इन खामियों पर विचारमन्थन कर
पुनरावलोकन करने की है?
इसी
समीक्षा के तहत, 1 अगस्त
2024 को देश के सर्वोच्च न्यायालय की 7 जजों की बेंच ने 6:1 के
बहुमत से आरक्षण पर एक अमूल्य और अहम फैसला दिया जिससे देश की अनुसूचित जाति और
अनुसूचित जनजाति के वंचित, शोषित और अंतिम छोर पर खड़े वर्ग
के लोगो के आर्थिक विकास के माध्यम से उनके जीवन मे बहुत बड़े बदलाव की आशा जागृत
हुई। सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के अपने ही एक अहम फैंसले को पलटते हुए, अब राज्य सरकारों को एससी, एसटी श्रेणी मे उप
श्रेणी बनाने का अधिकार दिया। न्यायालय का ये भी मानना था कि ओबीसी श्रेणी की तरह
एससी-एसटी श्रेणी मे भी क्रीमी लेयर का सिद्धान्त लागू होना चाहिये। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आरक्षण का
लाभ लेकर पहली जेनरेशन आगे की ओर जाती है तो दूसरी पीढ़ी को आरक्षण का लाभ नहीं
मिलना चाहिये। सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी वर्ग के उन जतियों को आरक्षण मे आरक्षण
दे समान अवसर प्रदान करने के प्रयास किये जिन्हे वर्तमान व्यवस्था के कारण आरक्षण
का लाभ नहीं मिल पा रहा था। सुप्रीम कोर्ट की कानूनी जटिलताओं मे जाये बिना इस
निर्णय का सार या निचोड़ यह था कि एससी-एसटी के लिये आरक्षित प्रतिशत मे बिना किसी
बदलाव किये, पूर्व मे आरक्षण का लाभ ले चुके (क्रीमी लेयर
अर्थात ऐसे व्यक्ति जो सरकारी नौकरी से आरक्षण का लाभ लेकर अपने आर्थिक और सामाजिक
बदलाव कर चुके हैं) व्यक्तियों के बच्चों को पुनः आरक्षण का लाभ न देकर, एससी-एसटी वर्ग के उन नये
व्यक्तियों को आरक्षण का लाभ दिया जाय
जिन्हे पहले आरक्षण का कभी लाभ नहीं मिला। सर्वोच्च न्यायालय का उक्त निर्णय अभिनदंकरी और
ऐतिहासिक था। इस निर्णय से एससी-एसटी वर्ग के
डाल चंद जैसे वंचित लोगो के बच्चों को सरकारी नौकरी के माध्यम से अपने
आर्थिक और सामाजिक बदलाव के नये आयाम खोल देने वाला था। लेकिन दुर्भाग्य!! देश के
भाजपा और कॉंग्रेस सहित सारे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनैतिक दलों ने एक स्वर से सुप्रीम कोर्ट के
इस सुझाव को कचरे के डिब्बे मे डाल दिया। सभी दलों के राजनैतिक नेताओं ने, बड़ी सफाई से आरक्षण के मूल आधार
को आर्थिक विकास से विलग कर छुआ-छूत से जोड़कर एससी-एसटी की कुछ चुनिन्दा जतियों के
कुछ चंद परिवारों के वर्चस्व को बनाये
रखने की खातिर अपने ही वंचित भाइयों को आरक्षण के माध्यम से उनके आर्थिक विकास के रास्ते मे अबरोध पैदा कर दिये, जो बेहद अफसोस जनक है। यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आकांक्षाओं के
अनुरूप एक बार आरक्षण का लाभ ले चुके व्यक्ति के बच्चों से अलग, ऐसे वंचित लोगो को आरक्षण का लाभ दिया जाता, जिन्हे
आरक्षण का कभी कोई लाभ न मिला हो, तब एक बहुत बड़े वर्ग का आर्थिक उत्थान के माध्यम से
निश्चित ही विकास होता और वे समाज मे समानता के प्रतीक होते। जब आर्थिक विकास होगा
तो छुआ-छूट, उंच-नीच जैसी बुराइयों का उन्मूलन तो स्वतः ही हो
जाता और आज के कड़े कानून इसमे सहायक होते।
राष्ट्रीय
और क्षेत्रीय राजनैतिक दलों का सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विरोध तो एससी-एसटी
वर्ग के वोट बैंक को बनाये रखने के, उनके स्वार्थ तो समझ आते हैं पर
एससी-एसटी के नेताओं के बारे मे क्या कहा जाय जो एक बार आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक
रूप से सुदृढ़ हो चुके, क्रीमी लेयर के एससी-एसटी वर्ग के लोगो के पक्ष
मे खड़े होकर अपने ही वंचित और शोषित
भाइयों की भलाई करने का विरोध कर रहे हैं।
इसका मुख्य कारण आरक्षण के लाभ से वंचित एससी-एसटी वर्ग का संगठित और शिक्षित न होना है। यही कारण है कि जहां एक ओर
एससी-एसटी की एक जाति या एक ही परिवार मे
आरक्षण के लाभ ले,
आठ-दस लोग आईएएस/आईपीएस बन जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर डाल चंद जैसे लोगो के
परिवार मे एक भी व्यक्ति सरकारी नौकरी के
चतुर्थ श्रेणी की नौकरी की बाट जोह रहा है।
यहाँ
यह लिखना आवश्यक हैं कि बाबा साहब अंबेडकर ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के
सर्वांगीण आर्थिक और सामाजिक उत्थान के
लिये जिस आरक्षण की कल्पना की थी, वह देश की स्वतन्त्रता के 77 वर्ष बाद, आरक्षण के वर्तमान स्वरूप मे कदाचित ही खरी उतर पायी? देश की समस्त राजनैतिक पार्टियों ने अपने राजनैतिक स्वार्थ और आत्महित
लाभ के लिये चली आ रही इस व्यवस्था मे अनुसूचित जाति और जन जाति के एक सीमित वर्ग
को ही लाभ पहुंचाया। आज भी इन जतियों का एक बहुत बड़ा वर्ग आरक्षण के लाभ से वंचित
हैं। ऐसे अनेकों परिवार, आपको अपने चारों ओर देखने को मिल
जाएंगे जिनकी अनेकों पीढ़ियों मे से शायद ही
किसी सदस्य को सरकारी नौकरी मे चपरासी की
नौकरी भी मिली हो?, अफसर या बाबू तो बहुत दूर की बात हैं। क्या केंद्र और राज्य
सरकारों की ये ज़िम्मेदारी नहीं कि ऐसे वचित वर्ग के किसी एक सदस्य को कम से कम
चतुर्थ श्रेणी के चपरासी या तृतीय श्रेणी के बाबू की सुनिश्चित नौकरी की गारंटी दे!!
ऐसा तभी संभव हो सकता हैं जब सुप्रीम कोर्ट की आकांक्षा के अनुरूप पूर्व मे आरक्षण का लाभ ले चुके व्यक्ति और उनके
बच्चों को तृतीय/चतुर्थ श्रेणियों के पदों
के लिये आरक्षण का लाभ ने देकर उनके ही वर्ग के ऐसे लोगो को आरक्षण का लाभ दे जिसे
जीवन मे आरक्षण का कभी लाभ न मिला हो।
विजय
सहगल



1 टिप्पणी:
*मेरी समझ से आरक्षण को समाप्त कर देना चाहिए। इसके बहुत सारे सामाजिक लाभ होगा। इसके बदले में देश में स्नातक होने तक सभी को निःशुल्क शिक्षा प्रदान किया जाना चाहिए। इससे देश प्रगति करेगा। लोगों में भेद-भाव नहीं होगा। हमारे ही देश में कई विभागों में आरक्षण नहीं है। और वही पर किसी के साथ कोई भेद-भाव नहीं होता एवं विभाग प्रगतिशील रहता है!*
शंकर भट्टाचार्य, ग्वालियर
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