रविवार, 29 सितंबर 2024

मित्र अश्वनी मिश्रा की सेवानिवृत्ति

 X

"मित्र अश्वनी मिश्रा की सेवानिवृत्ति"

Y






आज 30 अप्रैल 2024 को हमारे छोटे भाई तुल्य और अभिन्न मित्र अश्वनी मिश्रा जी की सेवानिवृत्ति है। 39  साल 4 माह  की निष्कलंक सेवा के बाद बैंक से रिटायर होना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं हैं। 1984 मे स्थानांतरण से  ग्वालियर पहुँचने पर मिश्रा जी का नाम सुन तो  रक्खा था, क्योंकि मिश्रा जी नजदीक ही मुरैना शाखा मे पदस्थ थे, लेकिन उनसे मुलाक़ात और निकटता 1992 मे मेरी पदस्थपना पोरसा जिला मुरैना शाखा के दौरान हुई। चूंकि पोरसा एक नॉन-फ़ैमिली स्टेशन था तो हर शनिवार और सोमवार या कभी बीच मे 45 किमी दूर मुरैना आना जाना बना रहता था। मुख्यालय मुरैना होने के कारण कई बार बैंक के काम से आना जाना जो लगा रहता, जहां उनसे मुरैना शाखा मे लगातार संपर्क बना रहा।   

मिश्रा जी कद-काठी मे बेशक हैं तो, छोटे, पर उनकी मेधा, स्वाभिमान और बुद्धिकौशल  की तुलना  आसमान की ऊंचाई से करें तो अतिसन्योक्ति न होगी। हमे याद हैं मिश्रा जी ने उन दिनों बैंक की परीक्षा सीएएआईआईबी के दोनों भाग पास कर लिए थे इसलिए वे विशेष सहायक से अधिकारी वर्ग की प्रोन्नति के लिये पात्र हो गये थे और वरिष्ठता सूची मे प्रथम नंबर पर थे। बैंक स्टाफ सीएएआईआईबी परीक्षा के महत्व  से भली-भाँति परिचित होंगे कि ये एक काफी महत्वपूर्ण लेकिन कठिन परीक्षा है, जिसे एक स्वतंत्र संस्था अखिल भारतीय स्तर पर हर छह माह मे आयोजित करती हैं। इस परीक्षा के दोनों भाग पास करने पर जहां तीन वेतन वृद्धियाँ तो मिलती ही हैं साथ मे राज्य स्तरीय वरिष्ठता सूची मे भी तीन साल की वरीयता भी  वरिष्ठता सूची  मिलती हैं। इस परीक्षा से ने केवल आर्थिक लाभ अपितु बैंक की प्रोन्नति मे भी फायदा मिलता हैं। लेकिन दुर्भाग्य कि  उन दिनों मिश्रा जी की योग्यता, ज्ञान और बुद्धि कौशल बैंक  प्रबंधन और यूनियन की  ओच्छी राजनीति और संकुचित और षड्यंत्रकारी  मानसिकता के चलते तत्कालीन ओरिएंटल बैंक प्रादेशिक प्रबंधन, भोपाल और राज्य स्तरीय बैंक अधिकारी  यूनियन, जिनसे   बैंक के स्टाफ  के हितों के लिये उनके पक्ष मे खड़े होने और उनके हितों की रक्षा की अपेक्षा थी, षड्यंत्र पूर्वक मिश्रा जी की वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ कर अपने चहेते, एक ऐसे भ्रष्ट और बेईमान कर्मचारी की प्रोन्नति कराने मे सफल हुए जिसको कालांतर मे  भ्रष्टाचार  और बैंक फ़्रौड  मे संलिप्त होने के कारण बैंक की सेवाओं से बर्खास्त किया गया। इस अन्याय से मिश्रा जी थोड़े निराश तो जरूर हुए पर  हौसले, श्री अटल बिहारी बाजपेयी की कविता की तरह बुलंद रहे कि:-   

हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठनूँगा,

काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ॥ 

यहाँ ये बताना आवश्यक है मिश्रा जी भी कविता लेखन मे पारंगत हैं। बैंक की सेवा के पूर्व भी मिश्रा जी का विध्यार्थी जीवन भी संघर्ष और कठिनाइयों भरा रहा। उच्च शिक्षा के लिये अपने गाँव से बाहर यूपी के कालपी मे अध्यवसाय हेतु जाना पड़ा, जहां एक आश्रम के एक कमरे मे रहकर इंटर्मीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। एक कमरे मे पारीक्षा की तैयारी करना कोई अजूबा नहीं था, अनूठापन तो था, पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ, रोज उदरपोषण  हेतु लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाना, जो समान्यतः हम-आप जैसे छात्रों को   विध्यार्थि जीवन मे नहीं करना पड़ा होगा।

सन 2000 से 2010 के दौरान मुझे मिश्रा जी के साथ तत्कालीन ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स की शाखा नया बाज़ार, थाटीपुर और डबरा शाखा मे कार्य करने का मौका मिला। डबरा शाखा मे मिश्रा जी को बैंक के कार्य मे उनकी लगन, समर्पण, निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करने का  मैं हमेशा कायल रहा। सामान्यतः वे अपने कार्य को बड़ी मेहनत और परिश्रम से संपादित करते लेकिन डबरा शाखा मे प्रबन्धक के रूप पदस्थपना के दौरान मैंने उनको हमेशा अपने समकक्ष साथी के रूप सम्मान दिया। कदाचित ही कभी उनके रहते, मैने  बैंक के दिन-प्रतिदिन के कार्यो मे हिस्सेदारी की हो इस कारण मै, सदैव बैंक के व्यव्यसाय के विकास मे ज्यादा से ज्यादा समय दे सका।

मुझे अच्छी तरह याद है उन दिनों बैंको  मे ट्रैक्टर ऋण मे डीलर से  मिलने वाले कमीशन के कारण ट्रैक्टर ऋण,  काफी संख्या मे गैर निष्पादन कारी हो रहे थे, जिसके कारण बैंक के ऋण खाते काफी संख्या मे खराब हो रहे थे।  इसको नियंत्रित करने के लिये हम लोगो ने उन दिनों डबरा क्षेत्र मे धान और गेहूं के व्यापारियों को वेयर हाउस रसीदों के विरुद्ध सर्वाधिक ऋण वितरण किया था। कृषि अधोसंरचना के विकास हेतु वेयर हाउस के निर्माण मे भी हमारे बैंक शाखा की हिस्सेदारी अच्छी-ख़ासी रही जिसमे हितग्राही को लाखों रुपए का अनुदान भी शामिल था। काजल की कोठरी मे रहने के बावजूद कदाचित, एक पैसे के आर्थिक कदाचार का, कभी कोई वृतांत हमारी शाखा के  बारे मे कभी देखा या सुना गया हो। यही कारण है जब मैंने मिश्रा जी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट मे उन्हे शत प्रतिशत नंबर दिये तो प्रादेशिक कार्यालय के एक अधिकारी ने इस पर सवाल खड़े किये? मैंने उन्हे स्पष्ट रूप से कहा कि मिश्रा जी की निष्ठा और ईमानदारी के लिये यदि  सौ मे सौ नंबर की मजबूरी न होती तो मैं उनको सौ से भी अधिक नंबर देता। मैं इन्हे अपने से ज्यादा योग्य, बुद्धिमान, सच्चा, ईमानदार और पवित्र मानता हूँ।

हम दोनों के बैंकिंग से परे बड़े घनिष्ठ परवारिक संबंध भी रहे। इनके दोनों बेटे कार्तिकेय और ज्योतिर्मय से हमारे बच्चों की प्रगाढता हम दोनों की आत्मीयता और निकटता से कम नहीं हैं। मिश्रा जी को याद हो न हो पर हमे उनके परिवार, वीके गुप्ता जी के परिवार और हमारे परिवार  के साथ अंडमान और निकोबार की यात्रा के सुखद, सुनहरी यादें अब तक याद हैं। विशेषकर जोलीबॉय दीप से पोर्ट ब्लेयर की स्टीमर से बापसी के दौरान घनघोर बारिश के बीच,   मछलियों और डीजल इंजिन के धुएँ की बदबू  के कारण  एक को उल्टी करते देख, दूसरे और दूसरे को उल्टी करते देखने के  दौरान तीसरे को, देखा देखि, जी घबड़ाने और   उल्टी दर उल्टी करने वालों की लाइन लगने की घटना तो भुलाए नहीं भूलती।                                           

मुझे याद है कि एक खराब हाउसिंग लोन खाते को रेगुलर कराने के लिये मिश्रा जी हमसे ज्यादा चिंतित और परेशान रहते थे जबकि उनका उस ऋण से कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध नहीं था। लेकिन एक भाई और अभिन्न मित्र होने के चलते उन्होने हमेशा हमारी परेशानी या दुःखों मे अपनी सहभागिता प्रकट की। हमे याद है जब हम दोनों की डबरा पदस्थपना हुई तो तत्कालीन ऋण अधिकारी श्री संतवानी ने हम दोनों  को न्यायालय के कर्मचारियों से व्यक्तिगत ऋण खाते मे बसूली के दौरान एक बहुत ही  अप्रिय अनुभव से गुजरने के कारण, इन बैंक ऋण खातों मे बसूली की  चुनौती दी थी। उक्त ऋण खातों मे किश्तें न आने के कारण खाते, गैर निष्पादन कारी हो गये थे। न्यायालय के कर्मचारियों द्वारा दिये गये किश्तों की अदायगी के चैक जैसे ही बिना भुगतान के बापस आए, हम लोगो ने सेक्शन 138 के तहत न्यायालय मे केस दायर कर दिये। माननीय न्यायाधीश को इस बात की जानकारी हुई तो मज़ाक मे मुझ से सवाल किया,  उनकी ही अदालत मे उनके ही कर्मचारियों के विरुद्ध मुकदमा!! मैंने कहा श्रीमान हम लोग तो नौकर ठहरे, आप जो आदेश दें, हमे तो उसकी पालना करनी है? उन्होने कर्मचारियों को सख्त आदेश दिये कि बैंक ऋण जमा करें अन्यथा उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही होगी। उक्त तीनों ऋण समझौते के आधार पर समाप्त हो गए। ऐसे डूबंत ऋण खातों मे  मिश्रा जी ने बड़ी चतुराई से बैंक के खराब ऋण मे बसूली की थी।   

मेरा ये दृढ़ विश्वास है के बैंक के सतर्कता विभाग मे पदस्थपना भी एक सम्मान का विषय है, जो बैंक के विरले, कर्मठ, मेहनती और ईमानदार अधिकारियों को ही प्राप्त होता है, फिर वह चाहे ओरिएंटल बैंक हो या पंजाब नेशनल बैंक!! यही कारण हैं कि उनके मृद व्यवहार के कारण उनके प्रशंसकों और मित्रों की एक लंबी सूची हैं जिसमे ग्वालियर, मुरैना के अनेकों गणमान्य व्यक्ति शामिल हैं।

मिश्रा जी!!, आप जैसे छोटे भाई और निकट मित्र को आपकी सफल सेवानिवृत्ति पर हम अपनी शुभकामनायें और बधाई प्रेषित करते है। आशा है, न केवल आप, भाभी जी के साथ अपितु हम जैसे  सेवा निवृत्त साथियों के साथ भी रिटायर्ड जीवन का आनंद सांझा करेंगे।  इन्ही कामनाओं के साथ एक बार पुनः सेवानिवृत्ति पर हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई। 

विजय सहगल  

शनिवार, 28 सितंबर 2024

लेबनान पर पेजर बमों की बौछार

 

"लेबनान पर पेजर बमों की बौछार"




मध्य पूर्व के लेबनान और सीरिया देश की  इज़राइल के साथ चली आ रही दुश्मनी से सारा विश्व भली-भांति परिचित है।  17-18 सितंबर 2024 को लेबनान और सीरिया मे संचार माध्यम मे उपयोग होने वाले हजारों  पेजर उपकरणों मे अचानक एक साथ हुए बिस्फोट ने लेबनॉन-सीरिया  सहित पूरी दुनियाँ को सकते मे डाल दिया। दिल देहला देने वाले  इन विस्फोटों मे लगभग 2750 लोग घायल हुए जिनमे 200 से ज्यादा लोगो की हालत बहुत गंभीर है। एक साथ इतने घायलों के अस्पताल मे आ जाने के कारण घायलों के उपचार के लिये जगह नहीं बची। एक विस्तर पर दो तो कहीं फर्श पर ही घायलों का इलाज किया जा रहा था।  इन पेजर विस्फोटों मे अब तक 40 से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। ये पेजर जिसके हाथ मे था उसके हाथ और जिसकी जेब मे था उसके पैर या अन्य अंग या जिसने कमर मे बांध रखा था उसके पेट, कमर के चिथड़े उड़ गए, कहने के तात्पर्य है कि पेजर जहां था विस्फोट से शरीर का वो अंग बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो कर नष्ट हो गया। कुछ लोगो की मैसेज देखने के कारण विस्फोट मे आंखे क्षत-विक्षत हो गयी। ये हमले यहीं नहीं रुके, दो दिन बाद जब  पेजर विस्फोट मे मारे गये एक हिज़्बुल्ला आतंकी के जनाजे कों नियंत्रित करने के लिये इन लड़ाकों और पुलिस  द्वारा उपयोग मे लाये जा रहे वॉकि-टॉकि पर बात करते ही इनमे भी विस्फोट होने लगे जिसमे 450 लोग घायल हो गए और 14 लोग मारे गए। इन पेजर विस्फोटों या यूं कहे कि इन पेजर बम हमलों की कल्पना हिज़्बुल्ला ने संपने मे भी नहीं की होगी। पेजर विस्फोट के  इन घायलों मे अपनी एक आँख गवा बैठे, लेबनान स्थित ईरानी राजदूत मोजताब अमानी भी हैं, ये वही मोजताब अमानी हैं जिन पर अनेकों  ईरानी लड़कियों की  हिजाब न पहनने के कारण,  आंखे फोड़ने का आरोप लगे थे। ईरानी राजदूत के बारे मे  लोगो का  कहना था, जैसी करनी बैसी भरनी!! ये हमले कुछ, उन होलिबुड फिल्मों की तर्ज पर थे  जो काल्पनिक अन्तरिक्ष युद्ध पर आधारित थीं।  इस पेजर हमले का शक इज़राइल पर किया जा रहा हैं पर इज़राइल इन देशो मे पेजरों मे हुए इन विस्फोटों से अनिभिज्ञता प्रकट करते हुए खामोश है।

दरअसल पेजर संचार माध्यमों का एक ऐसा उपकरण है जिसके माध्यम से सिर्फ  संक्षिप्त संदेशों का आदान प्रदान किया जाता हैं। इस उपकरण मे मोबाइल की तरह बात नहीं की जा सकती। आधुनिक उपग्रह संचार प्रणाली से जुड़े होने के कारण मोबाइल के लोकेशन की  पल पल की जानकारी मोबाइल कंपनी के पास रहने के कारण पिछले दिनों इज़राइल ने ईरान, लेबनान, सीरिया, गाजा पट्टी स्थित अपने अनेकों दुश्मनों कों उनकी लोकेशन कों निशाना बना कर, ड्रोन हमले मे मार गिराया था। लेबनान और सीरिया  स्थित आतंकी संगठन हिज़्बुल्ला के मुखिया हसन नसरल्लाह ने हाल ही मे अपने आतंकी लड़ाकों कों चेतावनी दी थी कि वे मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें, क्योंकि उन पर नज़र रखी  जा सकती है। हिज़्बुल्ला लड़कों कों आपसी संवाद के लिए ताइवान की एक कंपनी अपोलो गोल्ड से पेजर्स खरीदे गये थे। हिज्ज्बुल्ला संगठन ने  मोबाइल का इस्तेमाल बंद कर, इन पेजर का इस्तेमाल इसलिए शुरू किया था ताकि वे अपनी लोकेशन कों छुपा संके। ईरान समर्थित और उसके द्वारा पोषित ये आतंकी संगठन  हिज़्बुल्ला, इज़राइल पर आक्रमण करने के लिये कुख्यात हैं और उसके बाद वो सारे हथियार हैं जो किसी देश की सेनाओं पर होते हैं।

जहां एक ओर संयुक्त राष्ट्र संगठन सहित सारा  विश्व,  एक साथ कुछ घंटों के अंतराल मे घटी  इन पेजर विस्फोटो की घटनाओं से सकते मे हैं, वही इज़राइल द्वारा सीधे आक्रमण के बिना अपने दुश्मनों का सूचना प्रौधौगिकि के माध्यम से चुन चुन कर मारने और घायल करने के बौद्धिक कौशल और तकनीकि विकास  क्षमता पर सारी दुनियाँ   हतप्रभ हैं और दबी जुबान से इज़राइल की प्रशंसा करें बगैर नहीं रही। इज़राइल ने  एक बार पुनः सिद्ध कर दिया कि, इज़राइली ने जो किया दुनियाँ मे और कोई नहीं कर सकता।  इज़राइली खुफिया संस्था मोसाद अपने दुश्मनों कों चुन-चुन कर मारती  है, चाहे वे दुनियाँ के किसी भी कोने  मे छुपे हों।  अमरीका की कुछ खुफिया जांच एजेंसियों का मानना है कि इज़राइल की खुफिया संस्था मोसाद ने गुपचुप तरीके से  इस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु तभी  काम करना शुरू कर दिया था जब उसने हिज़्बुल्ला संगठन के मुखिया हसन नसरलला द्वारा  अपने लड़ाकाओं कों मोबाइल के प्रयोग से बचने की चेतावनी देते हुए पेजर का उपयोग करने की सलाह दी थी ताकि हिज़्बुल्ला के लड़ाकों कों इज़राइली सेना की सूचना प्रौधौगिकि रूपी निगाहों  से बचाया जा सके। तभी से इज़राइली खुफिया संस्था के दिमाक मे पेजर बम का आइडिया आया और उसने  इस लक्ष्य की प्राप्ति पर   कार्य शुरू कर, आज उसे अपने अंजाम तक पहुंचा कर अपने दुश्मनों को उसके ही घर के अंदर मार गिराया। विस्फोटों   1990 के दशक मे अनेक देशों द्वारा इस पेजर उपकरण का उपयोग हुआ करता था, पर मोबाइल फोन के इस्तेमाल के प्रचलन मे आने के कारण इसका दौर जल्दी ही समाप्त हो गाया। जानकारों का मानना है कि पेजर के निर्माण के समय ही इनमे विस्फोटक पदार्थ रख दिये गये थे इसलिए ताइवान की पेजर निर्माता कंपनी अपोलो गोल्ड से इस संबंध मे पूंछ-तांछ की गयी। उक्त कंपनी ने स्पष्ट किया कि उसने पेजर का निर्माण नहीं किया अपितु अपनी कंपनी के नाम का ब्रांड उपयोग करते हुए हंगरी की एक, बीएसी कंसल्टेंसी कंपनी को तकनीकि सहयोग समझौते के अंतर्गत पेजर का निर्माण कराया था, बाद मे इन्ही पेजरों  की आपूर्ति लेंबनान कों की गयी। ऐसा प्रतीत होता हैं इस्ज्रइली खुफिया एजेंसी ने छद्म नाम से पेजर का निर्माण करते समय या लेबनान के हिज़्बुल्ला संगठन  कों पेजर के कनसाइनमेंट  की आपूर्ति के पूर्व इसमे विस्फोटक पदार्थ कों पेजर मे डाल कर उन तक पहुंचाया  ताकि सिर्फ हिज़्बुल्ला के आतंकियों के लिए मंगाए गए इन पेजरों के उपयोग करते समय उनमे विस्फोट कराया जा सके जिससे सिर्फ हिज्बुल्ला आतंकवादी या उनके मददगार  ही प्रभावित हो संके!! लोगों का ये मानना हैं कि जहां एक ओर लेबनान  समर्थक देश उसे   चिकित्सकीय सहायता पहुंचा रहे थे, वही इजराइल समर्थक देश इज़राइल  की इस दूरस्थ सोच का लोहा मान रहे थे। लेबनान मे अब इस बात का अंदेशा है कि अब न जाने कौन सा इलेक्ट्रोनिक उपकरण मे विस्फोट कर इसराइल हिज़्बुल्ला पर आक्रमण कर दे?      

लेकिन पेजर और वॉकि-टॉकि  की ये घटना इस बात भयावहता की पूर्व चेतावनी हैं कि सूचना तकनीकि को हैक कर, इसके  दुर्पयोग से, ऐसी घटना यदि मोबाइल फोन मे घटित हो,  तो लाखों-करोड़ो लोग मौत के मुंह मे जा सकते हैं? इस तरह के साइबर हमले सारी दुनियाँ के लिये खतरे का एक संकेत हैं, अगर ऐसे हमलों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो ये दुनियाँ के विनाश के लिये परमाणु बम से भी ज्यादा घातक सिद्ध हो सकते हैं।

विजय सहगल                   

शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

राहुल गांधी-यूएस दौरे मे बिगड़े स्वर-ताल

 

"राहुल गांधी-यूएस दौरे मे बिगड़े स्वर-ताल"




आखिरकार 7 सितम्बर से प्रारम्भ,  राहुल गांधी का 10 दिवसीय विवादस्पद यात्रा  16 सितम्बर 2024 को समाप्त हो गया।  राहुल गांधी का पिछला रिकॉर्ड रहा हैं कि उनका विदेशी प्रवास हमेशा विवादों के घेरे मे रहा है, दुर्भाग्य से इन दिनों यूएस के प्रवास पर भी राहुल गांधी का नेता प्रतिपक्ष के रूप मे दिये गये भाषणों मे उनके बोल बिगड़ गये। उन्होने अपने अमेरिका प्रवास पर वर्जीनिया, टेक्सास और वाशिंगटन मे  मोदी, बीजेपी और आरएसएस पर तीखे राजनैतिक विरोध तो समझ आता है पर वे इन लोगो पर हमला करते करते कब देश विरोधी बयानों पर उतर आये शायद उन्हे खुद भी आभास नहीं हुआ। राहुल गांधी द्वारा अमेरिका मे दिये गये सिक्खों, आरक्षण समाप्ती और 2024 के संसदीय चुनाव पर चुनाव  आयोग की निष्पक्षता पर उठाये गये सवालों के अतिरिक्त  अमेरिका स्थित भारत विरोधी सांसद लॉबी के साथ बैठक ने उनको और उनकी सोच को शक, शंका और शंशय के सवालों के घेरे मे खड़ा कर दिया। उनके छद्म और मन गढ़ंत बयान से देश की राजनीति मे हँगामा खड़ा होना स्वाभाविक था।

उन्होने लोकसभा 2024 के चुनावों पर बीजेपी को मिली 240 सीटों की जीत पर संदेह जतलाते हुए कहा कि, मुझे नहीं लगता कि निष्पक्ष चुनावों मे बीजेपी 240 सीटों के करीब पहुँच सकती थी? उनके पास बहुत पैसा था, चुनाव आयोग उनकी मर्जी से काम कर रहा था। उन्होने कहा, मै इसे एक निष्पक्ष चुनाव नहीं मानता!! राहुल गांधी के आरोपों पर खेद और अफसोस होता है कि यदि चुनाव आयोग का रवैया इतना पक्षपात पूर्ण था तो तमिलनाडू मे उसे 39 सीटों मे 0 सीट क्यों मिली, केरल की  20 सीटों मे बीजेपी की 1 सीट क्यों मिली। पंजाब की 13 सीटों मे बीजेपी का खाता भी न खुल सका और सबसे बड़ी बात बीजेपी अपने गढ़ यूपी की 80 सीटों मे मात्र 36 सीटें ही क्यों जीत सकी। यदि चुनाव आयोग का रवैया पक्षपात पूर्ण था तब  क्या ये माना जाय काँग्रेस ने स्वतन्त्रता के बाद से देश पर लगभग 70 वर्ष तक सत्ता का सुखोपभोग किया तो चुनाव आयोग ने कॉंग्रेस के पक्ष मे भेदभाव पूर्ण व्यवहार कर सत्ता सौंपी?? राहुल गांधी और कॉंग्रेस के ये छद्मारोप, निष्पक्ष, तटस्थ, भारतीय चुनाव आयोग  को बदनाम करने का कुत्सित प्रयास है।

उन्होने वाशिंगटन डीसी मे मोदी के विचार और उनके डर के बारे मे एक  मनगढ़ंत, बनावटी और झूठी कहानी गढ़ उनके डर को समाप्त की घोषणा की और बतलाया कि यह सब अब इतिहास है!! लोकतान्त्रिक भारत मे कॉंग्रेस भाजपा समर्थित एनडीए गठबंधन के तीसरी बार बहुमत से सत्ता मे आने को नकार कर कैसी और कौन सी झूठी कहानी को स्थापित करना चाहती हैं?? आज इंडि गठबंधन द्वारा मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की वास्तविकता के  यथार्थ को नकार कर कल्पना लोक  मे जी रही हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। अपने यूएस की यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने, आरक्षण के विषय मे अपने एक अन्य आपत्तिजनक बयान मे स्थितियाँ अनुकूल होते ही आरक्षण की समाप्ति की घोषणा की। जो राजनैतिक दल, सुप्रीम कोर्ट के एससी, एसटी वर्ग के  प्रभावी और सर्वांगीण विकास के लिये, आरक्षण के लाभ हेतु श्रेणी मे उपश्रेणी बनाकार, क्रीमी लेयर को इस से  वंचित करने के पक्ष मे खड़े न हो सके वे कैसे आरक्षण की समाप्ति की बात कर सकते हैं?      

पाकिस्तान समर्थक अमेरीकन सांसद, ईल्हान उमर जैसे  राष्ट्र विरोधी व्यक्ति  के साथ राहुल गांधी का खड़ा होना चौंकाने वाला हैं! ईल्हान उमर, अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसद हैं और अमेरिका मे भारत विरोधी लॉबी का नेतृत्व के लिये जाने जाते हैं। न केवल पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर अपितु पूरे कश्मीर को पाकिस्तान का बतलाने का समर्थन करते हैं। हर मंच पर भारत का विरोध करने वाले, इस भारत  विरोधी व्यक्ति को, विशेष आमंत्रिण पर, राहुल गांधी की मीटिंग मे बुलाया गया था। कश्मीर से धारा 370 और 35ए के हटाये जाने के विरोध करने वाले  ऐसे भारत विरोधी व्यक्तियों के साथ मंच  सांझा कर, कॉंग्रेस और राहुल गांधी, क्या संदेश देना चाहते हैं? विदेश प्रवास पर मोदी सरकार या मोदी का विरोध तो समझ आता हैं पर  देश विरोधी व्यक्तियों के साथ खड़े दिखलाई देना ये दर्शाता हैं कि कॉंग्रेस सत्ता प्राप्ति के लिए किसी भी व्यक्ति और संस्था के साथ मिल कर किसी भी हद तक जा सकती है, भले ही इसके लिए देश विरोध भी क्यों न करना पड़े?

वाशिंगटन मे 10 सितम्बर की  एक मीटिंग मे एक बलिन्दर सिंह नामक सिक्ख का नाम पूंछते हुए उन्होने कहा कि लड़ाई भारत मे ऐसे सिक्खों के लिए हैं जो हाथ मे कडा नहीं पहन सकते, सर पर पगड़ी नहीं बांध सकते गुरुद्वारे नहीं जा सकते!! राहुल गांधी का न केवल सिक्खों अपितु देश के अन्य मताबलम्बियों के अपने धर्म के अनुसरण करने पर सवाल उठाना, राहुल गांधी द्वारा न केवल अमेरिका मे अपितु  देश के बारे मे भय, भ्रम, भ्रांति फैलाने का कुत्सित प्रयास है, पूरी दुनियाँ मे भारत देश को बदनाम करने का घिनौना प्रयास  है। राहुल गांधी उस विरासत और उस कॉंग्रेस के प्रतिनिधि हैं, जिनके पूर्वजों ने पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद उपजे अभिशाप से 31 अक्टूबर 1984 मे कॉंग्रेस के शासन काल मे तीन हजार से ज्यादा सिक्खों का नरसंहार को  यह कह कर न्यायोचित ठहराने का घृणित  प्रयास किया कि, "जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तब पृथ्वी भी हिलती है"। आश्चर्य तो इस बात का हैं कि राहुल गांधी के इन झूठी  और कल्पित बयान से गदगद, कनाडा स्थिति खालिस्तानी समर्थक आतंकवादी गुरवंत पन्नू ने कहा, कि राहुल गांधी का ये स्टेटमेंट उसकी अलग खलिस्तान की मांग को न्यायोचित ठहराता है!! राहुल गांधी की अमेरिका मे की गयी गलत बयानी से साफ है कि कॉंग्रेस और राहुल गांधी की कथनी और करनी मे सदा जमीन आसमान का फर्क नज़र आता है।       

भारतीय संविधान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण भावना अभिव्यक्ति की आज़ादी हैं। जो राहुल गांधी, हर घड़ी संविधान की प्रति को जेब मे रख कर, उसके रक्षा की दुहाई देते हैं उनके अमेरिका प्रवास पर अभिव्यक्ति की आजादी के हनन की एक शर्मनाक घटना भी सामने आयी। एक पत्रकार वार्ता के पूर्व, इंडिया टूड़े के एक पत्रकार, रोहित शर्मा के साथ सिर्फ इस बात पर गली गलौज और  मारपीट की गयी, क्योंकि उन्होने इंडिया ओवरसीज कॉंग्रेस के अध्यक्ष सेम पित्रोदा से ये सवाल पूंछ लिया कि, क्या राहुल गांधी अमेरिकी सांसदों के साथ बैठक मे, बांग्लादेश मे मारे जा रहें  हिंदुओं का मुद्दा उठाएंगे? वहाँ उपस्थित एक  कॉंग्रेस के सदस्य ने चींखते हुए  उनका मोबाइल छीन कर उसका पूरा डेटा डिलीट कर दिया और 45 मिनिट तक एक कमरे मे बंद कर के रक्खा गया। कॉंग्रेस के इतिहास की जानकारी रखने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि कॉंग्रेस की तो यह रीति-नीति रही हैं। 1975 मे आपातकाल के दौरान कॉंग्रेस ने  "अभिव्यक्ति की आजादी" का  किस तरह गला घौंटा था और किस तरह मीडिया के लोगो को हिरासत मे रक्खा था, जो  सर्वविदित है। ये घटना बेहद आपत्तिजनक, अपमान जनक और अफसोस जनक हैं।

दरअसल राहुल गांधी और उनके सलाहकारों की ये धारणा हैं कि वो जो कहते हैं वही सत्य है! वे असत्य को भी, ये सत्य है कह कर प्रस्तुत करते हैं। ऐसे लोगों की बुद्धि और सोच के बारे मे  श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 18 मे श्लोक संख्या 32 मे कहा गया हैं:-

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ (18.32) अर्थात हे अर्जुन!, जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि, अधर्म को (भी) 'यह धर्म है', ऐसा मान  लेती है तथा (इसी प्रकार अन्य) सम्पूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।

क्या राहुल गांधी से इस बात की अपेक्षा की जा सकती हैं कि उनका अगला, विदेशी दौरा विवादों, विराधभाषों और विद्वेष से रहित होगा?

विजय सहगल         

शनिवार, 14 सितंबर 2024

सुशील शिंदे-एक डरपोंक पूर्व गृह मंत्री

 

"पूर्व गृहमंत्री, सुशील कुमार शिंदे-"डरपोंक" होने की स्वीकारोक्ति"





10 सितम्बर 2024 को कॉंग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार मे रहे,  पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कश्मीर के बारे मे एक बहुत ही शर्मनाक ब्यान बड़े ही निर्लज्ज शब्दों मे दिया जिसको यहाँ लिखना भी अनैतिक हैं, जिसकी चर्चा पूरे  देश मे हो रही है। दिल्ली मे दिये गये उक्त विवादस्पद ब्यान, सुशील कुमार शिंदे ने उनके राजनैतिक संस्मरणों  पर  राशिद किदवई द्वारा लिखित किताब "राजनीति के पाँच दशक" के विमोचन के अवसर पर कही, जिसमे कॉंग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे, दिग्गज कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह और शिक्षाविद विजय धर   भी उपस्थित थे।  पूर्व गृहमंत्री ने अपने ब्यान मे कहा कि जब मै होम मिनिस्टर था उसके पहले मै विजय धर के पास जाता था और एडवाइस भी मांगता था, उन्होने मुझको ऐसा असली एडवाइस दिया, उन्होने कहा सुशील तू इधर-उधर मत भटक, लाल चौक (श्रीनगर) मे घूमना नहीं, भाषण देना, लोगों से मिलना, डलझील मे घूमना। उस एडवाइस से मुझे पब्लिसिटी भी मिली कि एक ऐसा मिनिस्टर है जो बिना डर के रोज आता है,  लेकिन कैसे बताऊँ कि लाल चौक पर मेरी ...... रही थी ( मैं डरा हुआ था?)

एक ऐसे केंद्रीय गृहमंत्री के मुख से ऐसा कायराना, अपमान जनक  और डरपोंक ब्यान, जिसके मातहत देश के लाखों बहादुर और देशभक्त केंद्रीय सुरक्षा बलों के नेतृत्व की ज़िम्मेदारी थी, ऐसी अपेक्षा कदापि नहीं की होगी। पूर्व गृहमंत्री के इस ब्यान को सुनकर उन केन्द्रीय बलों के जवानों के  दिलों पर क्या गुज़री होगी,  जिन  केंद्रीय सुरक्षा बलों के  जवान अपनी मातृ भूमि की रक्षा के लिये अपने प्राणों की बाजी सहित अपना सर्वस्व न्योछावर करने को सदा  तत्पर हों, उसका नेतृत्व करने वाला  गृहमंत्री इतना बुजदिल, डरपोंक और कायर  होगा, कदाचित ही भारत की 130 करोड़  जनता ने ऐसी कल्पना की होगी कि उसकी गुंडे, बदमशों और असामाजिक तत्वों से, अपनी आंतरिक  सुरक्षा करने वाला गृहमंत्री खुद अपने ही देश के अंदर, अपने आप को, कितना असुरक्षित महसूस करता है!! 

सुशील कुमार शिंदे के उक्त ब्यान से स्पष्ट है कि जब सुरक्षा बलों के कई  स्तरीय सुरक्षा के घेरे मे रहने वाले, ज़ेड श्रेणी की सर्वोच्च सुरक्षा मे  संरक्षित  केंद्र सरकार के पूर्व गृहमंत्री का ये हाल था कि उसे देश के मुकुट, जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के लाल चौक मे जाने से डर लगता था तो देश के जनसामान्य मानवी का क्या हाल रहा होगा। यही कारण था मनमोहन सिंह की कॉंग्रेस नेतृत्व वाली सरकार की  दृढ़ राजनैतिक इच्छा शक्ति के आभाव के कारण ही जम्मू कश्मीर राज्य मे पर्यटन की गतिविधियां शून्य थी। आतंकवादियों का इस राज्य मे एक छत्र राज्य था। आये दिन सेना और सुरक्षा बलों पर स्थानीय पत्थरबाजों द्वारा पत्थर फेंके जाते और जम्मू कश्मीर राज्य के नागरिकों का  सामान्य जन जीवन कठिन, दुष्कर और दुरुह हो गया था। स्कूल और कॉलेजों मे  छात्रों की उपस्थिती न के बराबर थी भविष्य अंधकारमय था। वहाँ के नागरिकों, व्यापारियों, उद्धयोग धंधों के बंद होने से राज्य के आर्थिक हालात भी खराब हो गये थे। आतंकवादियों के विरुद्ध सेना को कारगर कार्यवाही की अनुमति न होने के कारण, सेना और सुरक्षा बलों को सरकार का संरक्षण न मिलने की बजह से  उनके मनोबल भी क्षीण हो रहा था और उनके उपर आये दिन आतंकवादियों और स्थानीय पत्थरवाजों के हमले हो रहे थे।

लेकिन 2014 मे मनमोहन सरकार की कोंग्रेसी सरकार के बाद,  मोदी सरकार द्वारा सत्ता मे आने के बाद सेना और सुरक्षा बलों को आतंकवादियों, पत्थरबाज़ अपराधियों के विरुद्ध कार्यवाही की  मिली खुली  छूट के बाद बदले हुए परिदृश्य मे  देश के नागरिकों को वो घटना तो याद होगी जब 9 अप्रैल 2017 को कश्मीर मे  सेना के एक मेजर लितुल गोगोई ने एक पत्थर बाज युवक  को जीप के बोनट पर बांध कर इलाके मे घुमाया था जिससे अन्य दूसरे पत्थरबाजों ने सेना पर पत्थरों की बौच्छार को रोक दिया ताकि कहीं उनकी पत्थरबाजी से उसके ही पत्थरबाज़ साथी लहूलुहान हो कर घायल न हो जाय। उन दिनों सोशल मीडिया पर भले ही मेजर की उस कार्यवाही का तथाकथित सेकुलर वादियों ने  विरोध किया था लेकिन देश के सामान्य लोगो और सेना की कोर्ट ऑफ इन्क्वॉयरी  ने मेजर के उस फैंसले की सराहना की थी। मोदी सरकार के 5 अगस्त 2019 को, जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35ए की समाप्ति के बाद तो आतंकवादियों और उनका पराश्रय देने वाले देश पाकिस्तान और देश के अंदर भी देश  विरोधी तत्वों के विरुद्ध जो  प्रभावी कार्यवाही शुरू हुई जिसके कारण  आज जम्मू कश्मीर की जनता द्वारा 2024 के संसदीय चुनावों और वर्तमान विधान सभा के चुनावों मे बढ़-चढ़ कर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया मे भागीदारी के रूप मे परिलक्षित होती दिखायी  पड़ती हैं।

1947 मे देश विभाजन और कश्मीर के एक बहुत बड़े भूभाग को पाकिस्तान द्वारा अनधिकृत अपने कब्जे मे लेने  के लिये जिम्मेदार कॉंग्रेस और पंडित नेहरू के अदूरदर्शी निर्णय की सजा, कश्मीर सहित पूरा देश आज तक भुगत रहा हैं। भाजपा के घोषणा पत्र मे कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 और 35ए की समाप्ति, कश्मीर समस्या के समाधान मे पहला कदम है।  जो कॉंग्रेस की सरकार अपने पैसठ साल के कार्यकाल  मे न कर सकी मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के शुरू मे ही  मे इस धारा 370 की समाप्ति कर दी जिसके कारण आज देश का  सामान्य नागरिक निडर होकर पर्यटन और भ्रमण के लिये जा रहा हैं। कन्याकुमारी से श्रीनगर की जिस भारत जोड़ो यात्रा मे, जो राहुल गांधी निडरता और निर्भीकता  पूर्वक कश्मीर की वादियों मे अपनी बहिन प्रियंका गांधी के साथ बर्फ के मैदान मे, एक दूसरे पर बर्फ के गोले फेंकते नज़र आये थे वो कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति का ही परिणाम था। यदि आज सुशील कुमार शिंदे जैसे डरे, सहमे गृहमंत्री होते तो क्या जम्मू कश्मीर के लाल चौक से डरो मत-डराओ मत के  माहौल की समाप्ति संभव थी??

विजय सहगल                                   

शनिवार, 7 सितंबर 2024

"आरक्षण-सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अप्रभावी बनाने का षड्यंत्र ?"

 

"आरक्षण-सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अप्रभावी बनाने का षड्यंत्र ?"





सनातन धर्म के सबसे पुरातन, पवित्र और प्रामाणिक ग्रंथ श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 18 का एक, श्लोक संख्या 41 मे कहा गया हैं:-

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।। (18.41) अर्थात

हे परन्तप!। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के द्वारा विभक्त किये गये हैं। उक्त श्लोक से स्पष्ट हैं कि वर्ण व्यवस्था मे व्यक्ति के कर्म स्वभाव के अनुसार विभक्त किये गये थे न कि जन्म पर आधारित। खेद और अफसोस हैं इस पवित्रतम ग्रंथ के, ईश्वरीय निर्देशों की अवेहलना कर, हमारे पूर्वजों ने, सैकड़ों वर्षों पूर्व, विदेशी आक्रमणकारियों, इस्लामी आक्रांताओं, अँग्रेजी गोरों के कृपापात्र बनने की लालसा और अपने छद्म मान प्रतिष्ठा के स्वार्थवश, अपने ही एक सामाजिक वर्ग, अपने ही एक शरीरांग से, ऊँचनीच और छुआछूत का व्यवहार कर व्यवस्था से विलग कर दिया और बड़ी चतुराई से, स्वभाव आधारित वर्ण व्यवस्था को जन्माधारित बतला कर उनको सामाजिक, मानवीय और समानता के अधिकार से वंचित कर, घोर अनैतिक और अमानवीय कर्म कर हम लोगों से अलग कर दिया।  अफसोस तो इस बात का है कि हमारे कुछ धर्माचार्यों ने भी स्वभावगत वर्ण व्यवस्था को जन्म आधारित बतलाने वाली इस निष्ठुर निर्दयी व्यवस्था के उन्मूलन के लिये कोई सार्थक और प्रभावी प्रयास नहीं किये। मेरा तो मानना है कि हमारे संविधान मे यदि आरक्षण की व्यवस्था न होती तो कदाचित ही अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगो को सरकारी पदों मे उच्चपद तो क्या माध्यम और तृतीय श्रेणी के पदों पर नियुक्ति के लाले पड़े होते। यहां तक राजनीति मे भी यदि एससी-एसटी वर्ग के लिये आरक्षण के  प्रावधान की बात हैं, यदि यहाँ भी आरक्षण न किया गया होता तो शायद ही इस वर्ग के लोग सांसद, विधायक तो छोड़िए नगर और ग्राम  पंचायत के पारिषद या सदस्य भी न बन पाते। इसलिये संविधान मे एससी-एसटी वर्ग के आरक्षण के प्रावधान, इस वर्ग के उत्थान, विकास और प्रगति के लिये आवश्यक था।   

लेकिन स्वतन्त्रता के 77 वर्ष के बात जब इस आरक्षण व्यवस्था पर दृष्टिपात करते हैं तो थोड़ा दुःख होता है कि अनुसूचित जाति और जनजाति का एक बहुत बड़ा वर्ग, अब भी आरक्षण के इस लाभ से वंचित हैं। इसका मुख्य कारण आरक्षण के लाभ का असमान वितरण हैं। ऐसे अनेकों परिवार हैं जिनका कोई भी सदस्य तृतीय श्रेणी के बाबू होना तो दूर चतुर्थ श्रेणी के लाभ को नहीं पा सका। क्या ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई जानी चाहिये थी कि  इन वंचित परिवारों के एक सदस्य को सरकारी विभाग के तृतीय या चतुर्थ वर्ग की नौकरी की गारंटी दी जा सकती होती? मै अनुसूचित वर्ग के  डाल चंद को जानता हूँ जो मेरे प्राथमिक विध्यालय, पारेश्वर स्कूल, झाँसी  का सहपाठी था और जो चर्मकार वर्ग से आता था। उसके पिता भी मेरे पिता के स्कूली  सहचर थे। पिछले दिनों जब झाँसी शहर  स्थित मुरली मनोहर मंदिर के सामने उससे मुलाक़ात हुई जो वहाँ अपनी मोची के अस्थाई ठिये पर आज भी बैठता हैं। उसके बच्चे शिक्षित होने के बावजूद दिहाड़ी मजदूरी करने के लिये बाध्य हैं। क्या कारण हैं कि डाल चंद के बच्चों को चतुर्थ श्रेणी तक की  नौकरी से भी वंचित होना पड़ा? यध्यपि उसके समाज के अनेक लोग आरक्षण का लाभ लेकर, आर्थिक और सामाजिक स्तर मे बदलाब ले, घर के पास स्थित चमरयाना मुहल्ले को छोड़ कर अन्यत्र वस गये। आरक्षण का मूल मकसद भी एससी-एसटी वर्ग के लोगो का चहुंमुखी विकास ही था। आज आवश्यकता है कि सरकार और समाज द्वारा  आरक्षण की इन खामियों पर विचारमन्थन कर पुनरावलोकन करने की है?                

इसी  समीक्षा के तहत, 1 अगस्त 2024 को देश के सर्वोच्च न्यायालय की 7 जजों की बेंच ने 6:1 के बहुमत से आरक्षण पर एक अमूल्य और अहम फैसला दिया जिससे देश की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के  वंचित, शोषित  और अंतिम छोर पर खड़े वर्ग के लोगो के आर्थिक विकास के माध्यम से उनके जीवन मे बहुत बड़े बदलाव की आशा जागृत हुई। सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के अपने ही एक अहम फैंसले को पलटते हुए, अब राज्य सरकारों को एससी, एसटी श्रेणी मे उप श्रेणी बनाने का अधिकार दिया। न्यायालय का ये भी मानना था कि ओबीसी श्रेणी की तरह एससी-एसटी श्रेणी मे भी क्रीमी लेयर का सिद्धान्त लागू होना चाहिये।  सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आरक्षण का लाभ लेकर पहली जेनरेशन आगे की ओर जाती है तो दूसरी पीढ़ी को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिये। सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी वर्ग के उन जतियों को आरक्षण मे आरक्षण दे समान अवसर प्रदान करने के प्रयास किये जिन्हे वर्तमान व्यवस्था के कारण आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा था। सुप्रीम कोर्ट की कानूनी जटिलताओं मे जाये बिना इस निर्णय का सार या निचोड़ यह था कि एससी-एसटी के लिये आरक्षित प्रतिशत मे बिना किसी बदलाव किये, पूर्व मे आरक्षण का लाभ ले चुके (क्रीमी लेयर अर्थात ऐसे व्यक्ति जो सरकारी नौकरी से आरक्षण का लाभ लेकर अपने आर्थिक और सामाजिक बदलाव कर चुके हैं) व्यक्तियों के बच्चों को पुनः आरक्षण का लाभ न देकर, एससी-एसटी वर्ग के उन  नये व्यक्तियों को   आरक्षण का लाभ दिया जाय जिन्हे पहले आरक्षण का कभी लाभ नहीं मिला।  सर्वोच्च न्यायालय का उक्त निर्णय अभिनदंकरी और ऐतिहासिक था। इस निर्णय से एससी-एसटी वर्ग के  डाल चंद जैसे वंचित लोगो के बच्चों को सरकारी नौकरी के माध्यम से अपने आर्थिक और सामाजिक बदलाव के नये आयाम खोल देने वाला था। लेकिन दुर्भाग्य!! देश के भाजपा और कॉंग्रेस सहित सारे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय  राजनैतिक दलों ने एक स्वर से सुप्रीम कोर्ट के इस सुझाव को कचरे के डिब्बे मे डाल दिया। सभी दलों के राजनैतिक नेताओं ने,  बड़ी सफाई से आरक्षण के मूल आधार को आर्थिक विकास से विलग कर छुआ-छूत से जोड़कर एससी-एसटी की कुछ चुनिन्दा जतियों के कुछ  चंद परिवारों के वर्चस्व को बनाये रखने की खातिर  अपने ही वंचित  भाइयों को आरक्षण के माध्यम से उनके  आर्थिक विकास के रास्ते मे अबरोध पैदा कर दिये, जो बेहद अफसोस जनक है। यदि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आकांक्षाओं के अनुरूप एक बार आरक्षण का लाभ ले चुके व्यक्ति के बच्चों से अलग, ऐसे वंचित लोगो को आरक्षण का लाभ दिया जाता, जिन्हे आरक्षण का कभी कोई लाभ न मिला हो, तब  एक बहुत बड़े वर्ग का आर्थिक उत्थान के माध्यम से निश्चित ही विकास होता और वे समाज मे समानता के प्रतीक होते। जब आर्थिक विकास होगा तो छुआ-छूट, उंच-नीच जैसी बुराइयों का उन्मूलन तो स्वतः ही हो जाता और आज के कड़े कानून इसमे सहायक होते।

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनैतिक दलों का सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का विरोध तो एससी-एसटी वर्ग के वोट बैंक को बनाये रखने के, उनके स्वार्थ तो समझ आते हैं पर एससी-एसटी के नेताओं के बारे मे क्या कहा जाय जो एक बार आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो चुके,  क्रीमी लेयर के एससी-एसटी वर्ग के लोगो के पक्ष मे खड़े होकर अपने ही वंचित  और शोषित भाइयों की भलाई करने का  विरोध कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण आरक्षण के लाभ से वंचित एससी-एसटी वर्ग का संगठित और  शिक्षित न होना है। यही कारण है कि जहां एक ओर एससी-एसटी की एक जाति या एक  ही परिवार मे आरक्षण के लाभ ले,  आठ-दस लोग आईएएस/आईपीएस बन जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर डाल चंद जैसे लोगो के परिवार मे एक भी व्यक्ति  सरकारी नौकरी के चतुर्थ श्रेणी की नौकरी की बाट जोह रहा है।                  

यहाँ यह लिखना आवश्यक हैं कि बाबा साहब अंबेडकर ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सर्वांगीण आर्थिक और सामाजिक  उत्थान के लिये जिस आरक्षण की कल्पना की थी, वह देश की स्वतन्त्रता के 77 वर्ष बाद, आरक्षण के वर्तमान स्वरूप मे कदाचित ही खरी उतर पायी? देश की समस्त राजनैतिक पार्टियों ने अपने राजनैतिक स्वार्थ और आत्महित लाभ के लिये चली आ रही इस व्यवस्था मे अनुसूचित जाति और जन जाति के एक सीमित वर्ग को ही लाभ पहुंचाया। आज भी इन जतियों का एक बहुत बड़ा वर्ग आरक्षण के लाभ से वंचित हैं। ऐसे अनेकों परिवार, आपको अपने चारों ओर देखने को मिल जाएंगे जिनकी अनेकों  पीढ़ियों मे से शायद ही किसी सदस्य को  सरकारी नौकरी मे चपरासी की नौकरी भी मिली हो?, अफसर या बाबू  तो बहुत दूर की बात हैं। क्या केंद्र और राज्य सरकारों की ये ज़िम्मेदारी नहीं कि ऐसे वचित वर्ग के किसी एक सदस्य को कम से कम चतुर्थ श्रेणी के चपरासी या तृतीय श्रेणी के बाबू की सुनिश्चित नौकरी की गारंटी दे!! ऐसा तभी संभव हो सकता हैं जब सुप्रीम कोर्ट की आकांक्षा के अनुरूप  पूर्व मे आरक्षण का लाभ ले चुके व्यक्ति और उनके बच्चों को  तृतीय/चतुर्थ श्रेणियों के पदों के लिये आरक्षण का लाभ ने देकर उनके ही वर्ग के ऐसे लोगो को आरक्षण का लाभ दे जिसे जीवन मे आरक्षण का कभी लाभ न मिला हो।

विजय सहगल