गुरुवार, 1 अगस्त 2024

युगपुरुष अटल के नाम पर वनों का विनाश

"युगपुरुष अटल जी  के नाम पर वनों का विध्वंस"








भारत ही नहीं दुनियाँ मे स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी की यश कीर्ति, तेजस्वी वक्तृत्व शैली   और ओजस्वी विचारों की थाह इतनी विशाल है कि उसे किसी संग्रहालय, स्मारक या साहित्य के ग्रंथ भंडारों मे समेटना नामुमकिन है। वे हिंदुस्तान के राजनैतिक इतिहास मे सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री रहे। सारी ज़िंदगी सत्य मार्ग पर चलते हुए सच्चे और ईमानदार कर्मयोगी की तरह अनासक्त कर्म और सत्ता का लोभ उन्हे तिनके से भी छू न सका था। 1999 मे मात्र एक वोट की खातिर  झूठ और फरेब से सत्ता मे बैठने की अपेक्षा उन्होने काँटों की राह पर चलने का रास्ता चुना।

बड़े खेद और अफसोस का विषय हैं कि वर्तमान मध्य प्रदेश सरकार, ग्वालियर स्थित सिरोल की पहाड़ियों पर 26 हेक्टेयर  पर फैले वन और जंगल मे  पिछले 2-3 दशक से जन सामान्य की सहभागिता और वनमंडल ग्वालियर द्वारा विकसित वन मे स्थित हजारों वृक्षो को काट कर अटल स्मारक बनाने का प्रयास कर रही हैं। इस क्षेत्र मे वनों, वृक्षो को विकसित कर प्रातः भ्रमण मे आने वाले कुछ प्रबुद्ध जनों और जागरूक नागरिकों ने स्व॰ अटल बिहारी जैसे महान व्यक्तित्व के स्मारक के लिए इन फलीभूत वृक्षों की कटाई न करने का अनुरोध जिला कलेक्टर सहित शासन के संबन्धित अधिकारियों से  किया हैं। हम सब का मानना हैं कि आज माननीय अटल बिहारी बाजपेय जी भी होते तो उनकी याद मे बनाए जा रहे स्मारक के लिए इतनी बड़ी संख्या मे वृक्षो की कटाई का पुरजोर विरोध करते। माननीय मुख्य मंत्री डॉ मोहन सिंह यादव जी से अनुरोध है कि वे सिर्फ एक बार प्रातः या अन्य किसी भी समय आ कर प्रकृति और पर्यावरण के इस सुंदर समंजस्य को देखें तो पाएंगे कि कैसे राष्ट्रीय पक्षी मोर अपने सैकड़ों परिवार के साथ मेओ!, मेओ! कर अपने पंख फैला कर नृत्य करता हैं। छोटे -छोटे मोर के बच्चों से लेकर किशोर तक पूरे मैदान मे निडर होकर भ्रमण करते हैं। जंगली तीतर और खरगोश के समूह अपनी सुरीले आवाज मे धमा चौकड़ी करते नज़र आ जाएंगे। गिलहरी, तोते, कोयल, पपीहा, नील कंठ आदि पक्षियों  के समूह तो मानों सारे दिन स्वागत मे कूंह-कूंह करते सुबह से प्रभात फेरियाँ निकालते हुए पेड़ों की डालों पर मदमस्त विचरण करते हैं। यदा कदा नील गाय और जंगली सूअर पूरे वातावरण मे पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के यतन करते मिल जाएंगे।

एक ओर भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी देश के लोगो से आवाहन कर रहे हैं कि पर्यावरण को बचाने हेतु सभी लोग एक पेड़ अपनी माँ की याद मे रोप कर वृक्षा रोपण करें। इन दिनों प्रधानमंत्री जी के आवाहन की अनुपलना हेतु ग्वालियर मे भी बृहद वृक्षा रोपण कार्यक्रम किया जा रहा हैं। दाना पानी संस्था द्वारा भी सिरोल पहाड़ी से एकदम सटी  हुई शारदा बाल ग्राम की पहाड़ी के चारों ओर लगभग 700 पौधों का वृक्षारोपण किया हैं। एक ओर तो प्रधानमंत्री का वृक्षारोपण हेतु अपील की जा रही है वही ग्वालियर प्रशासन सिरोल पहाड़ी पर उगे वनों के विनाश का आदेश दे रही हैं जो प्रधानमंत्री की अपील के विपरीत ही नहीं पर्यावरणीय दृष्टि से अहितकर भी हैं। बैसे भी ग्वालियर का मौसम वृक्षों के अभाव मे दिन व दिन गर्म होता जा रहा हैं और वृष्टि भी साल दर साल कम हो रही हैं। ग्वालियर मे जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण वृक्षों, वनों और जंगलों का अंधाधुंध कटाई होना मुख्य कारण हैं।

कलेक्ट्रेट मार्ग और सचिन तेंदुलकर मार्ग के चारों ओर बने कंक्रीट के आवासों के बीच सिरोल पहाड़ी और शारदा बालग्राम रेगिस्तान के बीच नखलिस्तान की हरियाली सा जो सुख देता हैं अकल्पनीय और अवर्णनीय है!!  अफोसोस स्मारक बनने के बाद न्यू सिटी सेंटर के हृदय स्थल से हरियाली का नमो निशान भी जाता रहेगा।

हम सभी नागरिक और जन साधारण हाथ जोड़ कर शासन और सरकार से करबद्ध निवेदन करते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री, युगदृष्टा स्व॰ अटल बिहारी की स्मृति मे बनाए जाने वाले स्मारक को छत्तीसगढ़ मे राजिम के नजदीक स्थित कृष्ण भगवान के गुरु बल्लभचार्य की जन्मस्थाली ग्राम चंपारण की तर्ज पर बनाए जहां निर्माण के बीच आने वाले एक भी वृक्ष को नहीं काटा गया। इस हेतु शासन छत्तीसगढ़ के शासन से संपर्क कर ग्वालियर के कुछ अधिकारियों को चंपारण का दौरा करा कर, मार्ग निर्देशन प्राप्त करने हेतु भेज  सकता हैं। वन और वृक्षों के साथ श्रेद्धेय अटल जी की यादें और स्मारक दोनों ही एक दूसरे के सहअस्तित्व का  एक बेमिसाल उदाहरण साबित होंगे।

गुजरात के केवाडिया के तर्ज पर माननीय अटल जी की स्टेचू के साथ सुंदर आधुनिक पार्क भी बनाया जा सकता हैं। जहां पर रात मे सुंदर, रंग बिरंगे  प्रकाश की व्यवस्था कर आकर्षण उत्पन्न किया जा सकता हैं। या ऐसे ही अन्य सुझावों पर शासन और सरकार विचार कर, सिरोल की इस 26 हेक्टअर भूमि पर लगे वनों पर उगे अनगिनित वृक्षों को काटने से बचा सकती हैं।   

अटल स्मारक के जगह इस पहाड़ी पर घने वृक्षों के बीच एक सुंदर पार्क को विकसित किया जा सकता हैं। भोपाल मे ऐसे अनेकों पार्क विकसित किए गए हैं, ग्वालियर मे इस तरह का एक भी पार्क अब तक नहीं है, जहां लोग अपने बच्चों और परिवारजनों के साथ घने वृक्षों के हरियाली तले पिकनिक या मनोरंचन कर सकते हैं।    

यध्यपि जंगल के विनाश की शुरुआत के लिए आधारभूत संरचनाएं आना शुरू हो गयी हैं। पहाड़ी की घेरा बंदी के लिए बांस, बल्ली टीन शेड आ गए हैं। वृक्षो के विध्वंस के लिए जेसीबी, कंक्रीट मिक्सर ने पोजीशन सम्हाल ली हैं। इस सबके बीच इन विध्वंसकारी यंत्रों के हमले से, सालों से पेड़ों और उनपर अपना आश्रय बनाने वाले मूक पशु अपनी व्याकुलता और बेचैनी को महसूस तो कर रहे हैं पर कहें किस से?? क्या हम मानव हो कर भी पक्षियों को अपने घरों से उजड़ने के  दर्द को, वृक्षों को अपनी जड़ों से उखड़ने की वेदना को, पशुओं के आत्मघात की पीड़ा को, प्रकृति की व्यथा को, पर्यावरण के कष्ट और क्लेश को, नहीं समझ पा रहे, तो लानत हैं हमे अपनी मनुष्यता पर, खेद हैं हमे अपनी मानवता पर, दुःख और लज्जा  है अपने पुरुषत्व और पौरुष पर, जो इन मूक पशुओं  पक्षियों, वृक्षों  के संदेश को देखते हुए भी अनदेखी कर आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ पर्यावरण की दृष्टि से खिलवाड़ कर रहे हैं???? अभी भी वक्त हैं माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, माननीय मुख्यमंत्री श्री मोहन सिंह यादव स्मारक के लिये सिरोल पहाड़ी (ग्वालियर) पर वृक्षों से आच्छादित वनों के विनाश के फैसले को स्थगित कर पुनर्विचार करने का कष्ट करेंगे।

विजय सहगल   

           


4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Very bad news. Human beings are not ready to accept their follies and such actions resulting in natural catastrophe that causes damage and loss of life.
🙏🏻🙏🏻
I S Kadiyan, Chandigarh

बेनामी ने कहा…

बहुत ही दुःखद

बेनामी ने कहा…

आदरणीय सहगल जी,
सादर नमस्कार।
लोगों को जागरूक करते हुए,दृढ़ता से डटे रहिए,सफलता अवश्य मिलेगी।
प्रदेश सरकार को सद्बुद्धि जरूर आएगी।
राजेन्द्र सिंह, ग्वालियर

बेनामी ने कहा…

दुःखद। जनता जागरुक हो तो सब संभव है। जनता के सार्थक विरोध से इसे रोका जाए।