"अयोध्या
मे हुए मतदान के संदेश"
सनातन हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रेता
युग और द्वापर युग से लेकर आज के कलियुग तक भगवान श्री राम और अयोध्या एक
दूसरे के पर्याय हैं। किसी एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। रामचरित
मानस मे गोस्वामी तुलसीदास जी ने उत्तरकाण्ड मे रामराज्य की महिमा का वर्णन निम्न
चौपाइयों मे किया हैं:-
दैहिक
दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब
नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥ अर्थात
राम
राज्य मे किसी को दैहिक, दैविक और भौतिक
दुःख और तकलीफ नहीं थी। सभी मनुष्य परस्पर प्रेम करते थे और अपने अपने धर्म का
पालन करते थे, इसके बावजूद प्रभु राम
को जीवन पर्यन्त कदम, कदम पर अनेक
परीक्षाओं से गुजरना पड़ा था फिर चाहे आश्रम मे शिक्षा ग्रहण करने के दौरान गुरु
आज्ञा अनुसार असुरों का वध हों, माता कैकई के
आज्ञा अनुसार राज्य का त्याग और 14 वर्ष हेतु वन गमन करना पड़ा हो। भगवान राम को
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अर्थात
पुरुषों मे सबसे उत्तम, मर्यादाओं का
पालन करने वाले भगवान यूं नहिं कहा गया। एक राज्य के शासक राजा होने के बावजूद
उन्होने लोक लाज रूपी लोकतन्त्र की स्थापना और नैतिकता के उच्चतम मानदण्डों पर चलने
की राज्य नीति को ही अपना लक्ष्य मान शासन चलाया। जिन भगवान श्रीराम ने अपने राज्य मे धोबी का अध्यवसाय से अपनी जीवका उपार्जन
वाले एक साधारण नागरिक द्वारा अपने पारिवारिक अन्तः कलह मे माता सीता की पवित्रता
पर संदेह मात्र का उल्लेख के कारण देवी
सीता का परित्याग कर दिया था आज उसी अयोध्या मे जनादेश 2024 के रण मे सत्ताधारी दल
बीजेपी की पराजय देख कोई बिस्मय और आश्चर्य नहीं हुआ। बेशक नरेंद्र मोदी भगवान राम
नहीं हैं लेकिन भगवान राम के रामराज्य की परिकल्पना के आवश्यक कारक,
मूल तत्व और विचार, वर्तमान अयोध्या के
उत्थान, उन्नति और उदय मे परिलक्षित
तो होते ही हैं। जब त्रेता युग के रामराज्य मे समस्त राज्य की जनता को दैहिक,
दैविक और भौतिक सुख के बावजूद अयोध्या एक साधारण नागरिक के तंज़ के कारण रामराज्य
के राजपरिवार के राजा को अपनी अर्धांग्नि का परित्याग करना पड़ा हो तब कलियुग की उसी
अयोध्या के जनमानस द्वारा,
जनादेश 2024 के तहत अभूतपूर्व,
अंगिनित और अद्वितीय विकास कार्यों को अनजाना,
अनुसूना और अनदेखा करने मे कोई आश्चर्य और
विस्मय नहीं हुआ क्योंकि त्रेतायुग की अयोध्या की सरयू नदी मे तब से आज तक बहुत
पानी बह चुका हैं। रामराज्य के परस्पर
प्रेम और भाई चारे का स्थान कलियुग के स्वार्थ,
ईर्ष्या और वैरभाव ने ले लिया हैं।
मध्य
पूर्व के अनेकों देशों मे राजशाही के चलते समृद्धि,
संपन्नता सुख सुविधाओं के बावजूद वहाँ के आमजनों को बोलने की आज़ादी सीमित हैं,
वहाँ की सरकारे पहनने ओढ़ने की उतनी ही आज़ादी देती हैं,
जो वहाँ के शासक चाहते हैं। इसी तरह खाने,
पीने देखने और सुनने की स्वतन्त्रता पर उनका पूर्ण नियंत्रण हैं। उन देशों मे देश के
लोगों को वहीं दिखाया,
सुनाया, खिलाया,
पिलाया पहनाया और ओढ़ाया जाता हैं जितना वहाँ के शासक और सरकारें चाहती हैं। न्याय व्यवस्था
के तहत कदाचित ही कहीं कोई सुनवाई होती हो?
इतनी संपन्नता और सुविधाओं के बावजूद उनके नागरिक शायद ही प्रसन्न और संतुष्ट हों क्योंकि
उन्हे लोकतान्त्रिक देशों की तरह अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं हैं। लोकतन्त्र की ये एक
भारी विडंवना हैं कि जहां एक ओर लोगो को बोलने की अभिव्यक्ति की आज़ादी तो हैं पर अन्य
लोकतान्त्रिक विकासशील देशों की तरह समाज,
देश और लोक कल्याण के प्रति कोई कर्तव्य निर्धारित नहीं किये गये। यहीं कारण हैं कि
हम दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश होने के बावजूद हमारा लोकतन्त्र उतना परिपक्व,
जवाबदेह और जिम्मेदार नहीं है जितना कि दुनियाँ
के अन्य देश हैं।
देश की स्वतन्त्रता के 67 साल बाद भी जिस अयोध्या की आधारभूत संरचना के विकास की बात तो दूर अयोध्या की जिस धरती पर कॉंग्रेस सहित इंडि गठबंधन के नेतागण पैर रखने से डरते रहे क्योंकि बहुसंख्यकों के धर्म की आस्था और विश्वास से कहीं उनका वोट बैंक नाराज़ न हो जाए? जिस कॉंग्रेस ने पाँच सौ साल से भी ज्यादा समय से चले आ रहे रामजन्म भूमि मुद्दे को देश की स्वतन्त्रता के बाद से सिर्फ इसलिए अटकाये, भटकाये और लटकाये रक्खा ताकि उनका समर्थन करने वाला समूह कॉंग्रेस से नाखुश और नाराज न हो जाये? एक बारगी हम देश मे हुए निर्माण को एक तरफ रख सिर्फ अयोध्या के विकास मे मील का पत्थर सवित हुए राम जन्मभूमि मंदिर की बात करें तो जिस राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण से सीधे अयोध्या के आम नागरिकों को सड़कों के निर्माण से, होटल और व्यसायिक गतिविधियों के कारण, रेल्वे स्टेशन के विनिर्माण और नये हवाई अड्डे के निर्माण से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से लाखों रोजगार के अवसर मिले हों तब ऐसे भ्रष्ट, स्वार्थी और पदलोलुप्त राजनैतिज्ञों से कैसे अपेक्षा की जा सकती हैं कि उन्हे अयोध्या मे हुए अभूतपूर्व विकास से प्रसन्नता हुई होगी? दुर्भाग्य से अयोध्या के आम जन भी इन राजनैतिज्ञों के झांसे मे आकर अयोध्या के विकास, उन्नति और समृद्धि के पक्ष मे निर्णय लेने से चूक गये।
लोकतन्त्र के चुनावी रण मे जिस दल को बहुमत मिलता हैं जीत उसी की होती हैं फिर दल या उम्मीदवार कोई भी हों। लेकिन किसी भी चुनावी समर का आधार स्थान विशेष की आधारभूत संरचनाओं का विकास, नागरिकों को रोजगार, कानून व्यवस्था की स्थिति, पढ़ाई लिखाई एवं चिकित्सा और स्वास्थ्य की सुविधाएं और मजदूरों किसानों के हितों का ध्यान मुख्य आधार होते हैं!! जहां तक वंचित और कमजोर वर्ग के कल्याण की बात हैं मोदी सरकार के दोनों कार्यकाल मे उनको मुफ्त राशन, हर घर जल, आयुष्मान योजना, किसान सम्मान निधि, शौचालय, पीएम आवास योजना, हर घर बिजली, रसोई गैस जैसी गरीबी से जुड़ी प्रत्यक्ष लाभ वाली अनेकों योजनाओं का कार्यान्वयन हुआ। कोरोना काल मे तो सफलता पूर्वक तीनों इंजेकशन के डोज़ लगाए गए जब दुनियाँ के विकसित देशों मे भी हाहाकार मचा था। राजनीति मे थोड़ा बहुत भी दखल रखने वाला व्यक्ति इस बात पर सहमत होगा कि इन सारे पैमानों मे सत्तारूढ़ दल ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी तब ये तो निश्चित हैं कि अयोध्या का चुनाव विकास के मुद्दे पर तो कतई नहीं लड़ा गया। इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ एक मुद्दा बनाया गया कि येन केन प्रकारेण ध्रुवीकरण ईर्ष्या, वैमनस्य और जातिवाद फैला कर किसी भी तरह सीट हथियाना था। आम लोगो के बीच संविधान को समाप्त करने और आरक्षण को निरस्त करने जैसे मनगढ़ंत और झूठी किस्से गढ़ने मे सपा और कॉंग्रेस सहित इंडि गठबंधन के लोग कुछ हद तक सफल तो हुए पर फिर भी सत्ता पाने से वंचित रहे अन्यथा भाजप प्रत्याशी लल्लू सिंह का यदि व्यक्तिगत आग्रह और उनके व्यवहार को छोड़ दे, अन्यथा ऐसे कोई भी कारण नज़र नहीं आते कि मतदाताओं ने इस चुनाव मे अपनी चुनावी सूझ बूझ, दूरदृष्टि और क्षेत्र के विकास के मुद्दे को दृष्टिगत वोटिंग की हो? ऐसा प्रतीत होता हैं कि इस चुनावी संग्राम मे हद दर्जे की दुराग्रह, पूर्वाग्रह, अधम सोच, ईर्ष्या और कटुता की पराकाष्ठा रूपी मुद्दे ही हावी रहे जो समाज, देश और आपसी सद्भाव के लिए बहुत बड़ा सवालिया निशान हैं।
ये तो निश्चित हैं कि इंडि गठबंधन द्वारा गढ़े गये झूठे और मनगढ़ंत नरेटिव रूपी लकड़ी की हांडी हर बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाई जा सकती। एक झटके मे गरीबी हटाने की खटाखट-खटाखट योजनाएँ का भ्रम बार बार नहीं फैलाया जा सकता। आने वाले समय मे अयोध्या सहित देश के मतदाता और भी ज़िम्मेदारी और समझदारी से मतदान कर एक नया उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। ऐसी आशा की जानी चाहिये।
विजय
सहगल

2 टिप्पणियां:
आशा के अलावा कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं है।
सही लिखा आपने। इस वार झूठे लुभावने वादे और जातीगत भ्रम लोगों में फैलाकर इसवार इंडिया गयबंधन ने जीत तो हासिल करली लेकिन जनता को ज्यादा समय तक मूर्ख नहीं बना सकते।ये बात जल्दी ही लोगों की समझ में आ जाएगी। जय श्री राम।
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