रामतनु पांडे उर्फ
मियां तानसेन का मकबरा ग्वालियर
जब
तक मैं ग्वालियर के हाजीरा क्षेत्र मे स्थित इस तानसेन मकबरे की इस मुख्य स्मारक
को देख, गलत फहमी मे था कि वास्तु की
दृष्टि से इस सुंदर पीले राजस्थानी बलुआ पत्थरों से निर्मित पुरातन भवन मे दुनियाँ
के सर्वश्रेष्ट संगीत सम्राट तानसेन का मकबरा हैं, मै अति
प्रसन्नता और खुशी महसूस करता था। लेकिन
जैसे ही मुझे शिलालेख पर पढ़ कर ज्ञात हुआ कि ये मुख्य इमारत और उसके उपर
निर्मित गोल गुंबद,
संगीत सम्राट तानसेन की समाधि नहीं है मन को एक अदृश्य अवसाद, निराशा और दुःख ने घेर लिया। वास्तव मे वर्गाकार रूप मे निर्मित ये इमारत
गौस मुहम्मद का मकबरा हैं जो एक प्राचीन फकीर हुए हैं। तानसेन का मकबरा तो इस
अहाते मे बनी अन्य अनेकों समाधियों मे से एक अत्यंत साधारण, छोटी सी जगह मे बनाया गया हैं। मुझे मन ही मन मे
कचोट हुई कि अपने जमाने के मूर्धन्य और सर्वश्रेष्ठ संगीत सम्राट जिन्हे अकबर के नवरत्नों मे से एक रत्न होने का सम्मानीय स्थान प्राप्त था, की समाधि इतनी साधारण क्यों? यध्यपि संत फकीर
मुहम्मद गौस एक प्रसिद्ध संत रहे होंगे और उनके परिवार के अन्य स्वजनों के बीच
तानसेन के एक अति साधारण मकबरे मे दफनाने के पीछे अवश्य कोई रहस्य रहा होगा? जो शोध का विषय होना चाहिए अन्यथा तानसेन जैसे संगीतज्ञ की समाधि या
मकबरा एक शानदार और बेमिशल वास्तु से निर्मित समाधि स्थल या मकबरे की इमारत का
हकदार था? एक असाधारण संगीतज्ञ के नश्वर शरीर की आत्मा को श्रद्धांजलि के रूप मे इस साधारण सी
समाधि मे अन्य अनेकों लोगो के बीच दोयाम दर्जा देकर दफनाना कुछ अजीब लगता हैं? मृत्युपरांत उनके शरीर को एक अलग और अच्छे समाधि स्थल पर न दफनाया जाना
मन को खटकता रहा। तानसेन की समाधि शायद राजमहलों मे चलने वाली "दुरभिसंधियों"
अर्थात षडयंत्रों और साज़िशों का शिकार या परिणाम सवित हुई हो?
खैर
जो भी हो, सच्चाई से मै रु-ब-रु था। 6 मई 2024 को मैंने प्रातः 6-6.30 बजे प्रवेश
द्वार जो कि तमाम अतक्रमणों से युक्त था कुछ कुछ दिखाई दे रहा था। यदि आप बाजार खुलने के समय प्रातः 10 बजे के बाद
जाएंगे तो आपको तानसेन की समाधि के
मुख्यद्वार को तलाशने मे शायद कठिनाई हो और लोगों से पूंछ-तांछ करनी पड़े। पुरातत्व
विभाग की देखरेख मे समाधि स्थल के बड़े परिसर
को अच्छे ढंग से रक्खा गया हैं। 46-47 डिग्री की गर्मी के बावजूद हरे घास
के मैदानों का रखरखाव अच्छा था। ग्वालियर के हाजीरा क्षेत्र मे स्थित प्रातः घूमने
आने वाले सैकड़ों लोगो के बीच मैंने भी वृहद समाधि परिसर घूमने के प्रयोजन से
चहलकदमी शुरू की। पीले बलुआ पत्थरों से मुगल शैली मे निर्मित मुहम्मद गौस का मकबरा
वास्तु की दृष्टि से अत्यंत सुंदर और दर्शनीय है। भवन के मध्य मे शिखर पर गोल
गुंबद और उसके नीचे ढालू पत्थरों से निर्मित छज्जे तथा छत्त के चारों कोनों और
उनके मध्य मे छोटी छोटी छतरियाँ इमारत की सुंदरता मे चार चाँद लगा देती हैं। ऐसी
किवदंती हैं कि मुहम्मद गौस एक अफगानी राजकुमार थे जो बाद मे एक सूफी संत बन गए। मकबरे की बाहरी दीवारों
पर 20 वर्गाकार कक्काशीदार, सुंदर जालियाँ लगाई गयी हैं। हर जाली
की नक्काशी दूसरी जाली से भिन्न हैं जिन पर सुंदर ज्योमिति के वृत्त, अर्धवृत्त, लाइन, त्रिकोण, षट्कोण आदि उकेरे गए हैं। मुहम्मद गौस के मकबरे के पीछे व दायें और बाएँ
अनेक छोटे बड़े मकबरे अर्थात समाधियाँ बनी हैं जो संभावतः उनके परिवार के लोगो की
रहीं होंगी। वरिष्ठ जनों का एक समूह भी उन्ही समाधियों के बीच हास-परिहास कर रहा
था। मैंने भी उनके साथ शामिल हो एक फोटो लेने की अनुमति चाही। उन सीनियर सिटिज़न मे
से एकने पहले, पुलिसिया अंदाज़ मे मुझ से पूंछ-तांछ की तब
फोटो लेने की अनुमति दी!! वे शायद राज्य सरकार के कोई वरिष्ठ अधिकारी रहे होंगे।
आगे
वेला के फूलों की सुंगंधित खुसबू के बीच छोटे छोटे चबूतरों पर एक ही तरह की
समाधियाँ बनी थी। मुहम्मद गौस के मकबरे मे कुछ लोग फूल अगरबत्ती से उनके प्रति
अपनी श्रद्धा ज्ञपित कर रहे थे। वहीं आगे
सुप्रससिद्ध ध्रुपद गायक, संगीत सम्राट तानसेन की समाधि भी थी। एक ऊंचे चबूतरे के मध्य मे बारह, साधारण नक्काशी दार स्थम्भों के बीच बनी बारहदरी पर बने, तानसेन के मकबरे को निर्मित किया गया था, पुनः चार
पाषण खंभों के बीच उनकी समाधि बनी हुई थी। उसी कॉरीडोर मे तानसेन की समाधि के निकट
ही एक और समाधि बनी हुई थी जो शायद उनकी पत्नी हुसैनी की रही हो।
चबूतरे पर चढ़ कर मैंने भी समाधि स्थल पर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर वहाँ
लगे शिलालेख पर लिखी इबारत को पड़ने लगा। ऐसी
कहावत है कि तानसेन की समाधि पर
लगे इमली के पेड़ की पत्तियाँ खाने से आवाज मे मिठास आ जाती हैं। लोगो की नज़रें बचा
के डरते-डरते मैंने भी कुछ इमली की पत्तियाँ मुंह मे रख ली,
कहीं डर था कि कोई देख न ले और छींटा कसी
न कर दे, "अंकल, इस उमर मे आवाज मीठी कर के क्या करोगे?"
प्रतिवर्ष
मध्य दिसम्बर मे, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा चकाचौंध से परिपूर्ण इस चार दिवसीय वृहद तानसेन समारोह का आयोजन किया
जाता हैं जिसमे देश विदेश के नामचीन संगीतकर भाग लेते हैं। हर वर्ष किसी एक भारतीय
संगीतकार को तानसेन पुरुस्कार एवं पाँच लाख रुपए देकर सम्मानित किया जाता हैं।
कार्यक्रम के आखिर दिन तानसेन की जन्मस्थाली बेहट मे भी एक सभा का आयोजन किया जाता
हैं जो ग्वालियर से 40 किमी दूर स्थित हैं, जहां देश विदेश
के संगीतकारों के साथ बेहट गाँव के निवासी अपने प्रिय तनुआं अर्थात रामतनु पांडे
उर्फ संगीत सम्राट तानसेन को स्मरण कर उन
दिनों की याद करते हैं जहां तनुआं ने अपनी रागों की तान से शिव मंदिर को टेड़ा कर
दिया था। वह शिव मंदिर आज भी उसी दशा मे हैं जिसका उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग दिनांक
28 अप्रैल 2023 (https://sahgalvk.blogspot.com/2023/04/blog-post_28.html ) को किया था। इस वर्ष 2024 को इस तानसेन समारोह का 100 वां साल होगा। आप सब भी इस समारोह
मे, अभी से सादर आमंत्रित हैं।
विजय
सहगल







3 टिप्पणियां:
रामतनु पांडे उर्फ तानसेन को सादर नमन
ATI sunder jankari
कलम पर आपकी पकड़ निर्विवाद रूप से प्रशंसनीय है ! वास्तव में तानसेन को जो स्थान इस परिसर में मिलना चाहिये.... कहीं भी दृष्टीगोचर नहीं होता
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