शनिवार, 29 जून 2024

18वीं लोकसभा का शुभारम्भ और आपातकाल की काली 50वीं वर्षगांठ

 

18वीं लोकसभा का शुभारम्भ और आपातकाल की काली 50वीं वर्षगांठ



इसे विश्व  के सबसे बड़े लोकतन्त्र के मंदिर की 18वीं लोकसभा का सत्रारंभ का सुखद संयोग कहें या आज ही के दिन देश मे लोकतन्त्र के नाम कॉंग्रेस शासित तानाशाह  प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा देश मे थोपी गयी स्याह काली  आपातकाल की 50वी वर्षगांठ का  दुःखद दुर्योग, 18वीं लोकसभा का सत्र आरंभ  ऐसे समय हो रहा हैं जब संसद के दोनों पक्ष के लोग लोकतन्त्र की रक्षा करने की दुहाई देकर एक दूसरे पर संविधान मे बदलाव का आरोप लगा रहे हैं।  दोनों पक्षो के तेवर देख अनुमान लगाना कठिन न होगा कि आने वाले संसद के सत्र का स्वरूप कैसा होने वाला हैं। संसद सत्र के पहले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहाँ एक ओर अपने तीसरे कार्यकाल पर देश की जनता को धन्यवाद देते हुए सर्वसहमति से चलाने के प्रयास के तहत पक्ष-विपक्ष से सहयोग की अपील तो की साथ ही आपात काल की 50वीं काली वर्षगांठ पर तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार और प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की तानाशाही पूर्ण रवैये और देश को जेल मे परिवर्तित कर विपक्षी सदस्यों  को जेलों मे डालने पर प्रकाश डाला और देश को आगाह किया कि हमे ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना होगा ताकि कोई भी तानाशाह संविधान की हत्या कर लोकतन्त्र का बलात हरण कर स्थगित करने की हिमाकत न कर सके। वरिष्ठ कोंग्रेसी  नेता और कॉंग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे का आपात काल लगाने पर  ये कथन कि प्रधानमंत्री  मोदी अपनी कमियां छिपाने के लिए अतीत को कुरेदते रहते हैं!! उन जैसे परिपक्व और वयोवृद्ध व्यक्ति का उक्त कथन अदूरदर्शी, बेतुका और बुद्धि विवेक से परे हैं। हमे ये याद रखना होगा कि न तो इतिहास को भुलाया जा सकता और न ही छुपाया जा सकता हैं। किसी भी तानाशाह के शोषण, अत्याचार और अनाचार का विरोध करने, लड़ते हुए बलिदान हो जाने वालों का हमे उसी तरह स्मरण करना चाहिए जैसे सिक्खों के महान  गुरु श्री अर्जुन देव, गुरु श्री तेग बहादुर, गुरु गोविंद सिंह और उनके चारों साहिबजादे, छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और अन्य महान बलिदानियों द्वारा अपने आप को, देश धर्म और समाज की रक्षा के लिये न्योछावर हो जाने वालों को प्रतिवर्ष स्मरण कर उनकी जयंती मनाते हैं।             

वहीं दूसरी ओर इंडि गठबंधन के लोगो द्वारा हाथों मे संविधान की प्रतियों  के साथ संविधान की रक्षा की प्रतिवद्धता जतलाना आश्चर्य चकित करने वाला था। जो कॉंग्रेस संविधान की रक्षा करने की कसमें खा रही थी उसी कॉंग्रेस ने आज ही के दिन 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रेमती इन्दिरा गांधी ने  देश मे आपातकाल लगा कर देश के संविधान को समाप्त कर स्थगित कर दिया था। इसी आपातकाल मे इंडि गठबंधन के घटक दलों के जिन  नेताओं को  बिना किसी कारण के 19 माह तक गिरफ्तार कर तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार ने बिना किसी प्रमाण और कारणों के जेलों मे डाल दिया था वे ही घटक दल और उनके नेता  संविधान की रक्षा के नाम पर कॉंग्रेस के साथ खड़े हैं।  ये लोकतन्त्र की बड़ी भरी विडम्बना थी और  देश का दुर्भाग्य था कि जिस कॉंग्रेस सरकार पर देश के संविधान की रक्षा की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी थी उसी कॉंग्रेस ने संविधान की हत्या कर देशभर के विपक्षी दलों के नेताओं को जेल मे डाल दिया। अभिव्यक्ति की आज़ादी तो सपना हो गया था। मीडिया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा कर समाचार पत्रों की आज़ादी समाप्त कर दी गयी थी।

इसी बीच इंडि गठबंधन ने सर्वसम्मति से राहुल गांधी को विपक्षि दलों  का नेता चुन लिया। यूं तो राहुल गांधी हमेशा बड़ी जिम्मेदारियाँ लेने से बचते रहे क्योंकि इतने लंबे राजनैतिक कैरियर के बावजूद भी उनमे वो राजनैतिक परिपक्वता नज़र नहीं आती जो इतने अनुभव के बाद किसी सयाने और प्रौढ़ राजनेता से की जानी चाहिये। आशा ही नहीं विश्वास हैं कि राहुल गांधी विपक्षी दल के नेता के रूप मे अपने आप को स्थापित कर एक नया उदाहरण प्रस्तुत करेंगे।                

संसद मे प्रोटेम स्पीकर के रूप मे श्री भरतृहरि महताव के चुनाव जैसे साधारण मुद्दे को असाधारण बना कर कॉंग्रेस ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और सत्ताधारी दल का लोकसभा अध्यक्ष की चली आ रही निर्विरोध चुनने की प्रथा मे रोढ़ा अटकाकर अबरोध पैदा करने के प्रयास किया।  कॉंग्रेस की मांग थी कि सत्ताधारी एनडीए इस बात का आश्वासन दे कि लोकसभा का उपाध्यक्ष विपक्ष का हो? सत्तापक्ष के लोगो द्वारा इस तरह की किसी भी पूर्व शर्त स्वीकार नहीं किया जाने से कॉंग्रेस द्वारा के सुरेश को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। जब उपसभापति का चुनाव होगा तब इस विषय मे खुले दिल से विचार किया जाएगा। इस तरह के अविश्वास के कारण ही संसद मे 26 जून 2024 को सभापति पद के लिये एनडीए के प्रत्याशी के रूप मे श्री ओम बिड़ला और इंडि गठबंधन के प्रत्याशी के रूप मे श्री के॰ सुरेश के बीच हुए चुनाव के रूप मे अंततः ध्वनि मत से विजयी घोषित किए गए। ये जानते हुए भी कि इंडि गठबंधन के पक्ष मे आवश्यक संख्या बल नहीं है, कॉंग्रेस  ने मतविभाजन की मांग न कर अपनी जग हँसाई भी  करवाई। यदि राहुल गांधी के पहले संवैधानिक पद विपक्षी दल के नेता के रूप मे स्पीकर के पद की चुनावी रणनीति को उनकी  पहली परीक्षा माने तो राहुल गांधी इस परीक्षा मे असफल माने जाएंगे। 

सभापति के चुनाव के बाद माननीय सांसद महोदयों द्वारा स्पीकर महोदय श्री ओम बिड़ला  को दिये गए संदेशों की औपचारिकताओं के बीच कुछ सदस्यों द्वारा उनको प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नसीहते भी दी। सपा के अखिलेश यादव ने ओम बिड़ला जी द्वारा पिछले कार्यकाल मे 150 संसद सदस्यों को निलंबित किये जाने की घटना को दुबारा न करने की सलाह दी। कदाचित अखिलेश यादव, माननीय संसद  सदस्यों को भी संसद की तय मान्यताओं और नियमों के अनुरूप आचरण करने का भी संदेश देते, जिसके के कारण पिछले कार्यकाल मे संसद सदस्यों की बर्खास्तगी जैसी अप्रिय कदम  उठाने के लिये  सभापति को बाध्य होना पड़ा। लेकिन आज के सत्र के दौरान ही, सख्त अनुशासन पसंद सभापति ओम बिड़ला जी द्वारा एक सदस्य के लगातार बोलने पर आसंदी से खड़े हो कर उन्हे  बैठने के लिये कहते हुए सदन के सारे सदस्यों को ये संदेश दिया कि जब सभापति आसंदी से खड़े होकर बोले तो सारे सदस्यों को बैठ जाना चाहिये। चूंकि सदन के ये पहला दिन हैं और बहुत से सदस्य नये हैं,  पर आगे पाँच साल इस बात का ध्यान रक्खा जाना चाहिये। ये संदेश इस बात की तरफ साफ  इशारा था कि सभापति द्वारा संसद की कार्यवाही तय नियमों और अनुशासन के साथ ही चलाई जायेगी।

संसद की कार्यवाही के अंत मे सभापति श्री ओम बिड़ला द्वारा 25 अगस्त 1975 को तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा 50 वर्ष पूर्व देश मे लागू किये गये  आपातकाल पर, निंदा प्रस्ताव पढ़ना आश्चर्य और अभूतपूर्व था। उन्होने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी और कॉंग्रेस की निंदा और आलोचना करते हुए उन्हे तानाशाह बताते हुए लाखों विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, प्रेस पर पाबंदी, न्यायपालिका पर अंकुश और देश के आम नागरिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों की समाप्ति की कड़ी निंदा की और आपातकाल को देश के लोकतन्त्र के लिये कलंक और काला अध्याय बताना चौंकने वाला अभूतपूर्व साहसिक कदम था। संसद मे राहुल गांधी द्वारा जेब मे संविधान की प्रति रख कर अपने आप को संविधान की रक्षा का पुरोधा बताने पर उन्हे उनकी दादी श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा, संविधान पर किये गए कुठराघात पर आईना दिखा दिया। स्वाभाविक था कॉंग्रेस के सदस्यों ने  संसद मे नारेबाजी कर इस निंदा प्रस्ताव का विरोध किया। लेकिन सपा, टीएमसी और अन्य दलों द्वारा आपातकाल के इस निंदा प्रस्ताव के कॉंग्रेसी का साथ न मिलना बताता हैं कि कॉंग्रेस के उस तानाशाही पूर्ण आपातकाल को देश आज भी भूला नहीं हैं। भारत के  मजबूत लोकतन्त्र मे तानाशाही लाने और संविधान को बदलने का दुस्साहस करने वालों को उसी तरह मुँह की खानी पड़ेगी जैसे कि आज से 50 वर्ष पूर्व आपातकाल लागू करने पर श्रीमती इन्दिरा गांधी और कॉंग्रेस को खानी पड़ी थी।          

विजय सहगल

शुक्रवार, 21 जून 2024

"एलन मस्क की वोटिंग मशीन पर इंडिया का तंज़"

 

"एलन मस्क की वोटिंग मशीन पर इंडिया  का तंज़"



4 जून को एक्ज़िट पोल के परिणामों को नकारते हुए  कॉंग्रेस सहित जिस इंडि गठबंधन के पक्ष मे जो थोड़ा बहुत जनादेश आया था उसने इंडि गठबंधन के घटक दलों को  वोटिंग मशीन  पर  सत्यता और संदेह का कोई मौका नहीं दिया। जब ये सुनिश्चित हो गया कि चुनावी जनादेश 2024 इंडि गठबंधन के पक्ष मे न हो कर एनडीए के पक्ष मे रहा, तो इंडि गठबंधन अपनी असफलता का ठीकरा किसी के सिर पर फोड़ने की तलाश मे था।  इंडि गठबंधन की ये तलाश शनिवार 15  जून 2024 को तब पूरी हो गयी जब टेस्ला और एक्स (पूर्व ट्वीटर) कंपनी के प्रमुख एलन मस्क ने ट्वीट के माध्यम से एक बार फिर ईवीएम के भूत को जिंदा करते हुए लिखा, "हमे ईवीएम को खत्म कर देना चाहिए। इन्सानों या आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस द्वारा हैक किये जाने का जोखिम हालांकि छोटा है, फिर भी बहुत अधिक है।" उनका कहना था कुछ भी हैक किया जा सकता हैं।

कॉंग्रेस सहित इंडि गठबंधन की तो मानो मन की मुराद पूरी हो गयी। उन्हे एक बार फिर डूबते हुए ईवीएम मुद्दे को एलन मस्क रूपी तिनके का सहारा मिल गया। जिसके माध्यम से अब वे अपने पराजय की भड़ास का घड़ा एनडीए गठबंधन और ईवीएम के सिर पर फोड़ने का प्रयास करेंगे। एलन मस्क ने शायद ईवीएम पर सवाल अमेरिका के संदर्भ मे कहा था जहां वोटिंग मशीन को इंटरनेट, किसी कनेक्टिविटी, किसी ब्लुटूथ या वाईफ़ाई के माध्यम से जोड़ कर चलाया जाता हैं। भारत की वोटिंग मशीन मे इसलिये छेड़छाड़ संभव नहीं क्योंकि यहाँ की मशीन मात्र एक कैल्कुलेटर की तरह होती हैं जिसका कार्य विभिन्न उम्मीदवारों को मिले मतों की गणना कर, कुल डाले गये मत पत्रों से मिलान करना मात्र हैं। ईवीएम की कार्यपद्धति  एक साधारण कैल्कुलेटर की तरह होती है। इसके अतिरिक्त कुछ निश्चित प्रतिशत मशीनों का मिलान वीवीपीईट पर्ची के माध्यम से भी क्रॉस चेक कर, कराया जाता है तब गड़बड़ी की संभवना नगण्य रह जाती हैं। इंडि गठबंधन के घटक दलों द्वारा 4 जून को ईवीएम पर इसलिये प्रश्न खड़े नहीं किये क्योंकि शुरुआती नतीजे एक्ज़िट पोल को नकारते हुए इंडि गठबंधन के पक्ष मे आने की संभवना थी, लेकिन एनडीए गठबंधन द्वारा निर्धारित लक्ष्य हांसिल न करने की खुशी मे वे अपनी चुनावी असफलता को ही भुला बैठे और अंततः एनडीए गठबंधन के बहुमत मे आते ही जनादेश की व्याख्या अपनी अपनी तरह करके खुश होते रहे। जब अन्ततोगत्वा स्पष्ट बहुमत के साथ एनडीए की सरकार बन गयी तो सिवाय हाथ मलने के उनके पास कोई कारण नहीं रहा और वे ऐसे किसी मुद्दे की तलाश करने लगे,  जैसे कि  हमारे यहाँ कहावत हैं कि  "बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा" ठीक उसी तरह एलन मस्क के ईवीएम पर ब्यान ने इंडि गठबंधन को चुनावी हार पर अपनी  झेंप और शर्मिंदगी से बचा लिया।

कॉंग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी ने तो हमेशा की तरह  ईवीएम पर मनगढ़ंत आरोप लगते हुए उत्तर पश्चिम, मुंबई लोकसभा सीट से मात्र 48 मतों से जीतने वाले शिवसेना उम्मीदवार के एक रिश्तेदार का उदाहरण दिया जिसके पास ईवीएम हैक करने का मोबाइल फोन होने सुनिश्चित बताया जिससे ईवीएम मे छेड़ छाड़ संभव हुई। यध्यपि चुनाव आयोग ने उस रिश्तेदार के विरुद्ध मानहानि और झूठी  अफवाह और भ्रम फैलाने का नोटिस  दिया हैं। अदालत मे हारने और जीतने का  निर्णय तो जब होगा-तब होगा, पर फौरी तौर पर तो राहुल गांधी भ्रम और कपट फैला कर तो जीत ही गये? वे यहीं नहीं रुके, एक कदम और बढा कर राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर सवाल और ईवीएम को ब्लैक बॉक्स बताते हुए आरोप लगाया कि ईवीएम की जांच की इजाज़त ही नहीं है? जबकि चुनाव आयोग समय समय पर सभी राजनैतिक दलों सहित लोगो और संस्थाओं को, ईवीएम मशीन मे किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या हैक करके दिखाने की खुली चुनौती अनेकों बार दे चुका हैं, तब माननीय राहुल गांधी और कॉंग्रेस का तकनीकी ज्ञान, विध्या बोध और बुद्धि कौशल न जाने कहाँ गायब हो जाता हैं।

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव जो विदेशो के  उच्च शिक्षा संस्थाओं से शिक्षित योग्य और प्रवीण विध्यार्थी रहें हैं। इनका ज्ञान और कौशल किसी सामान्य व्यक्ति से उच्च  और स्तरीय हैं। अनेक विषयों के विशेषज्ञ श्री अखिलेश यादव  महोदय ने ईवीएम पर एक बार फिर सवाल उठाये। सोश्ल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट मे उन्होने कहा, टेक्नोलोजी समस्याओं को दूर करने के लिये होती हैं, अगर वही मुश्किलों की बजह बन जाए तो उसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए।  हमारी उम्मीद के विपरीत, अखिलेश यादव का अपने विदेशी ज्ञान के आधार पर ईवीएम के पक्ष मे खड़े होना तो दूर टेक्नोलोजी पर ही सवाल खड़ा करने पर घोर आश्चर्य हुआ? इंडि गठबंधन के इन नेता द्व्य राहुल गांधी और अखिलेश यादव का  मानना हैं कि देश मे चुनाव ईवीएम के माध्यम से न करा कर, कागज के मतपत्रों से कराये  जाने चाहिये जैसा कि पूर्व मे होता था। वे कम्प्यूटर टेक्नोलोजी का  परित्याग कर देश को किस आदम युग मे ले जाना चाहते हैं? क्या आज के सोश्ल माध्यम के प्रमुख प्लेटेफ़ोर्म जैसे  फ़ेस बुक, व्हाट्सप्प, एक्स (पूर्व ट्वीट्टर), इंस्टाग्राम, यूट्यूब, वी चेट, टेलीग्राम, मेस्सिंजर टिकटाल्क आज के समय के प्रमुख मंच हैं जिनका स्वयं  अखिलेश यादव जी सहित करोड़ो लोग सकारात्मक  उपयोग कर रहे हैं। अफसोस और दुःख तो तब होता हैं कि इन मंचों का उपयोग राजनैतिक दलों के शीर्ष नेता गण देश और समाज मे लोगो के बीच  झूठ, भ्रम, अंधविश्वास फैला कर समस्याओं को दूर तो क्या समस्याएँ  उत्पन्न कर रहे हैं तब  क्या इन सोश्ल मीडिया मंचों को भी बंद कर देना चाहिए? क्या हमे अपनी नकारात्मक सोच मे बदलाव ला कर विकसित और सकारात्मक  सोच को स्थान नहीं देना चाहिये?

इंडि गठबंधन के इन नेताओं को देश के विभिन्न राज्यों यथा कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडू, पंजाब, केरल और हिमाचल प्रदेश  मे इनके घटक दलों को इसी ईवीएम के कारण मिले बहुमत पर आत्ममंथन और तर्क वितर्क नहीं करना चाहिये? राहुल गांधी और अखिलेश यादव को समझाना उसी  तरह कठिन और असंभव है जैसे जागते हुए व्यक्ति को जगाने के निरर्थक प्रयास। यहाँ ये कहना युक्तिसंगत न होगा कि जब  कॉंग्रेस और उनके गठबंधन के लोग, लंबे समय से सत्ता और शासन से वंचित रहेते हैं तो इनकी सोच, सभ्यता और  आचरण मे तर्क-वितर्क के  स्थान  पर कुतर्क, भ्रांति और भ्रम की  भरमार हो जाती हैं अर्थात चुनावों मे जब, जिस जगह जीत जाएँ तो ईवीएम से कोई शिकायत नहीं होती लेकिन जब जहां पराजय का मुँह देखना पड़े, वहाँ ईवीएम पर शक, शंका और शिकायत ही शिकायत होना स्वाभाविक हैं।         

यदि चुनाव आयोग इन कुल श्रेष्ठ नरपुङ्गवः युति राहुल और अखिलेश को ये आश्वासन दे, दे, कि ये दोनों जिस रायबरेली और कन्नौज संसदीय क्षेत्र से ईवीएम की मतदान प्रक्रिया के माध्यम  विजयी हुए हैं, उस सीट से, यदि वे त्याग पत्र के पश्चात दुबारा चुनावी रण मे  मत पत्रों के माध्यम से यदि उनका परिणाम वर्तमान परिणाम के विपरीत आता हैं अर्थात यदि ये दोनों उम्मीदवार अपने अपने चुनावी क्षेत्र से पराजित हो जाते हैं या चुनावी अंतर की संख्या का अंतर बहुत बड़ा हो जाता है, तो पूरे देश मे ईवीएम  की जगह मत पत्रों के माध्यम से चुनाव कराएं जाएंगे और ये मान लिया जायेगा कि ईवीएम के बारे  एलन मस्क और इंडि गठबंधन के विचारों से देश सहमत है?  आप विश्वास मानिये ये दुबारा चुनावी मतदान की प्रक्रिया मे अपनी नकारात्मक और निष्क्रिय सोच के चलते स्वयं अपने आप को हरवाने मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे!! ताकि देश मे चुनाव मत पत्रों के माध्यम से कराये जा सकें और चुनाव मे पुनः  बूथों पर कब्जा, बाहुबल, धनबल की बदौलत धांधलबाजी कराई जा सके। अब देश के नागरिकों को सोचना हैं कि वे तकनीकी और विकास के साथ खड़े हो कर प्रगतिशील सोच  के पक्ष मे हैं या पुरातन, पिछड़ी और मति-मंद सोच के पक्ष मे। निर्णय देश के मतदाताओं को करना है?

विजय सहगल            

 

             

रविवार, 16 जून 2024

अयोध्या मे हुए मतदान के संदेश

 

"अयोध्या मे हुए मतदान के संदेश"



सनातन हिन्दू मान्यताओं के अनुसार त्रेता युग और द्वापर युग  से लेकर  आज के कलियुग तक भगवान श्री राम और अयोध्या एक दूसरे के पर्याय हैं। किसी एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। रामचरित मानस मे गोस्वामी तुलसीदास जी ने उत्तरकाण्ड मे रामराज्य की महिमा का वर्णन निम्न चौपाइयों मे किया हैं:-

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ 

सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥   अर्थात

राम राज्य मे किसी को दैहिक, दैविक और भौतिक दुःख और तकलीफ नहीं थी। सभी मनुष्य परस्पर प्रेम करते थे और अपने अपने धर्म का पालन करते थे, इसके बावजूद प्रभु राम को जीवन पर्यन्त कदम, कदम पर अनेक परीक्षाओं से गुजरना पड़ा था फिर चाहे आश्रम मे शिक्षा ग्रहण करने के दौरान गुरु आज्ञा अनुसार असुरों का वध हों, माता कैकई के आज्ञा अनुसार राज्य का त्याग और 14 वर्ष हेतु वन गमन करना पड़ा हो। भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अर्थात  पुरुषों मे सबसे उत्तम, मर्यादाओं का पालन करने वाले भगवान यूं नहिं कहा गया। एक राज्य के शासक राजा होने के बावजूद उन्होने लोक लाज रूपी लोकतन्त्र की स्थापना और नैतिकता के उच्चतम मानदण्डों पर चलने की राज्य नीति को ही अपना लक्ष्य मान शासन चलाया। जिन भगवान श्रीराम ने अपने  राज्य मे धोबी का अध्यवसाय से अपनी जीवका उपार्जन वाले एक साधारण नागरिक द्वारा अपने पारिवारिक अन्तः कलह मे माता सीता की पवित्रता पर संदेह मात्र का उल्लेख के  कारण देवी सीता का परित्याग कर दिया था आज उसी अयोध्या मे जनादेश 2024 के रण मे सत्ताधारी दल बीजेपी की पराजय देख  कोई बिस्मय और  आश्चर्य नहीं हुआ। बेशक नरेंद्र मोदी भगवान राम नहीं हैं लेकिन भगवान राम के रामराज्य की परिकल्पना के आवश्यक कारक, मूल तत्व और विचार, वर्तमान अयोध्या के उत्थान, उन्नति और उदय मे परिलक्षित तो होते ही हैं। जब त्रेता युग के रामराज्य मे समस्त राज्य की जनता को   दैहिक, दैविक और भौतिक सुख के बावजूद अयोध्या एक साधारण नागरिक के तंज़ के कारण रामराज्य के राजपरिवार के राजा को अपनी अर्धांग्नि का परित्याग करना पड़ा हो तब कलियुग की उसी  अयोध्या के जनमानस द्वारा,  जनादेश 2024 के तहत अभूतपूर्व, अंगिनित और अद्वितीय    विकास कार्यों  को अनजाना, अनुसूना और अनदेखा करने मे कोई आश्चर्य  और विस्मय नहीं हुआ क्योंकि त्रेतायुग की अयोध्या की सरयू नदी मे तब से आज तक बहुत पानी बह चुका हैं।  रामराज्य के परस्पर प्रेम और भाई चारे का स्थान कलियुग के स्वार्थ, ईर्ष्या और वैरभाव ने ले लिया हैं।

मध्य पूर्व के अनेकों देशों मे राजशाही के चलते  समृद्धि, संपन्नता सुख सुविधाओं के बावजूद वहाँ के आमजनों को बोलने की आज़ादी सीमित हैं, वहाँ की सरकारे पहनने ओढ़ने की उतनी ही आज़ादी देती हैं, जो वहाँ के शासक चाहते हैं। इसी तरह खाने, पीने देखने और सुनने की स्वतन्त्रता पर उनका पूर्ण नियंत्रण हैं। उन देशों मे देश के लोगों  को  वहीं दिखाया, सुनाया, खिलाया, पिलाया पहनाया और ओढ़ाया जाता हैं जितना वहाँ के शासक और सरकारें चाहती हैं।   न्याय व्यवस्था के तहत कदाचित ही कहीं कोई सुनवाई होती हो? इतनी संपन्नता और सुविधाओं के बावजूद उनके नागरिक शायद ही प्रसन्न और संतुष्ट हों क्योंकि उन्हे लोकतान्त्रिक देशों की तरह अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं हैं। लोकतन्त्र की ये एक भारी विडंवना हैं कि जहां एक ओर लोगो को बोलने की अभिव्यक्ति की आज़ादी तो हैं पर अन्य लोकतान्त्रिक विकासशील देशों की तरह  समाज, देश और लोक कल्याण के प्रति कोई कर्तव्य निर्धारित नहीं किये गये। यहीं कारण हैं कि हम दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश होने  के बावजूद हमारा लोकतन्त्र उतना परिपक्व, जवाबदेह और जिम्मेदार  नहीं है जितना कि दुनियाँ के अन्य देश हैं।

देश की स्वतन्त्रता के 67 साल बाद भी जिस अयोध्या की आधारभूत संरचना के विकास की बात तो दूर अयोध्या  की जिस धरती पर कॉंग्रेस सहित इंडि गठबंधन के नेतागण पैर रखने  से डरते रहे क्योंकि बहुसंख्यकों के धर्म की आस्था और विश्वास से कहीं उनका वोट बैंक नाराज़ न हो जाए? जिस कॉंग्रेस ने पाँच सौ साल से भी ज्यादा समय से चले आ रहे रामजन्म भूमि मुद्दे  को देश की स्वतन्त्रता के बाद से  सिर्फ इसलिए अटकाये, भटकाये  और लटकाये रक्खा ताकि उनका समर्थन करने वाला समूह कॉंग्रेस से नाखुश और नाराज न हो जाये? एक बारगी  हम देश मे हुए निर्माण को एक तरफ रख सिर्फ अयोध्या के विकास मे मील का पत्थर सवित हुए राम जन्मभूमि मंदिर की बात करें तो  जिस राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण से सीधे अयोध्या के आम नागरिकों को सड़कों के निर्माण से, होटल और व्यसायिक गतिविधियों के कारण, रेल्वे स्टेशन के विनिर्माण और नये हवाई अड्डे के निर्माण  से  प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से लाखों रोजगार के अवसर मिले हों  तब ऐसे भ्रष्ट, स्वार्थी और पदलोलुप्त राजनैतिज्ञों से कैसे अपेक्षा की जा सकती हैं कि उन्हे अयोध्या मे हुए अभूतपूर्व विकास से प्रसन्नता हुई होगी? दुर्भाग्य से अयोध्या के आम जन भी इन राजनैतिज्ञों के झांसे मे आकर अयोध्या के विकास, उन्नति और समृद्धि के पक्ष मे निर्णय लेने से चूक गये।   

लोकतन्त्र के  चुनावी रण मे जिस दल को बहुमत मिलता हैं जीत उसी की होती हैं फिर दल या उम्मीदवार कोई भी हों। लेकिन किसी भी चुनावी समर का आधार स्थान विशेष की आधारभूत संरचनाओं का विकास, नागरिकों को रोजगार, कानून व्यवस्था की स्थिति, पढ़ाई लिखाई एवं  चिकित्सा और स्वास्थ्य की सुविधाएं और मजदूरों  किसानों के हितों का ध्यान मुख्य आधार होते हैं!! जहां तक वंचित और कमजोर वर्ग के कल्याण की बात हैं मोदी सरकार के दोनों कार्यकाल मे उनको मुफ्त राशन, हर घर जल, आयुष्मान योजना, किसान सम्मान निधि, शौचालय, पीएम आवास योजना, हर घर बिजली, रसोई गैस  जैसी गरीबी से जुड़ी  प्रत्यक्ष लाभ  वाली अनेकों योजनाओं का कार्यान्वयन हुआ। कोरोना काल मे तो सफलता पूर्वक तीनों इंजेकशन के डोज़ लगाए गए जब दुनियाँ के विकसित देशों मे भी हाहाकार मचा था।  राजनीति मे थोड़ा बहुत भी दखल रखने वाला व्यक्ति इस बात पर सहमत होगा कि इन सारे पैमानों मे सत्तारूढ़ दल ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी तब ये तो निश्चित हैं कि अयोध्या का चुनाव विकास के मुद्दे पर तो कतई नहीं लड़ा गया। इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ एक मुद्दा बनाया गया कि येन केन प्रकारेण ध्रुवीकरण ईर्ष्या, वैमनस्य और  जातिवाद फैला कर किसी भी तरह सीट  हथियाना था। आम लोगो के बीच संविधान को समाप्त करने और आरक्षण को निरस्त करने जैसे मनगढ़ंत और झूठी किस्से गढ़ने   मे सपा और कॉंग्रेस सहित इंडि गठबंधन के लोग कुछ हद तक सफल तो हुए पर फिर भी सत्ता पाने से वंचित रहे अन्यथा भाजप प्रत्याशी लल्लू सिंह का यदि व्यक्तिगत आग्रह और उनके व्यवहार को छोड़ दे, अन्यथा ऐसे कोई भी कारण नज़र नहीं आते कि मतदाताओं ने इस  चुनाव मे  अपनी चुनावी सूझ बूझ, दूरदृष्टि और क्षेत्र के विकास के मुद्दे को दृष्टिगत वोटिंग की हो?  ऐसा प्रतीत होता हैं कि इस चुनावी संग्राम मे हद दर्जे की दुराग्रह, पूर्वाग्रह, अधम सोच, ईर्ष्या और कटुता की पराकाष्ठा रूपी मुद्दे ही हावी रहे जो समाज, देश और आपसी सद्भाव के लिए बहुत बड़ा सवालिया निशान हैं।

ये तो निश्चित हैं कि इंडि गठबंधन द्वारा गढ़े गये झूठे और मनगढ़ंत नरेटिव रूपी लकड़ी की हांडी हर बार चूल्हे पर नहीं चढ़ाई जा सकती। एक झटके मे गरीबी हटाने की खटाखट-खटाखट योजनाएँ का भ्रम बार बार नहीं फैलाया जा सकता। आने वाले  समय मे अयोध्या सहित देश के मतदाता और भी ज़िम्मेदारी और समझदारी से मतदान कर एक नया उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। ऐसी आशा की जानी चाहिये।

 

विजय सहगल     

शनिवार, 8 जून 2024

जनादेश 2024 - खटाखट, खटाखट

 

"जनादेश 2024 - खटाखट, खटाखट!!"







इस बार के संसदीय चुनाव 2024 अपने आप मे विशेष रहा। 543  सीटों की क्षमता वाली  लोकसभा मे 234 सीटें जीतने वाला  कॉंग्रेसी इंडि गठबंधन, ऐसे प्रचारित और प्रसारित कर रहा है मानों उसने चुनाव जीत लिया हो और 293 सीटें जीतने के बावजूद   एनडीए गठबंधन को ऐसे प्रस्तुत कर भ्रमित किया रहा हैं मानों मोदी का गठबंधन ने चुनाव 2024 मे कॉंग्रेस के सामने घुटने टेक दिये हों? जिस  कॉंग्रेस को मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल, त्रिपुरा अर्थात  छह राज्यों मे एक भी सीट न मिली हों और पश्चिमी बंगाल, ओड़ीशा और गुजरात मे मात्र एक-एक सीट मिली हो, वह 2024 के चुनावी जनादेश को एनडीए और नरेंद्र मोदी के खिलाफ बता रही है!! जब वोटों का प्रतिशत और बहुमत की सीटें एनडीए के पक्ष मे है तो फिर जनादेश की कोंग्रेसी परिभाषा का पैमाना हास्यास्पद और तर्कहीन ही माना जाएगा।  जैसा कि अंदेशा था कि चुनावी हार का ठीकरा इंडि गठबंधन ईवीएम वोटिंग मशीन पर फोड़ेगा पर चुनावी नतीजों ने ईवीएम की लाज़ रख ली और वोटिंग मशीन पर लाक्षन लगाने की इंडि गठबंधन के सारे मंसूबे, इरादे और  साजिशें धरी की धरी रह गयी। एक बार पुनः सिद्ध हो गया कि भारत का लोकतन्त्र दुनियाँ मे सबसे मजबूत हैं और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर इंडि गठबंधन द्वारा लगाए जा रहे सभी आरोप झूठे, मनगढ़ंत  और निरर्थक हैं।

आइये अब अपने शीर्ष विषय पर आते हैं। गुरुवार, 11 अप्रैल 2024 को राहुल गांधी ने बीकानेर की  एक चुनावी रैली मे गरीबी दूर करने का एक नया फार्मूला पेश किया जिससे  एक ही  झटके मे हिंदुस्तान की गरीबी को मिटाना संभव होगा। उन्होने कहा गरीबी रेखा के नीचे के हर परिवार की एक महिला के खाते मे एक लाख रुपए आयेगा जो हर महीने 8500 रुपए के हिसाब से खटाखट, खटाखट उनको मिलेगा। 8500 रुपए प्रतिमाह से साल मे एक लाख की जगह 102000 रुपए बनते हैं!! राहुल गांधी के कथानुसार, इस तरह कॉंग्रेस 8500 रुपए की दर से सरकारी खजाने से 102000 रुपए बसूल कर, महिलाओं को सिर्फ साल मे एक लाख रुपए देगी अर्थात 2000 का प्रति परिवार का घोटाला??  राहुल गांधी की  इस खटाखट योजना मे 2000 रुपए की हेराफेरी का यदि विश्लेषण करें तो फरवरी 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत मे इस समय 26 से 30 लाख के बीच गरीबी रेखा के नीचे के परिवार हैं। मैं अपने अंक गणितीय हिसाब से अनेकों बार गुणा भाग कर, इस नतीजे पर पहुंचा कि या तो माननीय राहुल गांधी का गणितीय ज्ञान कमजोर है अन्यथा इस योजना मे  2000 रुपए प्रति परिवार के हिसाब से 30 लाख परिवार को मिलने वाली कुल रकम मे 6 अरब रुपए का घोटाला संभव था और पाँच साल मे इस खटाखट योजना मे 30 अरब रुपए की गड़बड़ी हो जाती। वह तो भला हो देश के मतदाताओं का जिसने अपना जनादेश देकर  इस संभावित घोटाले बाज योजना मे  घोटाला होने से बचा लिया। निश्चित ही 30 अरब रुपए के इस संभावित घोटाले ने राजीव गांधी के एक रुपए मे सिर्फ 15 पैसे ही हितग्राही तक पहुँचने और 85 पैसे का बिचौलियों द्वारा  घोटाले कर हजम करने  की याद ताज़ा करा दी।    

गरीब महिलाओं को प्रति वर्ष एक लाख रुपए, 25 लाख का इन्शुरेंस, पहली नौकरी पक्की जैसी राहुल गांधी की गारंटियों रूपी लोभ लालच  को नज़रअंदाज़ कर लोगो ने एनडीए गठबंधन  पर विशवास जता कर नरेंद्र मोदी के पक्ष मे जनादेश दिया। यध्यपि समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और कॉंग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी सहित इंडि गठबंधन,  एनएडी प्रमुख  नरेंद्र मोदी के "अबकी बार 400 पार" के लक्ष्य को हांसिल न कर पाने को,  अपनी बड़ी सफलता मान, अपनी पराजय  को ढाँपने और छुपाने का असफल  प्रयास कर रहे है। इंडि गठबंधन के सभी घटक दलों का  व्यवहार एक ऐसे ठेठ पूर्वाग्रही अभिभावक की तरह हैं जिसे परीक्षा मे अपने बेटे के फेल  होने के   दुःख से ज्यादा अपने  पड़ौसी के बच्चे  के इम्तिहान मे  पास होने का दुःख और संताप हैं। काश!! पड़ौसी का बेटा भी फेल हो जाता तो उसे अपने बेटे की असफलता से कहीं कोई दुःख या पीड़ा न होती!!

चुनावी कार्यक्रम 2024 के दौरान इस तरह की रिपोर्ट टीवी पर दिखाई तो जा रही थीं कि बड़ी संख्या मे महिलायेँ द्वारा पोस्ट ऑफिस मे खाते  खुलवाये जा रहे हैं ताकि कॉंग्रेस की सरकार बनते ही महिलाओं के खाते मे 8500 रुपए प्रति माह खटा खट, खटा खट जमा कराएं जाएंगे।  लेकिन कॉंग्रेस अपने  चुनावी कार्यक्रम मे देश के मतदाताओं को इस कदर भ्रमित कर वोट हंसिल करेगी, ये इस बात से उजागर हुआ जब 5 जून को कर्नाटक के बेंगलुरु और उत्तर प्रदेश के लखनऊ मे सैकड़ों महिलाओं ने कॉंग्रेस के दफ्तर मे जाकर एक लाख रुपए की मांग की। उन महिलाओं को बताया गया था कि आप कॉंग्रेस के पक्ष मे मतदान करें,  4 जून की मतगणना के बाद, 5 जून को आप लोगों को एक-एक लाख रुपए प्रदान किया जाएगा। इस आशय के लिखित दस्तावेज़ भी उन महिलाओं को दिये गए थे।  5 जून के  इन दृश्यों को टीवी मीडिया द्वारा प्रमुखता से दिखलाया गया जिसमे महिलाएं उनसे किए गए वादे के मुताविक एक लाख रुपए लेने के लिए कॉंग्रेस के ऑफिस मे आयीं हुईं थी। राहुल गांधी की कॉंग्रेस के, एक झटके मे गरीबी हटाने के इस  इस खटाखट-खटाखट फॉर्मूला को सुन कर कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि भ्रम, झांसा और प्रलोभन देना तो कॉंग्रेस का स्वभाव रहा हैं। 1971 मे भी श्रीमती गांधी ने गरीबी हताओं, देश बचाओ का नारा देकर दो बार सत्ता हांसिल की थी। बाद मे श्री राजीव गांधी  भी इस नारे के उपयोग कर सत्ता मे आए।  पर देश की गरीबों की  गरीबी तो क्या हटी आज 2024 मे एक बार फिर कॉंग्रेस ने खटाखट-खटाखट फोर्मूले से देश की जनता की आँखों मे धूल झोंकने का अप्रिय कुत्सित प्रयास किया पर धन्य है देश के मतदाता जिन्होने कॉंग्रेस के इस प्रलोभन को नकार दिया।        

इंडि गठबंधन की ममता बैनेर्जी ने तो एनडीए गठबंधन के नेता नरेंद्र मोदी से उनके सत्ता मे आने के पूर्व ही इस्तीफे की मांग कर दी। कॉंग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खरगे, कॉंग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री जयराम रमेश ने तो एनडीए गठबंधन के स्पष्ट बहुमत 293 के बावजूद भी इसे मोदी की व्यक्तिगत हार, नैतिक हार और राजनैतिक हार बता कर संसदीय चुनाव 2024 को मोदी के विरुद्ध जनादेश बताया। उन्होने मोदी के 400 पार सीटे न ला पाने का उपहास उड़ाया पर ये दोनों नेता द्व्य भूल गये कि चुनावी रैलियों मे राहुल गांधी सहित इंडि गठबंधन ने लिख कर देने की भविष्यवाणी की थी कि 4 जून को मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे!! इन नेताओं ने इंडि गठबंधन को 295 सीटे जीतने की भविष्यवाणी भी  की थी पर क्या वे अपने कथन पर, खरे उतरे? तब उन्हे मोदी के "400 पार" वाले कथन पर सवाल खड़ा करने का क्या नैतिक अधिकार हैं? आरोप प्रत्यारोप का ये सिलसिला तो यूं ही चलता रहेगा पर  इंडि गठबंधन सहित कॉंग्रेस के नेताओं को  इस बात से तो सहमति जतलानी ही  पड़ेगी,  जिसमे नरेंद्र मोदी ने तमाम मंचों और चुनावी रैलियों मे सैकड़ों बार भविष्यवाणी की थी कि "आयेगा तो मोदी ही"!!  और "अबकी बार मोदी सरकार!!" इसे नरेंद्र मोदी का बड़बोलापन कहें या उनकी भविष्यवाणी, क्या कॉंग्रेस, नरेंद्र मोदी के 400 पार के कथन के साथ इन  कथनों  पर भी कुछ प्रकाश डालेगी??

विजय सहगल   

 

रविवार, 2 जून 2024

रामतनु पांडे उर्फ मियां तानसेन का मकबरा ग्वालियर

 

रामतनु पांडे उर्फ मियां तानसेन का  मकबरा ग्वालियर










 

जब तक मैं ग्वालियर के हाजीरा क्षेत्र मे स्थित इस तानसेन मकबरे की इस मुख्य स्मारक को देख, गलत फहमी मे था कि  वास्तु की दृष्टि से इस सुंदर पीले राजस्थानी बलुआ पत्थरों से निर्मित पुरातन भवन मे दुनियाँ के सर्वश्रेष्ट संगीत सम्राट तानसेन का मकबरा हैं, मै अति प्रसन्नता और खुशी महसूस करता था।  लेकिन जैसे ही मुझे शिलालेख पर पढ़ कर ज्ञात हुआ कि ये मुख्य इमारत और उसके उपर निर्मित  गोल गुंबद, संगीत सम्राट तानसेन की समाधि नहीं है मन को एक अदृश्य अवसाद, निराशा और दुःख ने घेर लिया। वास्तव मे वर्गाकार रूप मे निर्मित ये इमारत गौस मुहम्मद का मकबरा हैं जो एक प्राचीन फकीर हुए हैं। तानसेन का मकबरा तो इस अहाते मे बनी अन्य अनेकों समाधियों मे से एक अत्यंत साधारण, छोटी  सी जगह मे बनाया गया हैं। मुझे मन ही मन मे कचोट हुई कि अपने जमाने के मूर्धन्य और सर्वश्रेष्ठ संगीत सम्राट जिन्हे  अकबर के नवरत्नों मे से एक रत्न होने का  सम्मानीय स्थान प्राप्त था, की समाधि इतनी साधारण क्यों? यध्यपि संत फकीर मुहम्मद गौस एक प्रसिद्ध संत रहे होंगे और उनके परिवार के अन्य स्वजनों के बीच तानसेन के एक अति साधारण मकबरे मे दफनाने के पीछे अवश्य कोई रहस्य रहा होगा? जो शोध का विषय होना चाहिए अन्यथा तानसेन जैसे संगीतज्ञ की समाधि या मकबरा एक शानदार और बेमिशल वास्तु से निर्मित समाधि स्थल या मकबरे की इमारत का हकदार था? एक असाधारण संगीतज्ञ के नश्वर शरीर की  आत्मा को श्रद्धांजलि के रूप मे इस साधारण सी समाधि मे अन्य अनेकों लोगो के बीच दोयाम दर्जा देकर दफनाना कुछ अजीब लगता हैं? मृत्युपरांत उनके शरीर को एक अलग और अच्छे समाधि स्थल पर न दफनाया जाना मन को खटकता रहा। तानसेन की समाधि शायद राजमहलों मे चलने वाली "दुरभिसंधियों" अर्थात षडयंत्रों और साज़िशों का शिकार या परिणाम सवित  हुई हो?    

खैर जो भी हो, सच्चाई से मै रु-ब-रु था। 6 मई 2024 को मैंने प्रातः 6-6.30 बजे प्रवेश द्वार जो कि तमाम अतक्रमणों से युक्त था कुछ कुछ दिखाई दे रहा था।  यदि आप बाजार खुलने के समय प्रातः 10 बजे के बाद  जाएंगे तो आपको तानसेन की समाधि के मुख्यद्वार को तलाशने मे शायद कठिनाई हो और लोगों से पूंछ-तांछ करनी पड़े। पुरातत्व विभाग की देखरेख मे समाधि स्थल के बड़े परिसर  को अच्छे ढंग से रक्खा गया हैं। 46-47 डिग्री की गर्मी के बावजूद हरे घास के मैदानों का रखरखाव अच्छा था। ग्वालियर के हाजीरा क्षेत्र मे स्थित प्रातः घूमने आने वाले सैकड़ों लोगो के बीच मैंने भी वृहद समाधि परिसर घूमने के प्रयोजन से चहलकदमी शुरू की। पीले बलुआ पत्थरों से मुगल शैली मे निर्मित मुहम्मद गौस का मकबरा वास्तु की दृष्टि से अत्यंत सुंदर और दर्शनीय है। भवन के मध्य मे शिखर पर गोल गुंबद और उसके नीचे ढालू पत्थरों से निर्मित छज्जे तथा छत्त के चारों कोनों और उनके मध्य मे छोटी छोटी छतरियाँ इमारत की सुंदरता मे चार चाँद लगा देती हैं। ऐसी किवदंती हैं कि मुहम्मद गौस एक अफगानी राजकुमार थे  जो बाद मे एक सूफी संत बन गए। मकबरे की बाहरी दीवारों पर 20 वर्गाकार कक्काशीदार, सुंदर जालियाँ लगाई गयी हैं। हर जाली की नक्काशी दूसरी जाली से भिन्न हैं जिन पर सुंदर ज्योमिति के वृत्त, अर्धवृत्त, लाइन, त्रिकोण, षट्कोण आदि उकेरे गए हैं। मुहम्मद गौस के मकबरे के पीछे व दायें और बाएँ अनेक छोटे बड़े मकबरे अर्थात समाधियाँ बनी हैं जो संभावतः उनके परिवार के लोगो की रहीं होंगी। वरिष्ठ जनों का एक समूह भी उन्ही समाधियों के बीच हास-परिहास कर रहा था। मैंने भी उनके साथ शामिल हो एक फोटो लेने की अनुमति चाही। उन सीनियर सिटिज़न मे से एकने पहले, पुलिसिया अंदाज़ मे मुझ से पूंछ-तांछ की तब फोटो लेने की अनुमति दी!! वे शायद राज्य सरकार के कोई वरिष्ठ अधिकारी रहे होंगे।

आगे वेला के फूलों की सुंगंधित खुसबू के बीच छोटे छोटे चबूतरों पर एक ही तरह की समाधियाँ बनी थी। मुहम्मद गौस के मकबरे मे कुछ लोग फूल अगरबत्ती से उनके प्रति अपनी श्रद्धा ज्ञपित कर रहे थे।  वहीं आगे सुप्रससिद्ध ध्रुपद गायक, संगीत सम्राट तानसेन की समाधि भी थी। एक ऊंचे चबूतरे के मध्य मे बारह, साधारण नक्काशी दार स्थम्भों के बीच बनी बारहदरी पर बने, तानसेन के मकबरे को निर्मित किया गया था, पुनः चार पाषण खंभों के बीच उनकी समाधि बनी हुई थी। उसी कॉरीडोर मे तानसेन की समाधि के निकट ही एक और समाधि बनी हुई थी जो शायद उनकी पत्नी हुसैनी  की रही हो।  चबूतरे पर चढ़ कर मैंने भी समाधि स्थल पर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित कर वहाँ लगे शिलालेख पर लिखी इबारत को पड़ने लगा। ऐसी  कहावत है कि तानसेन की  समाधि पर लगे इमली के पेड़ की पत्तियाँ खाने से आवाज मे मिठास आ जाती हैं। लोगो की नज़रें बचा के डरते-डरते मैंने भी कुछ इमली की पत्तियाँ मुंह मे रख ली, कहीं डर था कि कोई देख न ले और  छींटा कसी न कर दे, "अंकल, इस उमर मे  आवाज मीठी कर के क्या करोगे?"  

प्रतिवर्ष मध्य दिसम्बर मे, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा चकाचौंध से परिपूर्ण इस  चार दिवसीय वृहद तानसेन समारोह का आयोजन किया जाता हैं जिसमे देश विदेश के नामचीन संगीतकर भाग लेते हैं। हर वर्ष किसी एक भारतीय संगीतकार को तानसेन पुरुस्कार एवं पाँच लाख रुपए देकर सम्मानित किया जाता हैं। कार्यक्रम के आखिर दिन तानसेन की जन्मस्थाली बेहट मे भी एक सभा का आयोजन किया जाता हैं जो ग्वालियर से 40 किमी दूर स्थित हैं, जहां देश विदेश के संगीतकारों के साथ बेहट गाँव के निवासी अपने प्रिय तनुआं अर्थात रामतनु पांडे उर्फ संगीत सम्राट तानसेन को स्मरण  कर उन दिनों की याद करते हैं जहां तनुआं ने अपनी रागों की तान से शिव मंदिर को टेड़ा कर दिया था। वह शिव मंदिर आज भी उसी दशा मे हैं जिसका उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग दिनांक 28 अप्रैल 2023 (https://sahgalvk.blogspot.com/2023/04/blog-post_28.html ) को किया था। इस वर्ष 2024 को इस तानसेन  समारोह का 100 वां साल होगा। आप सब भी इस समारोह मे, अभी से सादर आमंत्रित हैं।

विजय सहगल