18वीं
लोकसभा का शुभारम्भ और आपातकाल की काली 50वीं वर्षगांठ
इसे विश्व
के सबसे बड़े लोकतन्त्र के मंदिर की 18वीं लोकसभा का सत्रारंभ का सुखद संयोग
कहें या आज ही के दिन देश मे लोकतन्त्र के नाम कॉंग्रेस शासित तानाशाह प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा देश
मे थोपी गयी स्याह काली आपातकाल की 50वी
वर्षगांठ का दुःखद दुर्योग,
18वीं लोकसभा का सत्र आरंभ ऐसे समय हो रहा
हैं जब संसद के दोनों पक्ष के लोग लोकतन्त्र की रक्षा करने की दुहाई देकर एक दूसरे
पर संविधान मे बदलाव का आरोप लगा रहे हैं। दोनों पक्षो के तेवर देख अनुमान लगाना कठिन न
होगा कि आने वाले संसद के सत्र का स्वरूप कैसा होने वाला हैं। संसद सत्र के पहले
ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहाँ एक ओर अपने तीसरे कार्यकाल पर देश की
जनता को धन्यवाद देते हुए सर्वसहमति से चलाने के प्रयास के तहत पक्ष-विपक्ष से
सहयोग की अपील तो की साथ ही आपात काल की 50वीं काली वर्षगांठ पर तत्कालीन कॉंग्रेस
सरकार और प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की तानाशाही पूर्ण रवैये और देश को जेल मे
परिवर्तित कर विपक्षी सदस्यों को जेलों मे
डालने पर प्रकाश डाला और देश को आगाह किया कि हमे ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना
होगा ताकि कोई भी तानाशाह संविधान की हत्या कर लोकतन्त्र का बलात हरण कर स्थगित
करने की हिमाकत न कर सके। वरिष्ठ कोंग्रेसी नेता और कॉंग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे का आपात
काल लगाने पर ये कथन कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी कमियां छिपाने के लिए अतीत को कुरेदते
रहते हैं!! उन जैसे परिपक्व और वयोवृद्ध व्यक्ति का उक्त कथन अदूरदर्शी,
बेतुका और बुद्धि विवेक से परे हैं। हमे ये याद रखना होगा कि न तो इतिहास को भुलाया
जा सकता और न ही छुपाया जा सकता हैं। किसी भी तानाशाह के शोषण,
अत्याचार और अनाचार का विरोध करने,
लड़ते हुए बलिदान हो जाने वालों का हमे उसी तरह स्मरण करना चाहिए जैसे सिक्खों के महान
गुरु श्री अर्जुन देव,
गुरु श्री तेग बहादुर, गुरु गोविंद सिंह
और उनके चारों साहिबजादे, छत्रपति शिवाजी महाराज,
महाराणा प्रताप और अन्य महान बलिदानियों द्वारा अपने आप को,
देश धर्म और समाज की रक्षा के लिये न्योछावर हो जाने वालों को प्रतिवर्ष स्मरण कर उनकी
जयंती मनाते हैं।
वहीं दूसरी ओर इंडि गठबंधन के लोगो द्वारा
हाथों मे संविधान की प्रतियों के साथ
संविधान की रक्षा की प्रतिवद्धता जतलाना आश्चर्य चकित करने वाला था। जो कॉंग्रेस
संविधान की रक्षा करने की कसमें खा रही थी उसी कॉंग्रेस ने आज ही के दिन 25 जून
1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रेमती इन्दिरा गांधी ने देश मे आपातकाल लगा कर देश के संविधान को समाप्त
कर स्थगित कर दिया था। इसी आपातकाल मे इंडि गठबंधन के घटक दलों के जिन नेताओं को
बिना किसी कारण के 19 माह तक गिरफ्तार कर तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार ने बिना
किसी प्रमाण और कारणों के जेलों मे डाल दिया था वे ही घटक दल और उनके नेता संविधान की रक्षा के नाम पर कॉंग्रेस के साथ
खड़े हैं। ये लोकतन्त्र की बड़ी भरी
विडम्बना थी और देश का दुर्भाग्य था कि
जिस कॉंग्रेस सरकार पर देश के संविधान की रक्षा की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी थी उसी कॉंग्रेस
ने संविधान की हत्या कर देशभर के विपक्षी दलों के नेताओं को जेल मे डाल दिया।
अभिव्यक्ति की आज़ादी तो सपना हो गया था। मीडिया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा कर
समाचार पत्रों की आज़ादी समाप्त कर दी गयी थी।
इसी बीच इंडि गठबंधन ने सर्वसम्मति से राहुल
गांधी को विपक्षि दलों का नेता चुन लिया।
यूं तो राहुल गांधी हमेशा बड़ी जिम्मेदारियाँ लेने से बचते रहे क्योंकि इतने लंबे
राजनैतिक कैरियर के बावजूद भी उनमे वो राजनैतिक परिपक्वता नज़र नहीं आती जो इतने
अनुभव के बाद किसी सयाने और प्रौढ़ राजनेता से की जानी चाहिये। आशा ही नहीं विश्वास
हैं कि राहुल गांधी विपक्षी दल के नेता के रूप मे अपने आप को स्थापित कर एक नया
उदाहरण प्रस्तुत करेंगे।
संसद मे प्रोटेम स्पीकर के रूप मे श्री भरतृहरि
महताव के चुनाव जैसे साधारण मुद्दे को असाधारण बना कर कॉंग्रेस ने अपनी प्रतिष्ठा
का प्रश्न बना लिया और सत्ताधारी दल का लोकसभा अध्यक्ष की चली आ रही निर्विरोध
चुनने की प्रथा मे रोढ़ा अटकाकर अबरोध पैदा करने के प्रयास किया। कॉंग्रेस की मांग थी कि सत्ताधारी एनडीए इस बात
का आश्वासन दे कि लोकसभा का उपाध्यक्ष विपक्ष का हो?
सत्तापक्ष के लोगो द्वारा इस तरह की किसी भी पूर्व शर्त स्वीकार नहीं किया जाने से
कॉंग्रेस द्वारा के सुरेश को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। जब उपसभापति का चुनाव
होगा तब इस विषय मे खुले दिल से विचार किया जाएगा। इस तरह के अविश्वास के कारण ही
संसद मे 26 जून 2024 को सभापति पद के लिये एनडीए के प्रत्याशी के रूप मे श्री ओम
बिड़ला और इंडि गठबंधन के प्रत्याशी के रूप मे श्री के॰ सुरेश के बीच हुए चुनाव के
रूप मे अंततः ध्वनि मत से विजयी घोषित किए गए। ये जानते हुए भी कि इंडि गठबंधन के
पक्ष मे आवश्यक संख्या बल नहीं है,
कॉंग्रेस ने मतविभाजन की मांग न कर अपनी
जग हँसाई भी करवाई। यदि राहुल गांधी के
पहले संवैधानिक पद विपक्षी दल के नेता के रूप मे स्पीकर के पद की चुनावी रणनीति को
उनकी पहली परीक्षा माने तो राहुल गांधी इस
परीक्षा मे असफल माने जाएंगे।
सभापति के चुनाव के बाद माननीय सांसद
महोदयों द्वारा स्पीकर महोदय श्री ओम बिड़ला
को दिये गए संदेशों की औपचारिकताओं के बीच कुछ सदस्यों द्वारा उनको
प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नसीहते भी दी। सपा के अखिलेश यादव ने ओम बिड़ला जी
द्वारा पिछले कार्यकाल मे 150 संसद सदस्यों को निलंबित किये जाने की घटना को
दुबारा न करने की सलाह दी। कदाचित अखिलेश यादव,
माननीय संसद सदस्यों को भी संसद की तय
मान्यताओं और नियमों के अनुरूप आचरण करने का भी संदेश देते,
जिसके के कारण पिछले कार्यकाल मे संसद सदस्यों की बर्खास्तगी जैसी अप्रिय कदम उठाने के लिये
सभापति को बाध्य होना पड़ा। लेकिन आज के सत्र के दौरान ही,
सख्त अनुशासन पसंद सभापति ओम बिड़ला जी द्वारा एक सदस्य के लगातार बोलने पर आसंदी
से खड़े हो कर उन्हे बैठने के लिये कहते
हुए सदन के सारे सदस्यों को ये संदेश दिया कि जब सभापति आसंदी से खड़े होकर बोले तो
सारे सदस्यों को बैठ जाना चाहिये। चूंकि सदन के ये पहला दिन हैं और बहुत से सदस्य
नये हैं, पर आगे पाँच साल इस बात का ध्यान रक्खा जाना
चाहिये। ये संदेश इस बात की तरफ साफ इशारा
था कि सभापति द्वारा संसद की कार्यवाही तय नियमों और अनुशासन के साथ ही चलाई
जायेगी।
संसद की कार्यवाही के अंत मे सभापति श्री ओम
बिड़ला द्वारा 25 अगस्त 1975 को तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार की प्रधानमंत्री श्रीमती
इन्दिरा गांधी द्वारा 50 वर्ष पूर्व देश मे लागू किये गये आपातकाल पर,
निंदा प्रस्ताव पढ़ना आश्चर्य और अभूतपूर्व था। उन्होने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा
गांधी और कॉंग्रेस की निंदा और आलोचना करते हुए उन्हे तानाशाह बताते हुए लाखों
विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, प्रेस पर पाबंदी,
न्यायपालिका पर अंकुश और देश के आम नागरिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों की समाप्ति
की कड़ी निंदा की और आपातकाल को देश के लोकतन्त्र के लिये कलंक और काला अध्याय
बताना चौंकने वाला अभूतपूर्व साहसिक कदम था। संसद मे राहुल गांधी द्वारा जेब मे
संविधान की प्रति रख कर अपने आप को संविधान की रक्षा का पुरोधा बताने पर उन्हे
उनकी दादी श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा,
संविधान पर किये गए कुठराघात पर आईना दिखा दिया। स्वाभाविक था कॉंग्रेस के सदस्यों
ने संसद मे नारेबाजी कर इस निंदा प्रस्ताव
का विरोध किया। लेकिन सपा, टीएमसी और अन्य
दलों द्वारा आपातकाल के इस निंदा प्रस्ताव के कॉंग्रेसी का साथ न मिलना बताता हैं
कि कॉंग्रेस के उस तानाशाही पूर्ण आपातकाल को देश आज भी भूला नहीं हैं। भारत
के मजबूत लोकतन्त्र मे तानाशाही लाने और
संविधान को बदलने का दुस्साहस करने वालों को उसी तरह मुँह की खानी पड़ेगी जैसे कि
आज से 50 वर्ष पूर्व आपातकाल लागू करने पर श्रीमती इन्दिरा गांधी और कॉंग्रेस को
खानी पड़ी थी।
विजय सहगल









