रविवार, 24 मार्च 2024

अरविंद केजरीवाल - मेधा का असमय अवसान

 

"अरविंद केजरीवाल - मेधा का असमय अवसान"






एक बार ये पुनः सिद्ध हो गया हैं कि आईआईटी जैसे विश्व के श्रेष्ठम शिक्षा संस्थानों से निकले छात्रों की बुद्धि, मेधा, ज्ञान और कौशल का कोई  मुक़ाबला नहीं हैं। यहाँ से निकले छात्रों ने अपनी बुद्धिमत्ता, पांडित्य और प्रज्ञता के बलबूते देश ही नहीं अपितु दुनियाँ मे अपने नाम की छाप छोड़ी हैं। श्री चेतन भगत (विश्व प्रसिद्ध लेखक और साहित्यकार), श्री रघुरामन (पूर्व गवर्नर, आरबीआई), श्री मनोहर पर्रिकर (पूर्व मुख्य मंत्री, गोवा), श्री नन्दन नीलकेणी (आधार कार्ड के जनक और इन्फोसिस के संस्थापक) जैसे अनेक छात्रों ने अपनी सकारात्मक सोच और ऊर्जा का उपयोग, समाज और देश के विकास और कल्याण हेतु कर अपने नाम की  सार्थकता को  साबित किया, इसके विपरीत इन्ही  आईआईटी से निकले छात्र अरविंद केजरीवाल ने, संस्थान से प्राप्त बुद्धिबल  और मेधा का उपयोग विध्वंस और विनाश मे करने के कारण, प्रवर्तन निदेशालय ने दिनांक 22 मार्च 2024 को लंबी  लुका-छुपी के खेल के बाद अंततः भ्रष्टाचार के आरोप मे गिरफ्तार कर लिया। आईआईटी जैसे, एक ही संस्थान से निकले दो विपरीत सोच और संस्कारों के व्यक्तियों की गति कैसी होती? श्रीमद्भगवत गीता के संदेश "जैसे कर्म करेगा, बैसे फल देगा भगवान" को सही चरितार्थ कर दिया।  

बैसे राजनीति के पंडितों को अनिल केजरीवाल की इस दुर्गति के बारे मे जान कर कोई बहुत ज्यदा आश्चर्य या विस्मय नहीं हुआ क्योंकि अरविंद केजरीवाल के राजनैतिक जीवन की बुनियाद ही झूठ, फरेब, कपट और मिथ्या पर खड़ी हुई है। 5 अप्रैल 2011 को समाजसेवी श्री अन्ना  हज़ारे द्वारा एक सशक्त लोकपाल विधेयक के निर्माण  की मांग को लेकर दिल्ली मे अमरण अनशन की शुरुआत की गयी। भ्रष्टाचार के विरुद्ध श्री अन्ना हज़ारे की इस मुहिम मे अरविंद केजरीवाल का शामिल होना उनके राजनैतिक जीवन की शुरुआत थी। एक बड़ा आंदोलन चलाया गया। श्री अन्न हज़ारे के लोकपाल विधेयक की मांग और  भ्रष्टाचार के विरुद्ध, आंदोलन को सारे देश मे मिले जनसमर्थन के कारण ही अरविंद केजरीवाल जैसे नाचीज इंसान को  भारत के राजनैतिक पटल पर पहचान मिली। श्री अन्न हज़ारे के आंदोलन से उपजे, अरविंद केजरीवाल ने अब तक देश मे मिली पहचान से अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को अमलीजामा पहनाने की  राह मे श्री अन्न हज़ारे का अनुशासन सबसे बड़ा अवरोध थी। अन्न हज़ारे  और उनके आंदोलन मे शामिल सभी आंदोलनकारियों का राजनीति मे प्रवेश के निषेध की सख्त अनुपालना के चलते केजरीवाल जैसे तैसे चेहरे पर छद्म मुखैटा लगा कर अन्न हज़ारे के आंदोलन की समाप्ति का इंतज़ार करते रहे। अरविंद केजरीवाल को अन्ना हज़ारे के आंदोलन से अब तक मिली ख्याति के चलते अब अन्ना के आंदोलन की सफलता और असफलता से कोई विशेष प्रयोजन नहीं था अपितु जैसे ही अन्ना हज़ारे का आंदोलन राजनीति के भंवरजाल मे उलझ कर अपना अस्तित्व की आधी अधूरी जीत हांसिल कर 28 अगस्त 2011 को आंदोलन की समाप्ति हुई बैसे ही अरविंद  केजरीवाल ने अपने मन मे दवी ललक-लालसा को धरातल पर लाने मे एक क्षण की भी देरी नहीं की और अन्न हज़ारे के आंदोलन की नीति नियमों को तिलांजलि देकर अन्ना हज़ारे के विश्वास पर आघात किया और 2 अक्टूबर 2012 को  "आप" नामक राजनैतिक दल का गठन कर राजनीति मे प्रवेश किया। अब अन्न हज़ारे और अरविंद केजरीवाल की राहें अलग-अलग थी। यहाँ यह कहने मे कोई अतिसन्योक्ति नहीं कि अरविंद केजरीवाल का राजनीति मे प्रवेश ही विश्वासघात की बुनियाद पर आधारित था।

राजनैतिक परिदृश्य मे कुछ ऐसे बदलाब हुए कि अरविंद केजरीवाल ने 28 दिसम्बर 2013 को पहली बार दिल्ली  के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अपने नए पद और नई जिम्मेदारियों के जोश के  चलते जिन केजरीवाल ने कहा था न बंगला लूँगा, न सुरक्षा। न गाड़ी उन्ही केजरीवाल अपने गाड़ी और बंगले पर करोड़ो रूपये खर्च किए और अब आज करोड़ो रूपये के आबकारी घोटाले मे संलिप्तता के चलते ईडी की गिरफ्त मे हैं। 2015 और 2020 मे दिल्ली राज्य की सत्ता मे  अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व मे आम आदमी पार्टी की  पुनः वापसी ने उनके   आत्मविश्वास को सातवे आसमान पर ला दिया। कदाचित इसी  अति आत्मविश्वास ने आईआईटी के एक मेधावी छात्र को अपने कर्तव्य पथ से गुमराह कर पथभ्रष्ट कर दिया? अपनी दूरंदेशी मेधा के बलबूते अपने आप को सर्वश्रेष्ठ मानने मे कोई बुराई नहीं लेकिन अपने आप को सर्वोत्तम मानते हुए शेष दुनियाँ को मूर्ख समझने की नीति ने ही शायद केजरीवाल को पथच्युत कर दिया? अन्यथा न्यायालय अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के आबकारी घोटाले का मुख्य साजिशकर्ता बता कर प्रवर्तन निदेशालय की गिरफ्त मे न भेजता। अरविंद केजरीवाल की स्व्घोषित कट्टर ईमानदार की छवि को नकारते हुए उच्च और उच्चतम न्यायालय ने उन्हे गिरफ्तारी से बचने की कोई  भी राहत देने  से इंकार करते हुए प्रवर्तन निदेशालय की 7 दिन की अभिरक्षा मे भेज दिया। आम आदमी पार्टी द्वारा दिल्ली की जनता द्वारा केजरीवाल को मिले जनादेश की अवेहलना और लोकतान्त्रिक अधिकारों का हनन बतलाना, क्या दिल्ली के नागरिकों के लोकतन्त्र का मखौल नहीं? दिल्ली के लोगो ने केजरीवाल को शासन की डोर क्या इसलिये सौंपी थी कि वह जनता की सेवा सुहुलियत के विपरीत जा कर करोड़ो रूपये के भ्रष्टाचार मे संलिप्त हों? जनता की भलाई के इतर जनता के पैसों की लूट खसूट करें? आम आदमी पार्टी द्वारा इसे जनादेश का अनादर बतलाना दिल्ली की जनता का घोर  निरादर और अपमान हैं। क्या जनादेश की आड़ मे केजरीवाल को भ्रष्टाचार और घोटाला करने का संवैधानिक अनुमति मिल गयी। केजरीवाल की गिरफ्तारी को आम आदमी पार्टी ऐसे परिभाषित कर रही है मानों केजरीवाल किसी देशभक्ति और समाजसेवा मे गिरफ्तार हुए है? वे कोई बहुत बड़े देशभक्त या राष्ट्रभक्त हैं? हमे ये नहीं भूलना चाहिए कि केजरीवाल की गिरफ्तारी करोड़ो रूपये के घोटाले और भ्रष्टाचार मे की गयी है। शराब के उपभोग के लिये उम्र मे कमी, शराब की दुकानों को रात तीन बजे तक खोलने, शराब की होम डिलिवरी करने, शराब व्यापारियों मे लाभ का प्रतिशत 5 से 12 करने की नीति की आड़ मे करोड़ों रूपये का भ्रष्टाचार क्या एक कल्याणकारी सरकार की नीतियाँ हो सकती है? क्या एक सरकार के  मुखिया से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा कभी  की जा सकती है?

जिस केजरीवाल सरकार के तीन-तीन मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप मे जेल मे पहले से ही बंद हैं और उस सरकार के  मुखिया स्वयं अरविंद केजरीवाल  सारी नैतिकताओं, सदाचार और शर्मोहया त्याग कर ईडी द्वारा उनकी गिरफ्तारी पर जेल से सरकार चलाने का कौन से उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं? अपने सारे जीवन मे राजनैतिक दलों के भ्रष्टाचार, परिवारवाद और नैतिकताओं  पर कटाक्ष और कार्यवाही की मांग को लेकर अपनी ईमानदारी और नैतिकता की डींगे हाँकने वाले केजरीवाल जब स्वयं भ्रष्टाचार मे लिप्त हैं  तो इनके पैमाने अलग कैसे हो सकते हैं? भ्रष्टाचार पर दूसरों से त्यागपत्र मांगने वाले केजरीवाल, गिरफ्तारी पर जेल से सरकार चला कर  नैतिकता की कौनसी कसौटी का पालन कर रहे हैं? ये तो वही बात हुई हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और, अर्थात पर उपदेश कुशल बहुतेरे?

वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य मे, हमे ये बात माननी ही होगी कि श्री नरेन्द्रमोदी का वैयक्तिक जीवन मे सुचिता और ईमानदारी एक दृढ़ और उज्ज्वल पक्ष है जिसका विरोधियों मे नितांत आभाव हैं इसलिये अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी द्वारा अपनी करतूतों के लिए न्यायाधिपतियों को दरकिनार कर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और भाजप को दोषी ठहरना कहाँ तक उचित और उप्युक्त है??     

विजय सहगल

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

अब पत्नी पार्टी संयोजक की कुर्सी पर बैठकर पतिदेव के बचाव में ज़माने भर को दोषी ठहरा रही है … कभी पूछा ही नहीं होगा कि इतना झूठ/फ़रेब/मक्कारी क्यों …आनेवाले समय में उनके राजतिलक की तैयारी है क्योंकि दो ही विकल्प हैं - राजतिलक या राष्ट्रपति शासन … राजतिलक ही opt करेगा … राजतिलक होने के साथ ही वह अन्य जैसे ही परिवारवादी की श्रेणी में आ जायेगा … और बचा खुचा ईमान भी ख़त्म और संसार से ईमानदारी भी हमेशा के लिए ख़त्म … न भूतो न भविष्यति … 😊
- राजेश कंचन

बेनामी ने कहा…

आदरणीय सहगल जी।
ये केजरीवाल राजनीति का नटवरलाल है। ऐसा लगता है कि इसने कई मोर्चों पर भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा को लांघा है।जो बोला उसके विपरीत चला है ये व्यक्ति।
ऐसे व्यक्ति की सही जगह तिहाड़ ही है।
आलेख लिखने में वास्तव में अपने बहुत मेहनत की होगी।
होली की शुभकामनाएं।
राजेन्द्र सिंह

बेनामी ने कहा…

लेकिन मनी ट्रेल तो BJP की तराफ जाती है

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर शब्दों में आपने केजरीवाल के चरित्र और कारनामों पर प्रकाश डाला।पढ़ा लिखा व्यक्ति फ्राड को ज़्यादा अच्छी तरह अंजाम देता है केजरीवाल इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं और महोदय ने स्वयं को ही कट्टर ईमानदार घोषित कर दूसरों के निर्णय लेने पर विराम लगा दिया था । हर बार ईडी के सम्मन को असंवैधानिक भी घोषित कर देना भी एक कला है ।अच्छा एक महारत इस महान ठग को यह भी है कि जिन लोगों को यह भ्रष्टाचारी घोषित कर जेल भिजवाने की धमकी देता था आज वह इसका समर्थन करने और साथ देने के लिए बाध्य दिखाई देते हैं । एन.के.धवन