"नागरिक
संशोधन अधिनियम, काँग्रेस के पापों का प्रायश्चित?
अंततः मोदी सरकार ने दिनांक 11 मार्च 2024 को नागरिकता संशोधन अधिनियम की अधिसूचना जारी कर काँग्रेस के पापों का प्रायश्चित किया हैं। काँग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों द्वारा अपनी अपनी तरह इसकी व्याख्या कर सरकार के इस फैंसले की तीव्र आलोचना की और अपना विरोध प्रकट किया। पश्चिमी बंगाल, केरल, तमिलनाडू राज्य के मुख्यमंत्रियों ने यह जानते हुए भी कि इस कानून को रोक पाना उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है, अपने राज्यों के नागरिकों के बीच सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने और झूठी दिलसा देते हुए सीएए कानून को अपने-अपने राज्यों मे लागू न करने की घोषणा की!! विपक्षी दलों द्वारा फौरी राजनैतिक लाभ लेने हेतु उक्त छद्म और मिथ्याचरण तो समझ आता हैं पर काँग्रेस पार्टी को ये समझना चाहिये कि सीएए का लागू होना काँग्रेस के पापों का प्रायश्चित ही है? 3 मार्च 1947 को गांधी जी के उस बयान को कि "देश का बंटवारा उनकी लाश पर होगा" को नज़रअंदाज़ कर नेहरू ने प्रधान मंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षा के कारण भारत के विभाजन जैसी अलोकप्रिय, घातक, और खौफनाक विभिषिका को स्वीकारा जिसमे करोड़ों लोगो को रातों रात अपनी जन्मभूमि/मातृ भूमि विलग होना पड़ा जिसमे 30 लाख से भी ज्यादा लोगो की नृशंस हत्या हुई। काश!! यदि उस समय कॉंग्रेस द्वारा गांधी जी की बात मान ली गयी होती तो आज सीएए जैसे कानून की आवश्यकता न होती? लोगो को विस्थापन न झेलना पड़ता और लाखों लोगो को असमय, अकाल और अकारण अपनी जान न गंवानी पड़ती। दरअसल सीएए का मुख्य मकसद ही पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश मे वहाँ बसे अल्पसंख्यक (हिन्दू, सिक्ख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई) नागरिकों पर हो रहे धार्मिक उत्पीड़न और अत्याचार से प्रताड़ित नागरिकों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान हैं।
1947 मे भारत के विभाजन की विभीषिका के
बावजूद भी हम भारतियों ने अपनी सांस्कृति और संस्कारों के चलते सर्वधर्म समावेश की
अपनी प्रतिवद्धता के कारण, धर्मनिरपेक्ष
नीति को अपना कर अन्य अल्पसंख्यकों के साथ एकाकार जीवन जिया पर दुर्भाग्य से पाकिस्तान और बांग्लादेश की इस्लामिक सरकारों ने
अपने नागरिकों के बीच धार्मिक और सामाजिक सदभाव
की वचनबद्धता और प्रतिबद्धता के पालन का जो वायदा किया था वो पूरा नहीं किया। 1947
मे अखंड भारत के विभाजन के पूर्व मुहम्मद
अली जिन्ना और उनके अनुयायियों ने पाकिस्तान के निर्माण के पूर्व अल्पसंख्यक
हिंदुओं को धार्मिक आज़ादी की जो प्रतिवद्धतायेँ की थी उन्हे कभी पूरा नहीं किया
गया। अफगानिस्तान,
पाकिस्तान और बांग्लादेश के बहुसंख्यक
नागरिकों द्वारा अपने देश के अल्पसंख्यकों
पर उत्पीढन और अत्याचार करने के बावजूद वहाँ की सरकारों द्वारा उन उन्मादी
कट्टरपंथियों, मुल्ले मौलवियों के
विरुद्ध समुचित कार्यवाही न करना, चिंता और
परेशानी का मुख्य कारण रहा। इन देशों के सरकारों
ने यदि धार्मिक आज़ादी को बिना भेदभाव
के अपने-अपने देशो मे लागू किया होता तो
उनके देशों के हिन्दू, जैन,
सिक्ख, बौद्ध,
पारसी और ईसाई अल्पसंख्यकों को अपने धर्म
पालना हेतु भारत मे शरणार्थी के रूप मे नागरिकता के लिये आवेदन न करना पड़ता।
अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश
के अल्पसंख्यक नागरिकों का धार्मिक रूप से
उत्पीड़न, अत्याचार जैसी समस्याओं का सामना कर रहे लोगो की कष्ट और
परेशानियों का समाधान का एक मात्र रास्ता
सीएए ही था, जिसके चलते आज सीएए
जैसे कानून की भारत मे लागू करने की आवश्यकता पड़ी। ये देश का दुर्भाग्य है कि
काँग्रेस ये नहीं समझ पा रही हैं कि 1947
मे पंडित नेहरू और काँग्रेस की अदूरदर्शी नीतियों ने देश का विभाजन तो स्वीकार कर लिया लेकिन
पाकिस्तान मे रहने वाले हिन्दू, सिक्ख,
ईसाई आदि अल्पसंख्यक नागरिक, विभाजन की
विभीषिका के दंश को आज तक लगातार झेल रहे हैं। काश यदि महात्मा गांधी के वचन की
पालना हेतु काँग्रेस ने देश का बंटवारा स्वीकार न किया होता तो करांची,
लाहौर, मुल्तान,
रावलपिंडी या तथाकथित पाकिस्तान के किसी भी शहर मे किसी भी धर्म के अनुयायियों के उत्पीड़न के खिलाफ सख्त
कानूनी कार्यवाही से वैसे ही निपटा जाता जैसे अभी भारत मे निपटा और नियंत्रित किया
जा रहा हैं। तब शायद न नागरिक को विस्थापित होना पड़ता और न किसी नागरिक को विभाजन की विभीषिका झेलनी पड़ती।
एक ये भ्रम फैलाने की कोशिश की गयी कि इस
कानून मे मुस्लिमों को क्यों शामिल नहीं
किया गया? क्योंकि ये तीनों देश
इस्लामिक राष्ट्र हैं और यहाँ इस्लामिक धर्म के मानने वालों को धर्म के नाम पर
कहीं, कभी प्रताड़ित नहीं किया गया,
और जहां तक मुस्लिम पाकिस्तानी नागरिक को नागरिकता का सवाल है तो पहले भी इसके लिये अलग नियम और कानून है
जिसके तहत ही पाकिस्तानी नागरिक, गायक और
संगीतकार अदनान सामी को 2016 मे भारतीय नागरिकता प्रदान की गयी। तब विपक्ष द्वारा आम
मुस्लिमों के मन मे खौफ, डर या भय पैदा
कर ऐसे भ्रामक संदेश फैलाना कहाँ तक उचित है?
श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 3 के श्लोक 35
मे भगवान श्री कृष्ण ने कहा हैं कि:-
श्रेयान्स्वधर्मो
विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे
निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।3.35।। अर्थात
अच्छी प्रकार आचरण में लाये
हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित (भी) अपना धर्म अति उत्तम हैं। अपने धर्म में (तो)
मारना (भी) कल्याण कारक हैं (और) दूसरे का धर्म भय को देनेवाला हैं।
अफगानिस्तान,
पाकिस्तान और बांग्लादेश से धर्म के आधार पर उत्पीड़ित और सताये गए शरणार्थी अपना
जमीन जायदाद, धन संपत्ति और
रोजी-रोजगार सिर्फ अपने बाल बच्चों की खातिर और अपने धर्मपालनार्थ ही विस्थापित हो रहे हैं ऐसे
सनातन धर्मलम्बियों को अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी द्वारा इन शरणार्थियों
को कानून और व्यवस्था के लिये संकट बतलाते हुए इन्हे "पाकिस्तानी
घुसपैठिए", चोर,
डकैत, हत्यारा और बलात्कारी बतलाकर अपमानित करना और घृणित भाषा
का इस्तेमाल किया जाना न केवल निंदनीय हैं
अपितु उनके मानसिक दिवालियापन का ध्योतक है। जो केजरीवाल,
हाल ही मे देश मे नागरिकता संशोधन कानून अर्थात सीएए लागू होने के
बाद देश के लोगो के बीच तीन देशों के करोड़ो लोगो को नागरिकता देने का भय और खौफ
दिखा कर भ्रामक संदेश फैला रहे हैं जो वास्तविकता से कोसों दूर हैं। आपको जानकार
हैरानी होगी कि पिछले पाँच वर्षों मे लगभग सोलह हजार आवेदनों मे से सिर्फ 5079 लोगो को ही भारत की नागरिकता प्रदान
की गयी हैं। कर्नाटक के सीएम सिद्धरमैया ने सीएए को चुनाव पूर्व हथकंडा, पश्चिमी बंगाल की मुख्य मंत्री ने तो एक कदम
आगे बढ़कर इसे नौटंकी बताकर इसका मखौल उड़ाया। कमोवेश इंडि गठबंदन के सभी नेतागण इन
शरणार्थियों के आने से देश के लोगो को महंगाइ,
बेरोजगारी, जनसंख्या का भय दिखा कर
मिथ्याचारण कर रहे हैं कदाचित ये लोग अवैध और राष्ट्र विरोधी बंगलादेशी और रोहिङ्ग्या घुसपैठियों के बारे मे
चर्चा और चिंता करते,
जिनके कारण देश के अनेक स्थानों मे कानून
और व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो गयी हैं।
उम्मीद की जानी चाहिये कि सीएए के लागू हो
जाने के कारण, इन तीन देशों से आये
अल्पसंख्यक शरणार्थियों को देश के अन्य नागरिकों की तरह सारे अधिकार मिल पाएंगे।
दशकों से अपने बच्चों को स्कूलों मे दाखिला न मिल पाने के कारण पढ़ाई से वंचित इन
नौनिहालों को अब स्कूलों मे पढ़ाई करने का अवसर मिलेगा। अब तक दिहाड़ी मजदूरी,
छोटे रोजगार और दूसरों की दया पर निर्भर रहने वाले इन शरणार्थियों के अंधेरे जीवन मे नागरिक संशोधन कानून,
उजाले की किरण बनकर एक सम्मानजनक जीवन यापन का अधिकार देगा।
विजय सहगल



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