"12वी
फ़ेल" फिल्मी समीक्षा"
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अगस्त 1947 मे देश की स्वतन्त्रता के बाद से ही संघ लोक सेवा आयोग द्वारा
आयोजित देश की सबसे बड़ी और सबसे सम्मानजनक
सेवा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) एवं भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) मे शामिल और
सफल होने का सपना हर भारतीय युवा के मन मे
हमेशा से रहा है। इसमे कोई भी शक और संशय नहीं कि इस अहम सेवा मे सफल व्यक्ति को असीमित
और व्यापक शक्तियों के माध्यम से एक अलग पहचान मिलती है।
इन
दिनों निर्माता, निर्देशिक विनोद विधु चोपड़ा द्वारा लिखित फिल्म 12वी फ़ेल फिल्म की चारों
तरफ चर्चा हैं। यह फिल्म अनुराग त्रिपाठी द्वारा लिखित किताब "12th फ़ेल" पर आधारित हैं जिसमे एक ऐसे संघर्ष शील युवक के जीवन पर
आधारित सत्य घटना को चित्रित किया गया
जिसने अपनी आर्थिक निर्धनता और गरीबी के
बावजूद अपने, कठिन परिश्रम और संघर्ष पूर्ण जीवन से देश की
सबसे कठिन पर सम्मानित और प्रतिष्ठित परीक्षा संघ लोक सेवा की भारतीय पुलिस सेवा मे सफलता हांसिल कर देश के युवाओं के समक्ष एक
अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसमे कदाचित विरले लोग ही इस
चुनौती पूर्ण परीक्षा मे सफलता की सीढ़ी चढ़
कर अपना लक्ष्य हांसिल करते हैं। पर्दे पर
चंबल, मुरैना के युवा भापुसे के अधिकारी मनोज शर्मा की
भूमिका के रूप मे विक्रांत मैसी एवं उनकी प्रेमिका श्रद्धा के रूप मे अभिनय मेधा
शंकर ने बखूबी किया हैं।
फिल्म
12वी फ़ेल ने मुझे इसलिए भी आंशिक रूप से प्रेरित किया क्योंकि जिस चंबल इलाके मे
स्थित मुरैना-ग्वालियर के संघर्षशील युवा
एवं जुझारू किरदार, 12वी फ़ेल, मनोज शर्मा को दिखाया गया,
वो ही क्षेत्र मुरैना-अम्बाह-पोरसा, मेरी भी दशकों तक कर्म
भूमि रहे और दुर्भाग्य से मै भी 12वी मे
एक बार फ़ेल हुआ था!! लेकिन समय और परिस्थिति के अनुसार मेरे सपने और संघर्ष दोनों
ही बहुत छोटे और सहज थे जो मुझे बैंक के लिपिक पद, पर ले गये। चंबल के मुरैना-भिंड क्षेत्र
के लोगो मे स्वाभिमान और आत्मसम्मान
कूट-कूट कर भरा हैं, जिसकी परिणति एक ओर जहां, बहुतायत लोगो की पदस्थापना देश
की सेना और सुरक्षा बलों मे देखने को मिलती हैं, वहीं दूसरी ओर देश, धर्म, जाति और पूर्वजों की आन-वान और शान की खातिर अपना
सब कुछ दांव पर लगाने मे पीछे न रहने मे देखने को मिलती है, फिर भले ही इसके लिये प्राण ही क्यों न देना पड़े!! दुर्भाग्य से अनेकों
बार जर, जोरू और जमीन या छोटी-छोटी बातों के झगड़ों मे हिंसा और हत्या यहाँ आम बात हैं। चंबल
क्षेत्र मे 'डकैतों' की समस्या के मूल
मे यही एक मुख्य कारण रहा है!! पूरे देश मे जब किसान हताशा या निराशा मे अत्महत्या
करते हैं तब चंबल नदी के बीहड़ों मे रहने वाले लोग विपरीत और प्रतिकूल परिस्थितियों
मे 'हत्या' कर बीहड़ों के बागी बन जाते
हैं!! फिर बेशक दुनियाँ के लोग उन्हे दस्यु
या डाँकू कहती रहें?
रक्षा और अति आत्मरक्षा की इन्ही भावनाओं के कारण यहाँ के लोगो का हमेशा से, सेना या सुरक्षा बलों और उसकी बर्दी के प्रति एक अतिरिक्त आकर्षण रहा है
जिसके लिये चंबल के लोग जुनून की हद तक जा सकते हैं। शायद इन्ही अतृप्त या अपूर्ण
इक्षाओं के वशीभूत इस क्षेत्र के कुछ लोग अपने बच्चों का नाम कलेक्टर सिंह, तहसीलदार सिंह या कर्नल सिंह रखते हैं।
जहां
एक ओर परिवार की गरीबी, पिता की ईमानदारी पर उत्पीड़न और भाई के जुगाड़ से स्वरोजगार पर विधायक के
गुर्गों का कुठराघात ने ही शायद 12वी फ़ेल के नायक मनोज शर्मा की इसी लगन और दीवानगी ने उसे संघ लोक सेवा की
परीक्षा उत्तीर्ण करने की प्रेरणा दी हो? वर्दी का जादू और उसकी
गर्वोक्ति यहाँ ऐसा सिर चढ़ कर बोलती हैं कि
आईपीएस तो दूर पुलिस का एक साधारण कांस्टेबल की वर्दी उसमे साहस और शौर्य को दुगना महसूस करा देता
हैं फिर सेना और सुरक्षा बालों के ओहदे पर नियुक्त सेना नायकों का क्या कहना। लेकिन
वही दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोगो का पुलिस के इत्तर सेना और अन्य सुरक्षा बलों के प्रति
सम्मान, श्रद्धा और प्रतिष्ठा आज भी ज्यादा हैं। समाज मे प्रत्यक्ष
रूप से भले ही पुलिस विभाग मे कार्यरत लोगो का वेशक लिहाज़ होता हो पर चंबल क्षेत्र मे सेना, बीएसएफ़, आईटीबीपी, सीआईएसएफ़ मे कार्यरत लोगो का सम्मान पुलिस
सेवा के किसी बड़े अधिकारी से कहीं ज्यादा हैं। यही कारण हैं जब 12वी फ़ेल नायक का
पिता अपने पुत्र के भारतीय पुलिस सेवा मे
चुने जाने पर अपने गाँव के विरोधी को
सिर्फ ये जतलाने के लिये घर से निकलते हुए ये कहना कि, "तैने एक आईपीएस के बाप से पंगा लेके ठीक नाय
करो?" उसकी साधारण सोच को दर्शाता हैं?
मैंने
अपनी बैंक सेवा के दौरान एक जिले मे स्थित
कलेक्टर कार्यालय मे शाखा प्रबन्धक के रूप मे लगभग 5 साल, देश की इन
दो सर्वोच्च सेवा, आईएएस, और आईपीएस के अधिकारियों की सेवा और शक्ति को नजदीक से देखा हैं। मेरा मानना
हैं कि इन दो बड़ी सेवाओं के पद मे जितनी शक्ति, निहित है शायद
ही किसी दूसरी सेवा मे हो!! यदि आईएएस सेवाओं पर पदस्थ लोगो ने देश की स्वतन्त्रता
के बाद ईमानदारी और सत्य निष्ठा से काम किया होता तो देश के आम लोगो के साथ ही समाज
के गरीब, दबे-कुचले और पिछड़े लोगो का ये रूप देखने को न मिलता
जो आज देखने को मिलता हैं? आम लोगो के कल्याण की योजनाओं का कार्यान्वयन
यदि सुचारु और निष्कपटता से किए गये होते तो आज भारत विकसित राष्ट्रों मे गिना जाता।
यदि आईपीएस अधिकारियों ने कदाचित अपनी सेवाओं की कर्तव्य पालना ठीक तरीके से की होती
तो देश मे आतंकवाद, गुंडागर्दी, नक्सलवाद
जैसी समस्याएँ शायद ही देखने को मिलती?? देश मे आज कानून-व्यवस्था
का ऐसा अधोपतन शायद ही देखने को मिलता? पर देश का दुर्भाग्य है कि राजनैतिज्ञों से मिली
साँठ गांठ के कारण इन दोनों ही सेवाओं के लोगो को मिली असीमित शक्ति और सामर्थ्य ने
देश मे बेईमानी, भ्रष्टाचार को ऐसा बढ़ावा मिला कि देश मे नैतिक
और चारित्रिक मूल्यों का ऐसा पतन हुआ कि देश
को अधोगति, अवनति की परिणति देखने को मिली। ऐसे कितने दंपति होंगे जिनके भाग्य मे एक आईपीएस के माँ-बाप होना लिखा हो? काश, मनोज शर्मा आईपीएस मे सफल होने के संघर्ष और श्रम
के साथ वास्तविक जीवन मे ऐसा कुछ करके एक आदर्शा उदाहरण स्थापित कार पाते जो आम लोगो
मे आज एक मिशाल होता? पर दुर्भाग्य वे अपने इस कठिन संघर्ष मे
ऐसा कोई दृष्टांत रख पाते तो इस फिल्म की सार्थकता और संघर्ष को एक नया आयाम मिलता? लेकिन दुःखद ये रहा कि 12वी फ़ेल के
अभिनेता फिल्म के एक दृश्य मे अपने आपको साधारण व्यक्ति की सोच दिखाने से रोक न सके।
वे
फिल्म के एक सीन मे अपने आईपीएस होने की
गर्वोक्ति से नहीं बच सके जब वे उस दृश्य मे, थानेदार द्वारा अपने एक मित्र की अवैध हिरासत पर
तमाम कानूनी धाराओं को उद्धृत कर आईपीएस के रूप मे पहला पत्र उस थानेदार के
सस्पेंशन का साइन करने की धमकी देकर करते हैं? बैसे फिल्म 12वी फ़ेल के नायक मनोज शर्मा की, परीक्षा मे नकल के अभाव मे फ़ेल होने की "स्वीकारोक्ति", इस फिल्म का चरमोत्कर्ष थी।
जहां
तक इस फिल्म के कथानक, संवाद और निर्देशन की बात हैं विधु विनोद चोपड़ा फिल्म के हीरो की आईपीएस बनने
के संघर्ष, श्रम, लगन और दीवानगी को
उकेरने मे पूरी तरह सफल हुए इसमे कोई संशय नहीं हैं। लेकिन सत्य घटना पर आधारित इस
फिल्म के रियल हीरो मनोज शर्मा कदाचित
आईपीएस मे सफल होने के बाद अपने वास्तविक सरकारी सेवा मे कुछ ऐसे मानदंड और उदाहरण स्थापित करते जिससे
समाज के सामान्य मानवी भी उनके माता-पिता की तरह गर्व महसूस करता, तो कुछ और बात होती? पूरी फिल्म का एकांश भी यदि मनोज शर्मा द्वारा एक
भारतीय पुलिस सेवा को मिली अपनी असीम शक्तियों की सहायता से अपने गाँव के ही
बेरोजगार युवाओं को कुछ रास्ता दिखा पाते तो फिल्म 12वी फ़ेल की सार्थकता पूर्ण हो
सकती थी।
पर
वास्तविक जीवन मे ऐसा न होने के कारण मनोज शर्मा का संघ लोक सेवा के माध्यम मे
आईपीएस मे सफल होने का संघर्ष एक सामान्य संघर्ष हो कर रह गया।
विजय
सहगल

2 टिप्पणियां:
सही लिखा आपने
GOOD 😄👌
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