रविवार, 18 फ़रवरी 2024

ओबीसी का अवसान

 

"ओबीसी का अवसान"




आज फिर 19 फरवरी का दिन हम सब के परमप्रिय, हमारी ज़िंदगी के अभिन्न हिस्सा रहे, लाडले  ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का स्थापना दिवस हैं। 1943 मे आज ही के दिन पंजाब प्रांत के लाहौर (अब पाकिस्तान) मे  अपनी स्थापना के वर्ष से, जब हम बैंक के इतिहास पर दृष्टिपात करते हैं तो ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का वृतांत संघर्षों और चुनौतियों से परिपूर्ण रहा। अपनी स्थापना के चार वर्ष बाद जब देश  1947 मे, स्वतन्त्रता के सूरज की लालिमा प्रकाशमान हो रही थी तब ओरिएंटल बैंक को भी लाखों-लाख देश वासियों के साथ विभाजन की विभीषिका के  दंश झेलने के लिये बाध्य होना पड़ा। स्वतन्त्रता के बाद अपनी आठ शाखाओं मे से सिर्फ दो शाखाओं के साथ ओबीसी को अपना प्रधान कार्यालय लाहौर से अमृतसर लाना पड़ा। बैंक के तत्कालीन चेयरमेन लाला करम चंद थापर के दूरदृष्टिकोण के कारण पाकिस्तान की बंद  शाखाओं के ग्राहकों की  बैंक के खातों मे जमा पूंजी के  एक एक पैसे का भुगतान कर बैंक ने देश मे बैंकिंग के नए आयाम प्रस्तुत किए।

1970 से 1976 का समय ओरिएंटल बैंक के लिये चुनौतीपूर्ण रहा। इस दौरान अपने अस्तित्व को बचाने के  लिये बैंक को बड़े संघर्ष करने पड़े। एक दौर तो ऐसा भी आया जब बैंक, अपनी वार्षिक लेखाबंदी मे मात्र 175/- रुपए का लाभ ही निकाल पाया। ये दौर  ओरिएंटल बैंक के इतिहास का सबसे कठिन समय था, जब बैंक के हिस्सेदार थापर समूह ने इतने कम लाभ के कारण बैंक को बेचने/बंद करने  का अप्रिय निर्णय लेने के लिए विवश होना पड़ा। ऐसे आड़े और कठिन दौर मे तत्कालीन बैंक के समस्त अधिकारी और कर्मचारियों तथा बैंक यूनियन के तत्कालीन नेतृत्वकारी साथियों ने आगे आकार बैंक प्रबंधन को भरोसा दे,  बैंक के कारोबार मे एक जुट होकर, जी-जान से जुट कर, एक बार पुनः बैंक को बचा कर, बैंक को, संकटों के बादल से मुक्त कराया। इस कठिन दौर ने बैंक मे एक नयी कार्य सांस्कृति को जन्म दिया। समान्यतः भारतीय बैंक के इतिहास और विशेषतः ओरिएंटल बैंक के प्रबंधन और अधिकारी कर्मचारियों के बीच पनपी इस कार्य सांस्कृती को ओबीसी सांस्कृती के नाम से निरूपित किया। बैंक के प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच इस आपसी सौहार्द ने आगे चल कर बैंक की बुनियाद को एक मजबूत आधार प्रदान किया। ओरिएंटल बैंक का राष्ट्रीयकरण अन्य 5 बैंकों  के साथ  15 अप्रैल 1980 को किया गया, तब कुल 20 राष्ट्रीयकृत बैंकों  मे ओबीसी का स्थान 19वे नंबर पर था। ओरिएंटल बैंक के इतिहास मे एक पल ऐसा भी आया जब बैंक की गैर निष्पादनकारी आस्तियाँ ज़ीरो थी और बैंक को  अनेक व्यापारिक पैमानों के आधार पर देश का नंबर एक बैंक होने का गौरव भी प्राप्त हुआ। ये ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का स्वर्णिम काल था। 1993 मे 20 राष्ट्रीकृत बाँकों मे, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स को शेयर मार्केट मे अपना पहला आईपीओ आम जनता के बीच लाने का गौरव प्राप्त हुआ।

70 के दशक के ओरिएंटल बैंक के स्वर्णिम काल के पश्चात जब एक ओर  बैंक अपनी  नई ऊंचाइयों को छूने का प्रयास कर रहा था वहीं दूसरी ओर यूनियन और प्रबंधन के कुछ स्वार्थी, मौका परस्त सदस्य, बैंक  की कार्यप्रणाली के अंदर ओबीसी कल्चर को क्षति पहुंचाने मे कामयाब रहे। जहाँ  एक वक्त प्रबंधन और यूनियन के बीच का जो  आपसी सौहार्द, साहचर्य और सौजन्य बैंक के आड़े समय संकट से निकालने मे बैंक की धरोहर थी, वही इसी आपसी बंधुत्व, भाईचारा और मैत्री भाव, बैंक के संकट से उबरने के बाद, बैंक के स्टाफ के बीच ट्रान्सफर, पोस्टिंग और प्रमोशन मे पक्षपात का  कारण बना, जिसने बैंक के अंदर भ्रष्टाचार, भाई भतीजा बाद और चोर दरबाजे से चपरासी के रूप मे नेताओं और प्रबंधन के रिशतेदारों की सैकड़ो की  संख्या मे भर्ती के रूप मे  बैंक पर  बड़ा आघात भी किया। प्रबंधन और बैंक यूनियन का एक ही सिक्के के दो पहलू होने ने भी बैंक की कार्य सांस्कृति को बड़ी क्षति पहुंचाई। प्रबंधन और बैंक यूनियन के साथ  किसी बैंक स्टाफ की पसंद-नापसंद यूनियन और बैंक प्रबंधन की पसंद-नापसंद बन गयी। एक वक्त तो ऐसा आया जब प्रबंधन और यूनियन मे  किसी एक से नजदीकी और घनिष्ठता ने खुशामद, चापलूसी, चाटुकारिता जैसी कार्य सांस्कृति को बढ़ावा  दिया, वहीं दूसरी ओर किसी बैंक  अधिकारी या कर्मचारी की प्रबंधन/यूनियन से दुश्मनी या मतभेद ने उस स्टाफ को बैंक मे कहीं का नहीं छोड़ा अर्थात उस स्टाफ की सुनवाई न  तो कभी प्रबंधन ने सुनी और न ही यूनियन ने ऐसे स्टाफ की कभी सुधि ली।  ऐसे लोगो का बैंक की छद्म नीतियों की आड़ मे कदम-कदम पर उत्पीढन किया गया।

जिस तरह कॉंग्रेस ने देश की स्वतन्त्रता कराने के संघर्ष की कीमत के रूप मे निजी स्वार्थ, बेईमानी और भ्रष्टाचार के रूप मे कदम कदम पर कीमत बसूली, ठीक उसी राह पर चल कर ओबीसी के उच्च प्रबंधन और यूनियन  के अखिल भारतीय नेता द्व्य और अन्य क्षेत्रीय छुटभैये नेताओं ने भी बैंक को बिकने/बंद करने से बचाने की कीमत के रूप मे बैंक के संसाधनों की भरपूर लूट की। आश्चर्य होता है कि बैंक के राष्ट्रीकरण के पूर्व और पश्चात बैंक मे पिछले दरबाजे से तमाम नियम और शर्तों को दर किनार कर चपरासी के रूप मे सैकड़ों भर्तियाँ कीं  और ये खेल, राष्ट्रीकरण के दशकों बाद तक भाई भतीजा और आर्थिक कदाचार, भ्रष्टाचार  के रूप मे जारी रहा। कुछ अपुष्ट खबरों के अनुसार इस घोटाले मे जमीन की लिखा-पढी  ठीक उसी तरह की गयी जैसे रेल भर्ती घुटाले मे लालू परिवार पर नौकरी के बदले जमीन का घोटाला आजकल सुनाई दे रहा हैं। अब इस घोटाले मे नौकरी के बदले जमीन के ट्रान्सफर  की सीख, बैंक के नेताओं ने लालू से सीखी या लालू ने बैंक नेताओं से सीखी कहना मुश्किल हैं??   

राष्ट्रीकरण के बाद, बदले परिदृश्य मे, उच्च प्रबंधन ने अधिकारी-कर्मचारी यूनियन के बीच फूट-डालो और राज करो (दिवाईड अँड रूल) नीति के तहत दोनों को आपस मे लड़ा कर अपना उल्लू सीधा किया। दुर्भाग्य से एक समय ओबीसी कल्चर का दम भरने वाले बैंक के अधिकारी और कर्मचारी  नेताओं का एक दूसरे को नीचा दिखाने की क्षुद्र दंभ, तुच्छ अहम और छद्म अहंकार ने बैंक की कार्य सांस्कृति का अपूरणीय अहित कर बैंक के अधिकारी और कर्मचारियों के बीच गहरी खाई खोदी!! मुझे याद हैं उन दिनों जब बैंक के आपसी विलय की बात चलती थी तब बैंक स्टाफ का एक पक्ष, जो यूनियन और प्रबंधन की चाटुकारिता मे रत था, ने हमेशा ओबीसी कल्चर मजबूती का पक्ष लिया और सदा ही बैंक के विलय का विरोध किया, वहीं दूसरी ओर ऐसे बैंक स्टाफ जिनका बैंक प्रबंधन और यूनियन मे कोई धनी धोरी नहीं था और जिसने कदम कदम पर ट्रान्सफर, पोस्टिंग और प्रमोशन मे पक्षपात, भाई भतीजा बाद को देखा, हमेशा बैंक के विलिनीकरण की कामना करता रहा!!, और जो  सदा, इस दोआयमी, दोगली नीति को कोसते हुए  बैंक के विलय के पक्ष मे खड़े रहते। चंबल की एक शाखा मे एक लिपिक साथी जिसने बैंक परीक्षा सीएआईआईबी के दोनों पार्ट पास करने  के बावजूद विशेष सहायक के प्रमोशन से वंचित  कर कैसे यूनियन और प्रबंधन ने मिलकर एक भ्रष्ट व्यक्ति को सुपरबाइजर का प्रमोशन दिया जिसको आगे चल कर बेईमानी और भ्रष्टाचार के कारण बैंक की सेवाओं से बर्खास्त किया गया। ऐसे अनेकों किस्से बैंक मे अखिल भारतीय स्तर पर हर साल किए जाते रहे। ऐसे अन्यायी और अनाचार भरे माहौल मे योग्य स्टाफ जिनका बैंक मे कोई माई-बाप नहीं था, उनकी चित्कार  बैंक मे "नक्कार खाने मे तूती की आवाज" वाली कहावत को चरितार्थ करती रही!! अधिकारी यूनियन के एक महारथी ने तो स्वच्छंदता और स्वेच्छाचारिता की सारी सीमाएं तोड़ अपने निजी उपयोग  हेतु यूनियन के खर्चे पर लाखों रुपए की एक बड़ी चार पहिया कार खरीदी, जिसके पेट्रोल और ड्राईवर के वेतन व्यय, आदि के खर्चों का वहन भी यूनियन के चंदे से किया जाता था!!  भारतीय बैंक  यूनियनों  के इतिहास मे पैसे का ऐसा खुला  दुर्पयोग शायद ही कभी, कहीं अन्यत्र देखने को मिला हो??

ओरिएंटल बैंक शायद,  बैंक के बाहरी झंझावातों से लड़ कर अपना अस्तित्व बचा लेता पर बैंक अपने ही प्रबंधन के कुछ उच्च पदस्थ अधिकारियों के भ्रष्टाचार के कारण  और बैंक की यूनियन नेताओं का अपने सदस्यों के प्रति गैर जिम्मेदारान व्यवहार के कारण ओबीसी का अवसान तय कर दिया था और  जिसे सरकार की बैंकों के विलिनीकरण नीति ने आसान कर दिया। इस तरह  ओरिएंटल बैंक जैसे एक प्यारे संस्थान का अवसान बैंक के ही चंद लोगो के कुकृत्य के कारण,  ऐसे समय हुआ जबकि बैंक मजबूत स्थिति मे था। किसी शायर ने अपने ही लोगो द्वारा अपने ही घर को आग लगाने पर क्या खूब लिखा हैं, जो ओबीसी के अवसान पर सटीक बैठती हैं :-

दिल के फफोले जल उठे, सीने के दाग से।

इस घर को आग लग गई घर के चिराग से॥          

 

शायद आज ओरिएंटल बैंक, अपने स्थापना दिवस पर बेबसी, बेकसी और विवशता पर आँसू बहाते हुए सोच  रहा होगा कि:- 

 

मुझे अपनों ने मारा, गैरों मे कहाँ दम था।

मेरी कश्ती वहाँ डूबी, जहाँ पानी बहुत कम था॥

 

विजय सहगल

        

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Very Good Best written the story of OBC Best of luck , keep it up Thanks Happy foundation Day .🙏👍

बेनामी ने कहा…

Shukr hai merger hua.. Oriental bank of Circus tha. Kbhi bhi khi bhi posting de dete thae and kyee baar toh one time transfer bol ke ek vahiyaad jgah pr posting deke bhuul hi jaate thae

बेनामी ने कहा…

सर बहुत ही सटीक लिखा है।
हरीश अग्रवाल

govind great ने कहा…

Aab tho " OBC" Kewal ek itihaas hai. Bus kewal yadey rah gayee.