बुधवार, 21 फ़रवरी 2024

इलैक्टोराल बोंड्स पर सर्वोच्च निर्णय

 

"इलैक्टोराल बोंड्स पर सर्वोच्च निर्णय"





देश के सर्वोच्च न्यायालय ने 15 फरवरी 2024 को एक बार पुनः सिद्ध कर दिया कि भारतीय संसंद द्वारा ऐसे किसी भी कानून को मंजूर नहीं किया जा सकता जो देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था मे भ्रष्टाचार को एक कानूनी अमलीजामा पहना, वैधानिक मान्यता प्रदान करे!! पाँच जजों की संविधान न्याय पीठ मे मुख्य नयाधीश श्री डीवाई चंद्रचूड़ सहित जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे। ये फैसला भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास मे स्वर्ण अक्षरों से अंकित किया जायेगा। भारतीय राजनैतिक दलों को इलेक्टोराल बोंड्स के माध्यम से दिये जाने वाले चुनावी चंदे को सुप्रीम कोर्ट के पाँच जजों वाली बेंच ने एक राय से निरस्त करते हुए स्टेट बैंक को नए चुनावी बॉन्ड जारी न करने और वित्त विधेयक के माध्यम से लागू चुनावी बॉन्ड योजना से 12 अप्रैल 2019 से अब तक खरीदे चुनावी बॉन्ड का विस्तृत ब्योरा निर्वाचन आयोग को 6 मार्च 2024 तक देने का निर्देश दिया हैं। पाँच जजों की न्याय पीठ ने चुनाव आयोग को भी निर्देशित किया हैं कि वह चुनावी बॉन्ड के माध्यम से प्राप्त चुनावी चंदे की जानकारी यथा चंदा देने वाले का विवरण  और लाभान्वित राजनैतिक दल, धन राशि का विस्तृत विवरण चुनाव आयोग की वेव साइट पर प्रदर्शित सार्वजनिक करें।

अब देश की आम नागरिकों के इस बात की जानकारी हो सकेगी कि भारतीय राजनीति के विभिन्न दलों के युद्धाभिलाषी, चतुर खिलाड़ियों को किन किन औध्योगिक घरानों से कितनी कितनी धन राशि चुनावी संग्राम मे  विजयी प्राप्त करने हेतु मिली हैं। न्यायालय का मानना था कि इस बॉण्ड के माध्यम से असीमित चंदा देकर कंपनी और औध्योगिक घराने, चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित भी कर सकते हैं!! माननीय न्यायालय का ये भी मानना था कि इलेक्टोराल बॉण्ड योजना संविधान के अनुच्छेद-19 (1)(ए) का उल्लंघन हैं ये योजना, मुक्त और पारदर्शी चुनाव को प्रभावित कर रही थी जिसके कारण सूचना के अधिकार और विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के  अधिकार का भी उल्लंघन हो रहा था। इस योजना से मतदाताओं के अधिकार का भी हनन हो रहा था। जहां एक ओर स्वतंत्र और निर्दलीय प्रत्याशी चुनावी समर के लिये अपनी निजी आय से चुनाव लड़ने के लिये बाध्य है, वही इस असंवैधानिक चुनावी बॉण्ड योजना मे वे ही दल लाभान्वित होते जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत हो और जिन्हे विधान सभा या लोक सभा के चुनावों मे कम-से-कम 1% वोट मिले हों!! इस तरह यो चुनावी बॉण्ड देश के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों यथा  कॉंग्रेस, भाजप, बसपा, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, एनसीपी, राजद, जेडीयू, एआईडीएमके, डीएमके, नेशनल कॉन्फ्रेंस, शिवसेना या अन्य दलों   को ही लाभान्वित करता है शेष  99.99% निर्दलीय सामान्य भारतीय नागरिकों को चुनाव लड़ने हेतु ये योजना समानता के अधिकार से वंचित कर भ्रष्टाचार और काला बाजारी को बढ़ावा देती हैं जिसे निरस्त कर सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ही किया।

जैसा कि विदित था सुप्रीम कोर्ट के चुनावी बॉण्ड योजना के निरस्तीकरण पर राजनैतिक महारथियों की प्रतिक्रिया आनी स्वाभाविक थी। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2017-18 से 2022-23 तक सत्ताधारी दल भाजप को सबसे अधिक 6566 करोड़ की धनराशि प्राप्त हुई। काँग्रेस को इस योजना मे 1123 करोड़, टीएमसी को 1093 करोड़, बीजेडी को 774 करोड़, डीएमके को 617 करोड़ रुपए परोक्ष रूप से काली कमाई के रूप मे प्राप्त हुए। कुल मिलाकर रुपए 13431 करोड़ के बॉण्ड इस यौजना मे देश के विभिन्न राजनैतिक दलों को प्राप्त हुए जो चिंता का विषय हैं।  इस यौजना का सर्वाधिक लाभ देश या प्रदेश के सत्ताधारी दलों को मिला हैं। भाजप जो अपने आपको सुचिता और सत्य के पैमाने पर अन्य राजनैतिक दलों से अलग अनुशासित दल मानती है कैसे इस चुनावी बॉण्ड रूपी पाप मे भागीदार हुई? कल ट्वीटर और अन्य सोश्ल माध्यमों पर  राहुल गांधी सहित कॉंग्रेस के अन्य नेताओं ने नरेंद्र मोदी सरकार के इस चुनावी बॉण्ड योजना पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद हमला करते हुए, इलेक्टोराल बॉण्ड को रिश्वत और कमीशन लेने का माध्यम बताया!! नरेंद्र मोदी सरकार पर आरोप लगाते समय आर्यश्रेष्ठ श्री राहुल गांधी ये भूल गए कि इस भ्रष्ट चुनावी बॉण्ड योजना मे स्वयं काँग्रेस ने 1123 करोड़ रूपये प्राप्त किये!! माननीय राहुल क्या स्पष्ट करेंगे कि चुनावी बॉण्ड से प्राप्त 1123 करोड़ की यह धनराशि क्या "रिश्वत और कमीशन" नहीं हैं? बेशक भाजप चुनावी बॉण्ड के माध्यम से मिली धन राशि रूपये 6566 करोड़ के मुक़ाबले काँग्रेस को मिली धनराशि रूपये 1123 करोड़ से काफी कम है? पर रिश्वत, कमीशन रूपी ये चोरी तो चोरी ही हैं!! फिर, चोरी चाहे, छोटी हो या बड़ी?  इस असंवैधानिक निरस्त की गयी योजना की  लूट मे देश की सभी पंजीकृत राजनैतिक पार्टियां शामिल हैं, कहना अतिसन्योक्ति न होगी कि भारतीय राजनीति के इस  "हमाम मे सभी नंगे हैं"। राहुल गांधी को ये याद रखना होगा कि काँच के घरों मे रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते!! क्या ही अच्छा होता कि उन्होने  भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की तरह इस चुनावी बॉण्ड से एक पैसे का लाभ न लिया होता?

इस चुनावी बॉण्ड के विरुद्ध न्यायालय मे वाद दायर करने वालों मे  कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) प्रशंसा और बधाई की पात्र है जिसने इस काली चुनावी योजना को सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी और इस योजना से एक पैसे का भी लाभ नहीं लिया।  इसमे कोई दो राय नहीं कि साधारणतः आज भी कम्यूनिस्ट पार्टी के लोगो मे ईमानदारी देश की अन्य राजनैतिक दलों के मुक़ाबले कहीं ज्यादा हैं। मुझे अच्छी तरह याद है कि 1997 मे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव स्व॰ एबी वर्धन को उनके  रायपुर प्रवास पर, मै  अपनी छोटी, नॉन एसी मारुति 800 से रायपुर एयर पोर्ट से शंकर नगर लाया था। आज आवश्यकता इस बात की है कि देश के समस्त राजनैतिक दल, कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी की तरह आत्मचिंतन और आत्ममंथन कर खर्चीली चुनाव व्यवस्था मे भ्रष्टाचार और कालाबाजारी के विरुद्ध एकजुट हो लड़ाई  करें।  

विजय सहगल   

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