पोंगल शुभाकांक्षलु, (పొంగల్ శుభాకాంక్షలు
మరియు శుభాకాంక్షలు)
हैदराबाद मे अंतराष्ट्रीय पतंग और मिष्ठन उत्सव
की धूम
इन
दिनों पूरे भारत मे रवि फसल के आगमन पर मकर संक्रांति पर्व मनाया जा रहा हैं। देश
के विभिन्न भागों मे इस पर्व को अलग अलग नाम से पुकारा जाता हैं जो कि रवि फसल
अच्छे धन-धान्य पर ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने का उत्सव है। पंजाब मे इसे
लोहड़ी, उत्तर भारत मे संक्रांति या मकर संक्रांति,
पूर्वोत्तर मे विहु, दक्षिण मे पोंगल,
भोगी पोंगल और उत्तरायणी नामों से पुकारते हैं। इस उत्सव मे विभिन्न प्रान्तों के अपने
पारंपरिक रीतिरिवाज और परिधानों के साथ स्थानीय
सांस्कृति के दर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। जनवरी 14 एवं 15 2024 को, 3 दिन तक चलने वाले इस सामाजिक उत्सव
पोंगल या संक्रांति के साथ हैदराबाद के
पतंग और मिष्ठान उत्सव मे शामिल होने और उसे करीब से देखने का सौभाग्य
प्राप्त हुआ।
पोंगल
के पूर्व भगवान शिव के वाहन नंदी को
विभिन्न रंग-बिरंगी पोषकों मे सजा कर मेढक जिले से आये दो आदिवासी युवा
रामूजी, और राजू के साथ जा रहे बैलों से हुई। अपने परंपरागत वस्त्रों मे सुसज्जित
बैलों को देखना एक दिव्य अनुभूति देने वाला था, साथ ही दोनों
युवाओं द्वारा वध्य यंत्र वीणा (बीन) या शहनाई पर लोक गीत और
लोक संगीत की ध्वनि मन को मोहने वाली थी। इन दोनों युवाओं के बीन पर लोक संगीत की
धुन और "मालेष" तथा
"लक्ष्मण" नाम के बैलों के पैरों मे बंधे घुंघरू संगीत की ऐसी
मधुर स्वर लहरियाँ सुना रहीं थी कि मानों किसी दिव्य लोक मे विचरण कर रहे हों।
यूं
तो दक्षिण भारत मे शुभ-मंगल के प्रतीक के रूप मे हर घर मे रोज ही रंगोली बनायी जाती हैं पर आज विशेष अवसर संक्रांति या
पोंगल के अवकाश के कारण भी लोगो मे एक
अतिरिक्त उत्साह था। आज संक्रांति के दिन
15 जनवरी 2024 को अपने आवास के चारों तरफ, लगभग एक घंटे, निरुद्देश्य भ्रमण
के दौरान मैंने देखा, लगभग हर घर या हाउसिंग सोसाइटी के
सामने हल्दी के पीले पानी से साफ-सफाई की जा रही थी। मुझे लगता हैं कि पुराने
जमाने मे गाँव-कस्बों के कच्चे मिट्टी के घरों मे, किसी भी
तीज-त्योहार या धार्मिक उत्सवों के पूर्व
घरों को गाय के गोबर से लिपाई पुताई का स्थान अब शहरों मे हल्दी के पानी से
साफ-सफाई ने ले लिया हैं। हल्दी का पीला रंग गाय के गोबर से जमीन को लीपने का आभास
जो देता हैं। इस पीले रंग की पृष्ठभूमि पर सुंदर-सुंदर रंगोली बनायी गयी थी। कुछ जगह
रंगोली सिर्फ चावल के आटे से सफ़ेद रंग मे लाइनों की ज्योमिति आकार और कुछ जगह बिन्दुओं की सहायता से वृत्ताकार, अर्ध वृत्ताकार, चौकोर या वर्गाकार रूप मे बनायी
गयी थी। इन आकृतियों को देख कर रेखा गणित की याद हो आना लाज़मी था। लेकिन अधिकतर
घरों मे पोंगल के त्योहार के कारण, एक से एक सुंदर रंग
बिरंगी रंगोली बनायी जा रही थी। इन रंगोलियों के विषय प्रायः फल, फूल, पत्तियाँ, पक्षी तो थे
ही पर अनेकों जगह पतंग की रंगोली ने मन मोह लिया। हर घरों की महिलाएं और बच्चे इस
रंगोली बनाने मे मशगूल थे। लगभग हर रंगोली के मध्य मे गाय के गोबर से विषम संख्या
मे छोटे छोटे त्रिभुजाकार आकृति रक्खी गयी थी जिनमे घास के तिनकों को रोपा गया था।
लोगो ने बताया कि ये तिनके और गोबर की आकृति घरों मे नकारात्मक शक्तियों के प्रवेश
को रोकने की प्रतीक हैं। एक हाउसिंग सोसाइटी मे महिलाएं पारंपरिक लकड़ी के चूल्हे
मे आग की स्थापना कर पीतल की भगौनी मे रक्खे दूध को समूहिक रूप से स्थापित कर रही
हैं। उन लोगो के कथानुसार पोंगल के इस शुभावसर पर पवित्र अग्नि को चूल्हे मे
प्रज्वलित कर वे चावल की खीर बना रहे हैं जिसका प्रसाद सभी लोगो को ईश्वर के
आशीर्वाद के रूप मे वितरित किया जाएगा।
मकर
संक्रांति पर देश के अनेक हिस्सों मे त्योहार के परंपरागत रीतिरिवाज के अतिरिक्त
पतंग उड़ाने की परंपरा हैं। अहमदाबाद, दिल्ली के अतिरिक्त हैदराबाद, बेंगलुरु और
अन्य स्थानों पर भी ये परंपरा है। हैदराबाद मे भी इन दिनों दो दिवसीय
अंतर्राष्ट्रीय पतंग और मिष्ठान उत्सव की शुरुआत हुई। इस पतंग और मिष्ठन उत्सव ने
मुझे भी आकर्षित किया जिसके वशीभूत मैंने भी हाइटेक सिटी मेट्रो स्टेशन से परेड
ग्राउंड तक, हैदराबाद की मैट्रो मे बैठ कर अपने दिल्ली
प्रवास मे, दिल्ली मैट्रो की यादें ताज़ा कीं। सौभाग्य से
दोनों ही मैट्रो ब्लू लाइन की थी पर मेट्रो ट्रेन मे इतनी कम भीड़ देख कर अनुमान लगाना कठिन
न था कि यहाँ की मैट्रो लाइन को शायद "हैदराबाद की लाइफ लाइन" बनने मे
अभी काफी लंबा फ़ासला तय करना पड़ेगा?
परेड
ग्राउंड पर तो मानों पतंगो की बाढ़ आयी लगती दिखी। जितने मानव सिर मुंड दूर दूर तक
दिखाई दिये उनसे भी ज्यादा पतंगे आसमान पर जहां दिखाई दे रही थी। रेलि-पटरी पर जगह
जगह पतंगों की बिक्री, मांजे और सादा धागों की चर्खियाँ ऐसी याद दिला रहे थे जैसे दिल्ली के
पहाड़ गंज या कॅनाट प्लेस मे चाट-पकौड़ी के खोमचे दिखाई देते हों। लोगो, विशेषकर बच्चों मे पतंग का जबर्दस्त क्रेज़ था। लेकिन उम्मीद के परे फुटकर
बिक्री मे पतंगों का रूप रंग परंपरागत पतंगों जैसा ही था। बस अंतर ये था कि पुरानी
पतंगे कागज की थी और आज उसकी जगह प्लास्टिक और पन्नी ने ले ली। परेड ग्राउंड के एक
सिरे पर चारों तरफ लोहे की जालियों से घेर कर बहुत बड़े क्षेत्र को घेरा गया था, जिसमे सामान्य जनता का प्रवेश वर्जित था। इस ग्राउंड मे देश विदेश से आये
पतंगबाजों को उनकी अद्भुद और अनोखी पतंगों के प्रदर्शन हेतु आरक्षित रक्खा गया था जो
कि इस उत्सव के आकर्षण का मुख्य केंद्र था। जाली के चारों ओर हजारों की संख्या
मे दर्शक विभिन्न आकार और भांति-भांति की रचना, बनावट की पतंगों
का प्रदर्शन को देख रहे थे। पैराशूट के आकार की एक रंग बिरंगी पतंग जिसके बीच मे बड़ा
छेद था और जिसको सम्हालने के लिये 6-8 लोग लगे थे आकर्षण का मुख्य केंद्र लगी। काले
वनमानुष की आकृति वाली पतंग भी लोगो विशेषकर बच्चों को लुभा रही थी। कोबरा, ऑक्टोपस, मोटू हाथी, मिक्की, डोनाल्ड डक और डोरेमेन जैसे मिलते जुलते पात्रो की पतंगों को देख बच्चे ज्यादा
रोमांचित थे। इन सबसे अलग नीले आकाश मे हनुमान की मुद्रा मे हाथ जोड़े रंग बिरंगी पतंग
सभी के आकर्षण का केंद्र थी। एक पतंग उपर या नीचे जाते उड़ती कम पर सरसराहट के साथ आवाज
ज्यादा निकाल रही थी। तीन पतंगों को एक साथ
उड़ता देख मुझे अपने बचपन की याद हो आयी जब मैंने पाँच पतंगों को एक साथ बांध कर उड़ाया
था।
अब
तक चलते चलते काफी देर हो चुकी थी और धूप की चुभन भी अधिक थी तब कदम स्वतः ही ऊर्जा
की चाह और पंडाल की छाँव के लिये मिष्ठन उत्सव के पंडाल की ओर बड़े जहां सैकड़ों की संख्या
मे पंडाल लगे थे जिन पर विभिन्न तरह के मिष्ठन की प्रदर्शनी और बिक्री हो रही थी। पंजाब
की लस्सी, बंगाल का छैना, दिल्ली की बालूशाही, यूपी गुजिया, इमारती और जलेबी को देख के दिल तो ललचाया
पर शुगर और डाईबीटीज़ इस की इजाजत नहीं दे रहे
थे पर फिर भी मन से विद्रोह कर आखिर हमने गुजिया और ड्राइ फ्रूट लड्डू और आमरस मिठाई
का रसास्वादन किया आखिर ऊर्जा तो लेने ही थी।
इस
तरह हैदराबाद का मकर संक्रांति, पोंगल उत्सव मेरी सुंदर और सुखद स्मृतियों मे सादा
के लिये अंकित हो गया।
विजय
सहगल







7 टिप्पणियां:
अत्यंत सुंदर विवरण
नमस्कार आप द्वारा जहां मैं नहीं गया हूं वहां के बारे जानकारी मिलती है और प्रस्तुत करने की भाषा और अंदाज एक बार नहीं दो तीन बार पढ़ें बिना छोड़ नहीं सकते
दिलीप नेगी दिल्ली
Excellant commentary.
A great cultural fest having many festivals based on tradition , season and culture. Beautiful example of our Great nation's orchid. Lot of diversity but great unity,
Happy Festivities 💐
H K D JOSEPH, BHOPAL
अविस्मरणीय यात्रा
Very nicely described. Good luck.
Beautiful description of festival. Got some new informations.
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