बुधवार, 17 जनवरी 2024

डूबती काँग्रेस को, शंकराचार्य का सहारा

 

"डूबती काँग्रेस को, शंकराचार्य का सहारा"





इन दिनों काँग्रेस का चारों पीठों की शंकराचार्यों के प्रति सम्मान और आदर देखते ही बनता है। सनातन धर्म के इन मठों के आचार्य प्रमुखों के प्रति श्रद्धा, सत्कार और प्रशस्ति शायद ही काँग्रेस ने कभी सार्वजनिक मंचों से व्यक्त की हो। एक प्रैस कॉन्फ्रेंस मे काँग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने ढोंग और पाखंड की हदें पार कर दी, जब अपने वक्तव्य के दौरान, उन्होने  जितनी बार भी "शंकराचार्य" शब्द का उच्चारण किया, हर बार उनके प्रति बगुला भक्ति भाव प्रदर्शित करने हेतु   अपने दोनों हाथों से कान को छुआ। आज जो काँग्रेसी प्रवक्ता पवन खेड़ा, अधूरे मंदिर निर्माण का आड़ लेकर सनातन धर्म मे शंकराचार्यों की सर्वोच्च सत्ता का कथन करते नहीं अघाये, क्या उन्हे याद नहीं कि काँग्रेस के सत्तासीन रहते, कांची मठ के 70 वर्षीय  शंकराचार्य स्व॰ जयेन्द्र सरस्वती को हत्या के एक झूठे मुकदमे मे तमिलनाडू पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेजा था? काँग्रेस उस समय क्यों मौन थी? उन दिनों उनके साथ एक दुर्दांत अपराधी से भी वदतर व्यवहार किया गया था। विदित हो कि 11 नवंबर 2004 मे, चार पीठों मे से एक दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के चिकमंगलूर जिले मे स्थित श्रेंगेरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती को हत्या के एक झूठे मामले तमिलनाडू पुलिस ने हैदराबाद से गिरफ्तार किया था।  9 साल की ज़लालत भरे व्यवहार के बाद 2013 मे अदालत ने उन्हे सभी आरोपों से मुक्त कर ससम्मान रिहा किया था। यहाँ यह लिखना अतिशयोक्ति न होगी कि उस समय केंद्र मे कॉंग्रेस शासित श्री मनमोहन सिंह की सरकार थी और उन दिनों श्रीमती सोनिया गांधी की  सत्ता मे  सर्वोच्च शक्ति से कौन वाकिफ नहीं था।

कॉंग्रेस का  सनातन धर्म और हिन्दू  साधू, संतों के प्रति छद्म प्रेम, कूट आस्था और मिथ्या  विश्वास की एक बानगी और देखिये जब इन्होने संत महात्माओं के अहिंसक और लोकतान्त्रिक मांगों पर कुठराघात कर गोली चलवाई थी। सारा देश इस बात से भली-भाँति परिचित है कि श्रीमती इंद्रा गांधी की कॉंग्रेस सरकार के शासन काल मे 7 नवंबर 1966 को,  संत स्वामी  श्री करपात्री जी महाराज के नेतृत्व मे, गौ हत्या पर प्रतिबंध की मांग को लेकर संसद के बाहर प्रदर्शन कर रहे साधू संतों के ऊपर गोलियां चलवाई थी। लोगो का कहना हैं कि इस घटना मे अनेकों साधुओं की हत्या हुई थी। अपने वक्तव्य मे कोंग्रेसी प्रवक्ता ने श्रीराम मंदिर के अपने बहिष्कार को न्यायोचित ठहराते हुए, चारों पीठों के शंकरचार्यों  के उस तथाकथित वक्तव्य को उद्धृत किया कि अधूरे बने मंदिर मे भगवान की प्राण प्रतिष्ठा शास्त्र सम्मत नहीं है। आदरणीय शंकरचार्यों के तथाकथित  वक्तव्यों की  आड़ लेकर दरअसल काँग्रेस, सनातन धर्मलांबियों से,  मंदिर के बहिष्कार के अपने निर्णय से, 'मुंह छुपाने' का असफल प्रयास, ठीक उसी तरह कर रही हैं जैसे डूबते को तिनके का सहारा!! जब चारों शकरचार्यों के मनगढ़ंत वक्तव्यों पर विवाद बढ़ा  तो शृंगेरी शारदा पीठ और द्वारका शारदा पीठ की ओर से ब्यान आया कि उन के मठों से राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के विरोध के आरोप मनगढ़ंत और झूठे हैं। कॉंग्रेस के इस आरोप, कि अधूरे मंदिर मे प्राण प्रतिष्ठा शास्त्रीय नहीं है के खंडन मे देश के अनेकों धर्माचार्यों और धर्मगुरुओं तथा मंदिर निर्माण के इंजीनियर सोमपुरा बंधुओं ने सोमनाथ मंदिर और अंबाजी मंदिर के फोटो सहित उदाहरण  देकर अयोध्या मे राम मंदिर के गर्भ गृह मे भगवान के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा को  शास्त्र सम्मत ठहराया है। मंदिर के शिखर पर कलश की स्थापना मंदिर की पूर्णता का प्रतीक होगा जो भविष्य मे किया जा सकता हैं।  दरअसल कॉंग्रेस की समस्या ये हैं कि सत्ता प्राप्ति हेतु यदि वे मोदी विरोध करें या धर्म सम्मत तर्क दे तो किसी को कोई आपत्ति नहीं, लेकिन येन केन प्रकारेण, सत्ता की छटपटाहट मे यदि ये मनगढ़ंत, छद्म और कुतर्क दे कर राजद्रोह, धर्मद्रोह या देशद्रोह कर सनातन धर्म के इस दिव्य और भव्य राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम मे अनावश्यक, झूठे और मनगढ़ंत  अबरोध पैदा करें  तो ये दुःखद और दुर्भाग्य पूर्ण हैं।            

यूं भी, आदि शंकराचार्य और उनके द्वारा स्थापित चार पीठों ने  अपने आपको  सनातन धर्म की शिक्षाओं और धर्मग्रंथों के चिंतन मनन और सनातन धर्म की पताका को ऊंचा रख, फैलाने, फलने फूलने तक ही सीमित रक्खा। इन पीठों ने सनातन धर्म के विचार भिन्नता और अभिमत से अपने आप को दूर रक्खा हैं। आदि शंकराचार्य ने अपने जन्म 788 विक्रमी संवत (1235 ईसा वर्ष पूर्व) से जीवन पर्यंत  भारतीय दर्शन और सनातन धर्म के धर्म ग्रन्थों, वेद, उपनिषद  आदि के भाष्य का लेखन कर  सनातन धर्म के ग्रन्थों को अक्षुण रख एक महान और सरहनीय काम किया। हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रन्थों, वेदों, पुराण और उपनिषदों के पठन पाठन हेतु उन्होने सारे देश का भ्रमण उपरांत चार पीठों एवं सनातनी धर्मावलम्बियों हेतु चारों दिशाओं मे चार धाम यथा पूरब मे जगन्नाथ पूरी, दक्षिण मे रामेश्वरम, पश्चिम मे  द्वारका  एवं उत्तर मे बद्रीनाथ  की स्थापना की, जिन्हे प्रत्येक हिन्दू चारधाम के नाम से जनता हैं और जीवन मे एक बार इन तीरथों की यात्रा की अभिलाषा अपने मन मे रखता हैं एवं इन तीर्थों की यात्रा  करना अपना पवित्र धार्मिक कर्तव्य मानता हैं, तब काँग्रेस द्वारा चारों शंकरचार्यों का नाम लेकर अयोध्या मे राम मंदिर की प्राणप्रथिष्ठा मे हिन्दू धर्म के मानने वालों मे भ्रम फैलाने का कार्य अनैतिक और अधार्मिक हैं, जो निंदनीय भी हैं। आज आवश्यकता, इस बात की हैं कि इन ऐतिहासिक क्षणों को सारे देश वासियों के साथ जाति, धर्म और प्रांत से परे सभी  राजनैतिक दलों को  उत्साह, उमंग और हर्षोल्लास के साथ शांति पूर्वक मनाना चाहिये।

जय श्री राम।

विजय सहगल

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