शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और कॉंग्रेस का बहिष्कार

 

"राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और कॉंग्रेस का बहिष्कार!!"





इन दिनों सारे देश मे अयोध्या मे भगवान श्री राम के मंदिर के उद्घाटन और भगवान के बाल रूप  के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा की चर्चायेँ चारों ओर सुनाई और दिखाई दे रही हैं मानों  सारा देश राम मय हो गया हो। हो भी क्यों न 500 साल के लंबे संघर्ष के बाद 22 जनवरी 2024 को वो दिन आया है जब भगवान श्री राम अपनी जन्मभूमि मे अपने भव्य और दिव्य मंदिर  मे प्रतिष्ठित होंगे। इस दिन सारे देश मे हर्षोल्लास के बीच एक बार फिर दीपावली जैसा आयोजन होगा जैसे त्रेता युग मे वनवास के उपरांत भगवान श्रीराम अपनी भार्या माता जानकी और  अपने अनन्य भक्त श्री हनुमान के साथ अयोध्या पधारे थे। उन दिनों अयोध्या वासियों को श्री राम के स्वागत के लिये किसी ने आमंत्रित नहीं किया था अपितु ये आमंत्रण स्वस्फ़ूर्त था, कुछ ऐसी ही स्वांतः सुखाय, स्वस्फ़ूर्त भावनाएं देश के आम जनमानस के मन मे आजकल  उमड़ रहीं है जिसकी परिणति 22 जनवरी 2024 को देखने को मिलेगी।

खेद और अफसोस है कि काँग्रेस का आज इस कार्यक्रम मे शामिल न होने और इस कार्यक्रम का बहिष्कार करने का निर्णय बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं। अयोध्या मे 22 जनवरी 2024 को श्री राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम मे कॉंग्रेस नेत्री श्रीमती सोनिया गांधी, काँग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे एवं अधीर रंजन के  बॉयकॉट ने थोड़ा चौंकाया जरूर पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि काँग्रेस ने  तो सदा से ही देश के बहुसंख्यक हिन्दू और सनातन धर्मलाम्बियों के  विरोध मे कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, जिसकी परिणति,  काँग्रेस का सुप्रीम कोर्ट मे वह शपथ पत्र हैं जिसमे उसने भगवान राम को एक काल्पनिक पात्र बताया था।      

लेकिन देश के इस ऐतिहासिक मंगल और पवित्र अवसर पर भी कुछ विघ्नसंतोषी राजनैतिक दल के महारथी, अपने संकुचित और पूर्वाग्रही सोच के चलते, क्षुद्र राजनीति करने से बाज नहीं आए। श्री राम मंदिर के शुभारंभ अवसर पर आयोजन समिति के  आमंत्रण को लेकर अपनी कुटिल राजनीति शुरू कर दी। जब तक आमंत्रण पत्रिका नहीं मिली थी, तब इन लोगो ने  घड़ियाली आँसू बहा कर बुलावा न आने का उलाहना देते  रहे और जब निमंत्रण पत्र प्राप्त हो गया तो अपने कुत्सित राजनैतिक स्वार्थों के वशीभूत कार्यक्रम से किनारा करने की तरकीबें ढूंढने मे लगे हैं। अगर इन आर्यश्रेष्ठों के दिलों मे स्वराष्ट्र,  स्वधर्म और स्वाभिमान की लेश मात्र भी भावनाएं होती तो, बिना किसी आमंत्रण के इस यज्ञाहूति मे अपने कर्तव्यों के समर्पण का बोध कराने हेतु सदा  तत्पर रहते? देश मे होने वाले राष्ट्रीय पर्वों, महापर्वों और सांस्कृतिक क्रियाकलापों यथा पवित्र तीर्थ यात्राओं, पूर्ण कुम्भ और अर्ध कुंभों के पवित्र स्नानों पर कौन किसको आमंत्रण देता हैं? इसके बावजूद भी ऐसे धार्मिक अवसरों पर बिना किसी आमंत्रण और निमंत्रण के सनातन धर्मी अपना धार्मिक दायित्व समझ,  देश के दूर-दराज़ स्थित गाँव, कस्बों, शहरों और महानगरों से करोड़ो करोड़ लोग पवित्र तीर्थ स्थलों पर एकत्रित होकर धर्मलाभ कैसे  लेते।                      

देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी काँग्रेस जिसकी बुनियाद  "गांधी के रामराज्य" की कल्पना से प्रेरित रही, कैसे राममन्दिर के राह मे, काँग्रेस ने हमेशा कोर्ट कचहरियों मे कानूनी  रोड़े अटकाये और अबरोध खड़े किये जिससे सारा देश वाकिफ है। स्वतन्त्रता के बाद से दशकों तक देश पर शासन करने वाली पार्टी काँग्रेस ने तुष्टि करण और हर स्तर पर कुशासन और अराजकता के चलते  देश के बहुसंख्यक समाज को हमेशा दोयम दर्जे के  नागरिक की तरह व्यवहार किया जिसका नतीजा आज उसे भुगतना पड़ रहा है। काँग्रेस के दिग्विजय सिंह अपनी अनर्गल और असंयत वक्तव्यों के चलते राम मंदिर के विग्रहों पर सवाल उठा कर असहजता और अनिश्चितता फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। काँग्रेस के एक नेता बी के हरिप्रसाद ने तो बीजेपी पर राममन्दिर के उद्घाटन के पूर्व दंगों की आशंका व्यक्त कर दी? उनकी सूचना के इस गंभीर  आधार की जांच सरकार को करानी चाहिये? कहीं ये भी तो मंदिर की प्राण प्रतिष्ठिता के पूर्व अशांति फैलाने का एक घिनौना प्रयास तो नहीं है? 

इंडि गठबंधन के सारे दल और उनके अपरिपक्व नेता अपने बचकाने वक्तव्यों से सनातन धर्म आपत्तीजनक आरोप लगा कर राममन्दिर के इस पवित्र कार्यक्रम मे विघ्न डालने का कुप्रयास कर रहे हैं। कभी वे हिन्दू धर्म को धोखा बतला कर  और कभी ",मंदिर का मतलब मानसिक गुलामी का मार्ग बतला" कर अपनी मूढ़ता और अज्ञानता का परिचय दे कर देश के माहौल को खराब करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। सारी दुनियाँ और देश से अपनी वजूद की लड़ाई लड़ने वाले वामपंथी दलों के सूरमा, छद्म धर्मनिरपेक्षता और  तुष्टीकरण के चलते अपने चेहरों पर नकली नकाब ओढ़ कर श्री राम मंदिर के शुभारंभ पर बहुसंख्यकों के इस बड़े सांस्कृतिक और धार्मिक समारोह से दूरी बनाकर क्या उनका अनादर नहीं कर रहे? क्या विभिन्न धर्मावलम्बियों मे इस तरह की भेद-भाव पूर्ण नीति भारतीय लोकतान्त्रिक नीतियों के अनुरूप है?

एनसीपी का एक मंदबुद्धि नेता हिंदुओं की भावनाओं को आहत कर उन्हे मांसाहारी बतलाने की असमय, अपवित्र कोशिश कर रहा हैं। अधम और घृणास्पद  सोच का धनी ये एनसीपी नेता अपने आप को कृषि वैज्ञानिक मान अपने कुतर्कों से सिद्ध करने का यह प्रयास किया कि राम के वनवास के समय चावल पैदा ही नहीं होते थे? शायद इस अज्ञानी ने सनातन धर्म के सभी क्रिया कलापों और संस्कारों मे कदम कदम पर मस्तक पर चन्दन और अक्षत से तिलक करने  के उल्लेख के बारे मे कुछ पढ़ा होता तो सनातन धर्म को आहत करने के  इस तरह के कुप्रयास न किये होते।

हैदराबाद संसदीय सीट से यूं तो एआईएमआइएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी हैं जो  स्वयं  कानून के एक विख्यात वैरिस्टर हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की एकमत से  सबूतों और गवाहों के आधार मे मंदिर के पक्ष मे निर्णय दिये जाने के बावजूद, मुस्लिम युवाओं को निर्णय के खिलाफ भड़काने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन सूचना विज्ञान के इस युग मे पढ़ी लिखे कम्प्युटर सेवी मुस्लिम  युवा उनके झांसे मे अब आने वाले नहीं हैं।

स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेता, जो रामचरित मानस की एक चौपाई/छंद  को लिखने की बात तो दूर उसे बिना किसी त्रुटि के ठीक से पढ़ भी ने सके वो विक्षिप्त चित्त मानसिकता और नकारात्मक सोच का धनी नेता, गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस की चौपाई मे संशोधन करने  का अनर्गल आग्रह करता है!! मै नहीं जनता स्वामी प्रसाद  किस धर्म या संप्रदाय को मानते है? लेकिन एक बात सूरज की तरह सत्य हैं कि जब वे सनातन हिन्दू धर्म के "सत्व" और "मर्म" को  इस जीवन मे नहीं समझ सके तो अन्य धर्मों के "सारांश" या "सार" को अपने इस शेष, अल्प  जीवन मे तो क्या समझ पाएंगे?    

आशा की जानी चाहिये कि भारत की सनातनी सांस्कृति, सभ्यता  और देश की अस्मिता के प्रतीक भगवान राम के मंदिर की प्राण प्रतिष्ठिता के इस पवित्र और भव्य कार्यक्रम मे राजनैतिक, धार्मिक और जाति भेद से परे सारे देश को एक साथ खड़े होंगे। यदि इसके बावजूद ये राजनैतिक दल अपनी अधम सोच से बाज नहीं आये तो देश की 140 करोड़ जनता आने वाले 2024 के चुनावों मे इन्हे ऐसा सबक सिखायेगी, जिसकी सीख उन्हे दशकों तक याद रहेगी।

विजय सहगल   

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

सहगल जी
आपने अपने ब्लॉग मे बहुत कलात्मक तरीके
से व्यंग्यात्मक चित्रण प्रस्तुत किया है, अपने को प्रभु राम से अलग दिखाते हुए किसी दूसरे लोक की सीमाओं पर इस प्रकार जकड़ कर बैठ गए कि भूल का एहसास अहंकार के अंधेरों मे खो रहा है
आपने विविध प्रस्तुतियों का संकलन कुछ इस तरह किया है कि योद्धा परास्त होते दिख रहे है
संजय मेहरोत्रा