गुरुवार, 30 नवंबर 2023

सिल्कयारा सुरंग के सबक

 

"सिल्कयारा सुरंग के सबक"




12 नवम्बर 2023 को जब देश भर मे कार्तिक मास की आमवस्या की रात के अंधेरों  पर दीपावली का प्रकाश हावी हो, अपना प्रकाश चारों ओर फैला रहा था तभी उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले  मे स्थित यमनोत्री राष्ट्रीय राज मार्ग पर सिल्कयारा सुरंग मे कार्यरत 41 श्रमिक  मौत के भयावह  अंधेरे  से जूझ रहे थे। अचानक आयी इस विपदा की खबर ने न केवल इन श्रमिकों अपितु इनके परिवारों जनों के जीवन को  भी संकट के स्याह बादलों ने घेर लिया और देश के सामान्य जनों मे एक चिंता एवं दुःख की लहर फ़ेल गयी। एक साथ इतने लोगो के जीवन का संकट होने से शासन प्रशासन सहित दिल्ली की केंद्रीय सरकार को सकते मे ला दिया। आनन फानन मे इन मजदूरों को बचाने के प्रयास शुरू तो हुए लेकिन प्राकृतिक आपदा  की तीव्रता गहन थी, शुरू किये गए प्रयासों मे एक के बाद एक बधाएं आने लगी, इसके बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय के नेतृत्व मे सुरंग मे फंसे मजदूरों को बचाने हेतु देश और दुनियाँ से हर मुमकिन तकनीकि, और उपकरणों की निर्वाध उपलब्धि सुनिश्चित की गयी। देश और विदेश  के कोने कोने से भूगर्भ वैज्ञानिकों और आपदा  विशेषज्ञों को घटना स्थल ला कर उनको भी संकट के समाधान हेतु  हर संभव साधन उपलब्ध कराये गए। इस अभियान मे प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा अभियान मे लगी एजन्सियों के बीच आपसी सूझ-बूझ और समन्वय काबिले तारीफ था। बचाव और राहत कार्य मे इस तरह के कार्यों मे निपुण  भारतीय थल सेना, वायु सेना  सहित एनडीआरएफ़, एसडीआरएफ़, बीआरओ, आरवीएनएल, एसजेवीएनएल, ओएनजीसी, आईटीबीपी, एनएचएआईडीसीएल, टीएचडीसी सहित राज्य सरकार के अनेकों अधिकारियों और कर्मचारियों की महति भूमिका रही।         

जिस संकट का समाधान हल करने के प्रयास हेतु 900 मिमी॰ (2 फुट 11.43 इंच) पाइपों के माध्यम से सिल्कयारा सुरंग की 41 पीढ़ितों  तक पहुँचने के प्रयास मशीनों के माध्यम  से  जहां असफल हो गए वहाँ भारतीय सेना की इंजीन्यरिंग रेजीमेंट और मद्रास इंजीन्यरिंग ग्रुप के जवानों का सराहनीय सहयोग भी प्रशंसनीय रहा। इस विचार को धरातल पर देखने के लिए, जब आप जमीन पर 2 फुट 7.5 इंच के गोल घेरे मे बैठ कर देखें और कल्पना करें कैसे समाज के साधारण स्तर के चंद व्यक्तियों ने अपनी जान जोखिम मे डाल, 800 मिमी चौड़े गोल पाइप मे घुटनों के बल रेंगते  हुए 70-80 मीटर अंदर जाकर पुनः 14-15  मीटर, आगे  और  खुदाई  करते हुए 17 दिनों से सुरंग मे फंसे 41 श्रमिकों तक पहुँचे होंगे? कल्पना मात्र से ही एक अदृश्य भय और मौत के डर से रोंगटे खड़े हो जाते हैं, तब इन बहादुर "रैट माइनर" अर्थात जो चूहों की तरह पहाड़ को खोद कर सुरंग बनाने मे माहिर जवानों ने कितने  धैर्य और साहस से, कैसे इस  कठिन, दुरूह और श्रमसाध्य कार्य को अंजाम दिया होगा? जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। सिल्कयारा सुरंग खोदने के दौरान हिमालय श्रंखला के पहाड़ दरकने के कारण इन 41 मजदूरों के जीवन मे आये मौत के संकट से न केवल केंद्रीय सरकार के अनेकों विभागों और कार्यालयों के बीच समन्वय की भी प्रशंसा की जानी  चाहिए कि इस बचाव कार्य मे लाल फीताशाही आड़े नहीं आयी जिसके परिणामस्वरूप  इन पीढ़ित मजदूरों उनके परिवार जनों  के साथ सारे देश के लिए एक सुखद संदेश ले कर आये।

जहां एक ओर विभिन्न विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों का प्रत्यक्ष और परोक्ष सहयोग, बधाई और सम्मान का  पात्र हैं, वहीं सुरंग मे फंसे उन 41 श्रमिकों के धैर्य, साहस और बहदुरी की भी सराहना करनी पड़ेगी जिन्होने 17  दिनों के 24सों घंटे मौत के तांडव को अपनी आँखों के सामने घटते देखा होगा। शुरू के दिनों मे जब इन मजदूरों का संपर्क शेष दुनियाँ से कटा रहा, खाने के भोजन और पीने के पानी का अभाव, अपनों की यादों के बीच वेबस और असहाय!! अपने दुर्भाग्य पर अफसोस और उदासी ने इन्हे एक पल के भी लिए चैन से सोने नहीं दिया होगा? एक झपट्टे से यम के दूतों द्वारा जीवन का  हरण और तिल तिल कर मरने का  अहसास, दोनों ही मृत्यु के एक रूप अवश्य हैं पर दोनों के खौफ, रौद्र रूप और  भयावहता, मे जमीन आसमान का अंतर हैं, जिसे इन 41 श्रमिकों ने जीते जी सिकल्यारा सुरंग के अंदर 17 दिन तक जिया, महसूस किया और साक्षात देखा भी!! नमन है इन श्रमवीरों की बहदुरी और साहस को। सुरंग मे फंसे इन श्रमिकों ने बाद मे बताया कि कैसे वे अपने को स्वस्थ रखने के लिए, सुरंग के अंदर पैदल चल कर चहल-कदमी करते थे और योगा की मदद से अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ को मजबूत करते हुए एक दूसरे की मदद कर हौसला अफजाई करते थे। संकट के इन 17 दिनों मे एक सीमित अंधेरे स्थान मे इन श्रमवीरों के हौसले, हिम्मत और पराक्रम की महज कल्पना ही की जा सकती है।

नये और विकसित भारत के इतिहास मे 28 नवम्बर 2023 का दिन स्वर्ण अक्षरों  लिखा जायेगा जब राष्ट्रीय आपदा राहत अभिकरण के नेतृत्व मे उत्तराखंड के सिल्कयारा सुरंग मे 17 दिन से फंसे 41 श्रमिकों को तमाम बाधाओं, अबरोधों और चुनौती पूर्ण विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सफलता पूर्वक निकाल लिया गया। हमे इस बात की प्रसंशा करनी ही पड़ेगी कि  मोदी सरकार ने एक बार पुनः सिद्ध कर दिया कि देश या विदेश मे  आपदा या संकट के समय मे देशवासियों  को बचाने या राहत पहुँचाने मे  सरकार कोई कोर कसर वाकी नहीं छोड़ेगी।

 

देश की उन्नति,  विकास और उत्थान के लिए जहां पहाड़ों को चीर कर सड़क राजमार्ग और  रेल पथ का निर्माण लगातार किया जाता रहेगा और इन  निर्माण कार्यों के फलस्वरूप रास्ते मे  आपदाएँ और विपदाएं भी साथ साथ  आएंगी और इन चुनौतियों का सामना करने के राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल जैसे संगठन देश के लिए सदा तत्पर खड़े रहेंगे। पर एक बात निश्चित है कि उत्तराखंड की सिल्कयारा सुरंग के निर्माण मे सुरक्षा मापदंडों की अनदेखी की गयी। इतनी  बड़ी और विशाल सुरंग मे राजमार्ग बनाने का कार्य निश्चित ही खतरनाक और जोखिम भरा हैं। एक आम आदमी की सोच के तरह मेरा मानना हैं कि सुरंग निर्माण मे कार्यरत श्रमिकों, इंजीनियरों और अन्य कार्यरत व्यक्तियों की सुरक्षा का मुद्दा सर्वोपरि होना ही चाहिये था और  किसी भी प्रकृतिक आपदा के समय मुख्य रास्ते के साथ आकस्मिक वैकल्पिक मार्ग को होना इस सुरंग मे सुनिश्चित नहीं किया गया, जो एक बड़ी भरी चूक थी। ऐसे कार्यों मे किसी अनिष्ट और आपदा  की आशंका हमेशा बनी रहती हैं, तो क्यों नहीं व्यक्ति या व्यक्तियों के समूहों के लिए कुछ निश्चित दूरी पर सुरक्षित भोजन पानी के भंडार और वैकल्पिक मार्ग के लिए कुछ मानदंड निश्चित नहीं किए जाने चाहिये थे? सुरंग निर्माण के वैकल्पिक मार्ग के रूप मे क्यों नहीं हजार-बारह सौ मिमी के पाइप को भी साथ साथ  बिछाना सुनिश्चित किया गया। विशेषज्ञों द्वरा निश्चित ही सुरंग निर्माण कार्य शुरू करने के पूर्व विस्तृत दिशा निर्देश दिये गए होंगे जिनकी अवेहलना इस सुरंग निर्माण मे की गयी? अब आवश्यकता इस बात के हैं कि भविष्य मे होने वाले निर्माण मे सुरक्षा मानदंडों का अनुपालन शक्ति से लागू किया जाय ताकि इस तरह मानव जीवन को संकट मे डालने वाली घटनाएँ दुबारा न हों।                      

विजय सहगल

रविवार, 26 नवंबर 2023

दिव्यांग ऑटो चालक

 

"एक बहादुर दिव्यांग ऑटो चालक-उदय सिंह"





27 अक्टूबर 2023 के प्रातः भ्रमण की बापसी मे शारदा बाल ग्राम के रामकृष्ण विध्या मंदिर  के गेट पर मैंने एक ऑटो को देखा जो स्कूल के बच्चों को उनके घर से लाकर स्कूल मे छोड़ने आया था और ऑटो ड्राईवर ने अपने दाहिनी तरफ एक बड़ा डंडा रक्खा हुआ था। यूं तो चंबल क्षेत्र मे कंधे पर बंदूक, जेब मे कट्टा रखना और देखना आम बात हैं तो डंडे को रखना और  देखना कोई अजूबा न था, पर उस ऑटो ड्राईवर के बगल मे रखे एक डंडे को देखना मेरे लिए अनोखा और अनूठा था। बच्चों को छोड़कर बापस जा रहे ऑटो को जब मैंने हाथ के इशारे से रोका और उस  25-26 साल के ऑटो ड्राईवर से उसके बगल मे रक्खे डंडे के बारे मे पूंछा? लेकिन अचानक  उसके पैरों को देख शंका का समाधान होते देर न लगी क्योंकि उस नौजवान का  बाएँ पैर मे लकवा अर्थात पक्षघात हुआ था। उस युवा के बारे मे कुछ और जानने की जिज्ञासा के वशीभूत मैंने उससे बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अपने बारे मे बताने का आग्रह किया। उसने अपना नाम उदय सिंह धाकड़ और पोरसा, जिला मुरैना का रहवासी  बताया, उसने बताया कि बचपन मे ही उसके पैर मे लकवा लगने  के कारण शारीरिक विकलांगता को प्राप्त हुआ। जब मैंने उसे  बताया कि मै भी अपनी बैंक सेवा के दौरान पोरसा मे पदस्थ था, तो हम दोनों के बीच एक नई आत्मीयता ने स्थान ले लिया। अब हम दोनों कुछ और सहज और अपनत्व महसूस कर रहे थे।

जब मैंने उदय से पैरालिसिस के कारण पैर मे चलने-फिरने मे होने वाली परेशानी और उसके ऑटो चालन के व्यवसाय के विपरीत संयोजन और संयोग के बारे मे पूंछा?  ऑटो चालन आपकी शारीरिक विकलांगता मे अबरोध या आड़े नहीं आता? तब उदय के चेहरे पर आए आत्मविश्वास और साहस के भाव को मैंने स्पष्ट रूप से उसकी आँखों मे देखा। उसने उत्साह पूर्वक बताया कि वह इसके पूर्व मुंबई के शांताक्रूज क्षेत्र मे साढ़े चार तक ऑटो चला चुका हैं। उसकी एक बात ने मुझे और भी आश्चर्य और अचंभा हुआ कि उसने ऑटो चालन के पूर्व लगभग दो साल अहमदाबाद मे रंगाई-पुताई और पेंटिंग का काम किया। मै हैरानी और विस्मय से उसकी तारीफ किए बिना न रह सका और उदय से बोला, किस मिट्टी के बने हो तुम!! जहां सामान्य लोग भी पेंटिंग जैसे मेहनती काम मे दीवार पर चढ़ने-उतरने जैसे कठिन और श्रम-साध्य काम से बचते हैं और तुम हो कि  शारीरिक विकलांगता के चलते रंगाई-पुताई का काम कैसे कर पाये  होगे? लेकिन उदय तो कुछ अलग ही मिट्टी का बना नज़र आया जिसमे हिम्मत  जज़्बा, साहस और दिलेरी कूट-कूट कर भरी थी।   नियमानुसार उसके पास क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय से प्राप्त वाहन चालन का लाइसेन्स और ऑटो चलाने का परमिट भी हैं। उसे अपनी शारीरिक विकलांगता से कभी कोई भी परेशानी नहीं हुई और न ही सरकार, समाज से किसी तरह की शिकायत!! उसे ऑटो चालन के रोजगार ने  जीवन मे  मिलने वाली प्रसन्नता और खुशी दी साथ ही  उसे इस अध्यवसाय से  होने वाली आय से जीवन यापन मे ठीक ठाक आर्थिक आमदनी से मिलने वाली आत्म संतुष्टि भी दी।

10वी पास उदय ने बताया बचपन मे यार दोस्तों ने कभी उसकी शारीरिक दिव्यांग्ता का कभी उपहास नहीं उड़ाया अपितु हमेशा एक दोस्त की तरफ हमारे साथ खड़े रहे। मुंबई के शांताक्रूज क्षेत्र मे ऑटो चालान से लगभग दो हज़ार रुपए तक के अच्छी कमाई हो जाती थी। महाराष्ट्र पुलिस ने भी ऑटो चालन मे कभी "चालान" या रुपए के  लेन देन मे कभी परेशान न करने की बात कही क्योंकि मुंबई मे ऑटो चलाने का लाइसेन्स सिर्फ मुंबई परिवहन विभाग द्वारा जारी लाइसेन्स के आधार पर ही दिया जाता हैं जो उसने मुंबई मे रहते हुए प्राप्त किया क्योंकि देश के अन्य परिवहन विभाग द्वारा जारी  लाइसेन्स के आधार पर ऑटो/टैक्सी चलाने की  अनुमति मुंबई मे नहीं हैं।  

जैसा कि इस व्यवसाय मे प्रायः होता हैं, ऑटो चालकों को आए दिन क्षेत्र की पुलिस से सामना करना पड़ता हैं और प्रायः उनके दुर्व्यवहार और अपमान का कोपभाजन बनना ऑटो ड्राईवरों के जीवन का हिस्सा हैं। जब उदय से मैंने ऐसी किसी घटना के बारे मे पूंछा? जिसने शायद  उसके मन के  दुःख और अंतर्मन को कष्ट दिया हो? सहसा उसने आसमान की तरफ देखा, मानों कहीं इस अनंत  आकाश की गहराइयों मे खो गया हो!!  उदय ने बताया कि एक बार ड्राईवर की यूनीफ़ोर्म न पहनने पर एक पुलिस कर्मी ने ये जानते हुए भी कि वह विकलांग हैं, बिना चालान काटे,  रिश्वत के रूप मे पाँच सौ रुपए ले लिए। उसके हाव भाव और चेहरे पर लिखी  इबारत को  देख इस बात का सहज ही अंदाज़ लगाया जा सकता था कि उस दिन उसके आत्मसम्मान और स्वाभिमान को कितनी चोट पहुंची होगी!!       

जब मैंने उदय से शारीरिक रूप से दिव्यांग के लिए चलाई जा रही योजनाओं के लाभ तथा उसके द्वारा चलाये जा रहे  ऑटो की योजना आदि का बारे मे पूंछा तो उसने बताया के उसने ये ऑटो बिना किसी सरकारी योजना या अनुदान के सीधे बैंक से ऋण ले कर लिया हैं क्योंकि सरकारी योजनाओं मे लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार के चक्कर मे पड़ने से समय की बर्बादी को देखते हुए सीधे ही बैंक से ऋण लिया यध्यपि इस ऑटो ऋण मे ब्याज आदि की कोई छूट उसे नहीं मिली और पाँच वर्ष मे लगभग तीन लाख के ऋण के लिए ब्याज सहित उसे पाँच लाख रुपए चुकाने पड़ेंगे। ये जानकार दुख तो होता हैं कि सरकारी सुविधाओं और योजना का लाभ आज भी सुपात्र व्यक्तियों को मिलने मे कदम कदम बाधाए और अवरोध,  राग दरबारी की याद दिलाते नज़र आते हैं। लेकिन खुशी इस बात की हैं कि उदय सिंह जैसे नौजवान बिना किसी शिकायत और  प्रत्याशा के, दिव्यांग्ता का रोना रोने से दूर अपने पुरुषार्थ के भरोसे  जीवन  की राह पर निर्भीकता और निडरता से संघर्ष की राह पर आगे बढ़ रहा  हैं।

जब मैंने उदय सिंह से सोश्ल कई घुम्मकड़ी, पर्यटक ग्रुप से जुड़े होने की बात बताई और उससे पूंछा कि यदि हमारे घुम्माक्कड़ी ग्रुप के सदस्यों का  ग्वालियर भ्रमण का कार्यक्रम बने तो तुम्हें उन सदस्यों को ग्वालियर के पर्यटक स्थलों के दर्शन कराने मे कोई दिक्कत तो नहीं होगी? उसने कहा नहीं सर! मुझे खुशी होगी कि उन आए हुए अतिथितियों को ग्वालियर दर्शन कराने मे सहभागी हो सकूँ। मैं उसकी अनुमति से उसका मोबाइल नंबर 9664772156 आपके सब के साथ इस अपेक्षा के साथ सांझा कर रहा हूँ कि ग्वालियर प्रवास के दौरान इस बहादुर नौजवान की सेवाओं का लाभ  ग्वालियर भ्रमण के दौरान अवश्य लेंगे।       

अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद जीवन के पथ पर मेहनत और ईमानदारी से जीवकोर्पाजन करने वाला उदय निश्चित ही मेरे जीवन के किसी महानायक से कम नहीं हैं। मै उदय की जिजीविषा और बहादुरी को नमन करता हूँ।

विजय सहगल   

गुरुवार, 23 नवंबर 2023

पनौती अर्थात अशुभ या मनहूस

 

"पनौती अर्थात अशुभ या मनहूस"




21 नवंबर 2023 को राजस्थान के जालौर की एक चुनावी सभा मे बोलते हुए कॉंग्रेस के नेता श्री राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का नाम उद्धृत करते हुए उन्हे विश्व कप मे भारतीय टीम के फ़ाइनल मुक़ाबले मे पराजय के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए स्थानीय भाषा के शब्द "पनौती" कह संबोधित किया जिसका अर्थ होता है एक ऐसा व्यक्ति जो "आसपास के लोगो के लिए दुर्भाग्य या बुरी खबर लाता हैं"।  शाब्दिक अर्थों मे कहें तो "मनहूस", "अशुभ" या  "अपशगुनी"। ये शब्द आज के समय, जब एक साधारण मनुष्य के लिए भी स्वीकार नहीं हो सकते तो ऐसे नकारात्मक, अनैतिक और गाली गलौज भरे  अपशब्द का प्रयोग देश के प्रधानमंत्री के लिए प्रयुक्त करना अत्यंत निंदनीय और घोर आपत्तीजनक हैं। किसी सभ्य और संस्कारित व्यक्ति से ऐसे व्यवहार की उम्मीद कदापि नहीं की जा सकती। जैसे जैसे चुनाव की समाप्ती अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रही हैं राजनैतिक दलों की शीर्ष नेतृत्व द्वारा  भाषा की मर्यादाओं का उल्लंघन बढ़ता जा रहा हैं जो हमारे लोकतान्त्रिक देश के लिये अच्छा शगुन नहीं हैं।   

शायद किसी दुर्बुद्धि और नकारात्मक सोच के सलाहकार द्वारा पनौती शब्द का उपयोग करने का  सुझाव श्री राहुल गांधी को  दिया गया होगा  अन्यथा आज के वैज्ञानिक और सूचना प्रौद्योगिकी प्रधान, युग मे इस तरह के अंधविश्वास और कुपढ़ सोच के लिये सभ्य और प्रगतिशील  समाज मे कदाचित ही कोई जगह हो, तब कैसे दुनियाँ के प्रतिष्ठित हार्वर्ड और कैम्ब्रिज विश्विध्यालय से शिक्षित राहुल गांधी विश्वकप क्रिकेट मे भारतीय टीम की पराजय के लिये, क्रिकेट खेल के ज्ञान, कौशल और तकनीकि के विपरीत  देश के प्रधानमंत्री को मनहूस व्यक्ति कह, हार के लिये दोषी ठहरा सकते हैं। स्वतन्त्रता के पूर्व, सुदूर गाँव/देहातों मे बैगा और झाडफूंक करने वाले   बाबाओं द्वारा देश मे झाड़-फूंख, टोने-टोटके और अंधविश्वास के चलते लोगो को डायन, मनहूस और पनौती कह समाज से  बहिष्कृत कर समाज मे अंधविश्वास और कुप्रथाओं को बढ़ावा दिया जाता था। 21वीं  सदी के काल मे,  आज के विकसित समाज मे श्री राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री के लिये पनौती शब्द का इस्तेमाल कर, क्या संदेश देना चाहते हैं? "पनौती" जैसे अंधविश्वास, कुप्रथा और कुरीति  को बढ़ावा दे कर वे देश को किस दिशा मे ले जाना चाहते हैं? ये विचारणीय प्रश्न हैं।    

यूं तो खेल भावना का तकाजा हैं कि किसी भी खेल मे खेलने वाली दो प्रतिद्वंदी टीमों मे से अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली टीम ही जीतती हैं और फ़ाइनल मुक़ाबले मे तो निश्चित ही दो सर्वश्रेष्ठ टीमों के बीच कड़ा मुक़ाबला होता हैं और जीत का सेहरा, विजयी टीम के सिर पर बांधा जाता है लेकिन इसका ये मतलब नहीं होता कि पराजित टीम किसी भी मामले मे विजयी टीम से कमतर हो! यही कारण हैं कि किसी भी खेल की प्रथम दो टीमों के फ़ाइनल मैच मे एक टीम को विजेता और दूसरे को उपविजता का खिताब दिया जाता हैं न कि पराजित टीम!! इसलिए जिन भारतीय क्रिकेटरों ने लगातार 10 मैच जीतकर क्रिकेट विश्वकप के फ़ाइनल मे प्रवेश किया हो और जिसका मुक़ाबला विश्व की जानीमानी टीम आस्ट्रेलिया से हुआ हो तब जीत-हार  का ठीकरा क्रिकेट के खेल कौशल को न देकर किसी व्यक्ति को "पनौती" या "मनहूस" बता हार के लिये जिम्मेदार ठहराना  मूढ़ता  की पराकाष्ठा ही कहा जायेगा। ऐसा वक्तव्य किसी बुद्धिजीवी, विद्वान या विषय विशेषज्ञ का कदापि नहीं हो सकता।

भाषा के उपयोग की खूबसूरती तभी है जब उसके प्रयोग से किसी व्यक्ति को उद्धृत  किए बिना ही उसे संदेश स्पष्टता से प्रेषित हो जाय, तभी तो कहा जाता हैं "साँप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे" या तीर निशाने पर लगना, लेकिन श्री राहुल गांधी या उनके सलाहकार, शायद इस ज्ञान  मे माहिर नहीं हैं, तभी तो उन्हे उनके वक्तव्यों, ब्यानों और कथनों के कारण संकट की स्थिति का सामना करना पड़ता हैं जैसा कि "सभी मोदी को चोर" कहने पर उनको सूरत, गुजरात के एक न्यायालय द्वारा दो साल की सजा दिया जाना शामिल हैं।        

जैसा कि विदित था राहुल गांधी के "पनौती" वाले वक्तव्य पर भाजपा और उनके समर्थकों  की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया होनी ही थी। भाजपा समर्थक एक छुटभैये समर्थक ने ट्वीटर पर ट्वीट करते हुए लिखा, पनौती, "पहले देवर को खा गयी, फिर सास को खा गयी, फिर पति को खा गयी। निश्चित तौर पर इस तरह के घटिया रिमार्क असभ्य, अशिष्ट और अशिक्षित व्यक्ति का ही हो सकता है, जो निंदनीय हैं। चुनावी दौर मे राजनैतिक दलों के छुटभैये नेताओं और समर्थकों का रवैया तो उनके बुद्धि कौशल के हिसाब से समझ आता हैं पर राजनैतिक दलों के स्टार प्रचारकों, पार्टी प्रमुखों को  इस तरह की अमर्यादित, अशिष्ट और अनुचित  भाषा पर लगाम लगाना होगा अन्यथा क्रिया और प्रतिक्रिया के चलते या यूं कहें कि "काँच के महलों मे रहने वालों को दूसरे के घरों मे पत्थर नहीं फेंकना चाहिये" वाली कहावत के चलते, एक दूसरे पर पत्थरबाजी से सिर फुटौअल, सामाजिक सौहार्द, आपसी भाई चारा समरसता को ठेस पहुंचाएंगे।      

विजय सहगल

रविवार, 19 नवंबर 2023

गरीबी हटाओं आंदोलन की असफलता की अर्धशती "

 

"गरीबी हटाओं आंदोलन की असफलता की अर्धशती "

 


वास्तव मे कभी कभी हमे अपनी उपलब्धियों के साथ साथ कभी अपनी असफलताओं पर भी विचार मंथन कर अपना मूल्यांकन करना चाहिये। कदाचित यह आत्म निरीक्षण हमे हमारी भावी योजनाओं के क्रियान्वयन मे सहयोग कर सके। ऐसी ही देश की गरीबी हटाओं योजना पर विभिन्न सरकारों ने बड़ी बड़ी योजनाएँ बनाई पर दुर्भाग्य से स्वतन्त्रता के 76 वर्ष पश्चात भी देश की गरीबी उन्मूलन के वांछित परिणाम नहीं दिखाई दिये।

1971 मे इन्दिरा गांधी ने गरीबी हटाओ देश बचाओ का नारा दिया और इस तरह गरीबी हटाओ के नाम पर उन्हे दो तिहाई बहुमत से  सत्ता हांसिल हुई पर गरीबी हटाने के सिवा  सब कुछ हुआ, यथा प्रचार प्रसार, बड़े-बड़े बजट पर गरीबी जश के तश बनी रही और ये योजना बुरी तरह फ्लॉप होकर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी।    

5वीं पंचवर्षीय योजना मे (1974 से 1978 तक) जब इन्दिरा गांधी के विरोधियों ने इन्दिरा हटाओ का नारा दिया तो जवाब मे उन्होने गरीबी हटाओ का नारा दिया एक बार  फिर  वे प्रधानमंत्री के रूप मे सत्तासीन  हुईं पर  गरीबी हताओं के नाम से "ढाक के वही तीन पात" रहे।

स्व॰ राजीव गांधी ने भी इन्दिरा गांधी के पद चिन्हों पर चलते हुए गरीबी हटाओ का नारा दिया था। छटी पंचवर्षीय योजना (1980 से 1985 तक) का मुख्य उद्देश्य गरीबी को समाप्त करना था। योजना तो समाप्त हो गयी पर गरीबी ज्यों की त्यों बनी रही। वहीं श्री राजीव गांधी ने सातवीं पंच वर्षीय योजना (1985 से 1990) के अंतर्गत एक बार फिर गरीबी विरोधी कार्यक्रम के माध्यम से प्रयास किए। 

माननीय श्री मनमोहन सिंह ने 1975 मे इन्दिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम को 21वीं शताब्दी के अनुरूप पुनर्गठित कर गरीबी उन्मूलन को प्रतिस्थापित कर प्रासंगिक बनाने की कोशिश की।  आंदोलन से प्रभावित होकर 12वी पाँच वर्षीय योजना 2012 मे शुरू हुई और इस दौरान गरीबी मे 10%  कम करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए। पर हर बार की तरह होना जाना कुछ नहीं था सो नहीं हुआ और बीमारी जैसे की तैसे बनी रही।

2014 मे मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल मे समग्र रूप से गरीबी उन्मूलन की विभिन्न योजनाएँ शुरू हुई और उनके परिणाम भी देश ने देखें।

भारत की स्वतन्त्रता के 76 साल बाद आज देश के पास गरीबी उन्मूलन के  विभिन्न सरकारों की योजनाओं और उनके कार्यनिष्पादन के   तुलनात्मक आंकड़े हैं जिनके आधार पर हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि किन सरकारों ने वास्तव मे बुनियादी तौर पर देश से गरीबी मिटाओ के लिए काम किया और किन सरकारों ने इस पर लीपा पोती कर गरीबी हटाओं का नारा दे देश के निर्धनों के जज़्बात से खिलबाड़ कर उनके साथ धोखा किया।  

गरीबों की बुनियादी आवश्यकताओं मे पुरातन काल से ही "रोटी", "कपड़ा" और "मकान" की मूलभूत आवश्यकताओं की अवधारणा रही है। कालांतर मे समाज के विपन्न वर्ग के एक निर्धन व्यक्ति की इन तीन आवश्यकताओं मे रोटी के साथ पानी, कपड़े के साथ स्वास्थ्य और शिक्षा तथा मकान के साथ शौचालय, बिजली और गैस की आवश्यकताओं को भी जोड़ा गया जिसकी अपेक्षा एक निर्धन व्यक्ति अपनी प्रगतशील समाज और सरकार से रखता हैं।        

हमारे प्रबुद्ध पाठकों को याद होगा कि सबसे पहले, कैसे 1971 के लोकसभा के आम चुनाव मे तत्कालीन प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी ने "गरीबी हटाओ" का नारा बुलंद किया था। तब से लेकर 2014 और 2019 के आम चुनावों तक देश की गरीबी तो नहीं हटी पर गरीब और गरीब होता चला गया। 1966 से 1977 तक उन दिनों श्रीमती गांधी ने गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों मे   "20 सूत्री कार्यक्रम" का ढिंढोरा बड़ी ज़ोर-शोर से पीटा था। सरकार और उनके मातहत अफसरों इसे किस हद तक लागू करवा सके नहीं मालूम, लेकिन हम जैसे विध्यार्थियों को उन दिनों 10वीं  और 12वीं के पाठ्यक्रम की परीक्षाओं मे "सरकार के 20 सूत्री कार्यक्रम" का  रट्टा लगा कर याद करना एक टेढ़ी खीर जरूर साबित हुआ करता  था। वास्तव मे उन दिनों सरकार और उनके ठकुरसुहाती अफसरों का गरीबी हटाने मे न तो कोई दिलचस्पी थी और न कोई दृष्टिकोण!! न तो कोई नीति थी और न ही कोई नियति!!, न कोई कार्यक्रम थे और न ही योजनाएँ। देश के दवे कुचले वर्ग की  निर्धनता को कैसे दूर किया जाय? इस पर किसी का ध्यान ही नहीं था।  चाँदी की चम्मच मुँह मे  लेकर पैदा हुए नेतृत्व से भला कैसे उम्मीद की  जा सकती थी कि वे देश की गरीबी दूर कर सकते? राजपरिवार मे जन्मे ऐसे राजकुमारों से गरीबी हटाओं की आप क्या उम्मीद  कर सकते हैं जिनके पूर्वजों के कपड़े पेरिस मे धुलने जाते थे!! अरे गरीबी हटाओं के नारों को तो वह व्यक्ति ही महसूस कर सकता था जिसने गरीबी देखी हो या जिसने गरीबी मे जीवन यापन किया हो? एक धानीमानी धन कुबेर क्या जाने गरीबी क्या हैं? पचास-साठ के दशकों मे गरीबों की मूलभूत या बुनियादी अवश्यकतायेँ तो रोटी, कपड़ा, मकान तक सीमित थीं जिनको आज हमारी उम्र के अनेक युवाओं ने साठ-सत्तर के दशक मे देखा और भुक्ता हैं। राशन, मिट्टी के तेल और कपड़ो के लिए हम जैसे लोगो की उस पीढ़ी ने अपना पूरा बचपन लंबी लंबी लाइन मे लग कर आहूत कर दिया था। यहीं तक होता, तब भी ठीक था पर कदम-कदम पर भ्रष्टाचार और काला बाजारी से जीवन दुर्लभ और कठिन हो गया  था जिसके दंश अब तक हरे हैं।   

2014 मे मोदी सरकार के आने के बाद आज 21वी सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप  इनमे जल, बिजली, गैस, स्वास्थय के साथ एक महत्वपूर्ण कारक शौचालय को भी शामिल किया गया। उन दिनों पूरब से पश्चिम तक उत्तर से दक्षिण तक  गाँव शहरों मे लोग सड़क और रेल पटरियों के किनारे खुले मे शौच जाने को मजबूर थे। उन दिनों के मंजर हम आप भूले नहीं होंगे। खुले मे शौच के कारण महिलाओं की दशा तो सबसे ज्यादा दयनीय थी। खुले मे शौच महिलाओं के साथ होने वाली लिंग आधारित हिंसा और अस्वस्थ वातावरण सबसे बड़ा कारक था। जिन शौचालयों का नाम लेने पर लोग शर्माते थे, ग्राम पचायतों ने उसे "इज्जत घर" देकर सम्मानित किया जो पूर्णतः महिलाओं की लज्जा, सम्मान और  सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा था, जिस पर स्वतन्त्रता के बाद मोदी  सरकार के अलावा किसी भी राजनैतिक दल की नज़र नहीं पड़ी थी  क्योंकि राज प्रासादों मे रह रहे बिगड़े श्रेष्ठी वर्ग" महिलाओं की लाज शरम और  आत्मसम्मान से जुड़ी इन मूलभूत आवश्यकताओं से लेश मात्र भी परिचित नहीं थे।

गरीबी दूर तो तब होगी जब गरीबों के लिए चलने वाली योजनाओ का पैसा सीधे गरीबों को मिले। हमे याद है तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने एक बार स्वीकारा था कि सरकार द्वारा गरीबों को भेजा एक रुपया उन तक पहुँचते पहुँचते मात्र 15 पैसे ही रह जाता हैं अर्थात गरीबों के हित और विकास के लिए सरकार द्वारा  भेजे गए 100 पैसों मे से 85 पैसे  न जाने कितने हाथ के पंजों से होते हुए रास्ते मे गायब हो जाते थे। ऐसी कोई पारदर्शी व्यवस्था के बारे मे तत्कालीन सरकारों ने कभी सोचा ही नहीं कि निर्धनों के लिए भेजे पैसे को कैसे उनके हाथों तक सुरक्षित और सकुशल उन तक पहुंचाये जाएँ।

स्वतन्त्रता के 65 वर्ष बाद भी "गरीबी हटाओं" आंदोलन या योजनाओं की असफलता पर आज विचार मंथन की महति आवश्यकता हैं। न केवल कॉंग्रेस अपितु देश के सभी राजनैतिक दलों को जाति, लिंग भेद और प्रांत से  परे देश के निर्धन वर्ग के कल्याण के लिए विचार-विनिमय की अति आवश्यकता हैं।

विजय सहगल  

 

शुक्रवार, 10 नवंबर 2023

नितीश कुमार की , महिलाओं पर अमर्यादित, अश्लील और अनावश्यक टिप्पड़ी।

 

नितीश कुमार की, महिलाओं पर अमर्यादित, अश्लील और अनावश्यक टिप्पड़ी।



श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय छः के श्लोक छः मे भगवान श्री कृष्ण कहते हैं:-

बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।6.6।। 

अर्थात जिस जीवात्मा द्वारा मन और इंद्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है; और जिसके द्वारा मन तथा इंद्रियों-सहित शरीर नहीं जीता गया हैं, उसके लिये वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बरतता है।

यह कथन बिहार के मुख्यमंत्री के द्वारा बिहार विधान सभा मे महिलाओं के उपर दिये ब्यान से परिलक्षित होता हैं। दिनांक 7 नवम्बर 2023 को बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार का बिहार विधान सभा सत्र के दौरान माननीय सदस्यों के बीच, महिलाओं की शिक्षा और जनसंख्या नियंत्रण  मे सकारात्मक और नकारात्मक  योगदान  पर टिप्पड़ी का विडियो  देख और सुन कर तो यही प्रतीत होता हैं कि नितीश कुमार को किसी शत्रु की आवश्यकता नहीं हैं, क्योंकि न जीते हुए मन और इंद्रियों वाले नितीश कुमार  स्वयं ही अपने शत्रु हैं अन्यथा बढती जनसंख्या जैसे सामाजिक विषय पर जन्तु विज्ञान अध्याय  के यौन विज्ञान विषय का चित्रण कुत्सित और असभ्य भाषा और भाव से न करते। जैसे  हाव-भाव और चटखारे लेकर उन्होने विधान सभा मे माननीय सदस्यों के बीच, जिसमे अच्छी ख़ासी संख्या मे महिला सदस्यों की  भी थी, जिस भाषा का इस्तेमाल किया उसे यहाँ लिखना भी संभव नहीं। नितीश कुमार के 30 सेकंड के वक्तव्य ने न केवल विधान सभा के सदस्यों को अपितु महिला सदस्यों को असहज स्थिति मे डाला अपितु सारे देश की राजनीति मे एक भूचाल ला  दिया। इस पर कड़ी प्रितिक्रिया हुई जो स्वाभाविक थी जिसकी कल्पना शायद नितीश कुमार को भी नहीं रही होगी।      

जिस विधान सभा मे प्रदेश की जनता द्वारा चुने गए सदस्य प्रदेश के विकास पर चर्चा कर नीतियों और कार्यक्रमों का निर्माण करते हैं उस लोकतन्त्र के मंदिर मे नहिलाओं की शिक्षा के आंकड़े और जनसंख्या नियंत्रण की जिस समस्या का निदान, शालीनता, सरलता और शिष्टाचार से किया जा सकता था उसको "श्रीमान" नीतीश कुमार ने  अपनी  अमर्यादित, अभद्र और अश्लील भाषा मे  किया मानों वे साठ-सत्तर के दशक की किसी निम्न स्तर  की पुस्तक के साहित्य का अश्लील अंश पढ़ रहे हों। बिहार जैसे प्रदेश जिसने  भारत मे  सबसे ज्यादा ज्ञानवान और बुद्धिमान बुद्धिजीवि पुरुषों/महिलाओं को जन्म दिया वहाँ के मुख्यमंत्री से ऐसी निम्नस्तरीय, घटिया और सड़क छाप भाषा की अपेक्षा कैसे की जा सकती हैं? जब सभ्य समाज मे किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी अमर्यादित, कुत्सित टिप्पड़ी के लिए कोई जगह नहीं हो सकती तो मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार पदासीन व्यक्ति को कैसे माफ किया जा सकता हैं? सनातन धर्म और सांस्कृति मे तो यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। तब महिलाओं के प्रति दुराग्रह रखने वाले व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक मंच से ऐसा वक्तव्य, वह भी लोकतन्त्र के सर्वोच्च मंदिर, "विधान सभा" मे!!, कल्पना से परे हैं? यह नारियों के विरुद्ध, आसुरी मानसिकता के विक्षिप्त  चित्त व्यक्ति का  अक्षम्य अपराध हैं! महिलाओं के बारे मे ऐसी कुत्सित  सोच को धिक्कार हैं, मुख्यमंत्री महोदय! भारतीय नारियाँ तिरिस्कार करती हैं आपकी अधम मानसिकता का!! और  भर्त्स्ना करती महिलाओं पर आपकी भारतीय संस्कृति और सभ्यता विरोधी वक्तव्य  का!!!

ऐसा नहीं था कि मात्र नितीश कुमार अपने मन, वाणी और कर्म से महिलाओं पर अनाचार और दुराचार कर रहे थे, बड़ा खेद और अफसोस तो इस बात का हैं कि  बगल मे बैठे उपमुख्यमंत्री तेजश्वी यादव, पीछे बैठे कुछ माननीय मंत्रीगण भी तिरछी नज़रों से पेट पर हाथ फेर रहे नितीश कुमार की कुटिल हंसी मे मुस्करा कर नितीश कुमार के पाप मे साझीदार  थे। गोस्वामी तुलसी दास, रचित रामचरित मानस की चौपाइयों मे महिलाओं पर अपनी  मूढ़, अनर्गल और अतार्किक आरोपों के चलते सुर्खियों मे आए बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्र शेखर भी पीछे बैठे नितीश कुमार की  महिलाओं पर अश्लील और अमर्यादित  उपहास मे सहभागी थे।  वे यहीं नहीं रुके अपितु दर्शक दीर्घा मे पत्रकारों की ओर मुखातिव हो उन्हे भी अपने वक्तव्य के आशय को  समझ लेने की नसीहत दी अर्थात "चोरी और सीनाजोरी"!!  

ऐसा नहीं है कि महिलाओं पर मैली, मलिन और कलुषित विषादपूर्ण टिप्पड़ीयां करने वाले नितीश कुमार पहले व्यक्ति हों। इन घृणास्पद विषय पर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा जुलाई 2013 मे अपने ही दल की सांसद सुश्री मीनक्षी  नटराजन को "टंच माल" कह उपहास उड़ने से सारा देश परिचित हैं। उ॰प्र॰ के रामपुर से पूर्व सांसद और सपा सरकार के पूर्व मंत्री मोहम्मद आज़म द्वारा अप्रैल 2020 के चुनाव मे उनकी प्रीतिद्वंदी जया प्रदा पर "खाकी जाँघिया" वाली अभद्र और कुत्सित टिप्पड़ी से देश का हर नागरिक परिचित हैं। मोहम्मद आज़म खान ने एक बार जुलाई 2019 मे संसद सत्र के दौरान पदाशीन अध्यक्ष श्रीमती रमा देवी पर भी शर्मनाक टिप्पड़ी की थी। लालू प्रसाद द्वारा बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी के गाल की तरह चिकना बनाने की हास्यास्पद टिप्पड़ी भी इसी श्रेणी मे हैं। राजनेताओं की महिलाओं पर अभद्र, अश्लील और अनावश्यक टिप्पड़ियाँ उन राजनीतिज्ञों को बचपन मे मिले पारवारिक माहौल, विद्यार्जन और शिक्षा के दौरान मिली संगत, पॉलिटिकल पार्टियों की सोच और मानसिकता का प्रतिविम्ब हैं जो एक दिन मे विकसित नहीं होती। सालों साल, अधम और तामसी व्यक्ति की यह एक ऐसी सोच हैं जो अशास्त्र और अधर्म को भी, "यह धर्म" हैं मान लेती है।  

विजय सहगल               

मंगलवार, 7 नवंबर 2023

मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव-2023, "चुनाव फंसा हैं"

 

मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव-2023, "चुनाव फंसा हैं"!!





17 नवंबर 2023 के विधान सभा चुनाव मे, मध्य प्रदेश राज्य के मतदाता विधान सभा के लिए मतदान कर 16वीं विधान सभा चुनने के लिए  मतदान करेंगे।  वर्तमान मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जिन्हे प्यार से राज्य की जनता "मामा" कह संबोधित करती हैं, ने अलग अलग काल खंडों लगभग 16 वर्ष 8 माह मध्य प्रदेश राज्य का  मुख्य मंत्री के रूप मे नेतृत्व कर  मध्य प्रदेश राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्य मंत्री के रूप मे कार्य करने का रिकॉर्ड बनाया। श्री शिवराज सिंह 16 वर्ष के लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री के बावजूद वो प्रभाव और छाप प्रदेश की जनता के बीच नहीं छोड़ सके जो असर उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ ने अपने अल्प काल मे उत्तर प्रदेश मे कायम किया। गुजरात राज्य से श्री नरेंद्र मोदी के केंद्र मे प्रधानमंत्री के रूप मे  आगमन के बाद बने राजनैतिक वातावरण और बदले समीकरण के बीच  थोड़े ही समय  मे  आर्थिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ईमानदारी राजनेता और एक विकासशील सोच के रहनुमा  की जो छवि नरेंद्र मोदी  बनाने मे कामयाब रहे, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी को अपवाद मान लें तो  श्री शिवराज सिंह या अन्य भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री बैसी इमेज बनाने मे नाकामयाब रहे।

मध्य प्रदेश राज्य का ये दुर्भाग्य रहा कि सरकार और शासन मे चाहे काँग्रेस रही हो या भाजपा, इन दोनों की बुनियाद, मूल नीति और नियत मे लाल फ़ीताशाही, नौकरशाही और सरकार मे भ्रष्टाचार  का रूप/स्वरूप कमोवेश एक ही रहा। कॉंग्रेस के श्री दिग्विजय का कार्यकाल कौन भूल सकता हैं जब बिजली की कटौती के दैनिक कार्यक्रम तय होता था। 2-3 घंटे की कटौती मे घर के अंदर मौसम की मार पड़ती थी और घर के बाहर मच्छरों के दंश चैन से नहीं बैठने देता था। मध्य प्रदेश मे सरकार या शासन किसी भी राजनैतिक दल का रहा हो पर सरकारी कार्यालयों मे प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारियों का शासन पहले भी चलता रहा था और आज भी चल रहा हैं। आम जनता को अपने दिन प्रतिदिन के कार्यों के लिए इन दीर्घसूत्री और भ्रष्ट अधिकारियों के रहमो करम पर निर्भर रहना पड़ता हैं फिर चाहे नगर निगम हो, बिजली बिभाग हो या फिर सड़क या पानी वितरण विभाग हो। भाजपा मे तो पिछले एक दशक से मध्य प्रदेश मे श्री मोदी का कमाया हुआ ही खा रहे हैं। इनका अपना कोई बाजूद या पहचान नहीं जिसके बदौलत जनता इन्हे अपना समर्थन या सहयोग करें। आम जनता से जुड़े विभागों के बाबू और अधिकारी वर्षों  से एक ही स्थान पर पदस्थ होने के कारण कार्य सांस्कृति का पूरी तरह ह्रास हो गया हैं। कहना अनुचित न होगा कि मध्य प्रदेश विधान सभा का चुनाव फंसा हुआ हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा कहना मुश्किल हैं। 

पिछले छह वर्षों से जैसे इंदौर ने देश के टॉप 100 शहरों के स्मार्ट सिटी मे पहला स्थान पाने मे सफल रहा हैं। निश्चित ही इंदौर नगर की जनता, जन प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी बधाई के पात्र हैं, जिनके समर्पण, कर्तव्यनिष्ठा और सेवा भवना के कारण इंदौर नगर ने स्वच्छता  इतना अहम स्थान प्राप्त किया। क्या कारण हैं कि मध्य प्रदेश राज्य के वही नागरिक, अधिकारी और कर्मचारी बैसी कार्य सांस्कृति विकसित नहीं कर सके जैसी कि इंदौर शहर के लोगो ने की। इसका मुख्य कारण इन शहर के प्रशासनिक अधिकारियों और कर्मचारियों का वर्षों से एक ही शहर मे पदस्थ रहते हुए ज़िम्मेदारी और सेवा भावना का पूर्णतः  अभाव एवं भ्रष्टाचार!! ये कार्य सांस्कृति कोई एक दिन मे नहीं पनपी। शासन और सरकार  किसी भी दल की रही हो पर नौकरशाहों की अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार और  कार्य पद्धति अपने निश्चित ढर्रे पर ही चलती रही। इन दीर्घ सूत्री अधिकारियों की कार्य प्रणाली की एक बानगी देखिये कि पिछले एक माह से 24 घंटे लगातार स्ट्रीट लाइट के जलने की शिकायत प्रदेश के मुखिया से लेकर ग्वालियर के हर स्तर के आला अधिकारियों को करने के बावजूद विजली का अपव्यय अभी भी जारी हैं।           

श्री शिवराज सिंह के कार्यकाल के दौरान 2013 मे "व्यापम" जैसा घोटाला किसी भी सभ्य सरकार पर एक बहुत बड़ा कलंक था। इस घोटाले के अंतर्गत सरकारी नौकरियों, मेडिकल तथा इंजीन्यरिंग परीक्षाओं मे भर्ती की गड़बड़ी के कारण उनके मंत्री मण्डल के एक मंत्री की गिरफ्तारी इस महा घोटाले का सबूत थी। इसके बावजूद भी मुख्य विपक्षी दल कॉंग्रेस द्वारा इस मुद्दे को ज़ोर शोर से न उठाने के कारण लोग कॉंग्रेस के नेताओं की भी इसमे संलिप्तता के दबे मुंह बात करते हैं अन्यथा इतने बड़े घोटाले पर श्री शिवराज सरकार का पद पर बने रहना तमाम शंकाओं की ओर इशारा न करता?      

इस चुनाव मे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व  द्वारा अपने चुने हुए सांसदों, पार्टी संगठनों के धुरंधर पदाधिकारियों और केंद्रीय मंत्रियों तक को विधान सभा चुनाव मे नामांकन करा चुनाव के लिए खड़ा करना भी इस बात को दर्शाता हैं कि चुनाव के बाद भाजपा मे कहीं कुछ आश्चर्य चकित होने वाला होगा जिसकी कल्पना सामान्य घटनाक्रम से परे कुछ असाधारण और अनोखा होने वाला  होगा। बीजेपी ने मध्य प्रदेश के जिन दिग्गज केंद्रीय मंत्रियों को विधान सभा चुना 2023 का उम्मेदवार बनाया गया उनमे  श्री नरेंद्र सिंह तोमर, श्री प्रहलाद पटेल और श्री फगन सिंह कुलस्ते हैं जबकि चार वर्तमान सांसद सर्व श्री राकेश सिंह, जबलपुर से, सीधी से  रीति पाठक, सतना से श्री गणेश सिंह एवं होशंगाबाद के सांसद श्री उदय प्रताप सिंह को विधान सभा के चुनाव मे उम्मीदवार बनाया हैं जबकि पार्टी के धुरंधर महासचिव श्री कैलाश विजयवर्गी को उनके पुत्र की जगह इंदौर से उम्मीदवार बनाया गया हैं। इन महारथियों को एक साथ विधान सभा के चुनाव मे उतारना किसी तूफान के पूर्व की शांति की ओर इशारा करता हैं। या तो ये  प्रभावशाली  श्रीमान पुरुष चुनाव मे विजय वरण कर राज्य सरकार का हिस्सा होंगे या अपना बाजूद खोकर राजनैतिक पृष्ठ के हांसिये पर खड़े नज़र आयेंगे।  दोनों ही स्थितियों मे केन्द्रीय राजनीति मे संसद सदस्यों के रूप मे नये चेहरों को चुनाव मे मौका दिया जाना निश्चित हैं।  इस पूरे घटनाक्रम को "दबाब की राजनीति" कहना अतिशयोक्ति न होगी और शायद कूटनीति की भाषा के नकारात्मक भाव मे इसे ही "एक तीर से दो निशाने लगाना" या "एक पत्थर से दो शिकार करना" कहना "समसामयिक"  होगा।

केंद्रीय सरकार द्वारा निर्मित राष्ट्रीय राजमार्गों को यदि छोड़ दिया जय तो राज्य सरकार के मार्ग और शहरों, कॉलोनियों की आंतरिक सड़कों की हालात बहुत ही खराब हैं। तब मध्य प्रदेश के विधान सभा चुनाव 2023 के बारे मे भविष्यवाणी करना एक "टेढ़ी खीर ही होगा"!!  यह कहना अतिशयोक्ति न होगी की मध्य प्रदेश के चुनाव मे पेंच फंसा है। 

बेशक मध्य प्रदेश कॉंग्रेस के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार श्री कमाल नाथ भी राम नाम की चादर ओढ़े नाव पर सवार होकर चुनाव रूपी बैतरणी पार करने के प्रयास मे हैं पर चुनाव के पूर्व टिकिट बंटबारे की रणनीति मे असंतोष के चलते श्री दिग्विजय सिंह और श्री कमल नाथ के बीच  "कपड़े फाड़ने" की नौबत आ गयी। जिस कारण कॉंग्रेस के इन क्षत्रपों के बीच मतभेद खुल कर सामने आए। मध्य प्रदेश के बहुसंख्यक हिन्दू मतदाताओं को आज भी इंडिया गठबंधन के सदस्य श्री प्रियंक खडगे जो कॉंग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मलिकार्जुन खडगे के पुत्र हैं एवं डीएमके के उदयनिधि मारन के सनातन धर्म के विरुद्ध  वक्तव्य को भी लोग भूले नहीं है, जो कॉंग्रेस की राह को इतना आसान नहीं करने वाले। 

लोगो का मानना हैं कि मध्य प्रदेश राज्य की जनता विधान सभा चुनाव मे अपनी नयी  सरकार को चुनेगी तो मतदाओं की ये मजबूरी रहेगी कि उन्हे "साँप नाथ" या "नाग नाथ" दोनों  मे से किसी एक का चुनाव करना पड़ेगा क्योंकि अंततः ये दोनों  चोर चोर मौसेरे भाई जो ठहरे। काँग्रेस और बीजेपी के बीच मुक़ाबला कठिन हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा कहना कठिन हैं। चुनाव का सही निर्णय तो 3 दिसंबर के दिन ही देखने को मिलेगा, तब तक दोनों पक्ष के महारथी अपनी अपनी "डींग हांकेंगे" और "कयास" लगाएंगे" !!       

विजय सहगल