"दुर्गा अष्टमी"
22 अक्टूबर 2023 को दुर्गा अष्टमी के पवित्र दिन अपने अंतश्चेतना मन की यात्रा थी जिसने मेरे अन्तःकरण मे आत्ममंथन करने और अपनी सांस्कृति और पूर्वजों द्वारा की गयी परंपरा का हिस्सा होने का गौरव मुझे प्राप्त हुआ। कुलदेवी की पूजा की तैयारी के रूप मे झाँसी शहर के खत्रियों द्वारा अपने पूर्वजों की सनातनी परंपरा के अनुरूप दूर जंगलों से कुछ विशेष प्रकार के प्राकृतिक औषधिय पौध और धान की बालियों की एकत्रित कर श्रद्धा और सम्मान के साथ घर मे लाने और देवी की पूजा मे स्थापित करने की प्रथा हैं। पूजा मे एक औषधीय पौधा घमरा को चुनते हैं, दूसरी पौध के रूप मे ओरई की लंबी लंबी सींकों एवं तीसरी पौध के रूप मे धान की बालियों को पौध सहित देवी पूजा के रूप मे चुनते हैं। इन तीनों पौध को चुनने के पीछे निश्चित ही कोई कारण रहें होंगे जो शोध का विषय हो सकता हैं, पर मेरा मानना हैं कि घमरा एक बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी बूटी हैं जिसे वैज्ञानिक भी एक औषधीय पौधे के रूप मे मान्यता प्रदान करते हैं। ओरई के पौध को भी ग्रामीण सुखा कर हाथ पंखों, कलात्मक वस्तुओं के निर्माण मे करते हैं और धान तो निश्चित ही समृद्धि और धन-धान्य के रूप को दर्शाती हैं। शायद हमारे पूर्वजों ने धन-धान्य से परिपूर्ण, निरोगी और सुख समृद्ध परिवार की इच्छा और अभिलाषा की कल्पना रही होगी। ये परिपाटी कब से शुरू हुई कोई नहीं जानता। मैंने अपने पिता को इस रीति-रिवाज का पालन करते इन तीनों पौधों को एक कपड़े मे लपेट कर बचपन मे लाते देखा था। पिता को प्रौढ़ अवस्था के कारण अपने बड़े भाइयों और कभी-कभी छोटे भाई को भी इस परंपरा का निर्वहन उसी श्रद्धा भक्ति और समर्पण के साथ करते देखा था, लेकिन ये मेरा दुर्भाग्य रहा कि आलस, निष्क्रियता और सुस्ती के कारण कदाचित ही मुझे इस परंपरा का हिस्सा होने का मौका प्राप्त हुआ। लेकिन इस बार लगभग 55-60 वर्ष बाद मेरे दृढ़ संकल्प और दृढ़ इच्छा शक्ति ने प्रातः छह बजे ही दैनंदनी कार्यों से निवृत्ति और स्नान आदि के पश्चात इस पवित्र परंपरा मे शामिल होने का सौभाग्य मिल ही गया। आप इस कृत्य को "बहुत देर आयद, दुरुस्त आयद" के रूप मे देख सकते हैं।
दशकों पूर्व झाँसी शहर मे समाज के हर घर से एक व्यक्ति इन पौधों को चुनने शहर से 7-8 किमी॰ दूर नंगे पैर, पैदल ही जाते थे। समाज के सभी व्यक्ति जंगल मे ही किसी सरोवर या कुएं पर स्नान कर गीले वस्त्रों मे ही इन पवित्र पौधों की जल, पुष्प और रोरी, अक्षत से पूजन अर्चन कर एक वस्त्र मे लपेट कर अपने कंधों पर रख कर सम्मान सहित लाकर, घर मे स्थापित करते थे। घर पहुँचने के पूर्व रास्ते मे पढ़ने वाले महाकालेश्वर मंदिर से एक डिब्बे मे देवी को अर्पण करने के लिए जल और मंदिर की फुलवारी से देवी को अर्पित करने के लिए चुने गये फूल भी इस परंपरा का हिस्सा थे। उन दिनों शहर इतना विस्तार नहीं हुआ था और न ही आबादी भी इतनी विकसित नहीं हुए थी। इन पूजन सामाग्री को एकत्रित करने की ये यात्रा अनेकों बार अल्प वर्षा के कारण पवित्र पौधों की उपलब्धता मे कमी के कारण कुछ लंबी और तीक्षण हो जाती थी। समय के साथ इस परंपरा मे कुछ परिवर्तन हुए और पैदल यात्रा ने इस दूरी को दो पहिया वाहनों से तय किया जाना आरंभ कर दिया। अतः अब इस पवित्र कार्य मे लगने वाला समय कम होना स्वाभाविक था और यात्रा मे होने वाले कष्टों और परेशानियों मे काफी कमी आ गयी।
कुछ भी हो,
पर सैकड़ों सालों से चली आ रही इस सनातनी परंपरा के अंतर्गत दैवीय शक्ति से युक्त इन
पवित्र पौधों को देवी अर्पण के लिए एकत्रित कर,
चुनकर घर मे पूजा के पूर्व स्थापित करना एक पवित्र और धार्मिक यात्रा ही हैं।
या देवी सर्व भूतेषु,
शक्ति रुपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमस्तस्यै नमो नमः
विजय सहगल

























