शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2023

दुर्गा अष्टमी

 

"दुर्गा अष्टमी"








22 अक्टूबर 2023 को दुर्गा अष्टमी के पवित्र दिन अपने अंतश्चेतना मन की यात्रा थी जिसने मेरे अन्तःकरण मे आत्ममंथन करने और अपनी  सांस्कृति और पूर्वजों द्वारा की गयी परंपरा का हिस्सा होने का गौरव मुझे प्राप्त हुआ। कुलदेवी की पूजा की तैयारी के रूप मे झाँसी शहर के खत्रियों द्वारा अपने पूर्वजों की  सनातनी परंपरा के अनुरूप दूर जंगलों से कुछ विशेष प्रकार के प्राकृतिक औषधिय पौध और धान की बालियों की एकत्रित कर श्रद्धा और सम्मान के साथ घर मे लाने और देवी की पूजा मे स्थापित करने की प्रथा हैं। पूजा मे एक औषधीय पौधा घमरा को चुनते हैं, दूसरी पौध के रूप मे ओरई की लंबी लंबी सींकों एवं तीसरी पौध के रूप मे  धान की बालियों को पौध सहित देवी पूजा के रूप मे चुनते हैं। इन तीनों पौध को चुनने के पीछे निश्चित ही कोई कारण रहें होंगे जो शोध का विषय हो सकता हैं, पर मेरा मानना हैं कि घमरा एक बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी बूटी हैं जिसे वैज्ञानिक भी एक औषधीय पौधे के रूप मे मान्यता प्रदान करते हैं। ओरई के पौध को भी ग्रामीण सुखा कर हाथ पंखों, कलात्मक वस्तुओं के निर्माण मे करते हैं और धान तो निश्चित ही समृद्धि और धन-धान्य के रूप को दर्शाती हैं। शायद हमारे पूर्वजों ने  धन-धान्य से परिपूर्ण, निरोगी और सुख समृद्ध परिवार की इच्छा और अभिलाषा की कल्पना रही होगी। ये परिपाटी कब से शुरू हुई कोई नहीं जानता। मैंने अपने पिता को इस रीति-रिवाज का पालन करते इन तीनों पौधों को एक कपड़े मे लपेट कर बचपन मे लाते देखा था। पिता को प्रौढ़ अवस्था के कारण अपने बड़े भाइयों और कभी-कभी छोटे भाई को भी इस परंपरा का निर्वहन उसी श्रद्धा भक्ति और समर्पण के साथ करते देखा था, लेकिन ये  मेरा दुर्भाग्य रहा कि  आलस, निष्क्रियता और सुस्ती के कारण  कदाचित ही मुझे  इस परंपरा का हिस्सा होने का मौका प्राप्त हुआ। लेकिन इस बार लगभग 55-60 वर्ष बाद मेरे दृढ़ संकल्प और दृढ़ इच्छा शक्ति ने प्रातः छह बजे ही दैनंदनी कार्यों से निवृत्ति और स्नान आदि के पश्चात इस पवित्र परंपरा मे शामिल होने का सौभाग्य मिल ही गया। आप इस कृत्य को "बहुत देर आयद, दुरुस्त आयद" के रूप मे देख सकते हैं।

दशकों पूर्व  झाँसी शहर मे समाज के हर घर से एक व्यक्ति इन पौधों को चुनने शहर से 7-8 किमी॰ दूर नंगे पैर, पैदल ही जाते थे। समाज के सभी व्यक्ति जंगल मे ही किसी सरोवर या कुएं पर स्नान कर गीले वस्त्रों मे ही इन पवित्र पौधों की जल, पुष्प और रोरी, अक्षत  से पूजन अर्चन कर एक वस्त्र मे लपेट कर अपने कंधों पर रख कर सम्मान सहित लाकर,  घर मे स्थापित करते थे। घर पहुँचने के पूर्व रास्ते मे पढ़ने वाले महाकालेश्वर मंदिर से एक डिब्बे मे देवी को अर्पण  करने के लिए  जल और मंदिर की फुलवारी से देवी को अर्पित करने के लिए  चुने गये फूल  भी इस परंपरा का हिस्सा थे। उन दिनों शहर इतना विस्तार नहीं हुआ था और न ही आबादी भी इतनी विकसित नहीं हुए थी। इन पूजन सामाग्री को एकत्रित करने की ये यात्रा अनेकों बार अल्प वर्षा के कारण पवित्र पौधों की उपलब्धता मे कमी के कारण कुछ लंबी और तीक्षण हो जाती थी। समय के साथ इस परंपरा मे कुछ परिवर्तन हुए और पैदल यात्रा ने इस दूरी को दो पहिया वाहनों से तय किया जाना आरंभ कर दिया।  अतः अब इस पवित्र कार्य मे लगने वाला समय कम होना  स्वाभाविक था और यात्रा मे होने वाले कष्टों और परेशानियों मे काफी कमी आ गयी।

कुछ भी हो, पर सैकड़ों सालों से चली आ रही इस सनातनी परंपरा के अंतर्गत दैवीय शक्ति से युक्त इन पवित्र पौधों को देवी अर्पण के लिए एकत्रित कर, चुनकर घर मे पूजा के पूर्व स्थापित करना एक पवित्र और धार्मिक यात्रा ही  हैं।  

या देवी सर्व भूतेषु, शक्ति रुपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः     

विजय सहगल           

शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

विरासत की खोज"- मोती महल, ग्वालियर

 

"विरासत की खोज"- मोती महल, ग्वालियर"








दिनांक 19 फरवरी 2023  को ग्वालियर मे प्रातः भ्रमण के साथ एक "हेरिटेज़ वॉक" अर्थात "विरासत की संपदाओं की पुनरान्वेषण यात्रा" मोती महल, ग्वालियर से शुरू की गयी। इस यात्रा मे हमारे हमराही रहे हमारे घनिष्ठ पारवारिक मित्र और हितचिंतक पड़ौसी  श्री ललित और श्री #संजय पांडे।

1825 मे 900 कमरों वाले इस मोती महल का निर्माण सिंधिया वंश के महाराजा स्व॰ दौलतराव सिंधिया द्वारा कराया गया। मोटे मोटे गोल स्तंभों और चौड़ी-चौड़ी बुनियाद पर बने इस महल की भव्यता आज भी देखते ही बनती है। इतनी अधिक संख्या मे कमरों के निर्माण के कारण बाहर से दिखाई देने वाले इस भव्य महल के अंदर कमरों की भूल भुलैया इतनी जबर्दस्त है कि आप भटके बिना नहीं रह सकते। तत्कालीन महाराजा का मोतियों के प्रति आकर्षण और मोतियों का विशाल संग्रह के कारण इस महल का नाम "मोती महल" पड़ा। भूमिगत कक्षों को यदि छोड़ दिया जाएँ तो यह पूरा महल कहीं कहीं पाँच मंज़िला है जो पूर्णतः बड़े बड़े पत्थर की  बुनियाद पर टिका है और पूरे महल की छत्त लंबी लंबी पत्थर की पटौर से बनाया गया है। कहीं कहीं तो पत्थरों की लंबाई 30 फुट से भी अधिक है।  दीवारों पर उकेरी गईं पत्थर पर कलात्मक आकृतियाँ भी देखते ही बनती हैं। चंबल क्षेत्र मे पत्थरों पर की गयी नक्काशी और कलात्मक वास्तु की अनेक प्राचीन धरोहर आपको मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी मे आज भी देखने को मिल सकती हैं। पर्यटन का ज्यादा प्रचार-प्रसार न होने के कारण यह क्षेत्र आज भी पर्यटन की दृष्टि से काफी अबूझा, अनजाना और अक्षूता हैं। घुम्मक्कड़ पर्यटकों से अपेक्षा हैं कि इस क्षेत्र के ककन मठ, बटेश्वर पढ़वाली, मितावली जैसे कम प्रसिद्ध और कम ख़र्चीले इन पर्यटन केन्द्रों के भ्रमण की संभावनाओं का अन्वेषण और समन्वेषण करें।     

मोती महल के बैभव और सुंदरता का वर्णन के पूर्व महल के सामने बने बैजा ताल का जिक्र न हो तो ये न इंसाफ़ी होगी। मोती महल की सुंदरता मे चार चाँद लगाने मे बैजा ताल का महत्वपूर्ण भूमिका है। पश्चिम मुखी इस महल के सामने गहराई मे एक विशाल ताल बना है जिसके चारों ओर सीढ़ियाँ बनी है जिनसे नीचे उतर कर आप पानी से भरे इस तालाब मे  नौका यान और पैडल वोट की सवारी कर सकते है। ताल के बीचों बीच एक भव्य मंच बनाया गया है जिसको एक पुल के माध्यम से सीढ़ियों से जोड़ कर रास्ता बनाया गया है। इस मंच का उपयोग शहर मे संगीत और नाटक के कार्यक्रम यदा कदा आयोजित किये जाते है। बैजा तालाब के चारों ओर पक्की सड़क बनी है इस तालाब पर कुछ कुछ दूरी पर पत्थर पर नक्काशी दार छतरियाँ बनाई गयी है जहां पर बैठ कर आप तालाब या तालाब के बीचों बीच बने तरण मंच के सौन्दर्य और कार्यक्रमों के साथ मोती महल की भव्यता और दिव्यता का आनंद ले सकते है।

तालाब से पूर्व दिशा की ओर एक अर्ध गोलाकार अति सुंदर दो मंज़िला भवन दिखाई देता है, जिसके एकदम मध्य मे ऊपरी मंजिल पर आयताकार पिल्लर पर एक रोमन घड़ी लगी है जो पूरे दिन मे दो बार सही समय दर्शाती है अर्थात सुप्तावस्था मे हैं।  जहां ग्वालियर को सन 1947 मे मध्य भारत प्रांत की राजधानी होने का  गौरव प्राप्त है वही जिस मोती महल को सिंधिया रियासत कालीन सचिवालय का दर्जा प्राप्त था उसी मोती महल को मध्य भारत प्रांत की विधान सभा होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। मोती महल के मुख्य भवन को सुंदर नक्काशी दार अर्ध गोला कार दो बरामदे, एक के अंदर एक बने है। स्तंभों पर सुंदर नक्काशी से फूलदान, फूल पत्तियाँ  और पक्षियों के चित्रों को उकेरा गया है। स्तंभों के दोनों ओर पत्थर की बारीक नक्काशी दार  जालियाँ बनाई गयी है। नक्काशीदार पत्थर के  इस कॉरीडोर के अंदर ही तत्कालीन विधान सभा  अर्थात  तब के मध्य भारत की विधान सभा, जिसमे आज कल राज्य सभा के अनेकों कार्यालय कार्यरत है। मुख्य भवन के दोनों ओर बड़े बड़े प्रवेश द्वार के माध्यम से मोती महल के अंदर और ऊपरी कक्षों मे जाने के अनेकों रास्ते और सीढ़ियाँ बनाई गयी है। मोती महल के अंदर अनेकों आँगन और बरामदे बनाये गए है जिनके चारों ओर छोटे बड़े कमरों का निर्माण कराया गया है। पूरा भवन एक भूल भुलाइयाँ से कम नहीं हैं।

इन प्राचीन भवनों मे भ्रमण के बाद हम तीनों बैजा ताल से आगे सड़क की ओर बढ़े जो सिंधिया रियासत के राज निवास जय विलास पैलेस के उत्तरी  दरवाजे से होकर जाती है। जिसके अंदर सफ़ेद रंग की विशाल और भव्य महल  दिखाई दे रहा था,  जिसमे प्रवेश के लिए पश्चिम दिशा स्थित पाँच सितारा होटल "उषा किरण पैलेस" से होकर जाया जाता है। जय विलास पैलेस मे सिंधिया रियासत द्वारा संचालित रेल की पटरियों के अवशेष दिखाई देते है जो इस बात की गवाही देते है कि कभी ग्वालियर की सिंधिया रेल की लाइन राजमहल के अंदर तक जाती थी। जैसे छोटी लाइन के  प्राचीन भाँप के इंजिन को ग्वालियर स्टेशन के बाहर मॉडल के रूप मे प्रदर्शित किया गया है बैसा ही एक भाँप का इंजिन जय विलास पैलेस के बाहर भी दर्शन हेतु रक्खा हैं।

कुछ कदम आगे बढ़ने पर आज का महापौर कार्यालय जो ऐतिहासिक दृष्टि से ग्वालियर की तत्कालीन वास्तु का अनमोल नगीना है, जिसे जलविहार भी कहा जाता हैं। इस कलात्मक भवन के सामने बना वर्गाकार सरोवर इस भवन की सुंदरता मे चार चाँद लगा देता हैं। सरोवर मे बड़ी बड़ी रंग बिरंगी मछलियाँ विचरती हैं जिन्हे भ्रमण करने आए लोग आटे की गोलियां खिलाते हैं। आयताकार रूप मे निर्मित इस तालाब के चारों ओर पत्थर से निर्मित दो पतली नालियाँ पूरे वर्गाकार सरोवर के किनारे बनी हैं जिनमे पानी का बहाव निरंतर होता रहता हैं। सरोवर के बीच और किनारे की नालियों मे फब्बारे लगे हुए हैं जिन्हे मैंने कभी चलते तो नहीं देखा लेकिन जब फब्बारे चलते होंगे तो इस उस दृश्य की सुंदरता की कल्पना ही की जा सकती हैं। इस भवन के पीछे  ही एक इटालियन गार्डेन बनाया गया हैं जो वेशक आज उतना आकर्षक न हो पर ऐसा कहा जाता हैं कि इस बाग का निर्माण इटली के वास्तु पर आधारित हैं।

सुविधा की दृष्टि से घुम्मक्कड़ मित्रों को एक सलाह हैं कि ग्वालियर-चंबल के भ्रमण मे मोती महल का भ्रमण यदि सुबह 6-7 बजे करें तो पूरा महल निर्विघ्न-निर्वाध रूप से शांति पूर्वक विचरण कर देख सकते हैं अन्यथा 9 बजे के पश्चात राज्य सरकारों के अनेकों कार्यालय होने के कारण, यहाँ कर्मचारियों और आम जनों की भीड़ के बजह से न केवल आसानी घूम पाना कठिन होगा अपितु अफसरों की आवाजाही से कदम-कदम पर अवरोधों का सामना करना पड़ सकता हैं, क्योंकि यहाँ का वातावरण और रूप किसी ठेठ सरकारी कोर्ट-कचहरी की तरह दिखलाई पड़ता है ठीक श्री लाल शुक्ल के उपन्यास #राग दरबारी की तरह!!  इस तरह आज प्रातः का भ्रमण ग्वालियर राज्य की विरासत को एक सुंदर सुबह मे नजदीक से देखने की एक अविस्मरणीय यात्रा थी।

विजय सहगल   

शनिवार, 14 अक्टूबर 2023

कहानियाँ

 

"कहानियाँ"






मै प्रायः अपने ब्लॉग के लिये कहानियों का पीछा करता हूँ पर आज तो ऐसा लगा मानों  कहानियाँ ही मेरा पीछा कर रही हैं। मैंने अपने हैदराबाद प्रवास के दौरान विश्व विध्यालय मार्ग को सैर के लिये सर्वोत्तम जगह के रूप मे चुन रक्खा है, जब तक कि सैर के लिए  इससे अच्छा कोई वैकल्पिक स्थान नहीं मिल जाता। आज 15 सितम्बर 2023 को अपने उसी मार्ग का अनुसरण करते हुए जब स्टेट बैंक के प्रशासनिक कार्यालय के सामने से निकला तो एक सफाई कर्मी बड़े ही तन्मयता से नाले से निकले कचरे को अपनी ठेली मे रख नाले के चारों ओर सफ़ेद चूना पाउडर का छिड़काव कर रहा था। चूने के पाउडर से उड़े कणों से बचने के लिए जैसे ही मैं रुमाल मुंह पर रख आगे बढ़ा ही था कि मुझे एकाएक उस सफाई कर्मी के चेहरे पर उभरे  भाव से उस पर लिखी इबारत को स्पष्ट ढंग से पढ़ सका!! मानों बगैर बोले ही वह कह रहा हो, साहब!! ये तो हम गरीबों के भाग्य मे लिखा हैं कि जिस गंदगी को आप देखना भी नहीं चाहते उस गंदगी को हम  अपने हाथों से उठा कर साफ करते है? मुंह पर रुमाल रख के हम लोगो से  किनारा करना तो आप लोगो की फितरत मे हैं?? सुबह सुबह मेरे अंतरात्मा ने धिक्कारते   हुए कहा "तुम्हारे एक छोटे से कृत्य ने उस सफाई कर्मी  का दिल दुखया, ये ठीक नहीं किया? मैंने अपने मन की आवाज को तुरंत पढ़ उस सफाई कर्मी को नमस्कार!! कह संबोधित किया और अपने अनजाने मे किए व्यवहार को ठीक करते हुए उसकी ओर बढ़ा। वह कुछ अचकचा सा गया था,  जैसे उससे कोई भूल  हो गयी हो!! बैसे मै  हमेशा से ही इन दबे, कुचले, गरीब वर्ग को अपने  परिवार का हिस्सा मान अपने अनुभव यदा कदा  सांझा करता रहा हूँ।  मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए, पीठ थपथपा कर कहा, "कि हैदराबाद नगर ऐसे ही साफ-सुथरा और सुंदर दिखाई नहीं देता, इसमे आप जैसे लोगो का बहुत बड़ा  योगदान  हैं"। "अभी जब लोग अपने घरों मे सो रहे है और आप सड़क की सफाई के लिये सड़कों पर झाड़ू लेकर उतर आए!! बात चीत मे उस कर्मी ने अपना नाम हनुमंता बताया। प्रायः भाषा की संवाद हीनता यहाँ नहीं आयी क्योंकि वह महाराष्ट्रा का रहने वाला था और हिन्दी अच्छी तरह समझ और बोल सकता था।

जब मैंने उसके सफाई कार्य की प्रशंसा करते हुए पीठ थपथपाई तो वह कृतज्ञता  और आभार से झुक गया। उसे शीघ्र सवेरे किसी अंजान व्यक्ति से शायद ऐसे सकारात्मक व्यवहार की अपेक्षा नहीं थी। उसने बताया, कि वह  सुबह चार-साढ़े चार बजे उठ कर, दैनिक कार्यों से निव्रत्त होने के पश्चात छह बजे अपने सफाई के कार्य मे लग जाता है और दोपहर एक बजे तक अपने काम का निष्पादन करता है।  जब मैंने उससे पूंछा कि क्या वह हैदराबाद महा नगर पालिका का नियमित और स्थायी कर्मचारी हैं तो उसने इंकार करते बताया कि वह ठेकेदार के अंडर मे काम करने वाला सफाई कर्मी है और उसे मात्र 15000/- रुपए ही महवारी वेतन मिलता हैं। भविष्यनिधि भी उसके वेतन से कटती हैं। वह 12/- रुपए प्रतिवर्ष राशि की  प्रधानमंत्री जीवन  दुर्घटना बीमा योजना से अनिभिज्ञ था। महंगाइ के इस दौर मे परिवार को यध्यपि चलाना बड़ा कठिन था पर फिर भी पाँच बच्चों के परिवार मे उसने दो बेटियों की शादी भी कर दी। एक बेटा 12वीं मे तथा दूसरा 10वीं मे हैं। एक छोटा है जो छह वी कक्षा मे है। मैंने, उसे बच्चों को खूब पढ़ाने और उच्च शिक्षा के लिये बैंक से ऋण लेने की सरकारी योजनाओं और उनके वर्ग को मिलने वाले लाभों का भरपूर उपयोग करने  के लिये भी प्रेरित किया।

अभी कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि एक युवक बीच सड़क पर मोटरसाइकल मे आयी खराबी को पत्थर से ठोक कर ठीक करने का प्रयास कर रहा था। एक बारगी तो इस घटना को नज़रअंदाज़ कर, यह सोच  कुछ कदम आगे बढा कि मै 65 वर्षीय बरिष्ठ नागरिक कैसे उसकी सहायता कर सकूँगा?  पर फिर अंतर्मन से निकली आवाज ने मुझे धिक्कारा, इतने स्वार्थी मत बनो, भूल गए! एक बार यमुना एक्सप्रेस वे पर जब तुम्हारी कार का टायर उधण कर अलग हो गया था तब एक अंजान ट्रक ड्राईवर ने ट्रक रोक कर, कार का पहिया बदलने मे मेरा सहयोग किया था!! और जब उसे इस सहयोगा और अहसान के बदले कुछ पैसे देने का प्रयास किया था तो उसने विनय पूर्वक, वो राशि लेने से  इंकार कर दिया था। मै अपने अंतश्चेत्ना की आवाज को दबा न सका और मोटरसाइकल ठीक कर रहे उस युवक  को आवाज देकर सहायता करने का प्रस्ताव कर उसकी ओर बढ़ा। बाइक का पिछला पहिया जाम था। मैंने उससे कहा मै बाइक का हैंडल सम्हालता हूँ आप पिछले पहिये को कैरियर से कुछ उठा कर  पहले बाइक को,  सड़क किनारे लगा लो ताकि आ रहे वाहनों से दुर्घटना का अंदेशा न रहे। इस प्रयास मे देखा कि बाइक का अगला पहिया भी जाम हैं। तब एक बार फिर उस युवक ने मुझ से हैंडल पकड़ कर स्वयं अगले पहिये से उठा कर गाड़ी किनारे लगाने मे सहयोग का आग्रह किया। इस दौरान बाइक को पीछे से मैंने भी धक्का देकर गाड़ी को आगे घसीटा और गाड़ी को सड़क किनारे लगाया। अब तक पहिये मे भी कुछ गति आ गई थी। तब उसने गाड़ी को स्टार्ट किया जो धीमी गति से चलने लगी थी। इस तरह उस युवक ने मेरे प्रति आभार जताकर गाड़ी को मिस्त्री के वर्कशॉप की तरफ मोढ दिया। मै आज एक बार फिर कृतघ्नता से बच गया।  

हैदराबाद युनिवर्सिटी की इस रोड पर मै पहले भी कई बार आ चुका था। इस सड़क पर स्थित प्रायः हर बस स्टॉप की बेंचों पर मै  कुछ मिनटों तक विश्राम करता रहा हूँ सिवाय एक स्टॉप के! क्योंकि इस बस स्टॉप की बेंच पर जूते, कपड़े, रस्सी के सहारे लटका एक कंबल, चद्दर एक-दो झोले, पोलिथीन की थैलियों मे रक्खे  कुछ डिब्बे, फर्श पर पड़ी प्लास्टिक की चटाई आदि वस्तुएँ बेंच पर सदा रक्खी रहती।  इस बस स्टॉप के आसपास मै प्रायः एक नौजवान को घूमते देखता था। जो रोज ही लाइन वाली शर्ट के उपर नीला स्वेटर और पेंट को आधे घुटनों तक लपेटे, बिलकुल शांत हो, यहाँ वहाँ घूमता नज़र आता था। शायद उस नवयुवक ने परोक्ष रूप से उस बस स्टॉप को अपना आश्रय स्थल बना रक्खा था। निश्चित ही  वह मानसिक रोग या अवसाद  से ग्रस्त था।  आज भी वह मुझ से 20-30 कदम आगे-आगे जा रहा था। अचानक से उसने सड़क पर झुक कुछ उठाया और कुछ खाने के अंदाज के से मुंह तक ले जाकर बापस फेंक दिया। चूंकि मै भी सैर करता हुआ उसके पीछे पीछे ही था, लेकिन जब मैंने उसके द्वारा फेंका  एक छोटे प्लास्टिक का पाउच देखा जिसमे कुछ बची हुई चटनी और साँभर पड़ा थी जो शायद किसी राहगीर ने फेंकी होगी। यहाँ एक बार फिर मेरे मन ने धिक्कारा और प्रश्न किया? मिस्टर सहगल वो युवक तो मानसिक रूप से रोगी है, पर तुम तो नहीं?? युवक द्वारा खाली चटनी का पाउच फेंकने का उद्देश्य समझ नहीं आया? वो भूंखा भी तो हो सकता हैं? मेरे अन्तःकरण ने पुनः आज मुझे तीसरी बार झकझोरा!! मैंने उसे आवाज देकर पूंछा, क्या नाम है? लेकिन उसने कुछ भी समझने मे अनिभियता से कुछ बुदबुदाया, जो मै न समझ सका। शायद वो तेलगु के सिवाय कुछ नहीं जानता था!! तब मैंने हाथ की अनुगुलियों से निवाला बना कर मुंह की ओर ले जाने  के इशारे से पूंछा, कुछ खाओगे? तो उसने मौन स्वीकृति से "हाँ" मे सिर हिलाया!!, और मेरे पीछे आने लगा। अब तक मै श्रीनू (https://sahgalvk.blogspot.com/2023/09/blog-post_84.html) के दक्षिण भारतीय स्वल्पाहार गुमटी तक पहुँच चुका था। मैंने श्रीनू से कहा इसको पूंछ  कर जो ये मांगे खाने को दे दो,  शायद ये तुम्हारी बात समझ सके। ऐसा ही हुआ, श्रीनू ने जो प्रायः एक प्लेट मे छह पुंगलू (छोटे गोल बड़े) बड़े देता था आज उसने भी प्लेट मे आठ मेंदु बड़े और तीन तरह की चटनी अधिक मात्रा मे उस युवक को दे दी। युवक प्लेट लेकर  एक तरफ बैठ कर नाश्ता करता रहा। जब मैंने उसे दुबारा कुछ लेने के लिये इशारा किया लेकिन उसने फिर कुछ भी लेने से इंकार कर दिया।

विजय सहगल                  

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

पाला पित्त साइकल पार्क, हैदराबाद

 

"पाला पित्त साइकल पार्क, हैदराबाद"









आज हिन्दी दिवस के पवित्र दिन, प्रातः 14 सितम्बर  2023 को अपने रूटीन भ्रमण से हटके  मैंने तेलंगाना वन विभाग  द्वारा संचालित साइकल पार्क जाने का निश्चय  किया, जिसके लिए मुझे लगभग 2.5 किमी॰ पैदल चलना था। महानगरों मे सुबह से ही जीवन की भाग दौड़ और आपा-धापी शुरू हो जाती है, यहाँ भी देखने को मिली। वाहनों के शोर-गुल मे मेरे मोबाइल पर विविध भारती के गानों की आवाज भी सुनना मुश्किल हो गया। आप सोच रहे होंगे तब मै एफ़एम रेडियो सुनते समय ईयर फोन का इस्तेमाल क्यों नहीं करता तो मै यहाँ स्पष्ट करना चाहता हूँ कि ईयर फोन के कारण आये दिन होने वाली दुर्घटनाओं से बचाव के लिए ही मैंने भ्रमण के दौरान कभी ईयर फोन का उपयोग नहीं किया। हाँ वो बात अलग हैं कि घर के अंदर और एकांत मे मै भी ईयर फोन का इस्तेमाल करता हूँ लेकिन भ्रमण के दौरान मै समुचित आवाज मे विविध भारती का आनंद लेता हूँ।

लगभग 25-30 मिनिट की पैदल यात्रा के बाद मै साइकल पार्क के सामने था। आकर्षक प्रवेश द्वार के पहले प्रभाव ने ही एक अच्छी छाप छोड़ी। पार्क सुबह साढ़े पाँच बजे ही खुल जाता हैं। पार्क के अधिकारी श्री रमेश रेड्डी अपने अधीनस्थ स्टाफ के साथ मुस्तैदी से अपने कर्तव्य निष्ठा के पालन मे रत दिखे। मैंने साइकल किराए के सामान्य नियम और शर्ते पूंछी। 50/- रुपए प्रति घंटा और 18% जीएसटी टैक्स अर्थात 59/- रुपए कुछ ज्यादा तो था  लेकिन एक-दो बार के अनुभव के लिए इतनी कीमत तो दी ही जा सकती थी। 500 साइकल की क्षमता के स्टोर के साथ साइकिलों का रख रखाव भी अच्छा दिखा। 59/- रुपए के डिजिटल भुगतान के साथ अब एक साइकल हमारे सुपुर्द कर दी गयी। छोटी-मोटी साइकल सवारी को छोड़ दें तो  आज लगभग 42-43 साल बाद इस साइकल यात्रा ने मुझे झाँसी मे कॉलेज के दिनों और लखनऊ मे बैंक की सेवा के दौरान साइकल के उपयोग की  यादें ताजा करा दी। 10 जुलाई 2021 के अपने ब्लॉग  "साईकिल" की (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/07/blog-post_10.html) भी याद  ताज़ा कर दी, जब झाँसी के अपने कॉलेज मे साइकल को भूल से छोड़ आया था जो सारी रात कॉलेज के साइकल स्टैंड पर ही पड़ी रही। 1980 मे बैंक की सेवा   ग्रहण करने के दौरान कैसे  साइकल मेरे जीवन का हिस्सा थी जब आलमबाग, लखनऊ  से लगभग 8-9 किमी॰ दूर, लीला थिएटर, हज़रत गंज स्थित रीजनल ऑफिस और बाद मे मेफयर थिएटर के पास स्थित हजरतगंज शाखा जाया करता था।

प्रातः 7.24 बजे जब मैने 2॰71 किमी॰ के साइकल ट्रैक पर चलना शुरू किया जो एक कच्चे पगडंडी नुमा पर साफ सुथरा था  और रास्ते के दोनों ओर पेड़ों से आच्छादित एवं पूर्णतः शांत  और प्रदूषण से मुक्त था। चंद मिनटों की साइकिलिंग के साथ ही हैदराबाद शहर के वाहनों का कोलाहल और शोर शराबा मानो छू मंतर हो गया। प्रदूषण का नामो निशान नहीं था। वाहनों के हॉर्न और दो पहिये तथा चार पहिया वाहनों से निकलने वाले धुआँ दूर दूर तक अदृश्य था, इसकी जगह पक्षियों का कोलाहल और सुरीली आवाज़े वातावरण मे सुनाई देने लगी। शहर के कंक्रीट  जंगल के इस साइकल पार्क मे स्वतंत्र रूप से विचरती मोर को देखना एक सुखद अनुभव था। अन्य तरह के  पक्षियों मे कोयल, फाख्ता तोता आदि पक्षियों का कलरव की कल्पना ऐसे महानगरों मे कदाचित ही की जा सकती हो।  सुबह सुबह आज  यहाँ पार्क मे  ज्यादा साइकल सवार तो नहीं थे लेकिन सप्ताहांत यानि शनिवार और रविवार को पार्क मे ज्यादा साइकल सवार नज़र आते है। कई  जगहों पर  मैंने कभी मोबाइल से फोटो लेने  और कभी थकावट के कारण साइकल को यदा कदा रोका। रास्ते मे एक झील, और एक बड़ी ऊंची चट्टान जो बिलकुल ऐसे दिखाई दे रही थी मानों एक विशालकाय हाथी, पीठ दिखाते हुए बैठा हो!! सुंदर फूलवारी और रंग बिरंगे फूलों के झाड़ों से गुजरना मन को सुखद अहसास करने वाला था पर  हरी काई से भरे जल से भरे एक छोटे से पॉण्ड मे अपनी जिज्ञासा वश साइकल के साथ पहुंचा तो वहाँ पड़ी प्लास्टिक की बोतलों, थैलियों, खाली सीमेंट की बोरी, पुराने कपड़ों के ढेर और  अन्य कचड़े को देख दुःख हुआ। इस कचरे को  हटा कर इस जगह को प्रकृतिक रूप दिया से सुंदर बना कर किया जा सकता था। एक जगह झील का रास्ता दिखाता एक बोर्ड और उस पर  साँपों से सावधान होने की सूचना ने क्षणिक डर तो उत्पन्न किया, पर साइकल का रास्ता चौड़ा और साफ था अतः इस तरह साँपों के आने का कोई अंदेशा नहीं था। झील का पानी शांत और साफ था। बगुला जैसे  कुछ जलचर पक्षी विचरते नज़र आये लेकिन इस झील मे नहाने की सख्त मनाही थी। इस हेतु मैंने मोटर साइकल पर वन विभाग के एक गार्ड को निगरानी करते देखा और उसके कर्तव्य पारायण की प्रशंसा भी की। गोलाकार साइकल पथ को के बीच मे धन (प्लस, +) के आकार के रास्ते बनाए गए थे जो बच्चों की साइकिलिंग और साइकल सीखने वालों के आरक्षित थे। जगह जगह स्टील की बेंच भी लगाई गयी थी जिस पर मैंने भी बैठ कर आठ बजे का समाचार बुलेटिन सुना। कुछ मिनटों तक रागम चैनल पर शास्त्रीय संगीत का आनंद लिया। अब तक 8॰21 बज चुके थे। एक घंटे का समय भी हो रहा था। तब प्रवेश द्वार के पास बने स्टोर पर कर्मियों को बापस साइकल सुपर्द कर दी। यहाँ इस बात का उल्लेख भी करना आवश्यक है कि पार्क के अंदर ही महिला और पुरुषों के लिए अलग-अलग  साफ सुथरे प्रसाधन कक्ष उपलब्ध थे जिसमे पानी की व्यवस्था थी और हाँ पीने के पानी की भी समुचित व्यवस्था वन बिभाग ने उपलब्ध कराई हुई थी। ये बात सही है कि यदि ये जगह वन विभाग के अधीन न होती तो इस पर बिल्डरों की कभी कुदृष्टि पड़ चुकी होती और यहाँ भी हरे भरे पेड़ों के जगह  कंक्रीट का जंगल खड़ा हो चुका होता लेकिन ये भी उतनी ही सच्चाई है कि पार्क की चाहरदीवारी से सट कर बने बहुमंजिले भवनों मे निवासरत् लोग अत्यंत ही सौभाग्यशाली होंगे जिनको घर के पिछवाड़े सहज ही एक प्राकृतिक और सुंदर वातावरण रूपी जंगल और साइकल पार्क  मिला जिसे वो लाखों रुपए खर्च कर भी नहीं पा सकते थे। 

कुल मिलाके भीड़ भाड़ वाली जगह मे शांत, साफ-सुथरी और प्रदूषण मुक्त जगह मे एक घंटा साइकल से शरीर के व्यायाम और  हरे भरे वृक्षों के बीच बेंचों पर बैठ कर विश्राम करने  की ऐसी सुविधा मात्र 59/- रुपए मे कोई महँगी नहीं कही जा सकती जैसा कि शुरू मे मैंने उल्लेख किया था। निश्चित ही तेलंगाना सरकार का वन विभाग इस हेतु बधाई का पात्र है।      

विजय सहगल

सोमवार, 2 अक्टूबर 2023

राहुल गांधी का सत्यम् शिवम् सुंदरम् अर्थात अध जल गगरी छलकत जाए






दिनांक 1 अक्टूबर 2023 को  ट्विटर सहित अन्य सामाजिक माध्यमों और समाचार पत्रों मे  श्री राहुल गांधी द्वारा लिखित दो पेज का  लेख "सत्यम् शिवम् सुंदरम्"  प्रचारित और प्रसारित हो रहा हैं जिसमे उन्होने हिन्दू धर्म की व्याख्या अपने शब्दों मे की हैं। पूरे लेख मे उन्होने 16 बार "भय" या "भयावह" का उल्लेख कर हिंदुओं को उपदेश दिये हैं जबकि सनातन धर्म का मूल आधार ही "भय के सर्वथा आभाव" से शुरू होता हैं जैसा कि भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 16, श्लोक संख्या 1 मे, दैवी सम्पदा प्राप्त पुरुष (सनातनी) के लक्षणों के बारे मे लिखा हैं:-            

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।
अर्थात

"भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, ध्यानयोग मे निरंतर दृढ़ स्थिति और दान, इंद्रियों का दमन, यज्ञ, वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन, तप और शरीर तथा इंद्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता, पर  राहुल गांधी के आलेख की अधिकतर व्याख्या हिन्दू धर्म की शिक्षाओं, सिद्धांतों और नीतियों  के विपरीत, अप्रासंगिक, असंगत और असंबद्ध हैं। जिस हिन्दू धर्म और हिन्दू की उन्होने व्याख्या की,  वह सनातन धर्म के पवित्र ग्रन्थों  मे उल्लेखित शिक्षाओं से कहीं मेल नहीं खाती। दो  पेज की 41 लाइन के इस आलेख मे लिखे विचारों के समर्थन मे न तो उन्होने कहीं किसी ऋषि, संत या महापुरुषों का संदर्भ दिया और न ही किसी धार्मिक ग्रंथ का उल्लेख ही किया हैं। लेख मे उन्हेने  उत्साह और आनंद के साथ "भय" से जोड़ कर कभी मृत्यु का "भय", कभी दुःखों का "भय", कभी लाभ-हानि का "भय", कभी भीड़ मे खो जाने का "भय" और कभी असफलताओं के "भय" से जोड़ कर भयभीत कराने का प्रयास किया जो कि सनातन हिन्दू धर्म की मूल शिक्षाओं के एकदम विपरीत हैं। ऐसे ही सांसरिक माया मोह के बंधन से "भय मुक्त" करवाने के लिए ही तो भगवान श्री कृष्ण ने शोक और विषाद से भय ग्रस्त अर्जुन का साहस बढ़ाते हुए कुरुक्षेत्र मे निर्भयता, निडरता की शिक्षाएं देकर .......त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप अर्थात हे! अर्जुन!, युद्ध के लिए खड़े हो जाओ ( अध्याय 2, श्लोक .3) एवं ........तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः अर्थात  हे! अर्जुन, युद्ध के लिए निश्चय पूर्वक  खड़े हो जाओ......(ध्याय 2, श्लोक .37) के उपदेश दिये थे और यहाँ एक राहुल गांधी हैं कि सांसरिक काम, क्रोध, लोभ के भय से इस जीवन मरण के चक्र से मुक्ति के मार्ग मे अबरोध उत्पन्न कर "मोक्ष से वंचित कर रहे हैं अर्थात रोड़े अटका रहे हैं। वहीं  हमारे शास्त्र और ग्रंथ इन तीन प्रकार के नरक के द्वार को आत्मा का नाश करने वाले बता कर इन का त्याग करने का आदेश देते हैं। (गीता अध्याय 16 श्लोक 21)    

न जाने राहुल गांधी ने अपने आलेख मे कहाँ से हिन्दू धर्म की व्याख्या को गढा?, जिसमे वे कहते हैं कि इस जीवन रूपी "महासागर मे आज तक न तो कोई बच पाया हैं, न ही बच पाएगा" अर्थात मारे जाने और मृत्यु का भय दिखाया है जबकि श्रीमद्भगवत गीता मे हर कदम पर पुनर्जन्म की व्याख्या करते हुए अध्याय 2 के श्लोक संख्या 20 से 25 मे बासुदेव भगवान श्री कृष्ण, "आत्मा को किसी भी काल मे अजन्मा,  नित्य, सनातन और पुरातन बताते हुए कहते हैं कि शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता (अध्याय 2 श्लोक 20)।

आत्मा को नाश रहित, अव्यय बताते हुए वे कहते हैं कि, "जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र धरण करता हैं बैसे ही यह आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नए शरीर को प्राप्त होती हैं" (अध्याय 2 श्लोक 22)। न जाने कौन से विक्षिप्त चित्त अध्यन का अनुसरण कर श्री राहुल गांधी ने निरंतर जीवन यात्रा के  महासागर की गहराइयों को मृत्यु और अन्य छद्म सांसरिक सुखों को  भयावह निरूपित कर सामान्य मानवी के मन मे भय पैदा करने की कोशिश की हैं जबकि, "मनुष्य शरीर मे जैसे कि बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती हैं। धीर पुरुष इसमे मोहित नहीं होते!! (अध्याय 2 श्लोक 13)

अध्याय 2, श्लोक 27 मे भगवान  श्री कृष्ण कहते हैं कि हे! अर्जुन, जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है, तब इस बिना उपाय वाले विषय मे क्या शोक करना। इस तरह सनातन धर्म मे मृत्यु के विषय को अभय और निर्भय निरूपित कर शोक और भयमुक्त मार्ग प्रशस्त किया हैं, इसके विपरीत राहुल गांधी तमाम भयों के उल्लेख के साथ मृत्यु का भय हिंदुओं को दिखाने की चेष्टा करते है।   

सनातन धर्म मे ऋषियों की वाणी मे ही "भय से मुक्ति" की शिक्षाएं निहित हैं। श्री आदि शंकराचार्य ने भी "गीता महात्म्य" की व्याख्या करते हुए लिखा हैं कि, "गीता शास्त्र का नित्य पाठ करने वाला, भगवान विष्णु के आश्रय से "भय, शोक आदि चिंताओं से मुक्त हो जाता है। (भय शोकादि वर्जित:....) और एक राहुल गांधी हैं जो कदम कदम पर हिंदुओं को भय दिखा कर झूठी व्याख्या गढ़ रहे हैं।     

हिन्दू होने की एक नयी परिभाषा राहुल गांधी ने गढ़ी कि "जिसमे, अपने "भय" की तह मे जाकर इस महासागर को सत्य निष्ठा से देखने का साहस है-हिन्दू वहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता हैं कि अपने निजी जीवन के डर, भय और अनिश्चितता के चलते उन्होने हिंदुओं को एक नई तरह की विवेचना को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की हैं अन्यथा श्रीमद्भगवत (गीता के अध्याय 12 के श्लोक 15) मे भगवान श्री कृष्ण ने हर्ष, अमर्ष (दूसरे की उन्नति को देख संताप/शोक करने वाला), "भय मुक्त",  भक्त को अपना प्रिय बताया हैं जो श्रीमान राहुल के विचारों के एक दम विपरीत हैं। सनातन की ऐसी कुव्याख्या कोई सामान्य और साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता? ऐसी मनगढ़ंत परिभाषाएँ तो कोई "असामान्य" और "असाधारण महापुरुष" ही कर सकता हैं!!     

राहुल गांधी के इस "अध्यात्म विध्या" मे उल्लेखित विचार आपस मे ही विरोधाभाषी हैं जिसकी बानगी उनके आलेख मे देखने को मिली। पेज 2 पर वे "भय को गहनता से देखने और स्वीकार करने" को हिन्दू का साहस निरूपित करने का प्रयास करते हैं। भला भय को स्वीकारने मे साहस कैसा? भय या डर को निडरता पूर्वक दमन  ही साहस हैं, भय को स्वीकार करने की शिक्षा हमे कायर बनाएगी इसलिए हम दृढ़ता पूर्वक राहुल गांधी की व्याख्या से असहमति रखते है। आगे वे हिन्दू को" भय के वश मे आकर कमजोर न होने" की नसीहत देते हैं। हे! आर्यपुत्र राहुल गांधी मै आपसे आग्रह पूर्वक कहना चाहते है कि "भय" अपने आप मे ही  एक कमजोरी हैं, कायरता है और इसी भय से निर्भय और अभय के मार्ग को प्रशस्त करने की शिक्षाएं तो हमारे पवित्र ग्रंथ देते हैं। आप सनातन धर्म के ग्रन्थों और पवित्र पुस्तकों की शिक्षा किसी श्रेष्ठ गुरु के अधीन, ग्रहण कर चिंतन मनन और अध्यन करें तो न केवल आपका अपितु  देश का कल्याण होगा अन्यथा हमारे यहाँ एक कहावत हैं कि :-

"अधजल गगरी, छलकत जाए"

विजय सहगल