शुक्रवार, 11 अगस्त 2023

एक सुहानी सुबह

 

"एक सुहानी सुबह"





जब से 23 जुलाई 2023 को प्रातः भ्रमण के दौरान तमिलनाडू के कग्नूर गाँव जाना हुआ तब से अब, सुबह की घुम्मकड़ी का ऐसा क्रम बना कि तमिलनाडू के इस छोटे से गाँव कग्नूर  से कुछ  आसक्ति हो गयी कि प्रातः  कर्नाटक के थिण्ड्लु गाँव से 2-2.5 किमी दूर   मोटरसाइकल से घर से निकल कर कग्नूर पहुंचता और वहाँ मंजूनाथ की टी स्टाल पर बाइक रख घूमने निकल जाता। वहाँ से पैदल भ्रमण के दौरान मोबाइल पर विविध भारती के  एफ़एम रेडियो पर "वंदनवार", "रामचरित मानस", "संगीत सरिता", "भूले विसरे गीत" और "हम है राही प्यार के" कार्यक्रमों पर भजन, पुराने गानों के बाद  समाचार बुलेटिन सुनता जो मनोरंजन के साथ-साथ समय की सूचना देते  रहते। इस पृक्रिया के बाद जब 24 घंटे चलने वाला चैनल रागम पर दक्षिण भारतीय क्लासिकल संगीत सुनने को मिलता तो समय का पता ही नहीं चलता और ये क्रम तब तक चलता रहता जब तक गूगल फिट पाँच  हजार कदमों की संख्या पूरी होने का संकेत नहीं दे देता। जैसे ही पाँच हजार कदम पूरे होते उल्टे कदमों से घर बापसी शुरू हो जाती।  

कग्नूर गाँव से ये अनुराग यूं ही नहीं हुआ, दरअसल इसका एक बहुत बड़ा कारण कर्नाटक सीमा से जैसे ही तमिलनाडू सीमा मे आप प्रवेश करते है तो सड़क का आकार दुगना अर्थात  2 लेन सड़क से चार लेन सड़क का हो जाना है। सड़क की इस चौड़ाई के कारण घूमने मे सुरक्षा का भाव बना रहता, वहीं  मौसम की गुलाबी सर्द ठंडी हवाएँ  सड़क किनारे घूमने के सहज और सुंदर भाव पर  सोने पर सुहागा बनाने का कार्य कर देती। आज 3 अगस्त 2023 इस सुहानी सुबह, ऐसा ही कुछ मौसम था। मंजूनाथ की टी स्टाल से बगलूर (तमिलनाडू) लगभग 6 किमी था। इसलिए सुबह की घुम्मकड़ी इस निश्चय के साथ शुरू की, कि आज गूगल फिट के पाँच हज़ार कदमों के बाद उल्टे कदम बापसी के बजाय सीधे एक दिशा मे दस हजार कदम बगलूर (बेंगलुरु नहीं) तक चलकर पूरे किए जाए और बगलूर से कग्नूर तक बापसी बस से पूरी की जाय।



इस नेक इरादे के साथ मैंने प्रातः भ्रमण की अपनी पद यात्रा शुरू की। यूं तो सड़क पर वाहनों की आवाजाही ज्यादा न थी पर यदा-कदा  रेती, पत्थर, गिट्टी से लदे 12 चक्के वाले बड़े बड़े डंपर, सड़क के यातायात मे तीव्र शोर के साथ हलचल पैदा कर देते। तीव्र गति से आ राही कुछ कारों के बीच मे बेंगलुरु और हुसूर के बीच दैनिक आवागमन करने वाले दुपहिया वाहनों की बहुतायत रहती। शायद ही कोई दुपहिया वाहन चालक सवार महिलाएं या पुरुष सर्द हवाओं से बचने के लिये  गर्म स्वेटर, फुल जैकेट या हुड सहित जैकेट के बिना दिखेँ हों। मुझे भी अपने आवास से दो-ढाई किमी॰ जाने मे अच्छी ख़ासी सर्दी का सामना करते हुए कग्नूर तक जाना पड़ता। सर्दी का प्रकोप दिन के नौ बजे के बाद कम होना शुरू हो जाता है लेकिन हवा मे नमी और ठंडक पूरे दिन बनी रहती। बच्चों की स्कूल बस, माता-पिता द्वारा बच्चों को स्कूल तक स्कूटी से छोड़ने और कुछ बच्चों का पैदल ही स्कूल जाने का क्रम मुझे अपने स्कूल के दिनों की याद दिलाता रहता। बीच बीच मे बच्चों से नमस्ते या गुड मॉर्निंग करते हुए मै  अपनी मंजिल की ओर बढ़ता रहा। इस दौरान रास्ते मे गवर्नमेंट हाइ स्कूल मे पढ़ने वाले बच्चों वैशाली, सौजन्या और यशराज से भी भेंट हुई जो मुख्य सड़क से लगभग एक किमी॰ अंदर कोठापल्ली  अपने स्कूल जा रहे थे। इन बच्चों से बातचीत मे  जब इन बच्चों से इनके भविष्य के बारे मे पूंछा तो इनके उत्तर मे आत्मविश्वास की झलक स्पष्ट देखने को मिली जब इन बच्चों ने वकील, पुलिस अधिकारी और पायलट बनने की इच्छा बताई।



एक जगह पारदर्शी पोलिथीन से ढके एक बड़े "पॉली हाउस" को देख उसके अंदर जाने की इच्छा के  लोभ संभरण से अपने आप को न रोक सका, जिसके अंदर "डहेलिया" के फूलों की बागवानी हो रही थी। आठ दस मजदूर फूलों को तोड़ एकत्रित कर रहे थे। वाराणसी के धर्मेन्द्र सहित उनके परिवार के लोग यहाँ मजदूरी के लिए आए थे। पूरी तरह वैज्ञानिक संसाधनों के साथ फूलों का व्यापारिक उत्पादन होते देखना एक अच्छा अनुभव था। पूरे फार्म हाउस मे चार रंगों के फूलों को एकत्रित करने का काम चल रहा था। लाल, पीले सफ़ेद और गुलाबी फूलों को इन मालियों ने लगभग एक फुट टहनी के साथ तोड़ कर डिब्बों मे एकत्रित किया था। गुलाबी रंग के डहेलिया के फूलों ने मन मोह लिया। पॉली हाउस के प्रबंधन देख रहे श्री निवास ने बताया कि हर दिन एक लाइन को छोड़ एक लाइन से फूल चुने जाते है ताकि इनको तोड़ने का नित्य क्रम चलता रहे।




एक जगह सड़क के किनारे पेड़ के चारों तरफ एक नयी रेशम की साड़ी को बांधा गया था जो शायद अखंड सौभाग्य की निशानी थी। इस तरह के चलन स्थानीय स्तर पर कहीं कहीं दिखाई दे जाते। क्षेत्र मे इस तरह के प्रचलन या किवदंतियों पर यदि किसी सुधि पाठक को विस्तृत  जानकारी हो तो कृपया सबके साथ सांझा करें तो खुशी होगी?

लगभग 40-45 मिनिट सैर के बाद एक साफसुथरे आंजनेय भगवान (हनुमान जी) के मंदिर मे दो मिनिट का विश्राम सुकून दायक था। इस दौरान मोपेड़ से आए एक सज्जन से भेंट हुई जो नित्य ही इस मंदिर मे पूजा के लिए आते है पर भाषा की संवादहीनता के कारण ज्यादा बातचीत न हो सकी सिर्फ इशारों से थोड़ा बहुत संवाद हो सका। ग्रामीण क्षेत्रों मे इस तरह के प्रसंग बड़ी साधारण बात है लेकिन भाषा की संवाद हीनता के बावजूद सफल संवाद प्रेषण की कला  से ही आपके बुद्धि कौशल की असली परीक्षा होती है।



कुछ आगे एक्सिस बैंक का एक एटीएम लगा देखा जिसके रास्ते मे उगे झाड़-झंकार, घास-फूस और कटीली झाँडियाँ को देख लगा, "बहुत कठिन है डगर पनघट की" कैसे मे भर लाऊं, पनघट (एटीएम) से मटकी (रुपए)!! लेकिन एटीएम तक पहुँचने का मार्ग भी नज़र नहीं आ रहा था!! क्योंकि रास्ते मे जंगली घास और कटीली झड़ियों ने एटीएम तक पहुँचने के मार्ग को बाधित किया हुआ था। ऐसी स्थिति को देख एटीएम से रुपए निकालने वाले ग्राहक पर जिगर मुरदाबादी की वो पंक्तियाँ याद आ गयी कि :-

"ये इश्क नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे", "इक आग का दरिया हैं और डूब के जाना है"।   

रास्ते मे स्थानीय नस्ल की गायों के गले मे बंधी घण्टियों की सुरीली आवाज करती गायों के  एक झुंड को देख मन प्रफ़्फुलित हो गया। स्थानीय गायों के सींगों की बनावट एक विशेष आकार प्रकार की होती है जिनकी संख्या अब इस क्षेत्र मे कम देखने को मिलती है।



अब तक बगलूर की लगभग सात  किमी॰ की दूरी तय कर चुका था। कुछ विश्राम की आकांक्षा की उम्मीद से तमिलनाडू इलैक्ट्रिसिटी बोर्ड के ऑफिस मे चला गया जहां वेंकटेश और प्रेम कुमार से मुलाक़ात हुई और बिजली विभाग से संबन्धित बातचीत का सिलसिला चालू हो गया। ये दोनों मीटर रीडर थे और इनका सामना हर रोज़ बगलूर के जन साधारण से होता है। इनका कहना था कि बिजली के बिलों की बसूली शतप्रतिशत हैं। जब हमने दिल्ली सहित उत्तर भारत सीधे कंटियाँ डाल कर खंभे से बिजली लेने की बात पूंछी तो उनके चेहरे पर सवालिया कुटिल हंसी दिखाई दी? उन्होने बताया कि यहाँ बगैर मीटर के कोई भी बिजली नहीं जलाता अर्थात बिजली चोरी न के बराबर हैं। बिजली की कीमत सौ यूनिट तक मुफ्त के बाद अलग स्लैब के अनुसार है जो अधिकतम छह रुपए प्रति यूनिट  के लगभग है।



इस विश्राम के बाद हम अपनी मजिल बगलूर पहुँच चुके थे। स्थानीय होटल पर चाय और कुछ स्वल्पाहार कर बस स्टैंड पहुँचे। बस हाल ही मे आयी थी और चालीस मिनिट के बाद  बापस जानी थी। एक सुहानी सुबह के सर्वोत्तम आनंद के बाद चालीस मिनिट के इंतज़ार ने मुझे "लौट के बुद्धू घर को आये" का अहसास कराने को मजबूर कर दिया।

विजय सहगल

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

Amazing 👌👌👌👌

बेनामी ने कहा…

सहगल जी इस तरह नयी जगह के बारे जानकारी साझा करने से हमें भी एक अलग जगह के बारे पता लगता है और उस राज्य के विकास और वहां रहने वाले लोगों के बारे भी जानकारी मिलती है 👍🙏
नेगी, दिल्ली