शुक्रवार, 27 जनवरी 2023

मेरी पहली विदेश (नेपाल) यात्रा

 

"पहली विदेश (नेपाल) यात्रा"








9 नवम्बर 2022 के मेरे  राशि फल मे शायद विदेश यात्रा का योग रहा होगा पर मुझे इस बात की जरा भी आभास नहीं था कि आज मै अपने पड़ौसी देश नेपाल की यात्रा पर जाऊंगा। कार्यक्रमानुसार मिरिक की यात्रा के बीच अचानक एक जगह सूचना बोर्ड ने  "नेपाल-0 किमी॰" बताया। सड़क से लगी कुछ दुकानों पर तमाम गिफ्ट आइटम, गरम कपड़े एवं कुछ खाने पीने के छोटे छोटे जलपान गृह थे जो नेपाल देश की धरती पर थे। नेपाल के ये बहुत सीमित क्षेत्र का बाज़ार था।  कुछ किमी॰ और आगे जाने पर आधिकारिक तौर पर दोनों देशों की सीमा मौजूद थी। बाकायदा बैरियर से दोनों देशों की सीमाओं का निर्धारण किया गया था। भारत की सीमा मे सीमा सुरक्षा बल और पश्चिमी बंगाल की पुलिस मुस्तैदी से तैनात थी वही दूसरी ओर कुछ कदम की दूरी पर नेपाल पुलिस के लोग अपने देश की सीमा पर तैनात थे लेकिन दोनों देशो की सुरक्षा बलों के लोग पाकिस्तान और चीन की सीमा के विपरीत  एक मित्रता पूर्ण माहौल मे एक दूसरे को समान रूप से सम्मान देते हुए अपने-अपने कार्यों मे व्यस्त थे।

जब पश्चिमी बंगाल के पुलिस अधिकारियों से मैंने  सीमा पार नेपाल जाने की औपचारिकताओं के बारे मे जानना चाहा तो उन्होने बड़ी तत्परता और व्यावहारिकता के साथ आधार कार्ड और मोबाइल नंबर एक रजिस्टर पर दर्ज़ कर मात्र हस्ताक्षर प्राप्त  किए और हो गयी सारी औपचारिकता!! मुझे इतनी त्वरित और न्यूनतम औपचारिकता की उम्मीद नहीं थी। अब क्या था हम अगले कुछ  कदम पार  नेपाल की सीमा मे थे। दूसरे देश की धरती पर कदम रखना, एक अलग ही उत्साह और उमंग और रोमांच  उत्पन्न  कर रहा था। यध्यपि लोगो की भेषभूषा, बोलचाल और रहन सहन मे कोई अंतर नहीं था फिर भी मै भौगोलिक और विधिक रूप से नेपाल मे एक विदेशी यात्री के रूप मे था। मै नहीं कह सकता कि पशुपति नगर के लोग मुझे किस दृष्टि से देख रहे थे पर मै स्वयं नेपाल मे एक विदेशी यात्री के रूप मे सोच, उत्साह, जोश और  रोमांच का अनुभव कर रहा था। क्योंकि ये मेरी पहली विदेश यात्रा थी।

नेपाल सीमा मे लगी दुकानों पर थोड़ा ठहलने और  कदम ताल करने पर एक व्यक्ति ने टैक्सी से पशुपति नगर के अंदर ले चलने का आमंत्रण दिया। भारतीय मुद्रा के 300/- रुपए मे टैक्सी का  लौटा-बाट भाड़ा सुन मुझे ये सौदा सस्ता लगा। इस तरह मात्र 300 रुपए खर्च कर टैक्सी मे बैठते ही मेरी पहली विदेशी नेपाल यात्रा शुरू हो चुकी थी। कह नहीं सकता कि नेपाल का पशुपति नगर, सीमा पर स्थित होने के कारण इतना साफ सुथरा था या वहाँ के नागरिकों का स्वभाव ही साफ सफाई वाला था, लेकिन कुछ भी हो इस नगर की साफ सफाई, चौड़ी सड़के और मृदभाषी लोगो को देख मन प्रसन्न तो था ही। जिज्ञासा और उत्सुकता कभी कपड़ो के भाव और कभी सब्जी के रेट पूंछ नेपाल से अपने देश की महंगाइ के तुलनात्मक अध्यन एक अर्थशास्त्री की तरह शुरू हो चुके थे। गरम कपड़े लुधियाना से बिक्रय हेतु लाये गए थे। गिफ्ट आइटमस पर चीनी वसुतुओं का वर्चस्व था। सब्जी और सीमित प्रकार के फल भी ठीक ठाक ही थे पर कीवि 50 रुपए किलो  देख, आधा किलो कीवि ले ली जो स्वाद मे अत्यधिक मीठी और एक अलग तरह का क्रिस्पी स्वाद लिए थी। होटल ढुक-ढुकी के बोर्ड पर गोर्खा स्ट्रॉंग बीयर का विज्ञापन था पर दुकान के एक भाग मे चाय-नाश्ते का होटल भी था। होटल को देख कुछ यूं ही चाय पीने की इक्छा को जाग्रत किया। वहाँ गुप्ता जी से भेंट हुई जो होटल के मालिक थे और भारत के आजमगढ़  के रहने वाले थे। अनौपचारिक परिचय के बाद उन्होने बढ़िया बगैर चीनी की चाय और नमकीन खुरमे का स्वल्पाहार कराया।  एक मीठी और मधुर सेल्फी के साथ स्वादिष्ट चाय का सेवन यादगार था।

एक भवन की पहली मंजिल पर लगे बोर्ड "सूर्योदय नगर पालिका" के कर्मचारियों से बोर्ड पर लिखे "इलाम" शब्द का अर्थ जानने की जिज्ञासा, उन लोगो से बातचीत मे भाषा की  संवादहीनता के कारण समझ न सका। एक भवन पर "नेपाली कॉंग्रेस" के कार्यालय का बोर्ड देख ठिठक गया। एक समय नेपाल मे सत्तारूढ़ रहे  दल के साधारण और सादगी पूर्ण कार्यालय को देख अपने देश के राजनैतिक दलों के भवनों और कार्यालयों से तुलना ने इन दलों की सोच और व्यवहरिकता पर सोचने को मजबूर कर दिया??

एक बजाज लोडर पर लाउड स्पीकर पर कुछ सेल करने की आवाज सुनाई दी, पर भाषा की अनिभिज्ञता के कारण न  समझ सका। नजदीक आने पर ज्ञात हुआ 100 रुपए मे पैकेट बिक्री का कार्य हो रहा था। पता किया तो उस पैकेट मे चार सौ ग्राम नीबू का पैकेट बेचा जा रहा था जो कौतूहल का विषय था। नेपाल मे वस्तु विनिमय से ज्यादा देशाटन का उद्देश्य पूर्ण हुआ और अब नेपाल से अपने देश की सीमा मे बापसी का समय था। 

सड़क से निकलती टैक्सी के एक ओर भारत और दूसरी ओर नेपाल को देखना कौतूहल उत्पन्न करने वाला था। श्रीमद्भगवत गीता मे एक श्लोक पढ़ा था:-

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।17.20।।

यहाँ सात्विक दान के माध्यम से बताया गया कि प्रत्येक घटित घटना या प्रसंग के पीछे देश (स्थान), काल (समय), पात्र (व्यक्ति) का हाथ होता है। कैसे एक देश की सीमा रूपी रेखाओं  के बदलने से वहाँ रह रहे नागरिकों के भाग्य बदल जाते है और कैसे उन्हे उस देश मे रहने की कीमत अदा करनी पड़ती है।  जिसका जीवंत उदाहरण आज का पाकिस्तान है!! यदि आज पाकिस्तान की सीमा रेखाएँ  अखंड भारत का हिस्सा होती  तो वहाँ के नागरिकों को 10 किलो आटे के लिए लाइन मे लग कर, दर-दर की ठोकरे न खाने पड़ती। इसलिए यात्रा कार्यक्रम मे नेपाल, बांग्लादेश और चीन की सीमाओं का भ्रमण से मेरा ये निष्कर्ष था कि भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी उन्नति, बुद्धिमति  और अभिव्यक्ति व्यक्त करने  की जो स्वतन्त्रता हांसिल है, शायद ही किसी अन्य देश मे हो!!

विजय सहगल

  

                  

 

मंगलवार, 24 जनवरी 2023

"सर्जिकल स्ट्राइक-प्रमाण??"

 

 

"सर्जिकल स्ट्राइक-प्रमाण??"



28-29 सितम्बर 2016 को हमारी सेना के बहादुर कम्माण्डोस  ने पाकिस्तानी सीमा मे घुस कर पाकिस्तानी सीमा के अंदर आतंकवादियों के लौंच पैड पर हमला कर अनेकों आतंकवादियों और पाकिस्तानी सेना के दो जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। पाकिस्तान के विरुद्ध ये कार्यवाही 18 सितम्बर 2016 को पाकिस्तान द्वारा पोषित जैशे मोहम्मद के आतंकवादियों द्वारा  हमारे देश के उरी स्थित सेना के स्टेशन पर किये हमले मे शहीद हुए 19 जांबाज सेनाको के बदले के फलस्वरूप एक खुली चुनौती के रूप मे की गयी थी। उरी के इस हमले पर सारा देश स्तब्ध था और बदले की कार्यवाही की आग मे झुलस रहा था। ऐसे वक्त हमारी सेना द्वारा पाकिस्तान मे घुस कर की गयी सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तान हतप्रभ था कि भारतीय सेना, अपने सेना के वीर सिपाहियों के बलिदान का बदला लेने के लिये कहीं भी और किसी भी  हद तक जा सकती है।

लेकिन बड़ा खेद और अफसोस कल एक बार फिर मध्य प्रदेश की रियासत के एक पूर्व महाराज दिग्विजय सिंह द्वारा हमारे देश की सेना के शौर्य, साहस और वीरता पर सवाल खड़े कर सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे!! कोई भी राजनैतिज्ञ अपने राजनैतिक स्वार्थ और लाभ के लिये अपनी स्थिति से किस हद तक गिर सकता है उसका ये घिनौना, नीच और कुत्सित  उदाहरण है!! राजनीति मे किसी सियासी व्यक्ति या दल के विरुद्ध मत भिन्नता हो सकती है और होना भी चाहिये लेकिन उस व्यक्ति या राजनैतिक दल का विरोध करते हुए हम देश विरोध पर उतर अपनी सेना के  साहस और शौर्य पर सवाल उठाएँ तो क्या ये देश द्रोह नहीं  है?? उनके इस कथन की तीव्र निंदा, भर्त्स्ना और आलोचना होना ही चाहिये। कॉंग्रेस द्वार दिग्विजय सिंह के इस ब्यान से अपने को अलग कर, सेना के सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल को दिग्विजय का निजी विचार बता कर उचित ही किया है।

विदित हो कि माँ जब बच्चे को जन्म देती है तब घर और कुटुंब के लोग बच्चे को संबोधित  कर उसके पिता को इंगित कर कहते है, बोलो पापा!! या परिवार के सदस्यों के रिश्तो से परिचय के लिये अबोध बच्चे से कभी बाबा!!, कभी चाचा, कभी दादी या अन्य रिश्ते बुलवाने का प्रयास करते है। कालांतर मे जैसे जैसे  बच्चा बड़ा होता है तो वह कुटुंबियों द्वारा निर्देशित पारवारिक रिश्तों की पहचान पिता को पापा, माँ को मामा, मम्मी और इसी तरह अन्य रिश्तो बाबा, दादा, दादी को पहचान कर संबोधित करने लगता है। कदाचित ही वह इन रिश्तो पर प्रश्न खड़े करता है क्योंकि माँ, पिता और कुटुंबियों पर अटूट विश्वास, पारवारिक धरोहर की पूंजी होती है ये ही धर्म, भाषा और प्रांत से परे पारवारिक संस्कार है जो बच्चे को जन्म से घुट्टी के रूप मे परिवार और कुटुंबियों से  प्राप्त होते है। सत्य सनातन भारत भूमि के ये ही संस्कार ऋषि भारद्वाज ने भगवान राम को संबोधित करते हुए कहे थे:-  

मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव ।

जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥

 

अर्थात मित्रों, धनवनों, और अनाजों की इस संसार मे बड़ी प्रतिष्ठा है, लेकिन माँ और मातृ भूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है!!

भारत माँ का सेना के वीर जवानों से वही रिश्ता है जो एक माँ का अपने बेटों से होता है और जो अटूट विश्वास और समर्पण की बुनियाद पर मजबूती पर टिका है। इन रिश्तों मे  अविश्वास, असमंजस और आशंका के लिये लेश मात्र भी गुंजायस नहीं है।

सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक की घटना मे  देश, काल और पात्रों को प्रस्तुत कर, प्रमाण उपलब्ध कराने के बावजूद भी  इस तरह के प्रश्न खड़े करने की ढिठाई करने पर, बड़े दर्द, वेदना और कष्ट के साथ मै सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रमाण मांगने वाले राजनैतिक संग्राम के अभिलाषी,  युद्ध  विशारद, महारथियों से बड़े सम्मान के साथ पूछना चाहता हूँ कि:-

क्या कभी उन्होने, अपने पिता से, पिता होने का प्रमाण मांगा??

विजय सहगल             

शनिवार, 21 जनवरी 2023

मौलिन्नोंग-गाँव" (एशिया का सबसे साफ गाँव)- मेघालय

"मौलिन्नोंग-गाँव" (एशिया का सबसे साफ गाँव)- मेघालय"









बचपन मे एक कहानी पढ़ी थी। कि जब एक बहेलिये के जाल मे बहुत सारे कबूतर फंस गए तो सभी अपनी अपनी ताकत लगा कर खुद को बचाने मे लगे रहे तो सफल न हुए। तब कबूतरों के नायक ने कहा यदि हम सिर्फ अपने बचाने का प्रयास करेंगे तो सभी निरर्थक प्रयास कर पकड़े जाएंगे। क्यों न हम एक दिशा मे समूहिक प्रयास कर अपनी ताकत लगाए तो इस जाल को उखाड़ सकते है। ऐसा ही हुआ सभी कबूतरों ने एक सकारात्मक सोच के साथ एक ही दिशा मे उड़ने के लिए बल लगाया तो बहेलिये का जाल उखड़ गया और सारे कबूतर जाल सहित एक दूर स्थान की ओर उड़ गए। वहाँ पर अपने मित्र चूहे की सहायता से जाल को काट कर मुक्त हो गए। ऐसे ही  समूहिक श्रम और शक्ति का एक आदर्श उदाहरण मौलिन्नोंग गाँव मे देखने को मिला जो एशिया का सबसे साफ सुथरा गाँव है। इस गाँव के बारे मे काफी सुन रखा था पर जब आज 03 नवम्बर 2022 को गाँव और ग्राम वासियों से रु-ब-रु हुए तो जैसा सुना था कल्पना से परे उससे भी अच्छा पाया। देश के अन्य गाँवों की तरह अपने सीमित संसाधनों का भरपूर दोहन कर  यहाँ  के निवासियों ने इस बात को चरितार्थ कर दिया कि यदि एक समूह मे सारे ग्राम वासी सकारात्मक सोच के साथ किसी दिशा मे बढ़े तो सफलता निश्चित ही उनके कदम चूमेंगी।

मेघालय राज्य के पूर्वी ख़ासी हिल्स जिले के पिनिर्स्ला खंड मे स्थित ग्राम मौलिन्नोंग पंचायत के निवासियों की जितनी भी तारीफ की जाए कम होगी। ये सिद्ध करता है कि सिर्फ गाँव की साफ  सफाई के बल बूते कोई गाँव पूरी दुनियाँ मे अपनी पहचान भी बना सकता है। इसी साफ सफाई के आधार पर न केवल देश मे अपितु पूरे विश्व मे अपनी पहचान बना इस गाँव ने पर्यटन की दृष्टि से एक अहम मुकाम हासिल किया। पूरे गाँव को अपनी इस पहचान के कारण न केवल गाँव के लोगो को  रोज़गार के साधन मिले अपितु  आर्थिक दृष्टि से भी मौलिन्नोंग गाँव  ग्राम वासियों को आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने मे अहम भूमिका निभा रहा है। बमुश्किल 1000 की आबादी वाले गाँव मे अनेकों होम स्टे बने हुए है जिनमे पूरी दुनियाँ से पर्यटकों की आमद बनी रहती है। गाँव के  हर घर मे हरियाली और फूलों के पेड़ चारों तरफ दिखाई देते है। हर घर के बाहर और गाँव की सड़कों पर जगह जगह बांस की तिकोनी टोकरियाँ कचरा एकत्रित करने हेतु रक्खी है। नाली से नाली तक गाँव मे पक्की डम्मर की सड़क बनी हुई है। अंदर गलियों मे भी पत्थर और सीमेंट की पगडंडियाँ बनी है। ख़ासी महिलाओं द्वारा संचालित 7-8 साफ सुथरे रेस्टुरेंट गाँव मे कार्यरत है जो पर्यटकों को स्वच्छ और स्वस्थ भोजन परोसते है। रेस्टुरेंट के अतिरिक्त गाँव मे जगह जगह प्रसाधन केंद्र बनाए गयें है जिनका उपयोग आप  निशुल्क कर सकते है।  मुझे पूरे प्रवास के दौरान एक भी मानव निर्मित कचरा तो क्या प्रकृति के द्वारा उत्सर्जित  फूल पत्ती का कचरा भी कहीं देखने को नहीं  मिला। गाँव की पूरी अर्थव्यवस्था पर्यटकों पर आधारित होने के कारण सारे ग्राम वासी भी बड़े मृद भाषी और व्यवहार कुशल थे। चाय पान, उपहार केंद्र, पारंपरिक मेघालय के उत्पाद एवं कपड़े आदि की दुकानों पर कहीं कोई आपसी व्यापारिक स्पर्धा देखने को नहीं मिली। लोग शांत और संतुष्टि के भाव से ओतप्रोत थे।  गाँव के सफाई कर्मी और उनके घर की साफ सफाई और उनके बच्चों को भी नजदीक से  देखने को मिला। सारे ग्रामवासियों के चेहरों पर एक संतुष्टि का भाव उनकी समृद्धि और शांति को दर्शा रहा था।

गाँव मे चुनौती पूर्ण रोमांचक गतिविधियां भी चलाई जा रही थी। जमीन से लगभग 100 फुट ऊंचे  बांस से निर्मित ऊंचे मचान पर चढ़ने की ऐसी ही एक चुनौती पूर्ण कार्य देखने को मिला। जिस पर चढ़ना तो बहदुरी का कार्य था ही पर वहाँ पर पर चढ़ कर बंगला देश की सीमा को देखना भी रोमांच, उत्साह  और उमंग पैदा करने वाला था। अन्य गाँव वासी जो पर्यटन की गतिविधियों से विलग थे बांस के अपने कार्य को निर्लिप्त भाव से करते नज़र आए। जब सुदूर पूर्वोत्तर राज्य मे कुछ नवयुवक पानी के गोलगप्पे बेचने की तैयारी करते नज़र आये तो आम लोगो के बीच उत्तर भारत की प्रसिद्ध पानी पूरी देखने को मिले तो मुंह मे पानी आना स्वाभाविक था।

मौलिन्नोंग गाँव के प्रवेश द्वार पर एक भरी भरकम चट्टान को एक बहुत छोटे पत्थर पर टिके होना किसी आश्चर्य से कम न था। लगभग 10-12 फुट लंबी, 6-7 फुट चौड़ी और लगभग 5-6 फुट ऊंची चट्टान मात्र 2-3 फुट चौड़ी चट्टान के उपर  प्राकृतिक रूप से टिकी थी। जो अपने आप मे एक अचरज था। हमारे ग्रुप के कुछ सदस्यों ने उस चट्टान को उठाते हुए चित्र खींचे मानो चट्टान का सारा बोझ  उनके कंधे पर आ गया हो।  

मेरे यात्रा कार्यक्रम मे मौलिन्नोंग गाँव एक पढ़ाव के रूप मे था पर मै अपने सुधि पाठकों से कहूँगा कि वे कम से कम एक दिन इस गाँव मे जरूर प्रवास करें। अरे कुछ दिन तो गुजरों......... मौलिन्नोंग में!!  मैं 5-6 होम स्टे के नाम और मोबाइल नंबर दे रहा हूँ,  इस वैधानिक घोषणा के साथ कि मेरा  इन होम स्टे मे कोई भी व्यापारिक हित निहित नहीं है।       

मेघालय मेघों (बादलों) का आलय (आवास) यूं ही नहीं है। कुछ तो प्रकृति ने मेघालय को अपनी सुंदर कृतियों  से झरनों, पहाड़ों, गुफाओं आदि के रूप मे   श्रंगारित किया है और कुछ यहाँ के निवासियों ने अपने श्रम, उद्धयम, आचरण और व्यवहार से ईश्वर प्रदत्त उपहारों को रख रखाव, सलीके और समर्पण से कर इन्हे और भी सुंदर बना दिया है। मौलिन्नोंग गाँव वहाँ के निवासियों की श्रमशीलता का एक जीता जागता, अनुपम उदाहरण है।

विजय सहगल     


रविवार, 15 जनवरी 2023

"ईधन"

 

"ईधन"









किसी भी व्यक्ति के जीवन मे रोटी, कपड़ा, मकान उसकी मूलभूत आवश्यकताओं मे शामिल है जिसके लिए व्यक्ति सारे जीवन संघर्ष करता है। इन मूलभूत आवश्यकताओं मे  सड़क, बिजली पानी को जोड़ साधारण मानवी के लिए एक सुगम जीवन उपलबब्ध कराना एक आदर्श राज्य की कल्पना मे शामिल है। शायद इसीलिए गोस्वामी तुलसी दास जी ने श्री रामचरित मानस मे राम राज्य की अवधारणा को निरूपित करते हुए एक चौपाई मे कहा है:-

दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीति, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति॥

अर्थात राम राज्य मे देह से संबन्धित, दैवीय प्रकोप एवं भौतिक अपदाये किसी को नहीं ब्यापती। सब मनुष्य परस्पर प्रेम पूर्वक रहते हुए शास्त्रानुकूल नीतियों, मर्यादाओं के अनुसार अपने स्वधर्म  का पालन करते है।

पर इस कलियुग मे, साठ के दशक मे बचपन मे मैंने अपने घर पर भोजन  बनाने के लिए ईधन की जद्दोजहद देखी है और अपनी माँ को हम भाई बहिनों के लिये खाना बनाने मे होने वाली कठिनाई को नजदीक से देखा। चूल्हे से उठते धुएँ से जलती आंखे, अपने साड़ी के पल्लू से आँखों को ढक, गीली लकड़ी और उपले  से उठते धुएँ से अपने आपको बचाने के संघर्ष तो जैसे रोज की बात थी। ऐसा नहीं था कि ईधन के लिये ये लड़ाई सिर्फ हमारे घर मे थी कमोवेश ये संकट उस समय हर मध्यम घर की कहानी थी।    

घरों मे ईधन की आपूर्ति के लिये मुख्यतः लकड़ी और गाय के गोबर के उपले या कंडे  की उपलब्धता को हम बचपन से देखते आए थे। यूं तो मिट्टी का तेल, लकड़ी का बुरादा,  लकड़ी और पत्थर के  कोयले को भी लोग ईधन के रूप मे इस्तेमाल करते थे। इन तरह तरह के ईधन को घरों मे निरंतर आपूर्ति लगभग रोज का ही कार्य थे जो बरसात के मौसम मे और भी कठिन और दुरूह थी। शहरों मे लकड़ी की उपलब्धता गाँव से बैलगाड़ियों और ग्राम वासियों द्वारा सिर पर छोटे-छोटे गट्ठर रख कर की जाती थी। मेरे घर के बाहर पानी की टंकी के चौराहे पर लकड़ियों की बैल गाड़ी या सिर पर लकड़ी का गट्ठर ला  रहे ग्रामवासियों के आते ही खरीद दारों की भीड़ उन्हे घेर कर लकड़ी के दाम की पूंछ-परख से शुरू हो जाती थी। साथ ही साथ मोल-भाव को ऊंचा-नीचे लाने की सौदेबाजी भी प्रारम्भ हो जाती थी। चतुर क्रेता लकड़ी को तोड़ कर उसके सूखे या नमी दार होने की पुष्टि कर दाम तय करते थे क्योंकि सूखी लकड़ी हल्की, उपयोग मे आसान और  धुआँ रहित होती थी जबकि गीली लकड़ी भारी बड़ी कठिनाई से जलती और धुआँ करती थी। अपनी माँ को अनेकों बार गीली  लकड़ी से उठ रहे धुएँ से दो चार होते देखा था। बरसात के दिनों मे सूखी लकड़ी को खुले मे रखने से बचाने के लिये आँगन और पौर मे रक्खा जाता था। घर मे एक गाय की कोठरी मे भी लकड़ी को रखना एक विकल्प होता था क्योंकि उन दिनों घरों से गाय का पालन समाप्त हो चुका था। लकड़ी को जलाने मे गाय के गोबर के उपलों को  एक सहायक ईधन के रूप मे इस्तेमाल किया जाता था। शहरों मे उपलों की उपलब्धता भी ग्राम वासियों द्वारा की जाती थी क्योंकि गौपालन या भैंस पालन मे दूध के अलावा  गोबर के उपले एक अतिरिक्त आय के श्रोत के रूप मे होते थे। उपलों को गिनती के हिसाब से खरीदा बेचा जा सकता था एक दो कंडे रुंगन (मुफ्त) मे भी गिन लिये जाते थे। कंडों की कीमत छोटे बड़े आकार के हिसाब से भी तय होती थी। बरसात के पूर्व कंडों की मांग काफी बड़ जाती थी क्योंकि बरसात मे कंडे बनाने और उन्हे सुखाने की समस्या रहती थी। कभी कभी बाहर से सूखे दिखने वाले कंडों को तोड़ने पर अंदर से गीले नमी दार दिखते थे जो जलाने पर धुआँ छोड़ते थे। चूल्हे मे लकड़ी जलाना भी एक कला थी। कंडे के टुकड़े कर उन पर थोड़ा सा कैरोसिन ऑइल डाल कर उसमे आग लगा दी जाती थी और फिर उन पर लकड़ियों को रख कर उनके जलने का इंतज़ार किया जाता था। हाँ कभी कभी हम लोगो की शैतानियों पर जलाऊ लकड़ी से हल्की फुलकी पिटाई भी हो जाती थी।         

कोयला माफिया स्टेशन से निकलने वाली मालगाड़ियों से कोयले का अवैध दोहन कर बाज़ार मे बिक्री के लिये लाता था। पत्थर के कोयले को जलाने मे कठिनाई होती थी क्योंकि देर से आग पकड़ने के कारण उसको जलाने के लिये दूसरे ईधन जैसे मिट्टी का तेल या लकड़ी को लगातार जलाए रखना होता था। काफी दूर से आसमान मे उड़ते  धुएँ की लकीर से उस घर की लोकेशन को आसानी से ढ़ूढ़ा जा सकता था। इन सभी ईधन की एक विशेषता थी कि इनके उपयोग के बाद इन्हे पानी डाल कर बुझाने के बाद पुनः उपयोग मे लाया जा सकता था। लकड़ी, कोयला आदि को पानी डाल कर बुझाने से उत्पन्न विशेष ध्वनि  के कारण मुझे लकड़ी या कोयला बुझाने मे बड़ा मजा आता था। आज की पीढ़ी ने शायद ही इस आनंद का अनुभव किया हो।  

पत्थर के कोयले का उपयोग प्रायः होटल, हलवाई करते थे पर घरों मे इसका उपयोग कम होता था। लेकिन स्टेशन के आसपास रहने वाले एवं रेल्वे कॉलोनी के हर घरों मे शाम के समय प्रायः हर घर के बाहर पत्थर के कोयले की अंगीठी से उठता धुआँ इसके उपयोग का ध्योतक था।   पत्थर का कोयला ईधन के रूप दीर्घ अवधि तक ऊर्जा देता था और एक अच्छे ऊर्जा के  स्रोत के रूप मे होता था। बड़ी मात्रा मे उत्पाद बनाने मे सुगमता के कारण ही हलवाई या दुकानदार इसका उपयोग अधिक करते थे और इसके लिये कुछ कीमत ज्यादा अदा करते थे।

जब कभी गाँव से लकड़ी या कंडों की पूर्ति कम होती थी तो सब्जी मंडी के कोने मे स्थित टाल से लकड़ी लेनी पड़ती थी। लकड़ी की टाल के मालिक एक छोटे कद के गोल मटोल  तेज तर्रार पंजाबी सज्जन थे पर कोयले और लकड़ी जैसे अस्वच्छ व्यवसाय के बावजूद उनके स्वच्छ  सफ़ेद, प्रेस किये कपड़े उनकी नफासत और नजाकत को दर्शाता था जो टाल के नजदीक ही "चंद्रा होटल" को भी संचालित करते थे। होटल को बंद हुए दशकों बाद आज भी, उस गली को चंद्रा होटल की गली के नाम से जाना जाता है।  मोटी और भारी भरकम लकड़ी के डूंड़ (टुकड़े), चूल्हे मे बड़ी परेशानी पैदा करते थे। उनको छोटे छोटे टुकड़ो मे बांटने के लिये बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। पड़ौस मे स्थित साइकल वाले की दुकान से हथौड़ा लाकर छैनी की मदद से छोटे छोटे टुकड़ो मे तोड़ना पड़ता था। कभी कभी छैनी उच्छल कर चोट पहुंचाती थी तो कभी कभी छैनी की जगह हथौड़े का प्रहार  हाथ पर हो जाने पर, होने वाले दर्द की कल्पना आज की पीढ़ी शायद ही  महसूस कर सके। 

एक अन्य ईधन था मिट्टी का तेल या केरोसिन ऑइल जिसका उपयोग गैस स्टोव या बत्ती वाले स्टोव मे होता था जो उपयोग मे सुगम और आसान था पर जिसकी उपलब्धता सहज और सुगम न थी। स्टोव को चालू करना यूं था तो आसान पर पहले बर्नर को गरम करने की कला को सीखे बगैर, स्टोव जालना आसान नहीं था। बर्नर की लौ को तेज रखने के लिये बर्नर  मे आए कचरे को साफ करने के लिये सुई सी पतली पिन से कचरा साफ करना भी एक हुनर था। कभी कभी अधिक हवा के दवाब के कारण स्टोव फटने की घटनाए भी सुनाई देती पर मैंने कभी ऐसी घटना होते नहीं देखी। शायद उन दिनों स्टोव फटने की ऐसी ही घटनाओं की आड़ मे  दहेज जैसी कुप्रथा के कारण बहुओं को जलाने की कुछेक घटनाओं ने स्टोव को बड़ा बदनाम  किया था।

राशनिंग के चलते, केरोसिन ऑइल के विपणन मे दुकानदार भ्रष्टाचार, काला बाजारी, बेईमानी, करते ये बुराइयाँ उन दिनों राशन के  दूकानदारों मे आम थी या यूं कहें कि उनमे  कूट कूट कर भरी थी। लंबी लंबी लाइन, घट (कम) तौली, ज्यादा कीमत बसूलना आम बात थी। प्रायः जनता को मिलने वाला कोटा बाहर-ही बाहर ब्लैक मे बेच दिया जाता था। अफसर शाही, व्यापारियों की मिली भगत के कारण भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा थी। महीने मे 8-10 बार तेल की तलाश मे दुकानों के 2 फुट लंबे राशन कार्ड  और खाली डिब्बे के साथ चक्कर लगाना आम बात थी। उन दिनों आम जनता के  समय की मानों कोई कीमत ही नहीं थी। 2-4 लीटर तेल लाना मानों किसी युद्ध को फतह करने की तरह था।

उन दिनों घरो मे बिजली नहीं थी। शाम के घरों मे रोशनी के लिये भी केरोसिन ऑइल का उपयोग लालटेन मे होता था,  दुकानों मे बड़े बड़े लेंप जलाये जाते थे। कुछ दुकानदार गैस बत्ती की लालटेन जलाते थे जिसकी दूधिया रोशनी मे काम करने मे स्पष्टता और सुगमता थी और  देखने मे भी अच्छी लगती थी। इन गैस लालटेन मे रेशमी धागों का एक फिल्लामेंट बांध कर केरोसिन ऑइल से निकलने वाली गैस से जलाया जाता था। प्रायः बारात और शादी, व्याह और दूसरे  सभा, जलसों  आदि मे इन गैस लालटेन्स की बड़ी मांग होती थी जिनको किराए पर ले कर उपयोग मे लाया जाता था, क्योंकि इनकी तेज दूधियाँ रोशनी सभी को आकर्षित करती थी।

बेईमानी और भ्रष्टाचार के कारण देश की स्वतन्त्रता के बाद आम मानवीय के लिये "ईज़ ऑफ लिविंग" (जीवन जीने मे आसानी) के लिये शायद ही कहीं कोई सार्थक प्रयास हुए। आम लोगो ने तत्कालीन समय मे अधिकारियों और व्यापारियों की कपट और कुटिलता  के कारण जीवन मे आयी  परेशानियों, कठिनाईयों के कारण, अभावों मे, जीवन यापन को अपनी नियति मान लिया था। आम जनता मे  रोटी, कपड़ा मकान जैसी  मूल आवश्यकतायेँ तो सपने की बात थी तब शासन, प्रशासन से पानी, बिजली सड़क की अपेक्षा कैसे की जा सकती थी??

विजय सहगल            

शनिवार, 7 जनवरी 2023

एलिफ़ेंट वॉटर फ़ॉल्स - मेघालय

 

"हाथियाँ जल प्रपात (एलिफ़ेंट वॉटर फ़ॉल्स) - मेघालय"











1 नवम्बर 2022 को मै अपने समूह को अन्य छह सदस्यों के साथ मेघालय प्रवास पर था। सुबह की हल्की सर्दी और सुनहरी धूप मे गुवाहाटी के कोलाहल और भीड़ भाड़ से दूर हमारी टेंपू ट्रेक्स का  मेघालय राज्य की सीमा मे प्रवेश करते ही पर्यावरण मे हरियाली का प्रादुर्भाव स्पष्ट नज़र आया। मेघालय की दिशा मे यात्रा के पूर्व मीलों तक राष्ट्रीय राज मार्ग के बाएँ तरफ असम और दाहिने तरफ मेघालय राज्य को देखना अचरज भरा था। लेकिन पूरी तरह मेघालय मे प्रवेश करते ही  राज मार्ग के किनारे अनानास, केले, पपीता, खीरे, संतरे आदि फलों की छोटी-छोटी गुमटियाँ दिखाई देने लगी  जिनका संचालन मेघलयी महिलाओं द्वारा किया जा रहा था। फलों के साथ स्थानीय अचार और मुरब्बे आदि का भी बिक्रय इन गुमटियों पर छोटी छोटी शीशियों मे किया जा रहा था। ऐसे ही एक गुमटी पर हम सब ने पाइनेपल और कमरख का स्वाद लिया। महिला दुकानदार ने बहुत करीने से अनानास के छिलके निकाल कर छोटे छोटे टुकड़ो पर जब नमक और लाल मिर्च का मसाला मिलाया तब मसाले ने अनानास के  स्वाद मे और इजाफा कर दिया। कमरख के खट्टे स्वाद इस दौड़ मे अनानास से पिछड़ गया।  हमारे ग्रुप की छोटी सदस्या दिशा जिसे हम सभी ग्रुप लीडर के नाते प्यार से "कर्नल"  कह संबोधित करते ने आवश्यक भुगतान के बाद महिला दुकानदार से "खुबलाई" कहा तो उस ख़ासी महिला के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी। मेघालय की ख़ासी भाषा मे खुबलाई का अर्थ है "धन्यवाद"! अब तो "खुबलाई" शब्द का उपयोग हम सब ने पूरे मेघालय यात्रा के दौरान खूब किया जिसने हमेशा मेघालय के बच्चे, जवान महिला पुरुष के चेहरे पर हमेशा एक प्यारी मुस्कान छोड़ी।

आज की यात्रा का पहला पढ़ाव "हाथियाँ जल प्रपात" अर्थात "एलेफेंट वॉटर फॉल" था। जिसे  साधारण जल प्रपात की तरह मान  मै अनिक्छा पूर्वक वॉटर फॉल देखने के लिए बढ़े। लेकिन जब कुछ सीढ़ियाँ उतरकर हम नीचे वॉटर फॉल के सामने पहुंचे तो ऐसा लगा  जैसे हम अचानक नींद से जागे हों!! एकटक पानी के बहते झरने को देख लगा मानों दूध की धाराएँ पहाड़ों से कल कल करती नीचे गिर रही हों!! इतने सुंदर प्राकृतिक झरने को देख लगा ईश्वर ने मेघालय को यूं ही  मेघों (बादलों) का घर नहीं बनाया बल्कि अपने अप्रितम सौंदर्य का स्नेह-आशीर्वाद प्रदान करने मे कहीं कोई कंजूसी नहीं की। यह जान कर और भी सुखद आश्चर्य था कि यहाँ एक-दो नहीं पूरे तीन-तीन जल प्रपात है। प्रकृति ने कैसे जल प्रपात के इस रंग मंच पर एक ही जल की धारा, अपने तीन अलग अलग रूपों मे अभिनय के लिए उतरी हो। पूर्व मे इस जल प्रपात को स्थानीय ख़ासी जनजाति के लोग "थ्री स्टेप्स वॉटर फॉल" (तीन पगीय जल प्रपात) कहते थे क्योंकि तीनों जल प्रपात एक के बाद एक नीचे की ओर बने है। लेकिन अंग्रेजों के आगमन के पश्चात इस जल प्रपात के बाएँ स्थित पहाड़ी का आकार हाथी सा दिखने के कारण इसे एलिफ़ेंट वॉटर फॉल कहा गया। पर दुर्भाग्य से सन् 1897 मे आए भूकंप के कारण उक्त हाथी रूपी चट्टान के नष्ट होने के बावजूद इसे आज भी एलिफ़ेंट वॉटर जल प्रपात के नाम से जाना जाता है। कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरने के बाद एक बार फिर हम एक नए रूप मे दूसरे जल प्रपात के सामने थे। हरी भरे  पेड़-पौधों की झाड़ियों और टहनियों के बीच बहती धारा इस पानी के झरने मे ऐसा प्रतीत हुई मानो कुछ क्षण विश्राम के कारण दूध धारा दूध के लंबे लबे लच्छों के रूप मे जम गयी हो और जमे हुए दूध की मलाई के लच्छे रबड़ी का स्मरण करा मुंह मे पानी भर दे तो इसमे मेरा क्या दोष? मै इस जल प्रपात संख्या दो पर ज्यादा नहीं ठहर सका क्योंकि मेरे जैसे "डाइबिटिस" के मरीज का "शुगर लेबेल" रबड़ी की याद मे कहीं बढ़ न जाये!!

कुछ और सीढ़ियाँ उतरने के बाद जब हम लोग वॉटर फॉल क्रमांक तीन के सामने पहुंचे तो वॉटर फॉल के दृश्य को देख हतप्रभ थे। एक बार फिर पानी की धाराएँ उपर से नीचे चौड़ी और चौड़ी होते चली गयी। दूध की तरह बहती धाराओं ने वहाँ उपस्थित पर्यटकों के चेहरे पर खुशी स्पष्टतः महसूस की जा सकती थी। वहाँ उपस्थित पर्यटक, विभिन्न दिशाओं और कोणों से जल प्रपात की और अपने परिवार के साथ वॉटर फॉल की यादगार फोटो को मोबाइल और कैमरे मे  कैद करने को लालायित थे। वॉटर फॉल से गिर रहा पानी जिस सरोवर या कुंड मे एकत्रित हो रहा था उसकी पारदर्शिता शीशे की तरह आर पार दिखाई दे रही थी। लोग सरोवर के बीच पानी मे खड़े होकर और पानी के बाहर से भी बहते हुए पानी के झरने को अपलक निहार रहे थे। काफी देर तक प्रकृति के इस शानदार सुंदर रचना को एकटक देखने के बावजूद भी वहाँ से हटने का दिल नहीं कर रहा था। स्वर्ग के सपनों से बाहर निकलना आसान नहीं था। लेकिन अनइकच्छा पूर्वक दिवास्वपन से निकलने पर ऊंची ऊंची सीढ़ियों पर उपर चढ़ने की कल्पना ने हम जैसे वरिष्ठ जनों के हौसले पस्त कर दिये। उम्र के इस पढ़ाव पर दो-तीन घंटों की थकान के बाद  हर सीढ़ी हिमालय के एवरेस्ट चोटी पर चढ़ाई  की तरह लग रही थी। एक बार फिर  हमारे ग्रुप के कर्नल दिशा टंडन ने हम सभी प्रौढ़ता की ओर अग्रसर हो रहे वरिष्ठ जनों की हौसला अफजाई "हैरी पॉटर" की झाड़ू की याद दिला कर कराई  जिस पर बैठ कर वो कैसे फुर्र फुर्र कर दायें बाएँ मुड़ते हुए अपने गंतव्य पर उड़ जाता है।  "हैरी पॉटर" की झाड़ू तो नहीं मिली पर कर्नल दिशा के  उत्साह और उमंग से मिली ऊर्जा ने हम छहों बुजृगों को सीढ़ियाँ चढ़ने की प्रेरणा ने स्फूर्ति और ऊर्जा अवश्य दे दी।  

एलीफेंट वॉटर फॉल की मीठी और सुखद यादों के साथ जब सभी अजय के फूड कोर्नेर  से चाय पान कर पार्किंग मे पहुंचे जो पूर्व मे नोएडा मे काम कर चुका था। जब हम सभी  बस मे पहुंचे तो बस के दरबाजे खुले थे पर ड्राईवर महोदय बस से नदारद थे। हम सभी ये सोच कर अपने चालक का इंतज़ार करने लगे कि शायद वे कहीं दीर्घ या लघु शंका के समाधान हेतु गए होंगे। पर लगातार एक-डेढ़ घंटे तक उनके न आने और  मोबाइल पर कॉल करने के बावजूद संपर्क न होने के कारण हम सभी किसी अनहोनी की आशंका से चिंतित हो उठे। नकारात्मक विचारों को परे हटाते हम सभी सारी रात बस मे ठहरने की मन गढ़ंत कहानियाँ गढ़ने लगे। किसी ठंडी रात काटने की कल्पना की। किसी ने क्रम से बारी बारी रात मे जाग कर चौकीदारी करने के प्रस्ताव पर विचार रक्खे कुछ अन्य ने शेर आने पर अपनी अपनी रणनीति का बखान किया! पर हमारे ड्राईवर महोदय को गायब हुए लगभग तीन घंटे हो चुके थे। आगे के सारे कार्यक्रम भी इस बजह से गड़बड़ा गए। टूर ओपरेटर पर संपर्क से ज्ञात हुआ कि हमारे बस के ड्राईवर टाइम पास करने एक अन्य टैक्सी ड्राईवर की कार मे गपशप करने लगे और बस की चाबी उसकी टैक्सी मे गिर गयी। टैक्सी ड्राईवर के बारे मे हमारे बस चालक को कोई जानकारी नहीं थी और न ही उसका कोई मोबाइल नम्बर था सिर्फ ये जानकारी थी कि वह चेरापूंजी की तरफ जाने वाला था। बस की चाबी ढूढ्ने के सभी निरर्थक प्रयास के बाद हमारे बस के चालक ने वही वॉटर फॉल के स्टाफ के  स्कूटर से  बड़े अनुनय विनय के बाद उस टैक्सी का पीछा किया। 30-35 किमी॰ के बाद टैक्सी चालक के क्षणिक चाय पान के कारण आखिर टैक्सी मिल ही गयी।  तब कहीं चार घंटे  बाद हमारे बस सारथी बापस आये। हमारे आगे के सारे कार्यक्रम यध्यपि  निरस्त हो चुके थे  पर सभी ने "गहरी नदिया, नाव पुरानी, केवटियाँ से मिले रहने" की नीति पर चलते हुए  अपने बस चालक से अनजाने मे हुई इस त्रुटि के लिए कुछ शिकायत नहीं की।

एक अति सुंदर प्राकृतिक ईश्वरीय रचना के यादगार दर्शन के  साथ हमारे ग्रुप की  सकारात्मक सोच ने ड्राईवर से  अनजाने मे हुए अपराध को क्षमा कर इस घटना को और भी यादगार बना दिया।

विजय सहगल