"दक्षिण भारत की पवित्रतं
"सबरीमाला तीर्थ यात्रा" की पूर्व तैयारियाँ"
"దక్షిణ భారతదేశంలోని పవిత్ర స్థలం "శబరిమల తీర్థయాత్ర" కోసం సన్నాహాలు (गूगल द्वारा तेलगु अनुवाद)
यूं तो सूर्य के मकर राशि मे प्रवेश के पूर्व दक्षिण भारत मे सबरीमाला की
तैयारियाँ हमेशा ज़ोर शोर से होती हैं,
पर इस वर्ष मैंने हैदराबाद मे अपने प्रवास के दौरान इन तैयारियों को बहुत नजदीक
से देखा।
सबरीमाला यात्रा के बारे मे थोड़ी-बहुत जानकारी तो हर साल देश के राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर
देखी और सुनी जाती रही,
पर आज सबरीमलय पर्वत पर स्थित भगवान अय्यपन के दर्शन और यात्रा के संबंध मे
विस्तृत जानकारी कौंडापुर, हैदराबाद मे दिनांक
22 दिसम्बर 2023 को प्रातः भ्रमण के दौरान मिले,
श्री महेश गौड़ा जी से मुलाक़ात के दौरान हुई। महेश जी सबरीमाला स्थित भगवान अय्यपन
के भक्त, दर्शनर्थियों हेतु
निर्धारित काले वस्त्र, तुलसी या
रुद्राक्ष की माला एवं मस्तक पर विभूति और चन्दन का तिलक धारण किए हुए थे,
जो इन तीर्थयात्रियों की परंपरागत निर्धारित वेषभूषा हैं। 38 वर्षीय महेश,
हैदराबाद मे अपने पारवारिक ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय करते हैं और इस वर्ष सबरीमाला की उनकी ये 16वी यात्रा हैं। भगवान
अय्यपन को समर्पित सबरीमाला धार्मिक यात्रा के पूर्व,
यात्रा करने वाले भक्त यात्रियों के लिये
यह एक कठिन नियम-सयम्य, रीतिरिबाजों का
पालन करने वाली यात्रा है। जिसके बारे मे
प्रायः हम उत्तर भर्तियों को ज्यादा जानकारी नहीं हैं। आइये हम इस पवित्र और कठिन
आध्यात्मिक यात्रा पर श्री महेश गौड़ा द्वारा प्राप्त जानकारी को आप सबसे सांझा
करें।
महेश गौड़ा जी कौंडापुर स्थित हनुमान मंदिर
मे प्रातः ब्रह्ममुहूरत मे स्नान ध्यान के पश्चात सबरीमाला यात्रियों के लिए निर्धारित काले वस्त्रों को धारण कर अपने
व्यापार पर जाने वाले थे। उनके कुछ साथी अपने अधिष्ठानों मे नौकरी और सेवा हेतु जा
चुके थे। इन्ही काले वस्त्रों की वेश-भूषा मे मैंने हैदराबाद मे अनेक युवाओं,
ऑटो चालकों या व्यापारियों, डॉक्टर,
इंजीनियरों को देखा जो सबरीमाला यात्रा मे
अय्यप्पन भगवान दर्शन हेतु अपने अनुष्ठान पूर्ण करने मे लगे थे। इन दिनों हैदराबाद
मे सबरीमाला के इन भक्तों को हर जगह देखा जा सकता हैं। महेश जी ने बताया कि भगवान
अय्यपन के तीर्थ स्थान की यात्रा पर जाने के 41 दिन पूर्व कठिन व्रत या अनुष्ठान करना पड़ता हैं। ये भक्तजन
यात्री, इन 41 दिनों मे अपने
साधारण दिनों से परे ब्रह्मचर्य का पालन कर घर को त्याग कर समूहिक रूप से किसी
मंदिर या उसके आसपास टेंट लगा कर जमीन पर सोते हैं। इन दिनों मे सभी भक्त पैरों मे
कोई चप्पल या जूते नहीं पहनते। घर का खाना त्याग कर समूहिक रसोई मे बना सात्विक
भोजन ही ग्रहण करते है, वो भी दिन मे एक
बार। उनको अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों,
नौकरी के स्थानों या निर्धारित कार्यों को करने की छूट रहती हैं पर शाम के अपने
व्यवसाय या नौकरी के बाद वे अपने निर्धारित टेंट या अस्थाई आश्रय स्थलों मे आकार
ईश्वर आराधना, प्रार्थना मे रत रहते
हैं। किन्ही अत्यावश्यक कार्यों,
परिवार मे बीमारी या अन्य आकस्मिक कार्यों पर ही ये यात्री घरों मे जाते हैं
अन्यथा इन का 41 दिनों का कठिन अनुष्ठान अस्थाई टेंट और निवासों मे भगवान अय्यप्पन
की आराधना मे रमा रहता हैं। पूरी यात्रा के दौरान सिर्फ एक जोड़ी कपड़ों के साथ,
ब्रह्ममुहूर्त मे लगभग प्रातः 3.30 बजे से
स्नान शुरू कर अपने वस्त्रों को स्वयं धो कर दैनिक ईश्वर पूजा आराधना कर 8-9 बजे
से अपने अपने कार्यों की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। 1-1.30 बजे के लगभग शहर मे
स्थापित अपनी समूहिक रसोई मे तैयार किए भोजन प्रसाद के लिये एकत्रित हो समूहिक
भोजन करते हैं। काले परिधानों मे अपनी संकल्प से सिद्धि की ये यात्रा,
भक्त की ईश्वर भक्ति मे एकाकार होने के
कारण, वे सभी भक्त एक दूसरे को
"स्वामी" कह कर संबोधित करते हैं। इन के समूह मे अनेकों बार सबरीमाला यात्रा
का अनुभव रखने वाले वरिष्ठ भक्त को ये सभी
भक्त गण "गुरुस्वामी" कह कर आदर सम्मान देते हैं।
इसी कड़ी मे महेश जी ने 22 दिसम्बर को ही एक
गृह स्वामी द्वारा अपने घर मे होने वाले कार्यक्रम मे शामिल हो यात्रा की पूर्व
तैयारियों को देखने के लिये मुझे आमंत्रित किया। निर्धारित समय एवं स्थान पर लगभग 12 बजे पहुँच गया। तेलगु
भाषा मे चल रहे भजनों के भावों को समझने
मे ज्यादा कठिनाई नहीं हुई। जिस्मके भाव थे,
हे "विश्व के स्वामी हैं,
"अय्यप्पा" तुम्हें नमन"। यहाँ चल रही पूजा को देख अनुमान लगाना
कठिन नहीं था, क्योंकि एक सिंहासन पर
भगवान अय्यप्पा को विभूषित कर उन तक पहुँचने के लिए 18 सीढ़ियाँ बनाई गयी थी।
प्रत्येक सीढ़ियों के दोनों ओर जलते दीपक और फल,
फूल और विभिन्न पत्रों से सजा कर भारतीय सांस्कृति के ईश्वर को "पत्रम,
पुष्पम फलम तोयम" के समर्पण का भाव स्पष्ट था। सफ़ेद वस्त्रों को धारण किए और
सिर पर भी सफ़ेद वस्त्र धारण किए एक नौजवान पुरोहित और स्वामियों के निर्देशन मे
मुख्य जजमान के रूप मे पूजा संपादित कर रहा था,
जिसके पीछे पीछे उस युवक के पिता श्री पूजा के सम्पादन मे उसका सहयोग कर रहे थे।
महेश ने बताया कि इस घर के गृह स्वामी अपने पुत्र को पहली बार सबरीमाला यात्रा के
प्रथम चरण अर्थात 41 दिन के अनुष्ठान के
लिये बिदा कर रहे हैं। परिवार ने घर के इस युवक को इस पवित्र तीर्थ यात्रा के
प्रस्थान के सम्मान मे इस पवित्र पूजा का आयोजन किया हैं और दूसरे अन्य तीर्थ यात्रियों को आमंत्रित कर भोज का आयोजन
किया हैं। इन सबरीमाला के तीर्थ यात्रियों के साथ परिवार ने अपने निकट संबंधियों,
शुभ चिंतकों और मित्रों को आमंत्रित किया जिनमे मै भी एक अतिथि था। इस अवसर की जाने
वाली ऐसी पूजा का आयोजन, हर परिवार अपनी आर्थिक क्षमता और सामर्थ्य के
अनुसार आयोजित करता हैं।
पूजा मे फल,
फूल एवं नारियलों को फोड़ कर भगवान अय्यप्पा को समर्पित कर यात्रा के लिये मंगल
कामनाएँ की। प्रातः 11 बजे से शुरू हुए लगभग 3 घंटे चले इस कार्यक्रम के अंतिम चरण
मे सिंहासन के नीचे बनी 18 सीढ़ियों के मध्य मे प्रत्येक सीधी पर रक्खे कर्पूर
दीपों को एक लंबी छड़ी के सिरे पर रुई की लौ से नीचे से ऊपर की ओर प्रज्जव्लित किया
गया। महेश ने इन 18 सीढ़ियों का महत्व बतलाते हुए कहा कि ये 18 स्वर्ण सीढ़ियाँ केरल के पतनमतिट्टा जिले मे पेरियार टाइगर
अभ्यारण के जंगलों मे 18 सबरीमलय पहाड़ियों का प्रतीक हैं,
जिनके बीच भगवान अय्यप्पा का मंदिर स्थित
हैं। जंगल की 8-9 किमी की पैदल यात्रा के दौरान मंदिर मे प्रवेश के पूर्व बनी
इन्ही 18 स्वर्ण सीढ़ियों से होकर सभी सबरीमाला यात्रियों को ले जाया जाता हैं। दीप
प्रज्ज्वलन इस बात का प्रतीक है कि "भगवान अय्यापा" उनकी यात्रा का मार्ग
अपने तेजोमय प्रकाश से प्रकाशित करें।
जिन तीर्थ यात्रियों का 41 दिनी अनुष्ठान,
तप और संकल्प पूरा हो जाता हैं तो 41वे
दिन इन यात्रियों को एक समूह के रूप मे संकल्प की पूर्णाहुति के रूप मे एक छोटी सी
पूजा के साथ बसों से सबरीमाला तीर्थ के लिये प्रस्थान किया जाता हैं। इन यात्रियों
को सबरीमाला जाने के पूर्व के धार्मिक अनुष्ठान का अवसर भी आज प्रातः,
27 दिसम्बर 2023 को देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ जिसमे आज 20 तीर्थ यात्री सबरीमाला
जाने वाले थे। कौंडापुर के इस हनुमान मंदिर
के परिसर के एक भाग मे क्रम से संकल्प पूर्ण कर चुके एक-एक यात्री को भगवान
अय्यप्पा के स्वरूप के समक्ष बैठा कर संक्षिप्त पूजा कराई गई। पुरोहित द्वारा
नारियल के बीजांकुर को हटा कर, पानी को खाली कर उसकी जगह शुद्ध घी को भरा गया। नारियल
के उस छिद्र को एक छोटी लकड़ी से बंद कर उसके उपर मैदा के आटे से बनाए गए पेस्ट को
लगा कर बंद किया गया जिसके उपर एक चौकोर सूती कपड़े से
दबा कर, एक छोटी काली थैली मे
कस कर बंद कर दिया गया। दूसरी कुछ बड़ी और
लंबी, कपड़े की थैली मे अभ्यर्थी यात्री द्वारा दोनों
हाथों की अंजलि बना कर, तीन बार थैली
मे चावल डाले गये,
तत्पश्चात उसके परिवार के निकट संबंधियों
द्वारा भी क्रम से उस काली थैली मे तीन-तीन बार चावल के साथ कुछ धनराशि और कुछ वस्त्र भी रक्खे। छोटी थैली मे रक्खे नारियल को भी इस बड़ी काले
वस्त्र की थैली मे रक्ख कस कर बांध दिया गया। इसके बाद पूजा कराने वाले गुरुस्वमी ने भक्त तीर्थ यात्री
के सिर पर उस काली पोटली को रख कर यात्रा के लिए अपना आशीर्वाद दिया। भक्त
तीर्थयात्री ने मंदिर की प्रदक्षिणा के पूर्व,
परिवार सभी निकट संबंधी, मित्र और
शुभचिंतकों चाहे वह उम्र मे छोटे हों या बड़े सभी ने एक-एक कर सबरीमाला जा रहे अपने
परिजन को शाष्टांग प्रणाम किया, चरण वंदन किया!!
मंदिर मे भगवान के दर्शन के बाद अब सभी रिश्तेदार अपने परिजन से बिदा ले कर
अपने-अपने घरों को प्रस्थान कर गए।
इस तरह दक्षिण भारत की एक पवित्रम एवं महत्वपूर्ण
यात्रा के प्रथम चरण को हमने आपके समक्ष रक्खा और ईश्वर से प्रार्थना की कि मुझे
भी सबरीमाला के अगले चरण की तीर्थ यात्रा का आशीर्वाद दे ताकि उस यात्रा के विवरण,
अपने सुधि पाठकों, मित्रों और स्वजनों के
साथ सांझा करने मे समर्थ हो संकू। भगवान श्री
अय्याप्पा स्वामी की जय!!
विजय सहगल
यात्रा
का तेलगु अनुवाद गूगल के माध्यम से
"దక్షిణ భారతదేశంలోని పవిత్ర స్థలం "శబరిమల తీర్థయాత్ర" కోసం
సన్నాహాలు
అయినప్పటికీ,
సూర్యుడు మకరరాశిలోకి ప్రవేశించే ముందు దక్షిణ
భారతదేశంలో శబరిమల కోసం సన్నాహాలు ఎల్లప్పుడూ ముమ్మరంగా జరుగుతాయి,
కానీ ఈ సంవత్సరం నేను హైదరాబాద్లో ఉన్న సమయంలో ఈ
సన్నాహాలు చాలా దగ్గరగా చూశాను. శబరిమల యాత్ర గురించిన కొద్దిపాటి సమాచారం
దేశంలోని జాతీయ టీవీ ఛానెల్లలో ప్రతి సంవత్సరం కనిపిస్తుంది మరియు వినబడుతుంది,
అయితే ఈ రోజు శబరిమల పర్వతంపై ఉన్న అయ్యపన్ స్వామి
దర్శనం మరియు యాత్రకు సంబంధించిన వివరణాత్మక సమాచారం 22 డిసెంబర్ 2023న హైదరాబాద్లోని
కౌందాపూర్లో ఇవ్వబడుతుంది. మార్నింగ్ వాక్ సమయంలో కలిశారు,
శ్రీ మహేష్ గౌడ్ జీని కలిశారు. శబరిమల వద్ద అయ్యపన్
యొక్క భక్తుడైన మహేష్ జీ, ఈ యాత్రికుల
సాంప్రదాయంగా సూచించిన వస్త్రధారణ అయిన నల్లని వస్త్రాలు,
తులసి లేదా రుద్రాక్ష జపమాల మరియు తలపై విభూతి మరియు
గంధపు తిలకం ధరించాడు. 38 ఏళ్ల మహేష్ హైదరాబాద్లో
ఫ్యామిలీ ట్రాన్స్పోర్ట్ వ్యాపారం నిర్వహిస్తున్నాడు మరియు ఈ ఏడాది శబరిమలకు ఇది 16వ సందర్శన. శబరిమలకి మతపరమైన యాత్రకు ముందు, అయ్యపన్కు అంకితం చేయబడింది, నియమాలు మరియు
ఆచారాలను అనుసరించే భక్తులకు ఇది కష్టతరమైన తీర్థయాత్ర. మనలో చాలా మంది రిక్రూటర్లకు
దీని గురించి పెద్దగా తెలియదు. ఈ పవిత్రమైన మరియు కష్టతరమైన ఆధ్యాత్మిక ప్రయాణంలో
శ్రీ మహేష్ గౌడ్ పొందిన అంతర్దృష్టులను మీతో పంచుకుందాం.
కొండాపూర్లోని హనుమాన్
ఆలయంలో బ్రహ్మముహూర్తం సందర్భంగా ఉదయం స్నానం చేసి, ధ్యానం చేసి, శబరిమల యాత్రికుల కోసం
సూచించిన నల్లని వస్త్రాలు ధరించి మహేష్ గౌడ తన వ్యాపారాన్ని కొనసాగించబోతున్నాడు.
అతని స్నేహితులు కొందరు ఉద్యోగాలు మరియు సేవ కోసం వారి సంస్థలకు వెళ్లారు. శబరిమల
యాత్రలో అయ్యప్పన్ దర్శనం కోసం హైదరాబాద్లో చాలా మంది యువకులు,
ఆటోడ్రైవర్లు లేదా వ్యాపారవేత్తలు,
డాక్టర్లు, ఇంజనీర్లు ఇలా నల్లటి దుస్తులు ధరించడం నేను చూశాను. ఈ రోజుల్లో హైదరాబాద్లో
ఎక్కడ చూసినా శబరిమల భక్తులే కనిపిస్తారు. అయ్యప్పన్ తీర్థయాత్రకు వెళ్లే ముందు 41 రోజుల పాటు కఠినమైన ఉపవాసం లేదా ఆచారాన్ని పాటించాలని మహేష్ జీ చెప్పారు. ఈ
భక్తులైన యాత్రికులు, ఈ 41 రోజులలో, వారి సాధారణ రోజులకు
మించి బ్రహ్మచర్యాన్ని పాటిస్తారు, వారి ఇళ్లను విడిచిపెట్టి, సమిష్టిగా గుడిలో లేదా
చుట్టుపక్కల గుడారాలు వేసుకుని నేలపై పడుకుంటారు. ఈ రోజుల్లో భక్తులందరూ తమ
పాదాలకు చెప్పులు లేదా బూట్లు ధరించరు. వారు ఇంటి ఆహారాన్ని విడిచిపెట్టి,
సమూహ వంటగదిలో తయారుచేసిన సాత్విక ఆహారాన్ని మాత్రమే
తింటారు, అది కూడా రోజుకు
ఒకసారి. వారు తమ వ్యాపార సంస్థలను, పని ప్రదేశాలను నడపడానికి లేదా వారి షెడ్యూల్ చేసిన పనులను నిర్వహించడానికి
స్వేచ్ఛగా ఉంటారు, కానీ వారి సాయంత్రం
వ్యాపారం లేదా ఉద్యోగం తర్వాత, వారు తమ నియమించబడిన
గుడారాలలో లేదా తాత్కాలిక ఆశ్రయాలలో పూజలు మరియు ప్రార్థనలలో నిమగ్నమై ఉంటారు. ఈ
యాత్రికులు ఏదైనా అత్యవసర పని, కుటుంబంలో అనారోగ్యం
లేదా ఇతర అత్యవసర అవసరాల కోసం మాత్రమే తమ ఇళ్లకు వెళతారు,
లేకుంటే వారు తాత్కాలిక గుడారాలు మరియు నివాసాలలో
అయ్యప్పన్ను ఆరాధిస్తూ 41 రోజుల కష్టతరమైన
ఆచారాన్ని గడుపుతారు. మొత్తం ప్రయాణంలో ఒకే ఒక జత బట్టలతో,
బ్రహ్మముహూర్తంలో తెల్లవారుజామున 3.30 గంటలకు స్నానం చేయడం ప్రారంభించి, బట్టలు స్వయంగా ఉతికి, ప్రతిరోజూ దేవుని
పూజలు చేసి ఉదయం 8-9 గంటలకు తమ పనికి
బయలుదేరుతారు. మధ్యాహ్నం 1-1.30 గంటలకు, నగరంలో ఏర్పాటు చేసిన
వారి గ్రూప్ కిచెన్లో తయారుచేసిన ఆహారాన్ని తినడానికి ప్రజలు ఒకచోట చేరి
ప్రసాదంగా తింటారు. నల్లని వస్త్రాలు ధరించి వారి సంకల్పంతో సాగిన ఈ ప్రయాణంలో,
భక్తులందరూ భగవంతుని పట్ల ఐక్యంగా ఉండటం వల్ల,
ఆ భక్తులందరూ ఒకరినొకరు "స్వామీ" అని
సంబోధించుకుంటారు. తమ బృందంలో శబరిమల యాత్ర అనుభవం ఉన్న సీనియర్ భక్తుడిని
"గురుస్వామి" అని పిలుస్తూ భక్తులందరూ గౌరవిస్తారు.
ఈ నేపథ్యంలో డిసెంబర్ 22వ తేదీన ఓ ఇంటి యజమాని తన ఇంట్లో ఏర్పాటు చేసిన కార్యక్రమానికి హాజరు కావాలని, యాత్రకు సంబంధించిన ఏర్పాట్లను చూడాల్సిందిగా మహేష్ నన్ను ఆహ్వానించారు.
సుమారు 12 గంటలకు నిర్ణీత సమయం
మరియు ప్రదేశానికి చేరుకున్నారు. తెలుగు భాషలో పాడే కీర్తనల అర్థాన్ని అర్థం
చేసుకోవడంలో పెద్దగా కష్టపడలేదు. ఓ జగత్ప్రభువా, అయ్యప్పా, నీకు నమస్కరిస్తున్నాను. ఇక్కడ జరుగుతున్న పూజను చూసి, ఊహించడం కష్టం కాదు, ఎందుకంటే అయ్యప్ప స్వామిని
సింహాసనంపై అలంకరించారు మరియు అతనిని చేరుకోవడానికి 18 మెట్లు నిర్మించబడ్డాయి. ప్రతి మెట్లకు ఇరువైపులా దీపాలు వెలిగించి, పండ్లు, పువ్వులు మరియు వివిధ ఆకులతో
అలంకరించబడి, భారతీయ సంస్కృతి దేవుడికి
"పత్రం, పుష్పం ఫలం తోయం"
అంకితభావం స్పష్టంగా కనిపించింది. అర్చకుడు, స్వాముల ఆధ్వర్యంలో ఒక
యువకుడు తెల్లని దుస్తులు ధరించి తలపై తెల్లని దుస్తులు ధరించి పూజలు
నిర్వహిస్తుండగా, వీరి వెనుకే యువకుడి తండ్రి
శ్రీను పూజలు నిర్వహించేందుకు సహకరిస్తున్నాడు. శబరిమల యాత్ర మొదటి దశ అంటే 41 రోజుల ఆచారాల కోసం ఈ ఇంటి యజమాని తొలిసారిగా తన కుమారుడిని పంపిస్తున్నట్లు
మహేష్ తెలిపారు. ఈ పవిత్ర తీర్థయాత్రకు బయలుదేరిన ఇంటి యువకుడి గౌరవార్థం కుటుంబం
ఈ పవిత్ర పూజను నిర్వహించింది మరియు ఇతర యాత్రికులను ఆహ్వానించడం ద్వారా విందు
కూడా ఏర్పాటు చేసింది. ఈ శబరిమల యాత్రికులతో పాటు, కుటుంబం వారి దగ్గరి
బంధువులు, శ్రేయోభిలాషులు మరియు
స్నేహితులను ఆహ్వానించింది, అందులో నేను కూడా అతిథిని.
ప్రతి కుటుంబం తన ఆర్థిక సామర్థ్యానికి మరియు సామర్థ్యానికి అనుగుణంగా ఈ సందర్భంగా
ఇటువంటి పూజలను నిర్వహిస్తుంది.
పూజలో పండ్లు, పూలు, కొబ్బరికాయలు పగలగొట్టి
అయ్యప్ప స్వామికి సమర్పించి యాత్రకు శుభం కలగాలని ఆకాంక్షించారు. ఉదయం 11
గంటలకు ప్రారంభమై సుమారు 3
గంటల పాటు సాగిన ఈ కార్యక్రమంలో చివరి దశలో సింహాసనం
కింద ఉన్న 18 మెట్ల మధ్యలో ప్రతి
నిటారుగా ఉంచిన కర్పూర దీపాలను కింది నుంచి పై వరకు దూది మంటతో వెలిగించారు.
పొడవైన కర్ర చివర.. ఈ 18 మెట్ల ప్రాముఖ్యతను
వివరిస్తూ, ఈ 18
బంగారు మెట్లు కేరళలోని పతనంతిట్ట జిల్లాలోని
పెరియార్ టైగర్ రిజర్వ్ అడవుల్లోని 18 శబరిమల కొండలను సూచిస్తాయని, వాటి మధ్య అయ్యప్ప ఆలయం ఉందని
మహేష్ చెప్పారు. అడవిలో 8-9 కి.మీ నడకలో, శబరిమల యాత్రికులందరినీ ఆలయంలోకి ప్రవేశించే ముందు ఈ 18
బంగారు మెట్ల గుండా తీసుకువెళతారు. దీపం వెలిగించడం
"అయ్యప స్వామి" తన ప్రకాశవంతమైన కాంతితో వారి ప్రయాణ మార్గాన్ని
ప్రకాశింపజేయాలని సూచిస్తుంది.
41 రోజుల కర్మలు, తపస్సు మరియు తీర్మానం పూర్తయిన యాత్రికులు, 41 వ రోజు, ఈ యాత్రికులు, ఒక సమూహంగా, తీర్మానం పూర్తయిన గుర్తుగా
చిన్న పూజతో బస్సులలో శబరిమల యాత్రకు బయలుదేరుతారు. ఈ రోజు 27 డిసెంబర్ 2023 ఉదయం శబరిమలకు వెళ్లే
ముందు ఈ యాత్రికులు మతపరమైన ఆచారాలను నిర్వహించడాన్ని చూసే అవకాశం నాకు లభించింది, ఇందులో ఈరోజు 20 మంది యాత్రికులు
శబరిమలకు వెళ్తున్నారు. కౌందాపూర్లోని ఈ హనుమాన్ ఆలయ ప్రాంగణంలోని కొంత భాగంలో, తీర్మానం పూర్తి చేసిన ప్రతి యాత్రికుడు అయ్యప్ప భగవానుని ముందు కూర్చోబెట్టి
కొద్దిసేపు పూజలు చేశారు. పూజారి కొబ్బరి గింజను తీసివేసి, నీటిని ఖాళీ చేసి స్వచ్ఛమైన నెయ్యితో నింపాడు. కొబ్బరికాయలోని ఆ రంధ్రాన్ని
చిన్న కర్రతో మూసివేసి, దానిపై పిండితో చేసిన పేస్ట్ను
పూసి, దానిపై చతురస్రాకారపు కాటన్ గుడ్డతో నొక్కి, ఒక చిన్న నల్ల సంచిలో
గట్టిగా మూసివేయబడింది. రెండవది, కొన్ని పెద్ద మరియు పొడవాటి
గుడ్డ సంచిలో, అభ్యర్థి ప్రయాణికుడు తన
రెండు చేతులతో అంజలిని తయారు చేసి సంచిలో మూడుసార్లు బియ్యాన్ని పెట్టాడు, ఆ తర్వాత, అతని సమీప బంధువులు కూడా ఆ
నల్ల సంచిలో బియ్యంతో పాటు ఏదో మూడుసార్లు ఉంచారు. డబ్బు మరియు కొన్ని బట్టలు కూడా
ఉంచారు. చిన్న సంచిలో ఉంచిన కొబ్బరికాయను కూడా ఈ పెద్ద నల్ల గుడ్డ సంచిలో గట్టిగా
కట్టారు. అనంతరం పూజలు నిర్వహించిన గురుస్వామి భక్త యాత్రికుడి తలపై నల్లటి కట్టను
ఉంచి యాత్రకు అనుగ్రహించారు. ఆలయ ప్రదక్షిణకు ముందు భక్తులు, కుటుంబ సభ్యులు, సన్నిహితులు, స్నేహితులు, శ్రేయోభిలాషులు, చిన్నాపెద్దా అనే తేడా లేకుండా శబరిమల వెళ్లే తమ కుటుంబ సభ్యులకు ఒక్కొక్కరుగా
పాదపూజలు చేసి మొక్కులు చెల్లించుకున్నారు. ఆలయంలో దేవుడి దర్శనం చేసుకున్న అనంతరం
బంధువులంతా కుటుంబ సభ్యులకు వీడ్కోలు పలికి స్వగ్రామాలకు బయలుదేరారు.
ఈ విధంగా, మేము దక్షిణ భారతదేశానికి ఒక పవిత్రమైన మరియు ముఖ్యమైన యాత్ర యొక్క మొదటి దశను
మీ ముందు ఉంచాము మరియు ఆ యాత్ర వివరాలను మా పాఠకులతో, మిత్రులతో పంచుకోవడానికి వీలుగా శబరిమల యాత్ర యొక్క తదుపరి దశకు నన్ను
ఆశీర్వదించమని దేవుడిని ప్రార్థించాము. మరియు బంధువులు. సంకుతో పంచుకోగలరు. జై
భగవాన్ శ్రీ అయ్యప్ప స్వామి!!
విజయ్ సెహగల్