शनिवार, 26 नवंबर 2022

मनीष- ए बॉटल बॉय ऑफ-गंगटोक

 

"मनीष- ए बॉटल बॉय ऑफ-गंगटोक"








यूं तो 14 नवम्बर 2022 का दिन भारत के इतिहास मे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री प॰ जवाहार लाल नेहरू के जन्मदिन बाल दिवस के रूप मे प्रसिद्ध है पर मै सिक्किम की राजधानी गंगटोक मे प्रातः लगभग 5.30 बजे भ्रमण पर निकला हुआ था। हल्की सर्दी के बीच "सविता देवता"  अपने पूरे ओज और प्रकाश के साथ गंगोटोक की पहाड़ियों को प्रकाशित कर रहे थे। तब मान बहादुर और राम प्रसाद जैसे लोग सूर्योदय के पूर्व प्रातः के 3.00 बजे से अपने सहकर्मियों के साथ गंगोटोक की सड़कों को स्वच्छ बनाने मे जुट जाते है। गंगटोक शहर या पूरा सिक्किम यूं ही साफ सुथरा नहीं हो जाता। सिक्किम का हर नागरिक जो  परोक्षताः  अपने प्रदेश को साफ सुथरा बनाता ही है पर प्रत्यक्षतः सिक्किम के सफाई कर्मी ही अपने प्रदेश को देश मे सबसे साफ-सफाई  वाला प्रदेश बनाने मे अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते है। ऐसे ही एक सफाई योद्धा "श्री मान बहादुर" से मुलाक़ात हुई जो महात्मा गांधी रोड की ओर जाने वाली सड़क पर निष्काम भाव से  सेवा मे रत थे। आगे मुख्य महात्मा गांधी रोड की सफाई के पूर्व और सफाई के पश्चात का अंतर स्पष्ट देखने को मिला जिसको मैंने अपने मोबाइल मे  कैद करने की कोशिश की। एक और स्वच्छ कर्मवीर  श्री राम प्रसाद अपने अन्य साथियों के साथ महात्मा गांधी मार्ग पर सफाई के इस अंतर को विस्तार रूप देने लगे थे। लोग यूं ही गंगटोक को देश का सबसे  साफ सुथरा शहर  नहीं कहते इसका जीता जागता उदाहरण मान बहादुर और रामप्रसाद जैसे सफाई कर्मियों के रूप मे पूरे महात्मा गांधी मार्ग गंगटोक पर देखा जा सकता है।

भारत मे छद्म आवरण ओढ़े बुद्धिजीवियों की एक जमात अपनी आदत और व्यवहार के अनुरूप  समान रूप से  जम्मू कश्मीर से दक्षिण भारत के राज्यों तक एवं पूर्वोत्तर राज्यों से पश्चिम के गुजरात तक समान रूप से मिल जायेगी जो रात मे अँग्रेजी शराब, व्हिस्की या बियर का उपयोग कर उनकी खाली बोतलों को रात के अंधेरे मे शहर के कचरघरों, कूड़ाघरों या घूरों पर बेतरतीब ढंग से फेंक देते है। ये आदत जाति, धर्म, संप्रदाय और क्षेत्रीयता से परे एक समान रूप से पूरे देश मे व्याप्त है।                 

गंगटोक के एमजी मार्ग से प्रातः भ्रमण मे बापसी पर एक और स्वाभिमानी, चतुर और तीव्र बुद्धि अठारह वर्षीय किशोर श्री मनीष से मुलाक़ात हुई जो अपनी पीठ पर एक भारी भरकम बड़े से बोरे (झोले) को अपनी पीठ पर लादे, गंगटोक की पहाड़ी सड़कों की चढ़ाई पर चढ़ रहा था। एक तो सीधी कड़ी चढ़ाई उपर से पीठ पर लदे  बोझ ने उस किशोर की पीठ को झुका रक्खा था। मैंने जब हे! यंग बॉय!! संबोधित कर उत्साहवर्धन के साथ उसका परिचय जानने और बात करने की इक्छा प्रकट की? तो वह शंका और जिज्ञासा वश कुछ डरा और सहमा नज़र आया। मैंने उसे अपनेपन और सहजता से जब उसे धैर्य पूर्वक कुछ शांत किया तब वह अपने वारे मे खुल का बोलने को तैयार हो गया। बिहार के सीतामढी  जिले का रहवासी उस नव युवक ने जीवन संघर्ष के पथ पर अपनी जीवन यापन की यात्रा तब शुरू कर दी थी जब समान्यतः बच्चे विध्याध्यन हेतु स्कूल की राह पकड़ते है। आठवीं पास मनीष के पीठ पर लदे बोझ का अंदाजा लेने हेतु जब मैंने उस के झोले को उठा बजन का अनुमान लगाया जो किसी भी हालत मे 18-20 किलो से कम न था। मनीष भी एक ऐसा परोक्ष सफाई योद्धा था जो समाज के उस तथा-कथित उच्च तबके की फैलाई बीयर और व्हिस्की की खाली बोतलों की  गंदगी को साफ करने मे संलग्न था जो तमाम छद्म आवरण ओढ़े समाज मे एक श्रेष्ठ स्थान रखने का प्रयास करते  है और जो बुद्धिजीवि वर्ग के नाम से पुकारे जाते है। ये थोपे हुए बुद्धिजीवि वर्ग जो अपने  मजबूत कंधो पर देश की समस्याओं के समाधान का बोझ ढोते तो  है पर अपनी कमजोर और कायर सोच को पूरे देश मे समान रूप से रात के अंधेरे मे सड़कों मे इधर-उधर बेतरतीब रूप से छितरा कर फैला देते है।

जब मैंने मनीष से  उसके  दिल को दुखाने जैसी किसी घटना को सांझा करने को कहा तो सुन कर सहसा वह कहीं शून्य मे खो गया। उसके चेहरे पर मायूसी और निराशा के भाव साफ नज़र आये!! उसने बताया कि जब उसके साथ के दूसरे लोग जो अन्य दूसरा व्यवसाय करते है और उसे कबाड़ी का काम करने वाले कृत को हिकारत और हेय दृष्टि से देखते है। वे लोग कचरे मे से इस बोतल, प्लास्टिक के कबाड़ को इकट्ठा करने के काम को नीच काम मानते है। उसके अपने लोग उसकी शक्ल सूरत पर व्यंग कस उसे  काला और भूतह शक्ल का बता उसका मज़ाक उड़ाते है। जब बड़े भोलेपन से उसने ये कहा, "कि सर क्या मै काला और भूतह दिखता हूँ? या मेहनत और ईमानदारी से काम करना कोई गलत या गंदा काम है? मैंने उसका हौसला बढ़ाते हुए उसको ईमानदार और मेहनती युवा कहा, जो अपनी लगन और परिश्रम के बल पर अपना जीवन यापन कर रहा है। कोई काम ऊंचा या नीचा नहीं होता।

मनीष ने बताया कि बीयर या विभिन्न ब्रांड और रूप की व्हिस्की या अँग्रेजी शराब की बोतलों की खाली बोतले 3.50 रूपये प्रति बोतल की दर से वह ठेकेदार को बेच देता है। मुझे ये जान कर अति प्रसन्नता हुई जब मनीष ने  बताया कि कल उसे इन बोतलों को बेचने पर 1500/- की कमाई हुई। मनीष के बारे मे कुछ और जानने की जिज्ञासा के क्रम मे उसने बताया कि वह अपनी कमाई का आधे से ज्यादा हिस्सा अपने गाँव मे अपने माँ-बाप को भेजने के लिए बचत के रूप मे अपने सेठ अनिल भाई  के पास जमा करता है। बोतलों के साथ लोहा 19-20 रूपये किलो की दर से एवं  प्लास्टिक का कबाड़ को भी एकत्रित कर 10-15 रूपये तक मे बेचता है। वह बताता है कि इस कबाड़ को इकट्ठा करने हेतु वह अपनी चुस्त और फुर्तीले शारीरिक क्षमता के चलते 7-8 किमी॰ की पैदल यात्रा कर लेता है जबकि उसके अन्य साथी नीचे  पहाड़ी क्षेत्रों से जाने से बचते है। शहर के अन्य कबाड़ खरीदने वाले ठेकेदार उसके कबाड़ को ज्यादा पैसे मे खरीदने के लालच देने के बावजूद वह अपने कबाड़ को सिर्फ अनिल भाई को ही बेचता है क्योंकि अनिल भाई ने उसको रहने की ठौर और खाने आदि की सुविधा के साथ एक सामाजिक संरक्षण दे रक्खा है जो प्रायः इस तबके को काम ही नसीब होता है।

बेशक सिक्किम या देश के अन्य शासक-सरकारें, तुम (मनीष) जैसे लोगो के कार्य की सराहना या पहचान न करें लेकिन तुम लोगो का भी गंगटोक को साफ सफाई, स्वच्छ रखने  मे एक अहम और महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता और निश्चित ही सभी को तुम्हारी  सराहना करनी ही चाहिये!! उसके आँखों की चमक ने उसके चेहरे पर खुशी की एक हल्कि मुस्कान ला दी जिसने मेरे मन मे भी खुशियों की एक हिलोर पैदा कर दी!! जिसको मै अब तक न भूल सका!! मनीष के उज्ज्वल जीवन की कामना करते हुए मैंने मनीष जैसे मासूम और अबोध किशोर से बिदा ली।

विजय सहगल

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

down the earth vision and respect to such with acknowledgement

विजय सहगल ने कहा…

धन्यवाद Sir