शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

सराहन बुशहर (हि॰प्र॰)

 

"भीमकाली मंदिर-सराहन बुशहर (हि॰प्र॰)"

 




               



2 जून 2022 को रामपुर बुशहर के भ्रमण के बाद  मुझे शिमला जिले के सराहन कस्बे मे स्थित माँ भीमाकली मंदिर मे जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जो समुद्र तल से लगभग 7600 फुट की ऊंचाई पर, पहाड़ों पर स्थित है। भारत-तिब्बत सीमा के पुराने मार्ग पर स्थित सराहन कस्बा भौगोलिक दृष्टि से हिमाचल प्रदेश का एक बहुत छोटा कस्बा है। बुशहर राजवंश की कुलदेवी भीमा काली का एक प्राचीन मंदिर जिसकी गिनती 51 शक्तिपीठों मे होती है। रामपुर से 47 किमी॰ दूर स्थित इस कस्बे मे तापमान के अंतर को स्पष्टतः महसूस किया जाता है जो इसे  प्राचीन बुशहर राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी होने के दर्जे को न्यायोचित ठहराता है।  सराहन का ये भीमा काली  मंदिर, शिमला से 180 किमी॰ तथा रामपुर कस्बे से 46 किमी॰ की दूरी पर है। ऐसा माना जाता है कि  किन्नौर घाटी के प्रवेश द्वार पर स्थित ये  हिमाचल प्रदेश का एक अति प्राचीन मंदिर है जो लगभग 2000 वर्ष पूर्व वसा था। पुराणों मे शिव के वास स्थान के रूप मे इसे सोनितपुर के रूप मे वर्णित किया गया है। मंदिर का निर्माण 3 विशाल आँगन मे अवरोह की स्थित मे किया गया है अर्थात सबसे उपर के आँगन मे माँ भीमा काली का पाँच मंज़िला काष्ठ कला का अद्भुद स्थापत्य का नमूना मंदिर बनाया गया है। मंदिर के प्रांगण के नीचे दो और आँगन बने है। नीचे के सबसे विशाल आँगन मे मंदिर का प्रवेश द्वार के साथ ही रघुनाथ जी, नरसिंह एवं पाताल भैरव जी का भी मंदिर है। मंदिर परिसर के इस आँगन मे एक ओर श्रद्धालुओं को ठहरने के लिये 12  आवासीय कमरे भी बनाये गायें है, मंदिर प्रबंधन से संपर्क कर पूर्व सूचना देकर जिनको आरक्षित किया जा सकता है। अपने सुधि पाठकों की सुविधा हेतु मंदिर का दूरभास क्रमांक 01782274248/234054 उल्लेखित है।   

सराहन मे मंदिर प्रबंधन द्वारा ठहरने और खाने की उत्तम व्यवस्था की गयी है।  सराहन के मौसम, शुकून  और शांति को देख मुझे लगा कि रामपुर बुशहर की जगह यदि एक दिन का प्रवास सराहन मे किया जाता तो उचित होता। दो राजमहलों और बमुश्किल सौ-सवा सौ घरों के इस सुरम्य, शांत और प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर कस्बे मे हिमाचल की सांस्कृति की झलक एवं  गाँव के लोगो की मंदिर के प्रति श्रद्धा भक्ति को सरलता से देखा जा सकता है। कस्बे के रहवासियों, सरकारी कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं की नित्य, माँ भीमा काली के दर्शन हेतु ललक-लालसा इस बात का ध्योतक है।

मंदिर के फर्श पर साधारण पत्थर लगाए गए थे पर मंदिर की छत्ते ढालूदार काले आयताकार स्लेट पत्थर से बनाई गयी थी जो उपर से नीचे एक के नीचे एक क्रम मे सीधे लाइन से रक्खे गए थे ताकि वर्षात का पानी सीधे बाहर आँगन या मंदिर प्रांगण मे गिरे। लकड़ी की उपलब्धता प्रचुर मात्रा मे होने के कारण मंदिर की  ऊपरी मंज़िले सुनहरे रंग मे रंगी नक्काशी दार स्तंभों और दीवारों से बनाई गयी थी। कहीं बारीक नक्काशी दार बलयाकार बालकनी, छोटी-छोटी खिड़कियाँ, दरबाजे देखने मे अति सुंदर प्रतीत हो रहे थे। पहले आँगन से सीढ़ियों के माध्यम से प्रवेश कर दूसरे कुछ छोटे आँगन मे प्रवेश करते ही एक शानदार चाँदी का दरबाजा दिखाई दिया जो मंदिर का द्व्तिय  प्रवेश द्वार था। दरवाजे के दोनों ओर पारंपरिक लकड़ी के शेरों के पुतले रक्खे गए थे। इसमे प्रवेश करते ही आगंतुकों, पर्यटकों को अपने पर्स, बेल्ट मोबाइल और कैमरों को वहाँ उपलब्ध लॉकर की  अभिरक्षा मे अनिवार्यतः रखना होता है। उस स्थान पर मंदिर प्रबंधन द्वारा उपलब्ध कराई गयी सफ़ेद रंग की बुशहरी टोपी पहनना अनिवार्य थी जिसके बिना मंदिर मे प्रवेश की अनुमति नहीं थी। महिलाओं को सिर पर दुपट्टा या पल्लू भी इसी श्रेणी मे था। चूंकि मोबाइल कैमरे आदि की अनुमति न होने के कारण मंदिर के मुख्य प्रांगण और मंदिर की तसवीरों को लेना संभव नहीं थी।

प्रायः हिमाचल के मंदिरों की बनावट एक सी देखने को मिली। विशेष वर्गाकार स्तम्भ के ऊपरी सिरे पर उससे भी बड़े वर्गाकार की लकड़ी से निर्मित आकृति  को मजबूती से बनाया गया था जो दूर से ऐसे प्रतीत होती थी मानों वर्गाकार स्तम्भ के ऊपर एक और बड़े वर्गाकार कक्ष को टिका कर रक्खा  गया हो। मंदिर के लगभग 12-15 फुट के वर्गाकार कॉरीडोर मे प्रवेश करते ही एक तरफ छोटी सीढ़ियों के माध्यम से प्रत्येक सीढ़ी, जिन पर लाल रंग के गरम कालीन से  सजाया गया था, उपर जाने का रास्ता था। तीसरी मंजिल पर मुख्य मंदिर का मंडप जो लगभग 20X20 फुट का था और जिसके केंद्र मे एक सुंदर  सिंहासन पर देवी भीमकाली की भव्य चाँदी की प्रतिमा विराजित थी। हम लोगो का सौभाग्य था कि प्रातः के 9.00 बजे आरती का समय होने के कारण आरती मे शामिल होने का सौभाग्य मिल गया। लगभग 20 मिनिट आरती और स्तुति मे शामिल होने के दौरान मंदिर के मंडप मे बैठने के इस अद्भुद सुयोग ने देवी भीमा काली  के दर्शन को अविस्मरणीय बना दिया। मंगल  आरती और प्रसाद को ग्रहण कर, मंदिर पथ  की परिक्रमा कर, दूसरी ओर से बनी सीढ़ियों से हम लोग नीचे बापस आ गए। पूरे मंदिर परिसर मे हर जगह लाल रंग का कालीन लगाया गया था ताकि पूरे साल चलने वाली सर्दी से दर्शनार्थियों और मंदिर के सेवादार विप्रवरों को सर्दी से राहत मिल सके। मंदिर की इस विशेष शैली को कोट शैली के नाम से जाना जाता है।

मंदिर से बापस नीचे आने पर मंदिर प्रांगण मे ही मंदिर मे प्रयोग आने वाले पुराने वर्तन, कड़ाहों, कांस्य जल पात्रों  आदि का संग्रहालय बनाया गया है जिसमे वर्तनों के अतरिक्त हवन पूजन मे आने वाली वतुओं को करीने से सजाया गया था। जिसके पास ही एक छोटी और आकर्षित यज्ञ शाला जिसके मध्य मे हवन कुंड और उसके किनारे विप्र औ जजमानों के बैठने की व्यवस्था थी, बनाया गया था। प्रवेश द्वारों के उपर बने कमरों मे मंदिर मे कार्यरत कर्मचारियों के ठहरने की व्यवस्था थी लकड़ी से बने इन विश्राम स्थलों पर की गयी नक्काशी और लकड़ी की कलात्मकता देखते ही बनती थी। मंदिर के प्रांगण मे निरुद्देश्य बैठना भी अध्यमिक सुख और शांति देने वाला था। प्रातः के लगभग 10 बजे थे मंदिर प्रांगड़ मे ही बनी साफ सुथरी  कैंटीन मे गरमा गरम आलू के पराँठों का नाश्ता स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर था।

मंदिर प्रांगण से कुछ ही दूरी पर सेवों के बगीचे से होते हुए जब सराहन कस्बे मे बने दो महलों को देखने पहुंचे तो उनके मुख्य द्वार बंद थे, फिर भी महल की चाहारदीवारी के बाहर से महल को देखने से ऐसा लगा कि उक्त महलों का सीधा संबंध वुशहर राजवंश से हो? बेशक ये सुंदर महल इन राजपरिवारों की व्यक्तिगत संपत्तियाँ है पर ये  भवन और राजप्रसादों को भव्य और सुंदर रूप देने वाले कारीगरों, श्रमिकों और वास्तुकारों की वास्तुकला का ये एक   बेजोढ़ रचना के  नायाब नगीने है, जिनके श्रम से इनको इतना शानदार रूपाकार  दिया गया था।  अतः इन राजपरिवारों को पर्यटकों की सुविधा हेतु इनके भ्रमण और देखने की व्यवस्था करनी ही चाहिए बेशक चैल पैलेस की तरह वे कुछ प्रवेश शुल्क इसके एवज मे,  टूरिस्टों से  बसूल कर सकते है।  रामूपुर की तरह ही यहाँ के दोनों  महल अत्यंत आकर्षक और सुंदर थे पर प्रवेश के अभाव मे हम उन श्रमिकों की कला, हिमांचल की सांस्कृति  को अच्छी तरह देखने से वंचित रहे। हमे उम्मीद है हिमाचल प्रदेश का पर्यटक विभाग इस हेतु आवश्यक कार्यवाही करेगा।  

सराहन मे माँ भीमा काली के अद्भुद मंदिर और सुंदर राज महलों की अविस्मरणीय यादगार यात्रा प्रकृति और मानव के बीच पारस्परिक संतुलन का  एक बेजोड़ उदाहरण और आदर्श नमूना थी।

 

विजय सहगल             

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

जय श्री मां भीमा काली ।

Binod sharma ने कहा…

आपकी यात्रा जो बारीकियों से हरेक सौंदर्यता का उल्लेख हमें बस पढ़ने मात्र से उस ओर खींच रहा है।
आपकी यात्रा की लेखनी में पग पग पर प्रकाशित करना उक्त यात्रा को जीवंत बना दिया है।ऐसा लग रहा है मानो मैं भी उस मनमोहक दृश्य को देख आया हुँ।🙏🙏