रविवार, 31 जुलाई 2022

हिमाचल की राजधानी और देश का दिल "शिमला"

"हिमाचल की राजधानी और देश का दिल "शिमला" (1)








1 जून 2022 को कुफ़री और महासू पीक की यात्रा के पश्चात हमारा अगला पढ़ाव हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला था। अनुमान था कि एक-डेढ़ बजे तक शिमला मे अपने होटल पहुँच जाएंगे लेकिन अनुमान गलत था। दोपहर के लगभग दो बज चुके थे क्योंकि शिमला एक महानगर का रूप ले चुका है। बढ़ती आबादी और वाहनों की बढ़ती संख्या ने हर जगह इतना जबर्दस्त ट्रेफिक बड़ा दिया है कि सड़कों पर गाड़ियाँ  रेंगती नज़र आती है। यहाँ पर कार पार्किंग की समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी है। 40-50 रूम के होटल मे बमुश्किल 4-5 चार पहिया वाहनों की ही पार्किंग थी। यध्यपि होटल के पास ही पेड पार्किंग की सुविधा थी जहां पर 200 रुपए मे कार पार्किंग करना भी टेड़ी खीर थी। जैसे तैसे तीन बजे तक होटल मे प्रवेश पश्चात बगैर एक क्षड़ गवाये हम लोगो ने शिमला के मॉल रोड और रिज़ मैदान पर घूमने का कार्यक्रम बना लिया। वाहनों की बढ़ती संख्या के बीच  शिमला शहर की सड़कों को पार कर मॉल रोड की तरफ जाना एक दुष्कर और कठिन कार्य था, पर मॉल रोड पर वाहनों के प्रवेश निषेध को देख मन खुशियों से भर गया।

प्रायः हर हिल स्टेशन पर माल रोड अवश्यसंभावी होती है यहाँ शिमला मे भी थी। नैनीताल मे मॉल रोड पहाड़ के नीचे तलहटी मे है मसूरी मे भी कमोवेश ऐसा ही मॉल रोड पहाड़ के बीच मे  है पर शिमला का मॉल रोड  इस के ठीक उलट पहाड़ी के उच्चतम शिखर अर्थात "टॉप ऑफ द हिल"  पर है जहां से पूरे शिमला का 360 डिग्री का दृश्य देखा जा सकता है। पर शिमला के इस "टॉप ऑफ द हिल" पर पहुँचना एक टेड़ी खीर है, एक कठिन और काफी श्रम साध्य कार्य है। नौजवानों को छोड़ हम जैसे वरिष्ठ नागरिकों को मॉल रोड या रिज मैदान तक जाना कोई हिमालय पर्वत की चढ़ाई से कम नहीं है, लेकिन किसी खूबसूरत शहर के दर्शन के लिए इतनी कीमत तो अदा की ही जा सकती है। क्या ही अच्छा हो कि सरकार मॉल रोड तक पहुँचने के लिये मॉल रोड के चारों ओर लिफ्ट की व्यवस्था कर दे!!  जैसे तैसे अपने परिवार के साथ हम शिमला की पहाड़ी के एक छोर पर पहुँचने मे कामयाब रहे और इस रोड पर स्थित सैकड़ो ऐतिहासिक विरासत के भवनों और इमारतों की पहली मजिल के सामने खड़े थे। लाल गेरुई रंग की पृष्ठभूमि पर निर्मित शानदार वास्तु के दर्शन कराती इस बिल्डिंग मे रेल विभाग और ए॰जी॰ के कार्यालय  के अलावा कुछ राज्य सरकार के अन्य भवन भी स्थित थे।  

सड़क के दोनों ओर शिमला मे हरे भरे वृक्षों के बीच जगह जगह दूर दूर तक कंक्रीट के जंगलों के प्रतीक आवास, होटल, कार्यालय, हॉस्टल  नज़र आ रहे थे जो इस प्यारे और सुदर दिखने वाले शिमला शहर मे जनसंख्या के दबाव के द्दोतक थे। पर इक्का दुक्का सरकारी वाहनों को छोड़ मॉल रोड पर वाहनों का प्रवेश वर्जित था जो सैलानियों को निश्चिंत हों मस्ती मे घूमने के लिये स्वतंत्र कर देता था। स्कूल से लौटते बच्चे हों या बड़े बुजुर्ग, नौजवान सभी पैदल आते जाते नज़र आये। किसी भी शहर को सफाई कर्मियों द्वारा की गयी सफाई का महत्व तभी सार्थक होता है जब शहर के वासिंदे और नागरिक भी इस सफाई मे भागीदार हों!! शिमला के मॉल रोड और रिज मैदान मे इस का सजीव उदाहरण देखने को मिला। हल्के हरे रंग से आच्छादित तीन शेड की सुंदर इमारतों के बीच सेना के प्रशिक्षण कमांड, मुख्यालय  का  लकड़ी के आकर्षक प्रवेश द्वार  वरवश ध्यानाकर्षित कर रहा था। प्रवेश द्वार से लगी हुई चार जवानों की आदम कद मूर्तियाँ पर्वत के शिखर पर अपनी जीत के प्रतीक राष्ट्र ध्वज को फहराने की मुद्रा अत्यंत आकर्षक, मनोहारी और जोश पैदा करने वाली थीं। उन मूर्तियों के नीचे लिखा सेना का ध्येय मंत्र "मेरा देश-मेरा लक्ष्य, मेरे जवान-मेरा कर्तव्य" और "राष्ट्र प्रथम-हमेशा और हर समय" जैसे आवाहन न केवल सेना अपितु हर देशवासी के दिलों और आने वाले पर्यटकों के दिल मे भी देश के लिये मर मिटने और कुछ कर गुजरने का जुनून, ऊर्जा, उत्साह और उमंग पैदा कर देता है।

थोड़ा आगे बढ्ने पर  विरासत की एतिहासिक इमारतों मे सबसे छोटी गोल लाल गुंबज की बमुश्किल 12-13 फुट लंबी और 6-7 फुट चौड़ी लेकिन खूबसूरत इमारत से शिमला की इन एतिहासिक धरोहर की शुरुआत सुंदर थी। इसके ठीक सामने बीएसएनएल की इमारत जो अन्य इमारतों की तरह पुरानी न थी पर बिल्डिंग के हालात और सूरत इस बात की गवाह थी कि यह इमारत और विभाग अपने हालातों के कारण अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है। काश बीएसएनएल के कर्मचारी/अधिकारी दुनियाँ और सरकार को इन हालातों के लिये ज़िम्मेदार ठहराने  के पूर्व आत्मचिंतन भी करते तो शायद ये हालात न होते।

मॉल रोड मे कार्यालयों और निजी प्रतिष्ठानों को देख मुझे ऐसा लगा कि बायीं ओर की इमारतें सरकार के सरक्षण की इमरते थी जिसमे बैंक, एलआईसी, पोस्ट ऑफिस, पर्यटन विभाग आदि थे जबकि दाहिने तरफ के भवनों  का स्वामित्व  निजी संस्थानों और दुकानोंदारों और स्थानीय लोगो के स्वामित्य का होगा। मौसम की तेज धूप के बावजूद हवा की नमी ने सूरज के ओज़ को कम कर रक्खा था।

आगे  एक छोटे लेकिन अधिक खुले क्षेत्र वाले चौराहे के बीचों बीच पर लाला लाजपत राय की एक छोटी लेकिन ऐतिहासिक महत्व की आदम कद प्रतिमा लगी थी। प्रतिमा के नीचे लगे शिला पर लेख था  कि इस प्रतिमा को स्वतन्त्रता के बाद लाहौर से ला कर 15 अगस्त 1948 को शिमला के इस स्थान पर पुनर्स्थापित किया गया। मेरी आँखों मे इस लेख को पढ़ कर मन मे आये विचारों के कारण  वरवश ही आँसू आ गये। लाहौर से प्रतिमा को लाकर शिमला मे पुनः स्थापित करना इस बात को दर्शाता है कि देश के  बंटवारे से उपजी विभित्स्का, संत्रान्स और नागरिकों का  उत्पीढन  स्वीकारना कितनी भारी भूल थी और   देश के नागरिकों के साथ कितना बड़ा अन्याय और धोखा  था  कि  देश की स्वतन्त्रता के संघर्ष मे जिस लाहौर शहर  मे साइमन कमीशन के विरुद्ध अभियान मे लाला जी को अंग्रेजों द्वारा  लठियों से पीटने के कारण 30 अक्टूबर 1928 को अपने  प्राण न्योछावर करने पड़े,  उस  वीर अमर बलिदानी स्व॰ लाला लाजपत राय को देश के एक हिस्से पाकिस्तान  के लाहौर के निर्लज्ज और एहसान फरामोश लोगो ने उनकी शहादत के स्मारक के लिये दो गज जमीन देश के बँटवारे के बाद एक दिन के लिये  भी  देना  मुनासिब न समझा और प्रतिमा को लाहौर से शिमला लाना पड़ा।  ये घटना अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण, दुःखद और खेदजनक थी और देश के बँटवारे पर बहुत बड़ा सवालिया निशान भी?      

विजय सहगल 

शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

माननीयों का आचरण

 

"माननीयों का आचरण"





पिछले दिनों संसद के दोनों सदनों के विभिन्न राजनैतिक दलों के अनेकों माननीय संसद सदस्यों को सदन के मौजूद सत्र से निलंबित करने का समाचार हम सभी ने देखा और पढ़ा। बड़ा दुःख और अफसोस होता है कि जिन माननियों संसद सदस्यों को चुन कर देश की जनता देश के नागरिकों के कल्याण और हित के लिये नीतियाँ और कार्यक्रम बनाने की ज़िम्मेदारी सौंपती है वे अपने कर्तव्यों की अवेहलना कर संसद मे हँगामा खड़ा कर देश और देश के नागरिकों के साथ छल प्रवंचना करते है। संसद की कार्यवाही मे  विघ्न और बाधा उत्पन्न करने वाले ऐसे सांसदों का  व्यवहार न केवल उस संसदीय क्षेत्र के नागरिकों का अपमान है जिन्होने इन मननियों को अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि बना कर देश के सर्वोच्च लोकतान्त्रिक सदन के पवित्र मंदिर मे मर्यादित आचरण करने के वचन के साथ अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि बना कर भेजा था। तख्तियाँ लेकर सदन के मंडप मे जबर्दस्ती घुसना कौन सा मर्यादित आचरण है? वे क्यों अपने मर्जी और इक्छा हंगामे के रूप मे बल पूर्वक क्यों लागू करवाना चाहते है? क्यों नहीं सभापति द्वारा संचालित सदन के नियमानुसार सदस्य आचरण नहीं करते?

संसद के इस मानसून सत्र 2022 मे विपक्ष बढ़ती महंगाई और खाद्य सामाग्री पर जीएसटी की बढ़ोतरी को लेकर सदन मे बहस की मांग पर अड़ा है! जिसके चलते लगातार सदन मे हँगामा खड़ा किया जा रहा है। राजनैतिक दलों की दोमुंही नीति देखिये कि जिस जीएसटी परिषद मे  जिन खाद्य सामग्रियों  पर सर्वसम्मति से जीएसटी की दर बढ़ाई गयी थी, उस मे हँगामा कर रहे मननियों के दलों की राज्य सरकार के वित्त मंत्री भी उपस्थित थे। क्यों नहीं उनके राज्य की सरकारों के वित्त मंत्रियों ने खाद्य सामाग्री पर जीएसटी की दरों मे वृद्धि का विरोध किया? क्यों नहीं कॉंग्रेस पार्टी ने छत्तीसगढ़ और राजस्थान के, टीएमसी ने पश्चिमी बंगाल के, आप पार्टी ने दिल्ली और पंजाब के, डीएमके पार्टी ने तमिलनाडु के वित्त मंत्रियों से आवश्यक वस्तुओं पर जीएसटी बढ़ाने/लागू करने की सहमति पर सवाल किये?    

सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों पर मतांतर होना स्वाभाविक है! विपक्षी दलों का सरकार की  नीतियों और विचारों पर असहमति रखना उनका अधिकार है!! आवश्यकता पड़ने पर उनका विरोध करना उनका संवैधानिक अधिकार है!! पर विरोध संविधान मे उल्लेखित नियमो के तहत ही होना चाहिये। पर ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकतर विपक्ष विशेषकर देश की  सर्वाधिक पुरानी पार्टी, काँग्रेस सरकार विरोध और देश विरोध के बीच अंतर को भूल सरकार के विरोध करके राष्ट्र विरोध पर उतारू हो जाती है!! तभी आये दिन संवैधानिक संस्थानों और उस पर आसीन व्यक्तियों का अपमान करती रहती है।  इसी तारतम्य मे 27 जुलाई 2022 को काँग्रेस के संसदीय दल के प्रमुख माननीय श्री अधीर रंजन चौधरी ने जानबूझ कर देश की सम्मानीय प्रथम आदिवासी महिला "राष्ट्रपति" श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपत्नी! कह अपमानित किया। ये देश की राष्ट्रपति का ही नहीं देश और देश की 139 करोड़ नागरिकों का अपमान है। अफसोस और दुःख इस बात का है कि अधीर रंजन जी को उनकी त्रुटि की ओर  इंगित कराने के बावजूद भी उन्होने इसे चूक तो माना पर अपने अक्षम्य वक्तव्य के लिये माफी नहीं मांगी। क्या अधीर रंजन जैसे माननीय पुरुष द्वारा  भारत की राष्ट्रपति महोदया पर इस गंभीर अमर्यादित टिप्पड़ी के लिए कॉंग्रेस दल की प्रमुख, जो स्वयं भी एक महिला है, द्वारा हस्तक्षेप कर रंजन जी को माफी के लिये निर्देशित नहीं किया जाना चाहिये? 

इसी तरह 27 जुलाई 2019 को समाजवादी के सांसद श्री आज़म खाँ ने भी पीठासीन अध्यक्ष श्रीमती रामा देवी पर अभद्र टिप्पड़ी की थी। दुःख तो तब और  होता है कि हमारे माननीय संसद अपने कुत्सित वक्तव्यों पर माफी मांगना तो दूर अपने भौड़े कुतर्कों को न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते है!! विदित हो कि श्री आज़म खाँ पूर्व मे भी रामपुर से संसद सदस्य की प्रत्याशी रहीं जयप्रदा जी पर भी अमर्यादित,  विवादित, कलुषित  टिप्पड़ी के लिये कुख्यात रहें है। आश्चर्य इस बात का है कि श्री आज़म खाँ की श्रीमती रामा देवी पर की गयी अभद्र टिप्पड़ी पर  विभिन्न दलों की महिला सांसदों के साथ श्री अधीर रंजन जी ने भी निंदा की थी और श्री आज़म खाँ से माफी मांगने की मांग की थी पर आज महामहिम राष्ट्रपति जी पर अपमानजनक टिप्पड़ी पर माफी मांगने के प्रश्न पर वे क्यों मौन है?

मेरा इस माननीय सदस्यों से प्रश्न है कि क्या संसद के दोनों सदनों के सभापति द्वारा विभिन्न सांसद सदस्यों के मर्यादित आचरण के कारण निलंबन जो किसी भी दृष्टि से आपराधिक न सही लेकिन नैतिक सजा से कम नहीं है? जिस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व इन मननियों द्वारा किया जा रहा है क्या उस क्षेत्र के नागरिकों के विश्वास पर आघात नहीं है? आइये दलगत भावनाओं से परें समस्त देशवासी लोकतान्त्रिक संस्थानों, संगठनों और उन पर आसीन व्यक्तियों का सम्मान करते हुए देश की नयी पीढ़ी को एक शुभ, मर्यादित  और शास्त्रानुकूल संदेश दें।  

विजय सहगल                    

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

गुमशुदा लैपटॉप

 

"गुमशुदा लैपटॉप"

 

मेरी पदस्थपना के दौरान एक कार्यालय की घटना आपके साथ सांझा करूंगा जो बेहद अफसोस जनक और  शर्मसार करने वाली थी। कार्यालय के अंदर राजमहलों के से षड्यंत्र होना बहुत ही खेद और अफसोसजनक था। इस वृतांत मे देश, काल और पात्रों  को जानबूझ कर अबूझा रक्खा गया है।  इस  घटना मे एक  विभाग के  कार्यालय मे पदस्थ  विभाग प्रमुख सहित सारे फील्ड स्टाफ को बैंक कार्य हेतु  लैपटॉप प्रदान किया गया था, जिसकी लिखित रसीद व्यक्तिगत स्तर पर सभी सदस्यों से प्राप्त कर रेकॉर्ड मे रखी गई थी, ताकि लैपटॉप के लेनदेन मे पारदर्शिता रखी जा सके। अब लैपटॉप की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संबन्धित स्टाफ की थी जिसे लैपटॉप प्रदाय किया गया था। अब चाहे स्टाफ प्रदत्त लैपटॉप को कार्यालय मे रखे या अपने साथ घर ले जाये।  बैंक का कार्य समय की गति से चलता रहा। दिन, हफ्तों और महीनों पश्चात एक दिन ऐसा भी आया जब विभाग प्रमुख का स्थंतरण स्वाभिक प्रक्रिया के तहत  वर्तमान पदस्थपना से  अन्यत्र अन्य स्थान के लिये हो गया। नवांगतुक को प्रभार सौपने के पूर्व विभाग प्रमुख ने लैपटॉप तब के कार्यालय समन्वयक (रेसिडेंट अफसर) को देकर पावती प्राप्त करली। ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आवे।

अगले ही दिन निवृतमान विभाग प्रमुख हड़बड़ी दिखाते हुए जो लैपटॉप वापस किया था उसी  लैपटॉप की आवश्यकता बताते हुए उक्त लैपटॉप को अपने साथ ले गये एवं  कुछ समय पश्चात वापस कर देने के वादा  उपस्थित स्टाफ के सामने किया,  जिनमे मै भी एक था। वे हम सब के  समक्ष लैपटॉप को  लेकर  कार्यालय से चले गये।

चंद दिनों बाद जब नये विभाग प्रमुख द्वारा कार्यग्रहण कर लिया गया तो एक लैपटॉप को नये विभाग प्रमुख को देने की चर्चा हुई पर अचानक उस दिन लैपटॉप की गिनती का हिसाब किताब लगाया गया तो रेसिडेंट अफसर ने  एक लैपटॉप कम पाया। रेकॉर्ड के मिलान और पिछले दिनों के घटनाक्रम को स्मरण करने पर ज्ञात हुआ कि उक्त लैपटॉप तो निवृतमान प्रमुख आवश्यक कार्य हेतु ले गये थे। जब दूरभाष पर पिछले विभाग प्रमुख से चर्चा की गई जो उस समय तक नई पदस्थपना पर जॉइन कर अन्यत्र स्थान पर जा चुके थे। उन्होने बताया कि वह तो उक्त लैपटॉप कार्यालय मे वापस दे आये थे। काफी छानबीन, लैपटॉप के नंबर आदि मिलान के बाद भी लैपटॉप नहीं मिला। ये खेदजनक घटना बड़ी दुःखद और शर्मसार करने बाली थी। प्रतिष्ठित पद और गरिमापूर्ण सम्मान रखने बाले कार्यालय मे स्टाफ के बीच घटी ये घटना बहुत ही अविश्वसनीय और दुर्भाग्यपूर्ण थी।

अंतिम प्रयास के तहत मैंने भी तत्कालीन विभागाध्यक्ष से  बात करने का निश्चय कर उनसे दूरभाष पर पूंछा कि लैपटॉप की वापसी वे किस स्टाफ को करके गये थे? तो उन्होने  बताया कि उस दिन, जब वे कार्यालय समय के पूर्व लैपटॉप वापस करने कार्यालय पहुंचे तो उस समय कोई स्टाफ नहीं आया था, अतः वह लैपटॉप कैबिन मे ही अपनी टेबल पर छोड़ आये थे। मैंने उनसे निवेदन कर पूंछा जब कोई भी स्टाफ कार्यालय मे नहीं था  तो आपको कार्यालय समय के दौरान कार्यालय समन्वयक या किसी अन्य स्टाफ से फोन पर बात कर लैपटॉप की वापसी सुनिश्चित करना चाहिए थी। अफसोस इस घालमेल मे लैपटॉप नहीं मिला तो नहीं ही मिला। न जाने लैपटॉप को जमीन खा गयी या आसमान निगल गया। मैंने कार्यालय की कार चलाने वाले  ड्राईवर एवं अस्थाई प्यून से भी तत्कालीन विभाग प्रमुख द्वारा लैपटॉप को कार्यालय मे छोड़े जाने की घटना का स्मरण करने को कहा तो उन्होने भी ऐसी किसी भी घटना उनके संज्ञान होने से अनभिज्ञता प्रकट की।   

बातचीत मे एक बहुत ही परोपकारी, हृदयस्पर्शी और समवेदनाओं से परिपूर्ण अजीबो गरीब  संदेश तत्कालीन विभाग प्रमुख द्वारा मुझसे  टेलीफ़ोन पर जरूर कहा, "कि खोये हुए लैपटॉप के बाबत यदि कोई अंशदान (चंदा) आपस मे स्टाफ द्वारा एकत्रित किया जाये  तो वे भी  उसमे अपना योगदान देने को तैयार है!!" लेकिन मैने तुरंत ही उनके इस प्रस्ताव पर प्रतिवाद कर विराम लगते हुए स्पष्ट कहा कि कम से कम मै, ऐसे किसी भी "चंदे" के  प्रस्ताव पर एक भी पैसे का अंशदान नहीं दूँगा। 

रेसिडेंट अफसर से मैंने उक्त प्रकरण की शिकायत प्रधान कार्यालय करने को कहा। कार्यालय समन्वयक वेहद सज्जन, शांत सौम्य और सरल व्यक्तित्व के धनी थे। खोये  लैपटॉप की पूरी कीमत देने को तत्पर थे क्योंकि उनकी सेवानिव्रत्ति निकट ही थी और वे ऐसे समय  किसी भी विवाद या झमेले मे पड़ना नहीं चाहते थे। नये प्रभारी ने इस घटना को अपने बुद्धि  चातुर्य और  विवेक पूर्ण कौशल  से मामले को शांत कैसे  सुलझाया हमे इसकी  कोई जानकारी नहीं। इस घटना को अनेकों वर्ष बीत गये लेकिन ये बात रह रह कर मन मे उठती रही  कि आखिर लैपटॉप गया तो गया कहाँ??    

विजय सहगल  

 

शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

जमानत की एफ़डी

 

"जमानत की एफ़डी"




मै तो घटना के बारे मे भूल चुका था। पर पिछले दिनों मुझे बैंक के एक सम्मानीय ग्राहक के यहाँ एक सामाजिक कार्यक्रम मे जाना हुआ। सालों बाद उनसे एवं उनके परिवार से मिलने का मौका मिला। अति सम्मानित, उच्च पदस्थ गणमान्य सदस्यों के उक्त परिवार ने मेरा गर्म जोशी से अभिवादन कर मुलाक़ात की।

दरअसल अपनी बैंक सेवा के दौरान भोपाल  शहर मे मेरी पदस्थपना के दौरान, हमारे उक्त सम्मानीय ग्राहक का लगभग शाम पाँच बजे  मेरे पास फोन आया कि किसी अत्यंत आवश्यक कार्य हेतु बैंक की एफ़डीआर बनवाने हेतु  वे बैंक पहुँच रहे है। वे रास्ते मे ही थे। बैंक मे पहुँचते ही सामान्य  शिष्टाचार की औपचारिकता के बाद उन्होने अपने आने के उद्देश्य के बारे मे बताया। उन्होने बताया कि वे अभी कोर्ट से सीधे चले आ रहे है। उनके एक अति निकटस्थ स्वजन को जमानत के लिए पाँच लाख की एफ़डीआर जमानत के रूप मे न्यायालय मे प्रस्तुत करना है। एफ़डीआर जमा न करने के अभाव मे जेल जाने जैसे अप्रिय, अवांछित एवं कष्टकारी वेदना से गुजरने पड़ेगा। शाम के लगभग पाँच बजने को थे। स्थिति गंभीर, चिंताजनक लेकिन अत्यावश्यक थी पर चिंता ये थी कि एक तो मै यहाँ शाखा प्रमुख के पद पर पदस्थ न हो बैंक के एक नियंत्रण विभाग मे पदस्थ था जहां आम लोगो का लेन देन से कोई वास्ता  नहीं होता था। दूसरे मेरे कार्यालय के बगल मे स्थित शाखा मे  उस समय तक नगदी लेन देन का  कार्य  बंद हो चुका था गनीमत ये थी कि शाखा के पूरे दिन के कार्य की समाप्ति कम्प्युटर मे नहीं हुई थी। मैंने शाखा प्रबन्धक जी से एफ़डीआर बनाने के बारे मे चर्चा की। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रबन्धक महोदय ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। जब मैंने अपने गणमान्य ग्राहक से एफ़डीआर की धनराशि के बारे मे पूंछा तो उन्होने पाँच लाख रुपए की धनराशि निकाल मेरे सामने रख दी। अब चिंता इस बात की थी कि उन्हे कैसे समझाया जाये कि शाम के पाँच बजे नगदी स्वीकार करना नामुमकिन है? क्योंकि नगदी कार्य का लेन देन हेतु निर्धारित समय 2.30 बजे से काफी देर हो चुकी थी और नगदी लेन देन की बुक्स बंद कर दी गयी थी। समय समाप्त हो चुका था?

मैंने जब उनसे पूंछा क्या उनके खाते मे पहले से ही इतनी धन राशि पड़ी है? तो उनका जबाब नकारात्मक था। लेकिन मुझे उनके परिवार के अन्य सदस्यों के बारे मे जानकारी थी जिनके खाते दूसरे शहर की हमारी अन्य शाखाओं मे थे और जिनमे इतनी राशि होना सामान्य बात थी। मैंने तुरंत ही अपने सम्मानित खातेदार से उनके भाई से संपर्क कर सहमति लेने का अनुरोध किया। सहमति मे कोई किसी भी तरह की समस्या नहीं थी पर एक औपचारिकता के नाते मैंने मोबाइल पर उनसे बात कर मौखिक सहमति प्राप्त कर ली।   आगंतुक सम्मानीय ग्राहक से मैंने स्थानीय शाखा प्रबन्धक से परिचय करा  उनको सारे घटनाक्रम से अवगत कराया। मैंने प्रबन्धक महोदय से  अंतरण द्वारा  एफ़डीआर बनाने मे सहयोग करने का निवेदन किया? प्रबन्धक महोदय का रुख सकारात्मक और सहयोगात्मक था अतः इस हेतु उन्होने अपनी सहमति दे दी। अब सबसे बड़ी समस्या थी कि जिस खाते से पाँच लाख की एफ़डीआर बननी थी उसमे ग्राहक के हस्तकक्षरित आदेश की आवश्यकता थी। पाँच लाख जैसी  बड़ी धनराशि किसी के खाते से अंतरित करने के लिए प्रबन्धक महोदय को राजी करना साधारणतया असंभव था।  मैंने उक्त शाखा प्रबन्धक महोदय से पुनः आग्रह कर अपने स्वयं के  अधिकृत हस्ताक्षर के आधार पर धनराशि दूसरी शाखा से निकाल, इस शहर मे एफ़डीआर बनाने के लिए राजी कर लिया। वास्तव मे इस क्लिष्ट बैंकिंग प्रिविष्टि करने हेतु उक्त प्रबन्धक महोदय की महानता थी और उनका मेरे प्रति विश्वास ही था जो किसी ग्राहक के मौखिक आदेश पर पाँच लाख जैसी बड़ी धनराशि के आधार पर एफ़डीआर जारी कर रहा था। इस शाखा के प्रबन्धक हमारे खाताधारक या उनके किसी भी परिवार के सदस्यों से परिचित भी न थे। मुझे प्रसन्नता थी कि सहमति पत्र के मुद्दे पर शाखा प्रमुख ने मेरे अनुरोध का सम्मान रख स्वीकार कर लिया और इस तरह एफ़डीआर दस-पंद्रह मिनिट मे जारी हो गायी।

इस तरह बैंक द्वारा अपने ग्राहक को संकट की घड़ी मे दिये गये इस योगदान ने हमारे बैंक के एक सम्मानीय ग्राहक को अप्रिय स्थिति से जूझने से बचा लिया।  

मुझे तो स्मरण भी नहीं था पर  हमारे बैंक के उक्त सम्मानीय ग्राहक,  बैंक के तत्कालीन  सहयोग को अब तक भूले नहीं थे और आज जब उन्होने अपने परिवार के समक्ष उक्त घटना की चर्चा की तो स्वतः मुझे उस दिन शाखा के प्रबन्धक और स्टाफ की याद आ गयी जिनके सहयोग के बिना शाम पाँच बजे बैंक एफ़डीआर का बनना नामुमकिन था। वास्तव मे अच्छी और त्वरित बैंक सेवा, टीम भावना के बिना नामुमकिन था। बैंक स्टाफ द्वारा ग्राहक को कठिन  समय मे किए गये उक्त सहयोग को आज बारह साल बाद भी सम्मानीय ग्राहक द्वारा पुनः स्मरण कर धन्यवाद ज्ञपित करना बैंक के स्टाफ द्वारा अपने ग्राहक को उत्तम और त्वरित बैंक सेवा का अनूठा उदाहरण था!! ये घटना  मेरे बैंक और स्टाफ के साथियों के लिये गौरव की बात थी।       

विजय सहगल

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

कुफ़री -शिमला (हि॰ प्र॰)

 

"कुफ़री -शिमला (हि॰ प्र॰)"

          











आज 1 जून 2022 को मै इसलिये खुश नहीं था कि आज बैंक अकाउंट मे पेंशन जमा हो गयी। मै खुश इसलिये था कि चैल से प्रस्थान कर, मेरा परिवार सहित  कुफ़री जाना हो रहा था। 1972 मे कक्षा 8वी की भूगोल विषय की पुस्तक मे मैंने उस समय कुफ़री और उसके वर्फ़ीले मौसम के बारे मे पढ़ा था। कभी कभी भूगोल विषय की  परीक्षा मे कुफ़री के बारे मे संक्षिप्त सवाल आ जाता था। मैने बचपन मे  कुफ़री और उसके मौसम को "कुल्फी" के नाम से याद किया था ताकि स्थान और मौसम को भूगोल की उत्तर पुस्तिका मे लिखने मे आसानी हो। आज उन्ही  यादों को सँजोये प्रातः लगभग 8 बजे चैल, कुफ़री और शिमला के स्वर्णिम त्रिभुज पर स्थित कुफ़री की ओर प्रस्थान किया जो एक दूसरे से लगभग 18-20 किमी॰ की दूरी पर स्थित हैं।  चैल से बिदा लेते वक्त यहाँ की शांत और सुंदर घाटियों के बीच एक बार फिर से आने के भाव के साथ कुफ़री के लिए प्रस्थान करना सुखद अनुभव किया। इस 18-20 किमी॰ के शांत और हरे भरे वृक्षों की घाटियों से होकर सड़कों पर चलना सुगम था क्योंकि  सुबह के समय ज्यादा ट्रेफिक नहीं था।

चैल की तरफ से कुफ़री पहुँचने वाला शायद मै पहला बंदा था। घोड़े और कार पार्किंग के ठेकेदार  के साथ महासू पीक पर रोमांचक खेलों के टिकिट विक्रेता व्यापारी भी  विनिमय के लिए कार आता देख पधार चुके थे, पर हम लोगो ने प्रातः से कुछ आहार न लेने के कारण पहले आलू के गरमागरम पराँठे का स्वल्पाहार लेने का निश्चय किया। इस दौड़ भाग की दुनियाँ से उपजी बीपी और शुगर की कड़वी दवाओं के सेवन के साथ आलू के पराँठे स्वादिष्ट थे। पार्किंग की व्यवस्था ठीक ठाक थी पर, कुफ़री से ग्राम मखड़ोल मे स्थित  महासू पीक जाने आने के लिए बापसी की शर्त पर घोड़ा खरीदने के मोलभाव मे वक्त लग गया। सौदा पक्का हो जाने के बाद भी घोड़े के लिए घोड़ों की घुडशाल मे पहुँचने के लिए लगभग आधा किमी॰ की पैदल यात्रा करनी पड़ी। घोड़ा मंडी मे सैकड़ों घोड़ों को देख अंदाज़ा लग गया था कि आज महासू पीक की यात्रा मे पर्यटकों का भारी दबाब देखने को मिल सकता है। ऐसा ही  हुआ, हमलोग कुछ जल्दी कुफ़री पहुँच गए थे इसलिये महासू पीक पर जाने वालों की ज्यादा भीड़ नहीं थी, पर चारों तरफ घोड़ों की लीद की बदबू के बीच जैसे तैसे घोड़े पर सवारी कर हमने अपने परिवार के साथ यात्रा आरंभ की। घोड़ो की संख्या लगभग सात-आठ सौ से किसी भी तरह कम न होगी।  पीक पर  रोमांचक खेलों के 700/- रुपए के टिकिट विक्रेताओं को उम्र के तकाजे के  वास्ता के  कारण उन्हे निराश करने के पूर्व  सविनय माफी मांग ली। लगभग आधे घंटे की घुड़सवारी के पश्चात मखड़ौल स्थित महासू पीक पहुँच गये।

दस रुपए प्रति पर्यटक शुल्क अदा कर हम लोगो ने पीक की ओर प्रस्थान किया ही  था कि सामने ही लेह मे पाये जाने वाले याक के दर्शन हो गये। अभी पिछले वर्ष ही सितम्बर 2022 मे अपनी लेह यात्रा के दौरान याक से साक्षात्कार हो चुका था, पर यहाँ काले याक के साथ एक सफ़ेद याक के दुर्लभ दर्शन लाभ ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया। मै अचंभित इसलिये था कि सफ़ेद याक के दर्शन हमे पूरे लेह लद्दाख मे देखने नहीं मिले थे। मै  लेह लद्धाख की मधुर स्मृतियों को याद कर रोमांचित था और उस सफ़ेद याक को देख मन ही मन सोच रहा था कहीं ये गोरेपन की क्रीम "फेयर एंड लवली" का तो कमाल नहीं है!!?

यहाँ से कुछ आगे ही बढ़ा था कि महासू घाटी की तलहटी मे नीले और पीले रंग की बरसाती के टेंट दूर दूर तक फैले  नज़र आ रहे थे। घाटी मे जहां हरी घास के बुग्याल (मैदान) होने चाहिए थे उसकी जगह चाय, नाश्ते और अन्य वस्तुओं की दुकानों के पंडाल लगे थे। सँकरे रास्ते के अलावा शायद ही कोई जगह पर्यटकों के खड़े होने या आराम करने को दिखाई दी हो!! कड़ी धूप मे शायद ही कोई पेड़ घाटी मे दिखाई दिया हो!! बड़ी निराशा हुई देख कर। महासू पीक मे मानव निर्मित अतिक्रमण ने 50-51 वर्षों से, दिल मे वसी  कुफ़री और महासू पीक की छवि को ध्वस्त कर चकना-चूर कर दिया था। रास्ते की इन दुकानों, खोमचों से बचते बचाते कुछ दूर घाटी के दूसरे छोर पर पहाड़ी पर बने सिल्वर रंग की जालियों से घिरे मंदिर की ओर प्रस्थान किया। पहुँचने पर मालूम  हुआ कि उक्त मंदिर  "महासू देवता नाग मंदिर" है जिसका कायाकल्प 2019 मे कराया गया था और जो साल मे मात्र एक बार सावन मास की नाग पंचमी के दिन ही खुलता है। धूप से बचने की कहीं कोई राहत न देख इसी मंदिर के पीछे कुछ वृक्षों की छाँव तले राहत भी मिली और दूर दूर तक पहाड़ों और उसकी घाटियों मे लाखों  हरे भरे पेड़ देख मन प्रसन्न भी हो गया। 15-20 मिनिट ठंडी हवाओं के बीच हरे-भरे वृक्षों से आच्छादित पहाड़ों को एक टक निहारता रहा।

बेशक एक पर्यटक स्थल के नाते हम लोगो ने कुफ़री और महासू पीक का भ्रमण तो किया पर कुफ़री मे घोड़ों की लीद की बदबू और महासू पीक मे अनियंत्रित चाय नाश्ते के ढ़ावों के अतिक्रमण ने हताश और निराश किया। हम हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग से इन दोनों स्थलों पर आग्रह पूर्वक हस्तक्षेप की मांग करते है हुए इन स्थलों को सुंदर और आकर्षक ढंग से विकसित करने की अपेक्षा करते है। मुझे कहने मे कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि हिमाचल प्रदेश की इस यात्रा मे सबसे खराब और अप्रिय अनुभव कुफ़री-महासू पीक का ही रहा।  अगले  भ्रमण स्थल हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से करने के संदेश के साथ नमस्कार।

विजय सहगल