"हिमाचल
की राजधानी और देश का दिल "शिमला" (1)
1 जून 2022 को कुफ़री और महासू पीक की यात्रा के पश्चात हमारा अगला
पढ़ाव हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला था। अनुमान था कि एक-डेढ़ बजे तक शिमला मे
अपने होटल पहुँच जाएंगे लेकिन अनुमान गलत था। दोपहर के लगभग दो बज चुके थे क्योंकि
शिमला एक महानगर का रूप ले चुका है। बढ़ती आबादी और वाहनों की बढ़ती संख्या ने हर
जगह इतना जबर्दस्त ट्रेफिक बड़ा दिया है कि सड़कों पर गाड़ियाँ रेंगती नज़र आती है। यहाँ पर कार पार्किंग की
समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी है। 40-50 रूम के होटल मे बमुश्किल 4-5 चार
पहिया वाहनों की ही पार्किंग थी। यध्यपि होटल के पास ही पेड पार्किंग की सुविधा थी
जहां पर 200 रुपए मे कार पार्किंग करना भी टेड़ी खीर थी। जैसे तैसे तीन बजे तक होटल
मे प्रवेश पश्चात बगैर एक क्षड़ गवाये हम लोगो ने शिमला के मॉल रोड और रिज़ मैदान पर
घूमने का कार्यक्रम बना लिया। वाहनों की बढ़ती संख्या के बीच शिमला शहर की सड़कों को पार कर मॉल रोड की तरफ जाना
एक दुष्कर और कठिन कार्य था, पर मॉल रोड पर वाहनों
के प्रवेश निषेध को देख मन खुशियों से भर गया।
प्रायः हर हिल स्टेशन पर माल रोड
अवश्यसंभावी होती है यहाँ शिमला मे भी थी। नैनीताल मे मॉल रोड पहाड़ के नीचे तलहटी
मे है मसूरी मे भी कमोवेश ऐसा ही मॉल रोड पहाड़ के बीच मे है पर शिमला का मॉल रोड इस के ठीक उलट पहाड़ी के उच्चतम शिखर अर्थात "टॉप
ऑफ द हिल" पर है जहां से पूरे शिमला
का 360 डिग्री का दृश्य देखा जा सकता है। पर शिमला के इस "टॉप ऑफ द हिल"
पर पहुँचना एक टेड़ी खीर है, एक कठिन और काफी
श्रम साध्य कार्य है। नौजवानों को छोड़ हम जैसे वरिष्ठ नागरिकों को मॉल रोड या रिज
मैदान तक जाना कोई हिमालय पर्वत की चढ़ाई से कम नहीं है, लेकिन किसी खूबसूरत शहर के दर्शन के लिए इतनी कीमत तो अदा की
ही जा सकती है। क्या ही अच्छा हो कि सरकार मॉल रोड तक पहुँचने के लिये मॉल रोड के चारों
ओर लिफ्ट की व्यवस्था कर दे!! जैसे तैसे
अपने परिवार के साथ हम शिमला की पहाड़ी के एक छोर पर पहुँचने मे कामयाब रहे और इस
रोड पर स्थित सैकड़ो ऐतिहासिक विरासत के भवनों और इमारतों की पहली मजिल के सामने
खड़े थे। लाल गेरुई रंग की पृष्ठभूमि पर निर्मित शानदार वास्तु के दर्शन कराती इस
बिल्डिंग मे रेल विभाग और ए॰जी॰ के कार्यालय के अलावा कुछ राज्य सरकार के अन्य भवन भी स्थित थे।
सड़क के दोनों ओर शिमला मे हरे भरे वृक्षों
के बीच जगह जगह दूर दूर तक कंक्रीट के जंगलों के प्रतीक आवास, होटल, कार्यालय, हॉस्टल नज़र आ रहे थे
जो इस प्यारे और सुदर दिखने वाले शिमला शहर मे जनसंख्या के दबाव के द्दोतक थे। पर
इक्का दुक्का सरकारी वाहनों को छोड़ मॉल रोड पर वाहनों का प्रवेश वर्जित था जो
सैलानियों को निश्चिंत हों मस्ती मे घूमने के लिये स्वतंत्र कर देता था। स्कूल से
लौटते बच्चे हों या बड़े बुजुर्ग, नौजवान सभी पैदल
आते जाते नज़र आये। किसी भी शहर को सफाई कर्मियों द्वारा की गयी सफाई का महत्व तभी
सार्थक होता है जब शहर के वासिंदे और नागरिक भी इस सफाई मे भागीदार हों!! शिमला के
मॉल रोड और रिज मैदान मे इस का सजीव उदाहरण देखने को मिला। हल्के हरे रंग से
आच्छादित तीन शेड की सुंदर इमारतों के बीच सेना के प्रशिक्षण कमांड, मुख्यालय का लकड़ी के आकर्षक प्रवेश द्वार वरवश ध्यानाकर्षित कर रहा था। प्रवेश द्वार से
लगी हुई चार जवानों की आदम कद मूर्तियाँ पर्वत के शिखर पर अपनी जीत के प्रतीक
राष्ट्र ध्वज को फहराने की मुद्रा अत्यंत आकर्षक, मनोहारी और जोश पैदा करने वाली थीं। उन मूर्तियों के नीचे लिखा
सेना का ध्येय मंत्र "मेरा देश-मेरा लक्ष्य, मेरे जवान-मेरा कर्तव्य" और "राष्ट्र प्रथम-हमेशा और
हर समय" जैसे आवाहन न केवल सेना अपितु हर देशवासी के दिलों और आने वाले पर्यटकों
के दिल मे भी देश के लिये मर मिटने और कुछ कर गुजरने का जुनून, ऊर्जा, उत्साह और उमंग
पैदा कर देता है।
थोड़ा आगे बढ्ने पर विरासत की एतिहासिक इमारतों मे सबसे छोटी गोल
लाल गुंबज की बमुश्किल 12-13 फुट लंबी और 6-7 फुट चौड़ी लेकिन खूबसूरत इमारत से
शिमला की इन एतिहासिक धरोहर की शुरुआत सुंदर थी। इसके ठीक सामने बीएसएनएल की इमारत
जो अन्य इमारतों की तरह पुरानी न थी पर बिल्डिंग के हालात और सूरत इस बात की गवाह
थी कि यह इमारत और विभाग अपने हालातों के कारण अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर
रहा है। काश बीएसएनएल के कर्मचारी/अधिकारी दुनियाँ और सरकार को इन हालातों के लिये
ज़िम्मेदार ठहराने के पूर्व आत्मचिंतन भी
करते तो शायद ये हालात न होते।
मॉल रोड मे कार्यालयों और निजी प्रतिष्ठानों
को देख मुझे ऐसा लगा कि बायीं ओर की इमारतें सरकार के सरक्षण की इमरते थी जिसमे
बैंक, एलआईसी, पोस्ट ऑफिस, पर्यटन विभाग
आदि थे जबकि दाहिने तरफ के भवनों का
स्वामित्व निजी संस्थानों और दुकानोंदारों
और स्थानीय लोगो के स्वामित्य का होगा। मौसम की तेज धूप के बावजूद हवा की नमी ने
सूरज के ओज़ को कम कर रक्खा था।
आगे एक छोटे लेकिन अधिक खुले क्षेत्र वाले चौराहे के बीचों बीच पर लाला लाजपत राय की एक छोटी लेकिन ऐतिहासिक महत्व की आदम कद प्रतिमा लगी थी। प्रतिमा के नीचे लगे शिला पर लेख था कि इस प्रतिमा को स्वतन्त्रता के बाद लाहौर से ला कर 15 अगस्त 1948 को शिमला के इस स्थान पर पुनर्स्थापित किया गया। मेरी आँखों मे इस लेख को पढ़ कर मन मे आये विचारों के कारण वरवश ही आँसू आ गये। लाहौर से प्रतिमा को लाकर शिमला मे पुनः स्थापित करना इस बात को दर्शाता है कि देश के बंटवारे से उपजी विभित्स्का, संत्रान्स और नागरिकों का उत्पीढन स्वीकारना कितनी भारी भूल थी और देश के नागरिकों के साथ कितना बड़ा अन्याय और धोखा था कि देश की स्वतन्त्रता के संघर्ष मे जिस लाहौर शहर मे साइमन कमीशन के विरुद्ध अभियान मे लाला जी को अंग्रेजों द्वारा लठियों से पीटने के कारण 30 अक्टूबर 1928 को अपने प्राण न्योछावर करने पड़े, उस वीर अमर बलिदानी स्व॰ लाला लाजपत राय को देश के एक हिस्से पाकिस्तान के लाहौर के निर्लज्ज और एहसान फरामोश लोगो ने उनकी शहादत के स्मारक के लिये दो गज जमीन देश के बँटवारे के बाद एक दिन के लिये भी देना मुनासिब न समझा और प्रतिमा को लाहौर से शिमला लाना पड़ा। ये घटना अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण, दुःखद और खेदजनक थी और देश के बँटवारे पर बहुत बड़ा सवालिया निशान भी?
विजय सहगल

















