शुक्रवार, 27 मई 2022

थिकसे मोनेस्ट्री, लेह

 

"थिकसे मोनेस्ट्री, लेह"









17 सितम्बर 2021 को जब हमारे टूर ऑपरेटर द्वारा उस स्कूल के भ्रमण कराने का कार्यक्रम था जिसका चित्रांकन आमिर खान द्वारा अभिनीत फिल्म "थ्री इडियट" मे किया गया था, लेकिन हम सभी ने एक मत से समाज को उच्छृंखल और अधम संदेश देने वाले उस दोहरे चरित्र    के पथभ्रष्ट अभिनेता के किसी भी प्रतीक को देखने की अपेक्षा शांति के संदेश देने वाले थिकसे मठ को प्राथमिकता के आधार पर देखना उचित समझा। हम लोग नहीं चाहते थे कि लेह जैसे पवित्र स्थान पर दिन की शुरुआत एक अधोगामी, पतोन्मुख व्यक्ति का स्मरण कर किया जाय। 

थिकसे मोनेस्ट्री को लेह का प्रतीक स्थल कहे तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 15वी शताब्दी मे निर्मित इस खूबसूरत बुद्ध मोनेस्ट्री के आँगन को मैंने अनेकों बार टीवी या अन्य डोक्यूमेंट्री मे देखा था। इस वृहद प्रांगण मे लेह लद्धाख के सांस्कृतिक नृत्यों और लोक कलाओं के प्रदर्शन और धार्मिक आयोजन लेह भ्रमण करने वाले पर्यटकों के बीच काफी आकर्षक और प्रख्यात है। मुझे भी अपने समूह के सदस्यों के साथ लेह के मुख्य आकर्षक थिकसे मोनेस्ट्री के दर्शन लाभ का सुअवसर प्राप्त हुआ। लेह शहर से 19 किमी॰ दूर स्थित थिकसे मठ के प्रवेश द्वार के दोनों स्तंभों और उसके शहतीर के उपर सुर्ख लाल, नीले हरे पीले रंग से  बौद्ध शैली मे शानदार चित्रकारी देखते ही बनती थी। उपर के शहतीर पर सुनहरे रंग मे लेह की बकरी की छोटी दोनों मूर्तियाँ एक दूसरे के सामने मुंह किए बैठी थी, जिसके बीच मे शांति चक्र काफी दूर से मठ की  स्वर्ण आभा विखेर रहा था। इस महान मठ के  बाहर के बड़े  मुख्य द्वार मे प्रवेश करने, प्रार्थना चक्र घुमाते हुए मोनेस्ट्री के कार्यालय  से होकर हम लोगो ने मोनेस्ट्री की इमारत मे प्रवेश किया।  प्रवेश द्वार पर ही लेह लद्धाख पुलिस के जवान नासिर हुसैन से मुलाक़ात हुई। बात चीत मे धारा 370 के समापन से बने केंद्र शासित राज्य लेह और लद्धाख के निर्माण से वह बेहद  खुश थे क्योंकि भविष्य मे उन्हे केंद्र सरकार के वेतन मान एवं भत्ते एवं अन्य सुविधाएं प्राप्त होने वाली जो थी। मोनेस्ट्री के प्रवेश द्वार से होकर जैसे ही सीढ़ियाँ चढ़ कर मै उपर की ओर बढ़ा तो  सफ़ेद और हरे रंग की दो  शेर नुमा आकृतियों ने हमारा स्वागत किया।  जैसे ही शेरों के बीच बनी सीढ़ियों पर चढ़ा ही था तो लेह के प्रतीक मोनेस्ट्री के चिर प्रतीक्षित आँगन को देख मै भाव विह्वल हो गया। मुझे आभास नहीं था कि मै उसी  मोनेस्ट्री मे हूँ जिसकी कल्पना मैंने लेह आने के वर्षों पूर्व अपने अंतशचेतना पटल पर बना रक्खी थी। प्रांगण का सौन्दर्य और शांति से मन अविभूत हो गया।  मै कुछ देर आँगन मे भ्रमण के पश्चात एक कोने मे बैठ थिकसे मोनेस्ट्री के सौन्दर्य को एकटक निहारता रहा और कुछ पल के लिये थिकसे उत्सव के कल्पना लोक मे खो गया जो मैंने अनेकों बार टीवी पर देखा था। यहाँ यह बताना लाज़मी होगा कि लेह मे स्थित थिकसे मठ मे वार्षिक उत्सव तिब्बती कैलेंडर अनुसार नौवे माह की 17 तारीख से 19 तारीख तक मनाया जाता है जो अँग्रेजी माह अक्टूबर-नवम्बर के बीच कभी पड़ता है। आँगन के एक तरफ मोनेस्ट्री की दीवार जिस पर  सुनहरे गोल्डन कलर की पृष्टभूमि मे नीले, सफ़ेद, हरे, पीले  रंग से भगवान बुद्ध के जीवन पर आधारित जातक कथाओं को उकेरा गया था एवं जिसके पार  दूर दूर नज़र आने वाले ऊंचे ऊंचे सुनसान पहाड़ थे, वही आँगन के विपरीत दूसरी तरफ 5-6 मंज़िला इमारत जिसे बौद्ध शैली मे सुंदर तरीके से बनाया गया था और  जो देखने मे अत्यंत ही अनूठी, आकर्षक और सुंदर दिखाई दे रही थी। थिकसे मोनेस्ट्री के पंचमंजिला इमारत को निर्माण के अनुरूप    तीन भागों मे विभक्त किया जा सकता है। अँग्रेजी शब्द C के आकार मे बनी मठ की शानदार इमारत का सौन्दर्य देखते ही बनता था।

जब आँगन से चढ़कर पहले विशाल कक्ष मे प्रवेश किया तो ये एक सभा कक्ष की तरह दिखने वाले हाल की तरह ही था। बीच मे छोटा से रास्ता बनाया गया था जिसके दूसरे छोड़ पर सिंहासन पर विराजित मुद्रा मे शांति के अग्रदूत  महामहिम दलाई लामा की आदम कद कट आउट रक्खा हुआ था। जो  अपनी चितपरिचित मुस्कराती मुद्रा मे मानों हम सभी आगंतुकों का स्वागत करने को आतुर हों। ऐसा लगता है कि उक्त सिंहासन और उस पर लगे कट आउट को श्री दलाई लामा जी के थिकसे मठ मे आगमन की स्मृति मे बना कर रक्खा गया हो। मध्य मार्ग के दोनों ओर लकड़ी की चौकियों पर लाल रंग के गर्म बिछौने बिछे हुए थे जो शायद मठ के शिक्षकों, आगंतुकों और विध्यार्थियों के बैठने के लिये बनाये गये हों। इन चौकियों के पीछे भी हाल की दीवारों से सटी इसी तरह की चौकियाँ लगी हुई थी जिन पर हमारे समूह के सदस्यों ने कुछ समय बैठ कर भगवान बुद्ध का स्मरण किया। पूरे  सभा कक्ष मे  तिब्बती शैली मे रंग बिरंगी चित्रकारी दीवारों पर की गयी थी। सिंहासन के दोनों ओर देवस्थानों मे भगवान बुद्ध के विभिन्न विग्रहों को करीने से संजो कर रक्खा गया था।

उक्त कक्ष के बगल मे ही एक अन्य कक्ष मे विशाल लकड़ी के  स्तम्भों  पर आलंबित कक्ष मे अष्टभुजधारी विशाल स्याह रंग की प्रतिमा रक्खी हुई थी जिसके चेहरे और अन्य अंगों को नीले पीले सुनहरे रंगों के कपड़ों से ढाका गया था। ऐसा प्रतीत होता था मानों ये तंत्र-मंत्र विध्याध्यान का केंद्र हो। उक्त विशाल देव प्रतिमा के नीचे अन्य विग्रहों को भी रक्खा हुआ था। उक्त कक्ष मे हल्के धीमे प्रकाश मे उक्त विशाल बड़े दांतों और भयंकर मुख वाली रौद्र रूप वाली प्रतिमा  भय, खौफ और डर उत्पन्न करने वाली थी जो शायद प्राचीन तांत्रिक शिक्षा के कोई आराध्य देव हों। कक्ष के पास से ही छोटे पतले रास्ते जो उपर की मंजिल की ओर जाते थे और जो शायद मठ के कर्मचारियों, शिक्षकों और विध्यार्थियों के निवास और कार्यालय रहे होंगे और जहां दर्शनार्थियों और पर्यटकों का प्रवेश वर्जित था।  इन दोनों कक्षों के दर्शन के बाद बापस सीढ़ियों से उतरकर एक बार हम सब मठ के विशाल आँगन मे पुनः आ गये। आँगन के पार, दूसरी तरफ भी पहले कक्ष की तरह का एक विशाल भवन था। उक्त भवन मे सुनहरे रंग की विशाल बुद्ध प्रतिमा विराजित मुद्रा मे  मैत्रेय रूप मे स्थापित थी। चेहरे पर शांत भाव और सिर पर स्वर्ण रंग के मुकुट धारण किये सुंदर दिव्य और अलौकिक मुद्रा मे भगवान बुद्ध के दर्शन हृदय को कृत्य-कृत्य करने वाले थे। गमलों मे सुंदर पुष्पों और हरे भरे पौधों, चाँदी के पात्रों मे भरे दिव्य जल, शीतल पेय और बिस्कुट आदि वस्तुएँ प्रसाद के रूप मे मठ की दिव्यता को भव्यता प्रदान करने वाली थी। श्रद्धालुओं द्वारा समर्पित सफ़ेद मखमली कपड़े को जहां तहां अनुशासित रूप से बांध कर भगवान बुद्ध को समर्पित किया गया था।

बगल मे ही एक छोटे से कक्ष मे छोटी छोटी अलमारियों मे अनेकों प्रतिमाओं को संजो कर रक्खा गया था। अलमारियों के बाहर सुंदर नक्काशी की गयी थी। दीवारों पर भी पारंपरिक तिब्बती शैली की चित्रकारी जहां तहां नज़र आ रही थी। भक्तो द्वारा समर्पित शांति के प्रतीक  सफ़ेद मखमली पट्टे को यहाँ भी करीने से सजाया गया था। पूरे मठ के प्रांगण मे साफ सफाई देखते ही बनती थी। कहीं पर एक तिनका कचरा भी दिखाई नहीं दिया। मठ प्रबंधन की  इस हेतु हार्दिक प्रशंसा करे बिना न रह सका।  

एक सुंदर और सार्थक यात्रा पूरी कर जैसे ही हम लोग बाहर की तरफ बड़े ही थे कि छोटे छोटे बच्चे अपनी परंपरागत वस्त्रों मे मठ की तरफ आ रहे थे। बाल बौद्ध भिक्षुओं के रूप को देख मन आनंदित हो उठा। बौद्ध धर्म की शिक्षा ग्रहण करने वाले ये शिशु भविष्य मे देश और समाज को शांति का संदेश देने वाले शिक्षक होंगे इन्ही  मे से कोई बौद्ध धर्म के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच कर दुनियाँ को शांति का संदेश देगा।          

एक बात जो मुझे भ्रमण के दौरान हमेशा कचोटती रही  कि इन बौद्ध मठों से निकलने वाले विध्यार्थी फिर चाहे वो लेह लद्धाख, तिब्बत, बर्मा या जापान से क्यों न हों कहीं कभी कोई अतिवादी दूर दूर तक नहीं  निकलता इसके विपरीत दुनियाँ के अधिकतर आतंकवादी एक विशेष प्राथमिक विध्यालय से ही निकले हुए मिलते है जिनकी एक लंबी फेहरिश्त है!! ऐसा क्यों?  

 

विजय सहगल

शुक्रवार, 20 मई 2022

एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताज महल.......

 

"एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताज महल......."






सन 1630 मे निर्माण कार्य शुरू होने के बाद आगरा स्थित ताज महल,  भारतीय कारीगरों और वास्तुकारों के 23 वर्ष के अनथक प्रयास के पश्चात, वास्तु और  स्थापत्य का श्रेष्ठ नायाब निर्माण का नमूना ताज महल, सन 1653 मे बन कर तैयार आठ आश्चर्यों मे से एक इस ताज महल को विश्व धरोहर की बहुत ही खूबसूरत इमारतों मे एक गिना जाता है।  इस खूबसूरत इमारत को प्रेम और मोहब्बत के प्रतीक के रूप मे भी याद किया जाता है!! तमाम शायरों और कवियों ने भी खुर्रम उर्फ शाहजहाँ द्वारा निर्मित कराये ताज महल को अपनी पत्नी मुमताज़ के प्रेम और प्यार से जोड़ कर कवितायें किस्से भी लिखे है। देश के मशहूर शायर श्री शकील बदायूंनी ने तो एक कदम आगे बढ़ एक नज़्म लिखी :-

एक शहँशाह ने बनवा के हंसी ताज महल,

सारी दुनियाँ को मोहब्बत की निशानी दी है। (शकील बदायूंनी) 

इस एक नज़्म ने मुझे शाहजहाँ और मुमताज़ की मोहब्बत और प्रेम के प्रतीक इस मकबरे के बारे मे परिणामिक  शोध करने पर मजबूर कर दिया। गूगल मे तमाम  खोजबीन के बाद मै इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि शाहजहाँ ने इस स्मारक को बनवाने मे वो सब कुछ किया जो इसे एक खूबसूरत और सुंदर इमारत बनाता है सिवाय  "प्रेम और मोहब्बत" के? "प्रेम और मोहब्बत" का ताज महल के निर्माण की कहानी मे कहीं दूर-दूर का रिश्ता  नज़र नहीं आता!! हाँ!, निम्न लिखित तथ्यों के आधार पर शाहजहाँ का मुमताज़ महल के प्रति एक तरफा प्यार और मुहब्बत हर कदम पर अवश्य दिखाई देता है!! क्या ताजमहल के निर्माण के पूर्व प्यार और मोहब्बत नहीं था? या इसके निर्माण के पश्चात भी ऐसी अनुराग, प्रीति या प्रेम नहीं होगा?  तभी तो मेरे इस निष्कर्ष के पक्ष को मजबूत करती देश के एक  विख्यात और नामी शायर श्री  साहिर लुधयानवी की ताज महल के उपर लिखी  निम्न पंक्तियां साधारण  आदमी के जीवन मे मोहब्बत के जज़्बात को  यथार्थ के धरातल पर दर्शाती नज़र आती है कि:- 


एक शहँशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक। (साहिर लुधियानवी)

 

·         1627 मे जहाँगीर की मृत्यु के बाद शाहजहाँ ने छल-प्रपंच से सत्ता हथियाने के बाद अपने ससुर को  निर्देश दिया कि शाही परिवार के उन सभी सदस्यों को समाप्त कर दे जो सत्ता के दावेदार थे। 16 जनवरी 1628 को महलों मे षड्यंत्रों से उपजे कत्लेआम से सत्ता हथियाने वाले शाहजहाँ के आचरण मे क्या कोई पारवारिक भाई-चारा या  प्रेम-मोहब्बत कहीं आसपास दिखाई देती  है?

·       कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि मुमताज़ महल की पहली शादी मुगल सेना के एक सिपाही के साथ हुई थी। शाहजहाँ द्वारा जिसकी हत्या करवाने के बाद ही उसने मुमताज़ से निकाह किया। क्या किसी स्त्री के पति की सरे आम हत्या के बाद उससे प्यार, मोहब्बत और समर्पण की उम्मीद की जा सकती है? यह  एक बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रश्न है? शायद इतिहास कार मानवीय स्वभाव के इस पहलू को भूल कर चाटुकारों की तरह शाहजहाँ की ठकुर सुहाती कर मुमताज़ से उसके प्यार और मोहब्बत की छद्म स्तुति-गान करके, सत्ता सुख भोगते रहे!!    

 

·         5 जनवरी 1592 मे लाहौर मे जन्मे शाहजहाँ की सगाई सन 1607 मे  15 साल की उम्र मे मुमताज़ उर्फ आर्जूमंद बानो बेगम के साथ हुई थी। शादी, सगाई के पाँच वर्ष बाद 10 मई 1612 मे हुई। सगाई और शादी के बीच इन पाँच वर्षों के दौरान  शाहजहाँ की दो शादिया हो चुकी थी!! आश्चर्य!!, यदि शाहजहाँ को मुमताज़ महल से इतनी ही मोहब्बत होती तो सन 1609 मे फारस की शहजादी क्वानदरी बेगम से पहली शादी और दूसरी शादी अकबरी बेगम से क्यों करता? आश्चर्य देखिये कि मुमताज़ महल से शादी मे पाँच साल तक इंतज़ार!! वो भी तत्कालीन मुगल सल्तनत के राजकुमार शाहजहाँ द्वारा? बात कुछ हजम नहीं होती?

 

·         ऐसा नहीं था कि मुमताज़ महल के शादी के बाद और 14वे बच्चे की प्रसव पीढ़ा के दौरान मुमताज़ महल के देहावसान के पश्चात शाहजहाँ उसके विछोह मे विरक्ति धारण कर ली हो? या मुमताज़ महल के न रहते उसके स्वच्छन्द यौन आचरण कोई कमी आयी हो!! इसलिये ये कहना कि वह अपनी बेगम मुमताज़ महल से वेइंताह प्यार था "अतिशयोक्ति" और "अतिरंजना" से ज्यादा कुछ नहीं था।    

 

·         मुमताज़ की याद मे बनवाए गए ताज महल के निर्माता शाहजहाँ को इतिहास कारों ने प्रेम, मोहब्बत, प्यार, प्रीति  और न जाने ऐसे ही अन्य अनेक विशेषणों से अलंकृत किया है। ताज महल के निर्माण कार्य के पश्चात इसके निर्माण मे लगे लगभग 22 हजार कारीगरों, मजदूरों और कामगारों के दोनों हाथ काटने की घटना इतिहास मे सर्वविदित है। क्या मोहब्बत और प्रेम मे सरावोर कोई आशिक शहँशाह  इतना क्रूर और निर्दयी भी हो सकता है? ताजमहल के निर्माण मे लगे इन निर्धन और मेहनतकश मजदूरों के अंग-भंग कराने वाले शाहजहाँ को इतिहासकारों द्वारा  प्रेम-मोहब्बत का प्रतीक निरूपित करने मे बहुत बड़ा संदेह और शंका खड़ा करता है? दुनियाँ की सबसे सुंदर इमारत बनाने वाले कारीगरों के हस्त-विच्छेदन करने वाला निर्दयी, क्रूर और कठोर शासक को कैसे प्रेम-मोहब्बत का प्रतीक कहा जा सकता है?   यह एक विचारणीय प्रश्न है जो उसके प्रेम और मोहब्बत पर बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

 

·         जिस शाहजहाँ ने वैवाहिक जीवन के 19 वर्षों मे अपनी प्रिय बेगम मुमताज़ महल को  14 बार संतान सुख की खातिर लगातार  प्रसव पीढ़ा दे प्रसूता  बना कर रक्खा हो, वो इस बात को दर्शाता है कि शाहजहाँ ने अपनी यौन क्षुधा  पूर्ति की तुष्टि ही की, कदाचित ही  उसने एक पल भी अपनी बेगम के ख्यालातों, जज़्बातों और अरमानों की कद्र की होगी? मुमताज़ महल उर्फ मेहरुन्निसा ने शाहजहाँ की इन उच्छृंखल आचरण  के चलते ही अपनी 14वी संतान को जन्म देने के दौरान दम तोड़ दिया। मनोवैज्ञानिक तौर पर देखे तो मेहरुन्निसा का जीवन सोने के पिंजड़े मे कैद एक परिंदे की तरह था जिसे सभी सुख सुविधायेँ तो थी सिवाय आज़ादी के? क्या इन हालातों और परिस्थितियों मे कोई दंपति आपस मे प्यार और मुहब्बत की कल्पना कर सकते है?

 

·         इतिहासकार लिखते है कि जहां कहीं भी शाहजहाँ जाते थे मुमताज़ भी उनके साथ यात्राओं और युद्धों मे जाती थी (या बलात ले जायी जाती थी?) क्या कोई स्त्री जिसका लगभग पूरा वैवाहिक जीवन बच्चों को जनने मे ही बीता हो, युद्ध और यात्राओं की आपा धापी मे जाना पसंद करती होगी? लेकिन शाहजहाँ ने जिस तरह सत्ता और शासन हथियाया था शायद  उसकी पृष्ठभूमि मे छुपे अदृश्य अविश्वास और  भय के कारण ही उसे अपने परिवारियों, दरबारियों और कर्मचारियों पर सहज और सरल विश्वास न होने के कारण ही वह हर यात्रा और युद्ध मे उसे अपने साथ रखता हो? इसके चलते ही बुरहानपुर मे उसकी 17 जून सन 1631 मे मृत्यु हो गयी।

           

·         मुमताज़ महल का निधन बुरहानपुर मे सन 1631 मे प्रसव पीढ़ा के दौरान 37 वर्ष की उम्र  हो गया था। इतिहास मे इस बात का उल्लेख है कि मुमताज़ महल के पार्थिव शरीर को छह माह बाद आगरा ले जया गया। ताज महल के निर्माण पूर्ण होने के पश्चात मुमताज़ महल को 22  वर्ष बाद  ताज महल मे दफन किया गया। मुमताज़ महल का शव 22 वर्षों तक कहाँ, किस हाल मे रहा कोई नहीं जानता? इस तरह 22-23 साल तक शव की छीछा लेदर करना, बार-बार कफन-दफन बदलना प्यार और मुहब्बत को कम मानसिक आरोग्य को अधिक प्रदर्शित करता है?  

 

उपर्युक्त सारे निष्कर्षों से समझ पाना कठिन नहीं है कि शाहजहाँ और मुमताज़ महल के मोहब्बत के प्रतीक ताज महल मे प्रेम-मुहब्बत  जैसी कोई चीज नज़र आती हो? मुमताज़ से शाहजहाँ का प्रेम, एक तरफा प्रेम ही प्रतीत होता है, कदाचित ही उसने मुमताज़ महल के प्रेम, भावनाओं और इच्छाओं और समर्पण का कभी कोई सम्मान किया होगा?

 

जिस झूठ और फरेब के आधार पर अपने सहोदर भाइयों और सगे संबंधियों का कत्ल कर शाहजहाँ ने सत्ता हथियाई उसके पुत्र औरंगजेब ने भी अपने पिता के पथानुगामी  बन उसे उम्र के आखिरी पढ़ाव के आठ वर्ष कैद कर, एक-एक बूंद पानी के लिये तड़पा तड़पा कर जीते जी नरकीय जीवन जीने को मजबूर किया।  तत्पश्चात 22 जनवरी 1666 को 74 वर्ष की आयु मे शाहजहाँ को औरंगजेब के दोज़ख से छुटकारा मिला और वे जन्नत को प्यारे हो गये?

 

गोस्वामी तुलसी दास जी ने श्री रामचरित मानस मे सही ही लिखा है कि :-

करम प्रधान विश्व रचि राखा।

जो जस करई सो तस फल चाखा॥

 

अर्थात जैसी करनी, बैसी भरनी को चरितार्थ करती कहावत "बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय?"  शाहजहाँ के जीवन चरित्र पर सही साबित होती है!!

विजय सहगल  

 

   

शुक्रवार, 13 मई 2022

पदम पुरुस्कारों पर पान मसाले की काली छाया

 

"पदम पुरुस्कारों पर पान मसाले की काली छाया"







आज दिनांक 6 मई को आकाशवाणी समाचार के माध्यम से पदम पुरुस्कारों के लिये आम जनता से समाज मे उत्कृष्ट और उल्लेखनीय कार्य करने वालें गणमान्य नागरिकों के नाम मांगे जाने का समाचार सुना। सहसा ही इन पदम पुरुस्कारों  के बारे मे और जानकारी हांसिल करने की उत्कंठा मन मे जागृत हुई। सरकार की एक वेव साइट पर पदम पुरुस्कारों के बारे मे जानकारी उपलब्ध थी। भारत सरकार द्वारा 1954 मे शुरू किए इन नागरिक पुरुस्कारों के अंतर्गत समाज मे साहित्य, कला, संगीत, नृत्य, लोक कला, लोक संगीत, खेल  सहित किसी भी क्षेत्र मे उल्लेखनीय कार्य या सेवा करने वाले नागरिकों को ये पुरुस्कार देने की अनुसंशा की जाती है। "भारत रत्न", "पदम विभूषण", "पदम भूषण" एवं "पदम श्री" इस तरह इन   चार  श्रेणियों मे विभक्त पदम पुरुस्कारों के लिये भारत का  कोई भी नागरिक किसी को भी इन पुरुस्कारों के लिये नामांकित कर सकता है, यहाँ तक कि कोई व्यक्ति स्वयं अपने  लिये भी इन पुरुस्कारों मे अपना नाम की अनुसंशा स्वयं कर सकता है। पदम पुरुस्कार नामांकित व्यक्तियों का सार्वजनिक, सामाजिक या राष्ट्रीय सेवा मे होना एक सबसे आवश्यक महत्वपूर्ण घटक है।  इन तरह नागरिकों से प्राप्त इन अनुशंषाओं को पुरुस्कारों के लिये प्रधानमंत्री द्वारा गठित वरिष्ठ सचिव स्तर के सदस्यों की  एक कमेटी अपने विवेकानुसार निर्णय ले एक सूची बनाती है जिसकी घोषणा हर गणतन्त्र दिवस पर की जाती है।

स्वतन्त्रता के पश्चात के कुछ वर्षों के बाद से इन पदम पुरुस्कारों पर आम लोगो सहित समाज के अनेकों प्रबुद्ध नागरिकों ने    प्रत्येक वर्ष घोषित इन पुरुस्कारों पर   पक्षपात, राजनैतिक हस्तक्षेप, दल विशेष के प्रति  प्रतिबद्धताओं के भी आरोपों यदा कदा लगाये जाते रहे है। लेकिन हाल ही के कुछ वर्षों मे इन पुरुस्कारों को प्राप्त करने हेतु देश के आम नागरिकों से पदम पुरुस्कारों हेतु  नामांकन आमंत्रित करने के कारण इन पुरुस्कारों को सुपात्रों के चयन मे पारदर्शिता से विश्वस्नीयता मे काफी इजाफा हुआ है। अब समाज के ऐसे  सैकड़ों साधारण, अनाम अवूझे राष्ट्र नायकों  के नाम सामने आ रहे है जिनकी उत्कृष्ट  समाज सेवा ने  अति महत्वपूर्ण योगदान कर राष्ट्र के लोगो की महती सेवा की है।  स्वतन्त्रता के बाद के वर्षों मे फिल्मी चकाचौंध से प्रभावित कुछ  अभिनेताओं और अभिनेत्रियों, धन सम्पन्न लोगो, राजनैतिक व्यक्तियों  को "पदम श्री" और "पदम भूषण"  दिये जाने के कारण इन पुरुस्कारों को देने मे पक्षपात के भी आरोप लगे है जो समिति के निर्णयों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करते रहे।

यूं तो भारतीय सिनेमा जगत के अनेक अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को इन पदम पुरुस्कारों  से गौरवान्वित किया है पर यहाँ  निम्न चार  अभिनेताओं को प्रदत्त पुरुस्कारों पर चर्चा करूंगा:-

1.  श्री अमिताभ बच्चन उन परम सौभाग्यशाली, गिने चुने लोगो मे शामिल है जिन्हे  सन 1984 मे पदम श्री, सन 2001  मे पदम विभूषण एवं सन 2015 मे पदम विभूषण पुरुस्कार से विभूषित किया गया।

2.     श्री शाहरुख खान को सन 2005 मे पदम श्री से पुरुस्कृत किया गया।

3.     श्री अक्षय कुमार को 2009 मे पदम श्री से सम्मानित किया गया।

4.     श्री अजय देवगन को भी सन 2016 पदम श्री पुरुस्कार प्रदान किया गया।

इन चारों माननीय पुरुष श्रेष्ठों को फिल्म मे अभिनय के क्षेत्र मे उल्लेखनीय योगदान के लिए उक्त पुरुस्कारों से पुरुस्कृत किये जाने पर हम कोई सवाल नहीं उठाना चाहते।  लेकिन क्या इन चारों अभिनेताओं ने पान मसाले के विज्ञापन के संदेश को आम जनों के समक्ष प्रचारित और प्रसारित कर उनको दिये गये पुरुस्कारों की गरिमा और सम्मान को कायम रक्खा? क्या इन गणमान्य  शख़्सियतों ने पान मसाला के विज्ञापन कर  भारत के अति महत्वपूर्ण नागरिक पुरुस्कारों   हेतु निर्धारित शाख के एक मुख्य घटक "सार्वजनिक सेवा" संदेश को क्षति नहीं पहुंचाई? ये एक विचारणीय प्रश्न है?

श्रीमद्भगवत गीता मे भगवान श्रीकृष्ण कहते है:-

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (अध्याय 3, श्लोक 21)    अर्थात

श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर  देता हैदूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।

 

तब पुरुष मे श्रेष्ठ, हे! निष्पाप, श्री अमिताभ बच्चन एवं मंडली के सदस्य  आप देश की युवा पीढ़ी और नौनिहालों को  "पान मसाले के सेवन" का संदेश देकर कौन सा श्रेष्ठ आचरण समाज मे स्थापित करना चाहते  है? कृपया धनार्जन के उपरांत कभी समय मिले तो अवश्य चिंतन करना?    

इन पदम पुरुस्कारों की प्राप्ति मे भारतीय सिनेमा जगत की चकाचौंध, चमक-धमक  से प्रभावित हो कर अनेकों अभिनेता या अभिनेत्रियों को इन शीर्ष पुरुस्कारों से विभूषित किया गया है किन्तु यदि इसका एकांश भी रगमंच से जुड़े अभिनय कलाकारों या निर्माता निर्देशकों को इन परितोषिकों से सम्मानित किया गया होता तो अभिनय के क्षेत्र मे दिये इन पुरुस्कारों के महत्व और गरिमा मे और भी बढ़ोतरी होती। भारतीय सिनेमा जगत मे माफिया, गुंडों, ड्रग तस्करों की पैठ एवं हस्तक्षेप एवं कालेधन के रूप मे अर्जित धन मे मदांध तथाकथित अभिनेताओं एवं उनकी बिगड़ैल पथ  भ्रष्ट संतानों के बारे मे देश का हर एक नागरिक अच्छी तरह से परिचित है। ये जानते हुए भी कि पान मसाला, तंबाकू, गुटका के विज्ञापन नैतिक और संवैधानिक रूप से समाज के आम लोगो को पतन के राह पर अग्रेषित करता है, पदम पुरुष्कार प्राप्त धनलोलुप  अभिनेता इस विज्ञापन के माध्यम से अनैतिक संदेश देने वाले पतित काम को निर्लज्जता पूर्वक कर रहे है जिसकी निंदा की जानी चाहिये।               

 

श्री अमिताभ बच्चन को छोड़ शेष अन्य तीन अन्य अभिनेताओं के बारे मे मान भी ले कि ये अधेड़ नौजवान धनार्जन की अंधी दौड़ मे येन केन प्रकारेण धन उपार्जन करना चाहते है फिर भले ही पान मसाले के विज्ञापन का संदेश दे कर उन्हे देश के आम नागरिकों को कैंसर जैसी बीमारी के मौत के मुँह मे धकेलने के  कुत्सित  कार्य ही क्यों न करना पड़े?  पर श्री अमिताभ बच्चन जैसे परिपक्व विद्वान, विख्यात अभिनेता, योग्य बुद्धिजीवि के बारे मे क्या कहा जाय जो आजकल चकाचौंध भरी आईपीएल क्रिकेट लीग मे धलड्डे से   पान मसाले जैसे  विज्ञापन के माध्यम से पान मसाले के  सेवन करने के संदेश दे कर उस   नौजवान पीढ़ी को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के लिये आमंत्रित कर रहे है, जिनके पिताओं, चाचाओं, ताऊओं और संरक्षकों ने 26 जुलाई 1982 मे बेंगलोर मे फिल्म कुली की शूटिंग के दौरान उनके गंभीर रूप से घायल होने एवं  ज़िंदगी और मौत के बीच संघर्ष मे उनके शीघ्र स्वस्थ और दीर्घ जीवन होने की कामना की थी!!

बड़े दुःख और अफसोस का विषय है कि देश के बच्चों, किशोरों और युवाओं के दिलों पर राज करने वाले इन मासूम नवयुवकों को नहीं मालूम कि पान मसाले के सेवन का संदेश देने वाले विज्ञापन के माध्यम से देश का महानायक और अन्य अभिनेता  उनसे झूठ और फरेब कर  कर उनको मौत के मुँह मे धकेलने का छल-प्रपंच रच रहे है और जिसके एवज़ मे लाखों करोड़ो रुपयों का धन बसूल कर रहे  है।  

क्या इन दौलतमंद अभिनेताओं का पान मसाले के सेवन का संदेश देने वाला ये विज्ञापन उन्हे दिये गये  देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पदम श्री/पदम विभूषण का अपमान नहीं है? क्या  समाज के प्रति अपने नैतिक दायित्वों को तिलांजलि दे, इन पदम पुरुस्कारों की गरिमा के विपरीत नहीं है?? क्यों नहीं भारत सरकार को  इन तथाकथित चारों अभिनेताओं से  इनके तुच्छ, निकृष्ट, अधम एवं अनैतिक विज्ञापन मे पान मसाले के सेवन करने के संदेश को दिखाने के लिये इनको दिये गये देश के सर्वोच्च नागरिक रूपी सम्मान "पदम श्री" और "पदम विभूषण" जैसे गौरवमयी पुरुस्कार बापस लेने के लिये विचार करना चाहिये?

विजय सहगल  

रविवार, 8 मई 2022

कश्मीर फ़ाइल्स" (समापन अंश-2)

 "कश्मीर फ़ाइल्स" (समापन अंश-2)




इस फिल्म के प्रदर्शन पर पक्ष और विपक्ष की प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। जहां वामपंथियों और कॉंग्रेस के अधिसंख्य नेताओं, पीडीपी नेता महमूदा मुफ़्ती एवं नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता एवं पूर्व मुख्य मंत्री  फारुख अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और अन्य अनेक नेता तो सीधे ही फिल्म की कथावस्तु को झूठा सिद्ध करने में लगे हुए थे। बहस और विवाद इस बात पर भी था  कि उस वक्त केंद्र मे किस की सरकार थी और राज्यपाल कौन था। लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से सच थी कि 19  जनवरी के सत्य को विवादित बनाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा था। फारुख अब्दुल्ला जिन्होने 19 जनवरी 1990 के नरसंहार के एक दिन पहले अर्थात   18 जनवरी 1990 को जम्मू कश्मीर राज्य के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा देने के करण इस नरसंहार से निर्लज्जता, धृष्टता और धूर्तता पूर्वक अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला छाड़ लिया। फारुख अब्दुल्ला जैसा परिपक्व कोई राजनेता कैसे समय की लकीरों को साक्षी मान अपने राज्य की जनता के दुःख-दर्द और कष्टों से किनारा सिर्फ इसलिये कर सकता है कि एक दिन पहले उसने राज्य के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था? आतंकी और आतंकी संगठन कोई एक दिन मे नहीं खड़े होते? ऐसी आतंकी  घटना कोई एक दिन मे अचानक नहीं घट जाती? महीनों, सालों पहले से ये आतंकी चरमपंथी समाज मे अशांति और उपद्रव का माहौल बना रहे थे। इन आतंकियों को जहां एक ओर पाकिस्तान की सरकारे पोषित कर रही थी वही दूसरी ओर जम्मू कश्मीर मे राजनीति के सरपरस्त कुछ राजनैतिक परिवार भी अपने हाथ बांध  तमाशबीनों की तरह खड़े थे। जब 19  जनवरी 1990 को कश्मीर मे हिन्दू पंडितों का जन संहार हो रहा था तो  फारुख अब्दुल्ला  लंदन मे गोल्फ खेल का आनंद ले रहे थे। इन काल और परिस्थितियों को देख तो ऐसा ही लगता है कि जन संहार के एक दिन पहले मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना  फारुख अब्दुल्ला की सोची समझी चाल थी? उनके इस गैरजिम्मेदारन व्यान के आधार पर हमे क्यों नहीं शंका करना चाहिये कि आतंकी संगठनों के इस नर संहार की उन्हे पूर्व सूचना थी? इस संदेश और शक के पर्याप्त आधार हैं कि फारुख अब्दुल्ला त्याग पत्र दे अपनी कानूनी  ज़िम्मेदारियों  से तो बच गये पर क्या वे एक जन प्रीतिनिधि और राज नेता के नाते अपने नैतिक कर्तव्यों से कभी बच सकेंगे?  उनका ये कहना कि 19 जनवरी 1990 को कश्मीरी पंडितों की समूहिक हत्या के समय मै मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे चुका था? उनकी धृष्टता, अशिष्टता और बेहयाई की चरम सीमा है!!

कश्मीरी पंडितों के पलायन और नर संहार के लिये जहां एक ओर  फारुख अब्दुल्ला सरकार जिम्मेदार थी ही वहीं  दूसरी ओर केंद्र मे स्थित काँग्रेस शासित इन्दिरा सरकार के निष्क्रिय रवैये ने भी कश्मीरी पंडितों के जन संहार और पलायन ने  आग मे घी का काम किया।  हमे अच्छी तरह याद है इस दौरान कश्मीर मे घटने वाली हर आतंकी  हत्या, लूट बलात्कार या जन संहार  की घटनाओं की प्रतिक्रिया स्वरूप सरकार समाचार पत्रों मे सिर्फ  "रेड अलर्ट घोषित कर दिया है"!! या   "सुरक्षा और कड़ी कर दी गयी है"!! के संदेश देने की औपचारिकता मात्र निभायी  जाती  थी, और आतंकी संगठन दिन व दिन नयी नयी हिंसक  घटनाओं को अंजाम देते रहते थे। आज की तरह सेना और सुरक्षा बालों को कभी भी आतंकी संगठनों के विरुद्ध कार्यवाही करने की खुली छूट नहीं दी गयी थी? सेना के अनेकों उच्च पदस्थ अधिकारियों ने भी उन दिनों की काँग्रेस सरकार की कश्मीरी अलगाव वादी और  आतंकवादियों के विरुद्ध  राजनैतिक ईक्षा शक्ति मे कमी का खुले आम और  स्पष्ट तौर पर उल्लेख किया था। यदि आज की तरह ही दृढ़ ईक्षा शक्ति वाली सरकार उन दिनों होती और इन अतिवादियों, पत्थरबाजी करने वालों और अशांति फैलाने वालों के विरुद्ध सख्त कदम उठाए गए होते तो कश्मीर मे आतंकवाद का ये नासूर इतना न बढ़ता।

फिल्म मे एक जगह उल्लेख किया गया कि जम्मू कश्मीर मे 19 जनवरी 1990 मे नर संहार और औपचारिक रूप से पंडितों का पलायन की शुरूआत हुई लेकिन मेरा मानना है कि हिंदुस्तान मे पहला नर संहार और पलायन  1947 मे देश विभाजन के संदेश के साथ ही  शुरू हो चुका था।   चूंकि उक्त पलायन देश के पश्चिम मे एक सीमित क्षेत्र पंजाब और  सिंध प्रांत तथा पूर्व मे बंगाल तक ही सीमित था। पंजाबियों, सिंधियों और बंगालियों का  कत्लेआम और पलायन का दुःख शेष भारत मे 15 अगस्त 1947 मे स्वतन्त्रता के उल्लास और उमंग के शोर के बीच दब गया? ऐसा मानना है कि 1947 के इस पलायन मे उक्त लोगो को न केवल अपनी जमीन, जायदाद, धन संपत्ति, अपहरण, हत्या, हिंसा  एवं बलात्कार झेलना पड़ा अपितु लगभग 10 लाख से भी अधिक व्यक्तियों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा था।  

नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, वामपंथी, काँग्रेस और ऐसी ही विचारधारा वाले राजनैतिक दलों,  रवीश कुमार, एनडीटीवी जैसे दोहरी मानसिकता की सोच वाले टीवी चैनल ने कश्मीर फाइल फिल्म के जनसंहार को  राजनीति से प्रेरित दिखाने का प्रयास किया। हिन्दू अखबार ने तो इसे अर्ध सत्य और तोड़ मरोड़ कर उकसाने एवं भड़काने के इरादे से लिखी पटकथा बताया। यही नहीं इन अभिव्यक्ति के छद्म पैरोकारों ने फिल्म के निर्देशक पर पैसा कमाने का आरोप भी लगाया।  इस फिल्म के प्रदर्शन को गड़े मुर्दे उखाड़ना, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाली एवं आपसी भाई चारा बिगड़ने एवं अशांति फैलाने  की अशंका  वाली फिल्म बताया।  मै ऐसी सोच और विचार धारा के लोगो से पूंछना चाहता हूँ कि चाहे अत्याचार और अनाचार के प्रतीक यहूदी  राजा पिलातुस द्वारा प्रभु ईसा मसीह को शूली पर चढ़ाने की घटना हो या करबला के युद्ध मे याजीद द्वारा इमाम हुसैन के निर्दयी कत्ल हो या दुनियाँ के एक मात्र ईकलौते दृष्टांत के तहत श्री  गुरु तेग बहादुर जी  द्वारा 11 नवम्बर 1675 मे हिन्दू धर्म के रक्षार्थ क्रूर आततायी औरंगजेब जैसे  विधर्मी की अवज्ञा कर अपना आत्मोत्सर्ग कर सर्वोच्च बलिदान इस बात के उदाहरण है कि हर देश और काल मे ऐसे महा पुरुषों  ने क्रूरता, अनाचार और अत्याचार के विरुद्ध अपना बलिदान दे मानवता की रक्षा की है। हर वर्ष  इन श्रेष्ठ पुरुषों के बलिदान  दिवस पर इनके पराक्रम, शूर-वीरता  फिर चाहे ईसा मसीह का  गुड फ्राइडे पर स्मरण, इमाम हुसैन के बलिदान का  मुहर्रम पर यशोगान या श्री गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी पर्व को याद करने की परंपरा आज तक चली आ रही है। इन श्रेष्ठ पुरुषों के  शौर्य, साहस और वीरता को याद करने से विद्वेष, घृणा, तिरस्कार या नफ़रत कैसे फैल सकती है? अपितु उन क्रूर शासकों, दुष्टों आततायी, हैवान समूहों और पशुवत व्यक्तियों के स्याह चेहरे, जुल्म, ज्यादती, अत्याचार और उत्पीढन को बारम्बार  स्मरण उस विचारधारा और घृणित मानसिकता को धिक्कारना से  होता है।  कश्मीर फ़ाइल मे भी 1990 के दशक मे कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार, हिंसा और अनाचार की घटनाओं के  दस्तावेज़ फिल्म के रूप मे तैयार कर दिये गये है, अब उनकी ये नैतिक ज़िम्मेदारी है कि इन विलेखों को अपनी आने वाली पीढ़ियों को इस निर्देश के साथ सुपुर्द करें कि हर वर्ष इस अन्याय और अत्याचार की  इन घटनाओं पर चर्चायेँ-परिचर्चायेँ, गोष्ठियाँ और सभाओं के माध्यम से अपने देश और समाज के लोगो को जाग्रत कर इन घटनाओं की यादे सांझा करें।

फिल्म मे निश्चित ही कुछ घटनाओं का ही फिल्मांकन किया गया जो कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन से संबन्धित थी।  अन्य अनेकों घिनौनी और विभत्स घटनों का छायांकन दिखाया जा सकता था। लेकिन शायद इतिहास मे कश्मीरी पंडितों के  सबसे बड़े  पलायन को केंद्रीय विषय बनाने के कारण अन्य विषयों को इस फिल्म के साथ नहीं उठाया गया ताकि पलायन और नरसंहार के विषय पर ही ध्यान केन्द्रित किया जा सके, जो विषय की गंभीरता गहराई और महत्व को बनाए रखने हेतु आवश्यक एवं समयोचित था। 20 मार्च सन 2000 को अनंतनाग जिले के छत्तीपोरा मे इन्ही आतंकवादि राक्षसों ने 35 सिक्खों के सामूहिक जन-संहार की घटना भी इनमे से एक है, जब इसी तरह लाइन मे खड़ा करके इन कश्मीरी उग्र एवं अलगाव वादियों ने मानवता को गोलियों से भून दिया था। तमाम प्रगतशील मुस्लिम आदर्श वादियों ने भी कश्मीर मे इन अलगाव वादियों से संघर्ष कर अपना बलिदान किया है। इन घटनाओं पर भी अलग अलग फिल्मांकन की महती आवश्यकता है। लेकिन इन अतिवादी घटनाओं मे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से लिप्त व्यक्ति एवं राजनैतिक संगठन, झूठा स्यापा कर कश्मीर मे आतंकियों के हमले मे असमय मारे गये राष्ट्र भक्त मुस्लिमों और समाज के अन्य लोगो के बलिदान को,  पंडितों के पलायन और नर संहार के साथ घाल मेल कर विषय को हल्का बनाने का निष्ठुर प्रयास कर रहे थे पर भारतीय जनमानस द्वारा  फिल्म की अपार ने  उनके इस नृशंस प्रयास को असफल कर दिया।          

एक अंतिम बात और, हमे ये स्मरण रखना  होगा हर देश, काल मे गुरु तेग बहादुर जैसे आत्मबलिदानी महा पुरुष पैदा नहीं होंगे।  हमे खुद उनकी शिक्षाओं से उन जैसा न सही पर उनके जैसा बनने का प्रयास करने होंगे।   

विजय सहगल