शनिवार, 26 मार्च 2022

बाइक ट्रिप

 

"बाइक ट्रिप - ग्वालियर टु दिल्ली"





यदि गति के नियम के खोजकर्ता न्यूटन, या बिजली के बल्ब के आविष्कारक थॉमस एल्वा एडीसन एवं टेलीफ़ोन के खोजकर्ता ग्राहम वेल हिंदुस्तान मे जन्मते  और अपने आविष्कार को खोजने की कोशिश करते तो उनकी मम्मी ने उनकी  ऐसी दुचाई/कुटाई पिटाई लगाई होती कि सारी खोज धरी की धरी रह जाती। यदि शादी शुदा होते तो बीबी ने खोज की खुराफात पर कब का आसमान सिर पर उठा लिया होता और  कलह के कारण वे कब के खोज छोड़ कर अपनी पारंपरिक नौकरी, दुकान या व्यापार मे लग जाते। विदेश की तरह अपने देश मे कुछ चुनौतीपूर्ण कार्य या नई खोज न हो पाने की बजह घर से लेकर स्कूल तक प्रोत्साहन पूर्ण माहौल का न होना है।  हिंदुस्तान मे ये हर घर की  कहानी है। बचपन मे मम्मी और शादी के बाद घरवाली घर मे कुछ भी उल्टा सीधा या खुराफात, तोड़ फोड़ वाला काम किया नहीं कि डांट फटकार शुरू। मजाल है कि मम्मी की बिना आज्ञा के एक पत्ता भी हिल जाये!   

9-10 जनवरी 2018 की बात थी। मेरी मोटरसाइकल ग्वालियर मे थी जिसे नोएडा  लाना था। अचानक कार्यक्रम के कारण जिस दिन नोएडा आना था, ट्रेन मे रिज़र्वेशन नहीं मिला। जिसके अभाव मे मोटरसाइकल को पार्सल से  ट्रेन से भेजने की संभावना भी जाती रही। तब मन मे आया क्यों ने ग्वालियर से ही दिल्ली/नोएडा मोटरसाइकल से ही चला जाय? अब समस्या ये थी कि परिवार को यदि सूचना देता तो किसी भी कीमत पर मै ऐसा नहीं कर सकता था। परिवार के सारे लोग आसमान सिर पर उठा लेते? तब मैंने बगैर किसी को सूचना दिये ग्वालियर से नोएडा की यात्रा मोटरसाइकल से करने का निश्चय किया। एक दिन पहले मोटरसाइकल की सर्विस करा कर ऑइल, ब्रेक एवं अन्य सामान्य रख रखाव करा सुबह आठ बजे ग्वालियर से प्रस्थान करने के निश्चय के साथ सो गया। अगले दिन सामान कोई था नहीं एक पिट्ठू बैग मे पानी, कुछ खाना आदि लेकर निश्चित समय पर चल नोएडा के लिये चल दिया।

ग्वालियर मे ही गोले के मंदिर से  आगे जेसी मिल वाले फ़्लाइ ओवर पर खड़े हो हमने नोएडा मे घर फोन किया कि मै ट्रेन से चल दिया हूँ और सो रहा हूँ इसलिए फोन कर बीच मे डिस्टर्ब मत करना। सौभाग्य से पुल के नीचे से ट्रेन भी गुजर रही थी जिसकी आवाज भी फोन मे सुनाई दे रही थी इसलिये झूठ बोलने मे ज्यादा जतन नहीं करना पड़ा। उस दिन बाइक की यात्रा मुझे कुछ ऐसा अहसास दे रही थी मानों मै  बुलेट से लेह लद्दाख की यात्रा की रिहर्सल कर रहा हूँ। मै अपेक्षा कर रहा था कि और दिनों की तरह जनवरी की सुनहरी धूप मे यात्रा का आनंद लूँगा पर उस दिन शायद ईश्वर भी मेरी "बाइक यात्रा" की परीक्षा ले रहा था, मौसम ज्यादा अच्छा नहीं था। रास्ते मे वरसात शुरू हो गयी। हेलमेट तो था पर उसके आगे का पारदर्शी कवर नहीं था। जैकेट थी पर सर्द हवाओं ने यात्रा मे अवरोध उत्पन्न करना शुरू कर दिया। हाथ के दस्ताने तो थे पर घर पर भूल गया। लेकिन कठिनाइयां हमारे इरादे को न बदल सकी जैसा की कहावत है, "जहाँ चाह वहाँ राह"!! पीठ पर लदे पिट्ठू को मैंने आगे पेट की तरफ लाद लिया जिससे सर्दी से बचने का समाधान तो हो गया। दस्ताने के जगह एक हाथ मे रुमाल लपेट लिया और दूसरे हाथ मे प्लास्टिक की पन्नी लपेट ली जिसमे कुछ मठरी खाने के लिए रखी थी। अब मात्र बरसात से बचने का साधन नहीं होने के कारण जहाँ बरसात होती वहाँ बाइक को रोक किसी शेड या छप्पर के नीचे खड़ा हो जाता। ये सोच के कि शायद आगे बरसात और ठंडी हवा से छुटकारा मिल जाएगा लेकिन हाय रे! "दुर्भाग्य", मुरैना, धौलपुर, आगरा मथुरा तो क्या उस दिन मौसम ने नोएडा तक पीछा नहीं छोड़ा।

पिट्ठू और जैकेट से सर्दी तो बच रही थी पर थोड़ी थोड़ी देर बाद बरसते बादल यात्रा मे व्यवधान पैदा कर रहे थे। मरता क्या न करता रास्ते मे जहाँ बरसात होती किसी आश्रय का सहारा लेता जाता। आज मै ब्लॉग लिखते हुए अपनी "गढ़ कुढ़ार" की उस आदर्श बाइक यात्रा का स्मरण करता रहा  जिसकी आज मै नोएडा जाते समय  कल्पना कर रहा था। (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/12/blog-post_11.html)। पर नोएडा की ये यात्रा मेरी कल्पना और आशा के विपरीत थी लेकिन यात्रा फिर भी जारी थी। रुकते-रुकाते जैसे तैसे यात्रा के  पहले  पढ़ाव मुरैना मे वन विभाग की जांच चौकी पर पुनः बरसात के कारण आश्रय के साथ चाय पान किया। धौलपुर शहर मे बने फ़्लाइ ओवर को छोड़ कर मैंने पुल के नीचे का रास्ता पकड़ा ताकि यदि बरसात हुई तो आश्रय की तलाश के लिए यहाँ वहाँ न भटकना न पड़े। बार बार रुकने के कारण अनुमानित समय से बाइक यात्रा काफी पीछे चल रही थी पर चिंता इसलिए नहीं थी क्योंकि जैसे जैसे यात्रा मे अवरोध के कारण बिलंब हुआ, मैने  ट्रेन को भी उतना ही लेट चलने की सूचना घर पर देता रहा। आगरा शहर की भीड़ भाड़ से बचने के लिये शहर  मे न जा कर बाईपास का निर्णय था तो ठीक पर पूरे बाईपास पर कहीं आश्रय स्थल नहीं था और यदि वाहन के पंचर या अन्य मरम्मत की जरूरत पड़े तो वह यहाँ उपलब्ध नहीं थी। मथुरा के बाद राजमार्ग पर स्थित एक होटल मे गरमा-गरम रोटी और दाल ने एक बार फिर से एक नई स्फूर्ति और ऊर्जा से भर दिया ताकि शेष बची यात्रा भी पूरी की जा सके।

इस यात्रा की एक अनोखी और उत्साहित करने वाली एक बात और थी कि पूरे राष्ट्रीय राज मार्ग पर स्थित किसी भी टोल प्लाज़ा पर टैक्स नहीं देना पड़ा क्योंकि सरकारी नीति के तहत दुपहिया वाहनों पर कोई टोल टैक्स नहीं था। सरकार की इस नीति की प्रशंसा तो होनी ही चाहिए। अब तक पाँच बज चुके थे मुझे यात्रा करते हुए नौ घंटे हो चुके थे। नोएडा मे कुछ रास्ता भटकने के बाद मै घर पहुंचा जो महा नगरों मे आम बात है। हेलमेट और बाइक से घर आने की कहानी भी ये कह कर बनाई जा चुकी थी कि "रेल्वे स्टेशन से बाइक की डिलिवरी लेकर ही मै घर पहुँच रहा हूँ"। लेकिन कहते है न कि "एक झूठ को बोलने के लिये सौ  झूठ बोलना पड़ता है"!! घर पहुँचने पर मेरे बड़े भाई साहब ने उड़े हुए बाल, लाल आँखों के बारे मे जब पूंछा तो बताया कि बाहर मौसम बहुत खराब है क्योंकि अभी मोटरसाइकल से निजजामुद्दीन स्टेशन से आ जो रहा हूँ। लेकिन न जाने किसी काम से घर की  स्टील अलमिरा मे बाइक की आर॰सी॰ देख मेरे छोटे बेटे ने वहीं से चिल्ला कर कहा कि  "पापा झूठ बोल रहे है", "बगैर आरसी के बाइक ट्रेन मे बुक हो ही नहीं सकती"?? वे ग्वालियर से ही मोटर साइकल से यहाँ नोएडा आये!!

और इस तरह लगभग 9-10 घंटे से चल रही मेरी झूठी ट्रेन यात्रा का पर्दाफाश हो गया। लेकिन ग्वालियर-नोएडा बाइक की यात्रा कष्टदायी तो थी पर यादगार मोटर साईकल यात्रा थी। मुझे उम्मीद है इस यात्रा मे आयी परेशानी और कठिनाइयों के "सबक" हमारी मोटर साइकल से मनाली-लेह यात्रा के काम आएंगे!! ठीक है न!!

विजय सहगल                             

शनिवार, 19 मार्च 2022

जनादेश

 

"समीक्षा-जनादेश 2022"





10 मार्च 2022 को पाँच राज्यों के जनादेश बहुआयामी संदेश देने वाला है। अलग अलग राज्यों मे वहाँ की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक विषयों पर बड़ी ज्वलंत चर्चायें हुई और अंतोगत्वा अलग अलग सफल राजनैतिक दलों ने सत्ता की अट्टालिकाओं पर अपना परचम लहरा ही  दिया।  इतिहास मे कहानियाँ सिर्फ सफल लोगो की ही लिखी जाती है परास्त  राजनैतिज्ञों द्वारा फिलहाल पूर्व की तरह असफलता का ठीकरा दूसरों के सिर फोड़ आत्म मंथन और विचार मंथन का घिसा-पिटा डायलॉग बोल इस असफलता रूपी बला से फौरी तौर पर  पीछा तो छुड़ा ही लिया पर मरते दम तक कुर्सी से चिपके रहने का मोह नहीं जाता।

सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण संदेश जो इस जनादेश-2022 मे देखने को मिला, वह यह था कि जब पिछले वर्ष सन् 2021 मे पश्चिमी बंगाल मे तृणमूल काँग्रेस को मिले जनादेश पर दृष्टिपात कर तुलना करें  कि किस तरह बंगाल मे चुनावी परिणाम के बाद विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं, उनके अनुगामी सहचरों के साथ तृणमूल काँग्रेस के कार्यकर्ताओं ने लूटपाट, आगजनी, हत्या, हिंसा एवं बलात्कार  का तांडव किया था, जो जनादेश 2022 मे कहीं दूर दूर तक नहीं दिखाई दिया। निर्विवाद रूप से पश्चिमी  बंगाल की उक्त हिंसा, आगजनी और लूटपाट जैसी घटनायें, भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश को शर्मसार करने वाली थी एवं  जनमत के नाम पर बहुत बड़ा कलंक थी। अविवादित रूप से  इस हिंसा, लूटपाट और आगजनी मे सत्ताधारी दल द्वारा आसामाजिक तत्वों, गुंडों को राज्याश्रय दिया गया था। जिसका स्वतः संज्ञान माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिया गया था। ऐसा प्रतीत होता है लालफ़ीताशाही, और रगदरबारी के चलते उक्त प्रकरण, फ़ाइलों मे बंद हो गया लेकिन लोकतन्त्र के प्रहरी के नाते हर जागरूक भारतीय नागरिक को इस फाइल को सदा सर्वदा खोले नहीं रखना चाहिये?

जनादेश 2022 मे उत्तर प्रदेश मे जहां समाजवादियों ने बेरोजगारी, महंगाई, विकास न होने और प्रदेश मे पिछड़े पन की दुहाई दी। सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने आदि के आरोप सत्ता पक्ष पर लगा चुनावी माहौल को अपने पक्ष मे करने की भरसक कोशिश की पर सफलता के आंकड़े छूने से काफी पीछे छूट गयी। सापा द्वारा स्वयं ध्रुवीकरण की राजनीति की शुरुआत करते हुए, समाज के आम लोगो के बीच प्रचलित  नैतिक मूल्यों एवं दृष्टांतों  की परवाह किये बगैर, ऐसे प्रत्याशियों को टिकिट दिये जिनकी पृष्टभूमि और इतिहास अपराधिक गतिविधियों से भरा पड़ा था। जिसमे कई उम्मीद्वार पूरी चुनावी  प्रिक्रिया के दौरान जेलों मे बंद थे और जेल मे रहते हुए भी जीत गये।    इसमे कोई शक-ओ-सुबह नहीं थी कि उत्तर प्रदेश के चुनावों मे पश्चिमी बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बैनर्जी  का प्रत्यक्ष या परोक्ष निर्देशन था। लेकिन शायद वे भूल गयी कि उत्तर प्रदेश मे "कानून व्यवस्था" एक सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण "फैक्टर" या "घटक" था जिसके चलते उत्तर प्रदेश की जनता ने "निर्भय", "निडर" और "साहस" के साथ मतदान किया। जिसके फलस्वरूप चुनाव के बाद कहीं कोई दंगा, आगजनी, लूट की एक घटना नहीं हुई। केंद्रीय राजनीति मे आने को आतुर माननीय ममता बैनर्जी को एक बार पश्चिमी बंगाल मे चुनाव के बाद हुई हिंसा, आगजनी, लूट-पाट, हत्या और बलात्कार पर "अपनी सरकार" और स्वयं "अपनी भूमिका" पर जरूर आत्ममंथन  करना चाहिये?

"मुँह मे चाँदी की चम्मच लिये" जन्मे माननीय अखिलेश यादव जी जिन्होने कर्नाटक के एक बड़े  निजी "जेएसएस विज्ञान एवं तकनीकी विश्वविध्यालय", मैसूर से "नागरिक पर्यावरण इंजीन्यरिंग" से स्नातक की परीक्षा पास की है। उन्होने ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविध्यालय से पर्यावरणीय इंजीन्यरिंग से परास्नातक की डिग्री भी हांसिल की है। तब ये तो माना ही जाना चाहिये कि उन्होने विश्व के अच्छे शिक्षा संस्थानों मे शिक्षा और ज्ञान अर्जित किया है। अनेक चुनावी सभाओं  मे उन्होने उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री आदित्य नाथ योगी के कम्प्युटर ज्ञान का मखौल उड़ाया है। उनका कहना था कि योगी आदित्य नाथ ने इसीलिए लेपटोप नहीं बांटे क्योंकि उनको "लेपटोप और स्मार्ट फोन"  चलाना नहीं आता? (https://www.youtube.com/watch?v=tKIc82uqdz4)। योगी जी ने गणित मे स्नातक की डिग्री गढ़वाल विश्वविध्यालय से हांसिल की है एवं गणित मे ही मास्टर की डिग्री के दौरान वे गोरखपुर आश्रम मे आ गये।  विज्ञान का विध्यार्थी होने के नाते मै जानता हूँ कि गणित के स्नातक विध्यार्थी के सामने अन्य विषयों के विध्यार्थियों की क्या औकात है!! फिर जिन विश्व विध्यालयों से माननीय अखिलेश जी ने स्नातक और परास्नातक की पढ़ाई की वो कोई भारत और दुनियाँ के श्रेष्ठतम  "आईआईटी" या "एनआईटी"  तकनीकि  संस्थान के समकक्ष  नहीं थे जिनमे प्रवेश के  लिये कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है और साधारण बुद्धि के छात्रों के प्रवेश के लिये तो यह एक दिवास्वपन की ही तरह होता है!! यूएस, आस्ट्रेलिया मे स्थित ऐसे  शिक्षा संस्थान निश्चित ही अच्छे ज्ञान और विज्ञान के केंद्र है पर इनमे प्रवेश धनबल के आधार पर सहजता से प्राप्त किया जा सकता है इसके लिये किसी अतिरिक्त ज्ञान, बुद्धि या कौशल की आवश्यकता नहीं है।

अपने पूरे राजनैतिक कार्यकाल मे अखिलेश यादव जी सिर्फ इसलिये नोएडा नहीं आये कि यहाँ की धरती पर उनका पदार्पण उन्हे मुख्यमंत्री पद से वंचित कर देगा!! कोई धार्मिक रीति रिवाजों मे आस्था विश्वास करने वाला साधारण शिक्षित व्यक्ति  ऐसा करे तो समझ आता है पर आधुनिक विज्ञान और तकनीकी तथा कम्प्युटर मे सिद्धहस्थ तथा ज्ञान और कौशल का दम भरने वाले, विदेशी विश्व विध्यालय से  इंजीन्यरिंग की इतनी आधुनिक उच्च तकनीकि मे दक्षता  और ज्ञान हांसिल करने के बाद मुख्यमंत्री पद पर रहे श्री अखिलेश यादव जी जैसे  व्यक्ति सन् 2014 से 2022 तक नोएडा शहर  मे न आने के कपोल कल्पित टोटके और अंधविश्वास मे कैसे यकीन कर सकते  है?? यह एक विचारणीय प्रश्न है??  

उक्त  चुनावी सभा मे ही अखिलेश यादव जी द्वारा योगी जी के अङ्ग्रेज़ी ज्ञान का उपहास उड़ाया गया। उनका ये कहना था कि योगी जी विदेश मे इसलिये नहीं जाते क्योंकि वे अङ्ग्रेज़ी मे बात नहीं कर सकते? उत्तर भारत के गाँव, देहात और छोटे शहरों मे रह रहे कुछ मध्यम वर्गीय अल्प बुद्धि परिवारों मे आज भी एक बहुत बड़ी कमी है कि वे अङ्ग्रेज़ी ज्ञान, विशेषतः अङ्ग्रेज़ी बोलने मे प्रवीणता  को एक अतिरिक्त और श्रेष्ठ योग्यता माना करते है। आश्चर्य होता है कि ऐसे लोग आज भी "हीनता की भावना" से ग्रसित है। वे ये भूल जाते है कि रूस, जापान, फ़्रांस, जर्मनी, चीन  और अन्य अनेकों देशो के राष्ट्राध्यक्ष सिर्फ अपनी मातृ भाषा मे बात करते है, वे अङ्ग्रेज़ी भाषा नहीं बोल सकते तो क्या उनकी बुद्धि, ज्ञान और कौशल पर सवाल उठाया जा सकता है? मुझे याद है कि एक बार झाँसी  रोजगार कार्यालय मे अपना नाम दर्ज़ कराने के दौरान कार्यालय के एक कर्मचारी ने मेरे अङ्ग्रेज़ी ज्ञान का उपहास उड़ाने की चेष्टा की थी। मैंने उसे उसी की भाषा मे जबाब देते हुए कहा था,  श्रीमान इंग्लैंड मे झाड़ू लगाने वाला एक सफाई कर्मी भी आपसे अच्छी अङ्ग्रेज़ी बोल और लिख सकता है, लेकिन वह ज्ञान और योग्यता मे आप से श्रेष्ठ नहीं हो सकता? "हाँ मेरा अङ्ग्रेज़ी ज्ञान कम हो सकता है, क्योंकि अङ्ग्रेज़ी मेरी मातृ भाषा नहीं है। इसका ये मतलब नहीं कि दुनियाँ मे अङ्ग्रेज़ी  ही ज्ञान की कसौटी का एक मात्र पैमाना है?

14 जनवरी 2022 को लखनऊ मे एक प्रेस वार्ता के दौरान श्री स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने दल मे शामिल करने के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री अखिलेश यादव ने एक बार पुनः योगी आदित्य नाथ का उनके क्रिकेट खेलने पर मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि "बाबा मुख्यमंत्री  क्रिकेट खेलना नहीं जानते। स्वामी प्रसाद और अन्य लोगो के दल बदल पर कहा कि बीजेपी के  लगातार विकेट गिर रहे है, उनके द्वारा कैच छूटने के उदाहरण दे अपने क्रिकेट ज्ञान का परिचय दिया  ( https://www.youtube.com/watch?v=YFiYJ8838tk )। मैंने काफी कोशिश कर गूगल सर्च पर इंडिया टीम, प्रदेश या रणजी ट्रॉफी की टीम या आईपीएल की टीम मे किसी राजनैतिज्ञ जो क्रिकेट का पारंगत, प्रवीण पंडित हों का  नाम खोजने की कोशिश की, जिसमे श्री तेजस्वी यादव के  अलावा कोई और नाम नहीं मिला!!  और फिर क्या मुख्यमंत्री को राज्य का शासन चलाने के लिये क्रिकेट खेल के ज्ञान और कौशल की अनिवार्यता है?

उत्तर प्रदेश के परिपक्व और समझदार वोटर्स द्वारा अपने जनादेश 2022 के  माध्यम से जो बड़े संदेश दिये है वो सभी राजनैतिक दलों को आत्म चिंतन और मंथन के लिये अवश्य मजबूर करेंगे ऐसा मेरा मानना है।

विजय सहगल    

मंगलवार, 15 मार्च 2022

सुरक्षा/कानून व्यवस्था का महत्व

 

"सुरक्षा/कानून व्यवस्था का महत्व?"







 

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की चुनावी चर्चाओं मे बेरोजगारी और महंगाई की खूब चर्चा चली। राजनैतिक दलों ने इस दौरान एक दूसरे पर  खूब आरोप प्रत्यारोप लगाये गये, पर  उत्तर प्रदेश मे, सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था की स्थिति पर सभी नागरिक निर्विवाद रूप से एकमत थे कि प्रदेश मे सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था की स्थिति काफी अच्छी और ठीक है। निर्भय होकर लोग प्रदेश मे आ जा सकते है। गुंडागर्दी, रंगबाजी, लूटपाट, माफियाओं की चौथ बसूली पूरी तरह से बंद हो गयी। माफियाओं की काली कमाई से अर्जित सम्पत्तियों को बुलडोजर की सहायता से  ज़मींदोज़ कर मिट्टी मे मिला दिया गया। प्रदेश मे कहीं कोई दंगा फसाद का नमो निशान नहीं था। उत्तर प्रदेश मे  सुरक्षा और कानून व्यवस्था के वारे मे अच्छी  धारणा बनाने मे 10 जुलाई 2020 को बिकरू गाँव, कानपुर की उस मुठभेड़ ने अहम भूमिका अदा की जिसमे आठ पुलिस अधिकारियों की नृशंस तरीके से हत्या करने वाला शातिर अपराधी विकास दुबे को पुलिस वाहन पलटने के दौरान, मौके का फायदा उठा पुलिस हिरासत से भागने और पुलिस दस्ते पर बंदूक से हमला  करने के प्रयास के दौरान पुलिस मुठभेड़ मे मार गिराया गया। घटना छोटी थी पर संदेश बहुत बड़ा छोड़ गयी। इस घटना से प्रदेश के अपराधियों मे एक डर और भय का वातावरण व्याप्त हो गया। जो अपराधी खुले आम अपराध करते थे अपराध छोड़ने की तख्तियाँ अपने गले मे लटका पुलिस थानों मे सपर्पण कर स्वयं को जेलों मे बंद कराने की अनुनय विनय करने लगे।

क्या ऐसा संभव नहीं  कि मानव समाज पर बोझ बनने वाले अपराधियों और असामाजिक तत्वो को ठीक उसी तरह मानव समाज से अस्वीकार, खारिज या विलीन कर देना चाहिये जैसा कि बैंक के ऋण को क्रमबद्ध तरीके से गैर निष्पादन आस्तियों से शुरू कर बट्टे खाते मे डालने तक  की पृक्रिया के पश्चात बैंक की किताबों से खारिज/निकाल (राइट ऑफ) दिया जाता है??     

मेरा मानना है कि "सुरक्षा व्यवस्था" मे कमी के चलते चंद दिनों के भीतर  किसी देश और उसके नागरिकों की दुर्दशा, दुर्गति और  नरकीय स्थिति मे परिवर्तित होने का सबसे सटीक उदाहरण यूक्रेन है। "सुरक्षा व्यवस्था" का विषय कितना  महत्वपूर्ण है, इसको यूक्रेन देश की वर्तमान  भयावह स्थिति को देख भली भाँति समझा जा सकता है। यूक्रेन के सभी नागरिक वैभव और विलासता की किसी भी वस्तु के मुंहताज़ नहीं थे। दुनियाँ की सभी सुख सुविधायेँ  नागरिकों को आसानी से सुलभ थी। शायद ही किसी यूक्रेनी नागरिक ने अपने जीवन मे कभी बेरोजगार, मेहंगाई, गैस सिलेंडर और पेट्रोल जैसी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से परेशानियों, कष्ट और पीड़ा का अनुभव किया हो?  हर नागरिक के पास रहने को आलीशान घर, आने जाने के लिये बड़ी बड़ी चमचमाती गाडियाँ, हाथ मे स्मार्ट फोन, खाने पीने की वस्तुओं के  भंडार, आमोद-प्रमोद एवं मनोरंजन के सुगम साधन, पर्यटन के लिये विकसित पर्यटन स्थल एवं सुख सुविधाओं युक्त विलसतापूर्ण होटल, क्या नहीं था, यूक्रेन जैसे विकसित देश मे? बस कमी थी तो संकटों और विपत्ति की घड़ी मे सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की ताकि संकट के समय समाज और देश के सुरक्षा बल अपने नागरिकों की रक्षा करते हुए अपने दुश्मनों से लड़ उन्हे परास्त कर सके। लेकिन ऐसा हो न सका। देश के नेतृत्व और सरकार नागरिकों को रक्षा और सुरक्षा देने मे नाकामयाब रही और मजबूरन देश के नागरिकों को अपने घर, संपत्ति, रोजगार सुख-सुविधाओं को छोड़ पलायन के लिये मजबूर हो दूसरे देशों मे शरणार्थीयों के रूप मे शरण लेने के लिये मजबूर होना पड़ा। सारी विलसता, सुख, समृद्धि, वैभव पूर्ण जीवन, विकास उन्नति सुरक्ष-व्यवस्था के चलते धरी-की धरी रह गयी। कल तक जो यूक्रेनी नागरिक वैभव और विलसता पूर्ण जीवन जीते थे वे आज अपने बच्चों और अपने लिये भोजन, पानी तक  को मुँहताज हो गये!!  आज यूक्रेन सुरक्षा व्यवस्था के अभाव मे  खंडहरों मे तब्दील एक उजड़ा, बर्बाद और क्षतिग्रस्त शहरों का देश हो चुका है, जहां पिछले बीस दिनों से दिन रात बमों के धमाकों की आवाज के बीच शमशान की एक नीरव शांति पसरी है, जिसका एक और मात्र एक कारण सुरक्षा व्यवस्था का पूर्णत: अभाव था। काश ये सुविधा भोगी यूक्रेनी नागरिक कुछ मेंहगाई को झेल लेते?  रोजगार मे कुछ कमी से ही गुज़र-बसर  कर लेते? वस्तुओं, वाहनों कपड़ों पर कुछ अतिरिक्त टैक्स दे देते? गैस, बिजली और ईधन की कुछ ज्यादा कीमत अदा कर देते? तो उनके देश का सुरक्षा तंत्र मजबूत हो जाता और आज उसके नागरिकों को  ऐसे कठिन, क्लेश के अशुभ और विभत्स दिन न देखने पड़ते?

ये कहने मे कोई अतिश्योक्ति या अतिरंजना  न होगी कि किसी भी देश के नागरिकों के जीवन मे सुख, समृद्धि और शांति बनाये रखने के लिये देश की सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था का सुचारु  संचालन परमावश्यक है।  इस संदेश को उत्तर प्रदेश के नागरिकों ने सफलतापूर्वक अपने  जनादेश 2022 के माध्यम देश और दुनियाँ को दिया है जिसके लिये उत्तर प्रदेश का प्रत्येक नागरिक और वोटर बधाई का पात्र है।                            

विजय सहगल

शनिवार, 12 मार्च 2022

आर॰टी॰जी॰एस॰

 

"आर॰टी॰जी॰एस॰"






सार्वजनिक सेवा के किसी भी संस्थान  की सफलता उसके कर्मचारियो के  टीम आधारित प्रयास पर निर्भर करती है। टीम के किसी भी सदस्य की कोताही पर सफलता मे अवरोध और परिणाम के रूप मे  विरोध उत्पन्न होता है। ऐसा ही कुछ मैंने अपनी बैंक सेवा के  डबरा पदस्थपना मे महसूस किया। धन प्रेषण का इलेक्ट्रॉनिक्स "आरटीजीएस" माध्यम नया-नया ही शुरू हुआ था।  इसके अंतर्गत एक बैंक का ग्राहक अपने बैंक के माध्यम से  पैसे को भारत मे किसी दूसरे  बैंक की किसी भी शाखा मे सीधे ही धन का प्रेषण कर सकता था।

शायद सन् 2007 की बात थी।  हमारी शाखा के एक महत्वपूर्ण ग्राहक श्री संतोष जी मोर ने पाँच लाख रुपए की धनराशि का प्रेषण एसबीआई की इटावा शाखा के अपने व्यवसायिक हित रखने वाले व्यापारी को आरटीजीएस के माध्यम से प्रेषित करने का आवेदन किया। वे डबरा के एक बड़े व्यापारी है। समान्यतः इस प्रेषण को उसी दिन चार घंटे के भीतर प्रेषित हो जाना चाहिए था लेकिन पता नहीं किस तकनीकी खामी के चलते उक्त धनराशि इटावा स्थित उनके व्यापारी के खाते मे नहीं पहुंची। व्यापारी से फोन पर चर्चा से ज्ञात हुआ कि उक्त धनराशि उन्हे उस दिन देर रात तक भी नहीं मिली! संतोष जी की धन प्रेषण पर व्यापारिक विश्वसनीयता और प्रतिष्ठाता पर चिंता स्वाभाविक थी पर उनसे ज्यादा चिंता मुझे इसलिये हो रही थी कि पाँच लाख जैसी बड़ी धनराशि के प्रेषण मे कहीं कोई चूक बैंक स्तर पर हमारे स्टाफ से तो नहीं हो गयी?  बैंक खाता नंबर या बैंक के कोड लिखने मे कोई त्रुटि से धन प्रेषण कहीं किसी गलत व्यक्ति के खाते मे तो नहीं हो गया? मुझे चिंता यूं हो रही थी कि शाखा से पहले "आरटीजीएस" धन प्रेषण से कहीं ऐसा न हो कि "होम करते हाथ जल जायें"? सावधानी वश, शाम को बैंक बंद करने के पूर्व मैंने उक्त समस्या के बारे मे अपने उच्च अधिकारियों को फोन और ई-मेल के माध्यम से अवगत करा दिया था।

अगले दिन सुबह बैंक मे आते ही मैंने आरटीजीएस सेल दिल्ली और मुंबई फोन किया और विस्तृत विवरण दे कर जानकारी चाही पर बहुत सकारात्मक उत्तर दोनों जगह से प्राप्त नहीं हुआ। मुझे याद है दिल्ली मे कोई उमा मेडम इस संबंध मे अपने स्तर पर प्रयास रत तो थी पर उनके प्रयास भी निश्चयात्मक परिणाम देने वाले न थे। उस दिन पूरे समय मै दिल्ली और मुंबई फोन करता रहा। दिल्ली फोन करो, तो वे लोग मुंबई संपर्क करने का निर्देश देते और मुंबई  कार्यालय वाले दिल्ली संपर्क करने की हिदायत दे रहे थे। मुझे अच्छी तरह याद है उस पूरे दिन फोन पर हमारे दिल्ली और मुंबई कार्यालय ने  मुझे फुटबाल की तरह इस्तेमाल कर दिल्ली और मुंबई के पाले मे लतिया-लतिया कर मेरी हालत खराब कर दी थी!! इसके बावजूद मैने मुंबई और दिल्ली स्थित  दोनों ही कार्यालयों के अधिकारियों से धैर्य पूर्वक यही निवेदन किया  कि नियमानुसार यदि चार घंटे मे प्रेषण नहीं हुआ तो पैसा व्यापारी के खाते मे बापस तो आना चाहिए? परंतु अफसोस कोई संतोषजनक उत्तर नहीं प्राप्त हुआ। वही दूसरी ओर हमारे खाता धारी श्री संतोष जी मोर भी व्यापारी के पास पैसा न पहुँचने के कारण परेशान थे। उनकी व्यावसायिक साख भी दाँव पर लगी थी। एक बात अच्छी थी चूंकि पाँच लाख रुपए जैसी बड़ी धन राशि का मामला था तो मैने भी पूरे घटना क्रम को ई-मेल कर  अपनी डायरी मे नोट कर लिया था।

आप जानकार हैरान होंगे कि हमारे लगातार फोन/मेल  आदि के प्रयास के बावजूद हमारी शाखा की उस गंभीर समस्या का समाधान अगले दो दिन तक भी नहीं हुआ!! इस घटनाक्रम के पांचवे दिन भी शिकायत का निराकरण न होने से चिंतित मैंने एक गंभीर आत्मघाती कदम उठा कर अपने खाताधारक श्री संतोष मोर को बैंक के सीएमडी महोदय का नंबर दे उनसे मेरी शाखा और मेरी शिकायत करने का सुझाव दिया। पहले तो उन्होने मेरी शिकायत सीएमडी से करने मे   संकोच और हिचकिचाहट दिखाई।  पर जब मैंने उनसे संशय और दुविधा छोड़ सीएमडी के स्तर पर शिकायत के शीघ्र सुनवाई और समाधान के बारे मे बताया तो वो मेरी शाखा और शाखा प्रबन्धक अर्थात मेरी  शिकायत के लिये राजी हो गये। मैंने उन्हे आगाह भी किया कि आप सिर्फ शाखा और शाखा प्रबन्धक की समस्या  पर कार्यवाही न करने की शिकायत पर ही केन्द्रित रहना, आप दिल्ली या मुंबई कार्यालय से मेरे प्रयास का कोई जिक्र न करना।  ये तरक़ीब काम कर गयी!! जैसे ही उन्होने दिल्ली/गुड़ गाँव स्थित कार्यालय मे सीएमडी महोदय को फोन किया। सीएमडी साहब की सचिव महोदया ने शिकायत का विवरण की जानकारी ली। दो मिनिट के अंदर ही मुझे सीएमडी सचिवालय से फोन पर संतोष मोर जी की शिकायत पर की गयी कार्यवाही के वारे मे पूंछा? मैंने मेडम को शिकायत के समाधान के लिये मेरे द्वारा किये गये प्रयासों की  विस्तृत जानकारी, ई-मेल और दिल्ली-मुंबई स्थित कार्यालयों से संपर्क किये गये अधिकारियों के नाम बता कर  समाधान का निवेदन किया। मैंने उन्हे इस बात से भी अवगत कराया कि पीढ़ित पार्टी ने खाता बंद करने एवं रिजर्व बैंक मे शिकायत की भी धमकी दी है।

सीएमडी को किये गये शिकायती फोन के कारण अब तक तो शिकायत, जो कल तक रेंग-रेंग कर चल रही थी मानो शिकायत को पंख लग गये!! एक के बाद एक अनेकों फोन बैंक के दिल्ली और मुंबई कार्यालय से शिकायत की पूंछ-तांछ के संबंध मे आने लगे!! आई-टी सेल के सहायक महा प्रबन्धक सहित न जाने किस किस के फोन आये और दस-पंद्रह मिनिट मे आरटीजीएस की धनराशि श्री संतोष जी के इटावा स्थित व्यापारी के खाते मे जमा हो गयी। हर अधिकारी अपनी सफाई मे एक दूसरे को दोषी ठहरा कर कभी एसबीआई बैंक को तो कोई तकनीकी खामी को उत्तरदायी बता रहा था।  

मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि ग्राहक की "उत्तम एवं त्वरित सेवा" की नीति के तहत खुद मुझे अपनी ही शिकायत बैंक के उच्चतम पदाशीन अधिकारी, श्रीमान "अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक" महोदय से करवानी पड़ेगी। लेकिन अंततः अपनी शाखा और अपनी ही शिकायत कराये जाने से उपजे  समाधान पर जो सुख और संतोष मिला वह अवर्णीय था।

विजय सहगल                          

सोमवार, 7 मार्च 2022

मातृ शक्ति नमन्-दिवस

 

मातृ शक्ति नमन्









आदरणीय अम्माँ जी, 08 मार्च 2022

चरण वंदन,

 

आज आठ मार्च को यूं तो "महिला दिवस",  मातृ शक्ति को नमन कर उनको याद करने का, उनके प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन है लेकिन मेरा मानना है कि साल का हर दिन मेरे लिये तुम्हें स्मरण करना, तुम्हें याद करना मेरे लिये दैनिक अनुष्ठान के अंग की तरह है। माँ, तुम  परिवार  की आदर्श "हीरो" की तरह हो जिसने हम सबको  संकट और दुःख की घड़ी मे धैर्यपूर्वक, मजबूती के साथ खड़े हो विपत्तियों से सामना करना सिखाया। उपलब्ध संसाधनों मे संतुष्ट, शांति और सुखी  रहने के तुम्हारे गुरुमंत्र से हम सभी आज भी  प्रेरणा लेते है।  आपने पापा के वेतन आमदनी की  सीमित आय मे भी हम छह भाई बहिनों के पालन पोषण, पढ़ाई-लिखाई मे अपने जीवन की कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। 

अम्माँ, यूं तो मध्यम वर्गीय परिवारों हर मौसम मे अपनी कठिनाइयाँ और अनुकूलतायेँ होती है लेकिन मुझे याद है बरसात के मौसम मे सुबह के समय जब हम भाई बहिन स्कूल जाने की तैयारी करते, तो तुम  रसोई के चूल्हे पर सबके लिए सब्जी रोटी बना खाने के टिफिन का इंतजाम करती थी। आधे आँगन मे टीन के छप्पर के नीचे जहां अन्य मौसम मे रसोई खुली एवं बड़ी दिखाई देती थी, पर बरसात मे पानी की फुहारों के बीच रसोई का  आकार सीमित हो कर एक तिहाई हो जाता। नालीदार टीन की शेड मे जितनी नाली होती उतनी धाराएँ आँगन मे गिरने के कारण, उछलते पानी के छीटें "आटे" की परात और चूल्हे मे जल रही लकड़ियों को भी गीला कर देते थे। पानी के छीटों और परात के बीच मूंझ वाली चारपाई से भी जब बचाव न होता तो चारपाई पर कोई चादर डाल दी जाती ताकि चादर पानी के छीटों को सोख टपकती बूंदों की धाराओं मे बदल कर आँगन मे बहा सके। मिट्टी से बने मुख्य चूल्हे के पीछे भी एक गोल उप चूल्हा भी बना रहता जिससे  निकलने वाली आंच के ऊपर तुम  बटलोई या बटरी मे दाल या कढ़ाई मे सब्जी पकाने के लिए चढ़ा देती थी। माँ, तुम्हारा जब एक रोटी को अंगारों  के ऊपर रख फूलने के लिए सेंकना, दूसरी रोटी को तवे पर सेंकने के लिए डालना और तीसरी आटे की लोई को चकले, बेलन की सहायता से बेलने के इस निरंतर  क्रम को आटा समाप्त होने तक विना किसी क्षणिक व्यवधान के मशीन की तरह रोटी बनना, सेंकते देखना अद्भुद और आश्चर्य चकित कर देता था।  रोटी बनाने, सेंकने  के साथ, बीच बीच मे उप चूल्हे पर सब्जी मे छौंका लगा सब्जी बनाने का संतुलन देखते ही बनता था जो मुझे आज भी याद है। गीली लकड़ी से जब धुआँ निकलने लगता तो इस संतुलन के क्रम मे कुछ बिघ्न पड़ता, आंखो मे धुआँ और जलन से आँसू निकलते पर तुम, कभी फुँकनी से कभी विजना (खजूर का पंखा), या कॉपी या रजिस्टर के  गत्ते से हवा कर चूल्हे की आंच को बापस प्रज्वलित कर लिया करती थी। तमाम बाधाओ के बीच, हर क्षण संतुलन बनाये रखने का अनूठा उदाहरण देखते ही बनता था। नहाने के बाद, मै भी ठंड से बचने के लिये, चूल्हे के सामने कुछ मिनिट खड़े होने के मोह को नहीं रोक पाता, साथ ही आपके खाना बनाने के क्रम को  बड़े कौतूहल से देखा करता था।

माँ,  परिवार मे सबसे पहले जाग कर, देर रात सबसे बाद मे सोने के तुम्हारे क्रम को  मैंने सालों साल ऐसे ही देखा! जब तुम  सुबह से देर रात तक बिना एक पल विश्राम किये, हम भाई बहिनों के लिये खटती रहती थी। दमयंती और नीलम (दोनों बहिने) भी जब स्कूल स्तर पर पढ़ने जाने लगी थी तो वे भी अपनी पढ़ाई-लिखाई  और घर के कार्यों के बीच संतुलन बना तुम्हारा  हाथ बंटाने लगी थी।

मई-जून के ग्रीष्म अवकाश के समय जब हम बच्चों की छुट्टियाँ हो जाती तो ऐसा नहीं था कि घरेलू काम से तुम्हें कुछ आराम या छुटकारा मिल जाता हो? तब तुम उन दिनों आवश्यक वस्तुओं का  पूरे साल का भंडारण करने के जतन मे व्यस्त रहती थी।  "चैत" माह जब  गेहूं की नयी फसल के बाजार मे आगमन का समय होता, पापा पूरे साल के लिये मंडी से चार-पाँच बोरे गेहूं  क्रय  कर लाते थे। तुम, गेहूं को पानी से धोना, सुखाना, छजने या छलनी  से छानने, फटकारने और बीनने के कार्य को करती थी, यह  क्रम हफ्ते दस दिन चलता था। हम भाई, गेहूँ को उठाने-धरने छत्त पर गेहूँ को फैला सुखाने के क्रम मे थोड़ी सहायता जरूर कर देते पर गेहूँ बुहारने का कार्य कठिन और दुष्कर था। गेहूँ के भंडारण हेतु लोहे की एक टंकी घर मे थी पर बाकी बचे गेहूँ को मिट्टी से बनी ढिंकौली, हौद और पीतल के बड़े-बड़े हंडे मे रखने का जतन तुम ही करती थी। इन पात्रों को बजनी होने के कारण सुव्यस्थित रखबाने, खिसकाने की जिम्मादारी हम भाई जरूर कर लेते थे।  

वस्तुओं के साल भर के  भंडारण मे आटे की सिमइयाँ भी होती थी। सिमइयाँ एक मशीन  की सहायता से बनाई जाती थी। आज की युवा पीढ़ी शायद इस मशीन से परिचित न हो पर अस्सी-नब्बे के दशक तक सिमइयाँ बनाने की मशीन से हर परिवार परिचित था। हर दिन 5-10 किलो गूँथे हुए आटे को इस मशीन मे लोई बना बना के डाल, हैंडिल की सहायता से घुमा कर लंबी-लंबी पतले तार की तरह इन सिमइयाँ को निकाल सुखाया जाता था। चारपाई की पाटी पर कस इस मशीन को चलाना एक श्रमसाध्य काम था जिसे माँ, सभी भाई-बहिनों के बीच समय अंतराल को बाँट करा लेती,   तींन चार दिन चलने वाले इस क्रम मे पूरे साल का स्टॉक एकत्रित कर लिया जाता था।  सिमइयाँ मशीन के साथ आज तो चारपाई भी लुप्तप्राय हो गयी। उन दिनों बाज़ार मे पिसा हुआ नमक उपलब्ध नहीं होता था डेला नमक ही उपलब्ध था जिसके छोटे-छोटे  डेलों का  उपयोग तो  सब्जी, दाल आदि मे हो जाता था पर आटे, पापड़, पकवान आदि मे नमक को घर मे चक्की से पीस कर रक्खा जाता था। माँ, आप ने एक मिट्टी के घड़े मे इसकों भी पीस कर साल का स्टॉक रखा हुआ था।    

प्रायः हर भारतीय घरों मे ग्रीष्म अवकाश के दौरान आम, हरी और लाल  मिर्च, नीबू, टेंटी, कटहल, लवेरे  आदि के अचार भी बड़ी मात्र मे बनाये जाते जिनको पूरे साल उपयोग के लिये बनाया जाता। अरहर की दाल और आलू के पापड़ का पूरे साल का स्टॉक को तैयार करना भी परिवारों के लिये बड़ी चुनौती होती थी। हाँ आलू मसाले के पापड़ को वेलने के बाद मै सुखाने के लिए पापड़ को धूप मे डालने का कार्य बड़े दिल से करता था क्योंकि मसाले के आलू को चोरी से खाने का स्वार्थ जो छुपा था। दाल बड़ी, आलू चिप्स के अलावा धनियाँ, मिर्च, अमचुर  हल्दी आदि मसलों का भी पूरे साल का स्टॉक इन्ही दिनों मे एकत्रित कर लिया जाता था। माँ, तुम बड़ी धैर्य पूर्वक इन सभी वस्तुओं को अपनी पूरी क्षमता और समर्पण के साथ क्रमबद्ध तरीके से तैयार कर इनका  भंडारण कर लेती जो पूरे साल परिवार के लोग इस्तेमाल करते थे।   

मेरा मानना है कि  उत्तर भारत के प्रायः हर परिवार मे महिलाएं अपने दैनंदिनि कार्यो के अलावा इन मौसमी कार्यों का सम्पादन बड़े सुचारु और प्रबंधकीय कौशल से करती थीं। पर  माँ तुमने  इन सभी कार्यों मे महारथ हांसिल कर ली थी। माँ तुम,  गृह संचालन के हर स्तर पर प्रबंधकीय कौशल, आर्थिक स्तर, तीज त्योहारों, परिवार के सभी सदस्यों के कपड़ो-लत्तों का प्रबंधन,  स्कूल की फीस एवं सामाजिक कार्यों के अंतर्गत नेग, सगुन आदि के  लेनदेन  सफलता पूर्वक  संपादित कर तुम ताउम्र एक सफल गृहणी का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती रही। आज पिच्यासि वर्ष की उम्र मे भी जब तुम आधुनिक इलेक्ट्रोनिक यंत्रों पर  यूट्यूब को देखने एवं सक्रियता पूर्वक, उनकी  सहायता से नए नए व्यंजनों को बनाने एवं देखने के आपके शौक के  हम सभी बड़े कायल है। आधुनिक तकनीकी के "माऊस" के उपयोग से टीवी को संचालन करना मुझे आश्चर्य चकित कर देता है। आज भी जब घरों पर महिलाएं भले ही सास-बहू के सीरियल को देख आनंदित होती हों पर आप देश दुनियाँ के समाचार देखे और पढे बगैर एक दिन भी न रहती। अँग्रेजी की समुचित शिक्षा के अभाव के बावजूद आप शब्दों को जोड़  अँग्रेजी के अक्षरों को सुगमता से पढ़ लेती हो तो मुझे आश्चर्य होता है। माँ तुम आज भी परिवार की एक  आदर्श अगुआ हो, हम परिवार के सभी सदस्य आज भी आप से ऊर्जा और  प्रेरणा ग्रहण करते है। माँ, आप शतायु हों, स्वस्थ रहे! हम सब ये ही कामना करते है।  

आज महिला दिवस पर आप को स्मरण करते हुए, हम अपने परिवार, समाज, स्नेहिजनों, मित्रों, शुभचिंतक सभी महिला शक्ति रूपा  माँ, बहिन, बेटियों को इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर  अपना अभिवादन, स्नेह और सम्मान प्रेषित कर अभिनंदन करते है। आप सहित सभी महिला शक्ति को  हार्दिक बधाई, शुभकामनायें, चरण वंदन!

विजय सहगल