"बाइक ट्रिप - ग्वालियर टु दिल्ली"
यदि गति के नियम के खोजकर्ता न्यूटन,
या बिजली के बल्ब के आविष्कारक थॉमस एल्वा एडीसन एवं टेलीफ़ोन के खोजकर्ता ग्राहम
वेल हिंदुस्तान मे जन्मते और अपने
आविष्कार को खोजने की कोशिश करते तो उनकी मम्मी ने उनकी ऐसी दुचाई/कुटाई पिटाई लगाई होती कि सारी खोज
धरी की धरी रह जाती। यदि शादी शुदा होते तो बीबी ने खोज की खुराफात पर कब का आसमान
सिर पर उठा लिया होता और कलह के कारण वे
कब के खोज छोड़ कर अपनी पारंपरिक नौकरी,
दुकान या व्यापार मे लग जाते। विदेश की तरह अपने देश मे कुछ चुनौतीपूर्ण कार्य या
नई खोज न हो पाने की बजह घर से लेकर स्कूल तक प्रोत्साहन पूर्ण माहौल का न होना
है। हिंदुस्तान मे ये हर घर की कहानी है। बचपन मे मम्मी और शादी के बाद घरवाली
घर मे कुछ भी उल्टा सीधा या खुराफात,
तोड़ फोड़ वाला काम किया नहीं कि डांट फटकार शुरू। मजाल है कि मम्मी की बिना आज्ञा
के एक पत्ता भी हिल जाये!
9-10 जनवरी 2018 की बात थी। मेरी मोटरसाइकल
ग्वालियर मे थी जिसे नोएडा लाना था। अचानक
कार्यक्रम के कारण जिस दिन नोएडा आना था,
ट्रेन मे रिज़र्वेशन नहीं मिला। जिसके अभाव मे मोटरसाइकल को पार्सल से ट्रेन से भेजने की संभावना भी जाती रही। तब मन
मे आया क्यों ने ग्वालियर से ही दिल्ली/नोएडा मोटरसाइकल से ही चला जाय?
अब समस्या ये थी कि परिवार को यदि सूचना देता तो किसी भी कीमत पर मै ऐसा नहीं कर
सकता था। परिवार के सारे लोग आसमान सिर पर उठा लेते?
तब मैंने बगैर किसी को सूचना दिये ग्वालियर से नोएडा की यात्रा मोटरसाइकल से करने
का निश्चय किया। एक दिन पहले मोटरसाइकल की सर्विस करा कर ऑइल,
ब्रेक एवं अन्य सामान्य रख रखाव करा सुबह आठ बजे ग्वालियर से प्रस्थान करने के
निश्चय के साथ सो गया। अगले दिन सामान कोई था नहीं एक पिट्ठू बैग मे पानी,
कुछ खाना आदि लेकर निश्चित समय पर चल नोएडा के लिये चल दिया।
ग्वालियर मे ही गोले के मंदिर से आगे जेसी मिल वाले फ़्लाइ ओवर पर खड़े हो हमने
नोएडा मे घर फोन किया कि मै ट्रेन से चल दिया हूँ और सो रहा हूँ इसलिए फोन कर बीच
मे डिस्टर्ब मत करना। सौभाग्य से पुल के नीचे से ट्रेन भी गुजर रही थी जिसकी आवाज
भी फोन मे सुनाई दे रही थी इसलिये झूठ बोलने मे ज्यादा जतन नहीं करना पड़ा। उस दिन बाइक
की यात्रा मुझे कुछ ऐसा अहसास दे रही थी मानों मै बुलेट से लेह लद्दाख की यात्रा की रिहर्सल कर
रहा हूँ। मै अपेक्षा कर रहा था कि और दिनों की तरह जनवरी की सुनहरी धूप मे यात्रा
का आनंद लूँगा पर उस दिन शायद ईश्वर भी मेरी "बाइक यात्रा" की परीक्षा
ले रहा था, मौसम ज्यादा अच्छा नहीं
था। रास्ते मे वरसात शुरू हो गयी। हेलमेट तो था पर उसके आगे का पारदर्शी कवर नहीं
था। जैकेट थी पर सर्द हवाओं ने यात्रा मे अवरोध उत्पन्न करना शुरू कर दिया। हाथ के
दस्ताने तो थे पर घर पर भूल गया। लेकिन कठिनाइयां हमारे इरादे को न बदल सकी जैसा
की कहावत है, "जहाँ चाह वहाँ
राह"!! पीठ पर लदे पिट्ठू को मैंने आगे पेट की तरफ लाद लिया जिससे सर्दी से
बचने का समाधान तो हो गया। दस्ताने के जगह एक हाथ मे रुमाल लपेट लिया और दूसरे हाथ
मे प्लास्टिक की पन्नी लपेट ली जिसमे कुछ मठरी खाने के लिए रखी थी। अब मात्र बरसात
से बचने का साधन नहीं होने के कारण जहाँ बरसात होती वहाँ बाइक को रोक किसी शेड या
छप्पर के नीचे खड़ा हो जाता। ये सोच के कि शायद आगे बरसात और ठंडी हवा से छुटकारा
मिल जाएगा लेकिन हाय रे! "दुर्भाग्य",
मुरैना, धौलपुर,
आगरा मथुरा तो क्या उस दिन मौसम ने नोएडा तक पीछा नहीं छोड़ा।
पिट्ठू और जैकेट से सर्दी तो बच रही थी पर
थोड़ी थोड़ी देर बाद बरसते बादल यात्रा मे व्यवधान पैदा कर रहे थे। मरता क्या न करता
रास्ते मे जहाँ बरसात होती किसी आश्रय का सहारा लेता जाता। आज मै ब्लॉग लिखते हुए
अपनी "गढ़ कुढ़ार" की उस आदर्श बाइक यात्रा का स्मरण करता रहा जिसकी आज मै नोएडा जाते समय कल्पना कर रहा था। (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/12/blog-post_11.html)। पर नोएडा की
ये यात्रा मेरी कल्पना और आशा के विपरीत थी लेकिन यात्रा फिर भी जारी थी। रुकते-रुकाते
जैसे तैसे यात्रा के पहले पढ़ाव मुरैना मे वन विभाग की जांच चौकी पर पुनः
बरसात के कारण आश्रय के साथ चाय पान किया। धौलपुर शहर मे बने फ़्लाइ ओवर को छोड़ कर
मैंने पुल के नीचे का रास्ता पकड़ा ताकि यदि बरसात हुई तो आश्रय की तलाश के लिए
यहाँ वहाँ न भटकना न पड़े। बार बार रुकने के कारण अनुमानित समय से बाइक यात्रा काफी
पीछे चल रही थी पर चिंता इसलिए नहीं थी क्योंकि जैसे जैसे यात्रा मे अवरोध के कारण
बिलंब हुआ, मैने ट्रेन को भी उतना ही लेट चलने की सूचना घर पर
देता रहा। आगरा शहर की भीड़ भाड़ से बचने के लिये शहर मे न जा कर बाईपास का निर्णय था तो ठीक पर पूरे
बाईपास पर कहीं आश्रय स्थल नहीं था और यदि वाहन के पंचर या अन्य मरम्मत की जरूरत
पड़े तो वह यहाँ उपलब्ध नहीं थी। मथुरा के बाद राजमार्ग पर स्थित एक होटल मे
गरमा-गरम रोटी और दाल ने एक बार फिर से एक नई स्फूर्ति और ऊर्जा से भर दिया ताकि
शेष बची यात्रा भी पूरी की जा सके।
इस यात्रा की एक अनोखी और उत्साहित करने
वाली एक बात और थी कि पूरे राष्ट्रीय राज मार्ग पर स्थित किसी भी टोल प्लाज़ा पर
टैक्स नहीं देना पड़ा क्योंकि सरकारी नीति के तहत दुपहिया वाहनों पर कोई टोल टैक्स
नहीं था। सरकार की इस नीति की प्रशंसा तो होनी ही चाहिए। अब तक पाँच बज चुके थे
मुझे यात्रा करते हुए नौ घंटे हो चुके थे। नोएडा मे कुछ रास्ता भटकने के बाद मै घर
पहुंचा जो महा नगरों मे आम बात है। हेलमेट और बाइक से घर आने की कहानी भी ये कह कर
बनाई जा चुकी थी कि "रेल्वे स्टेशन से बाइक की डिलिवरी लेकर ही मै घर पहुँच
रहा हूँ"। लेकिन कहते है न कि "एक झूठ को बोलने के लिये सौ झूठ बोलना पड़ता है"!! घर पहुँचने पर मेरे
बड़े भाई साहब ने उड़े हुए बाल, लाल आँखों के
बारे मे जब पूंछा तो बताया कि बाहर मौसम बहुत खराब है क्योंकि अभी मोटरसाइकल से
निजजामुद्दीन स्टेशन से आ जो रहा हूँ। लेकिन न जाने किसी काम से घर की स्टील अलमिरा मे बाइक की आर॰सी॰ देख मेरे छोटे
बेटे ने वहीं से चिल्ला कर कहा कि "पापा
झूठ बोल रहे है", "बगैर आरसी
के बाइक ट्रेन मे बुक हो ही नहीं सकती"??
वे ग्वालियर से ही मोटर साइकल से यहाँ नोएडा आये!!
और इस तरह लगभग 9-10 घंटे से चल रही मेरी
झूठी ट्रेन यात्रा का पर्दाफाश हो गया। लेकिन ग्वालियर-नोएडा बाइक की यात्रा
कष्टदायी तो थी पर यादगार मोटर साईकल यात्रा थी। मुझे उम्मीद है इस यात्रा मे आयी
परेशानी और कठिनाइयों के "सबक" हमारी मोटर साइकल से मनाली-लेह यात्रा के
काम आएंगे!! ठीक है न!!
विजय सहगल


