शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

बाजी राऊत

 

"बाजी राऊत"




जैसा कि मै अनेकों बार उल्लेख कर चुका हूँ कि विविध भारती की प्रातः कालीन सेवा के  सुबह लगभग छह से साढे आठ तक के कार्यक्रम मेरी दिनचर्या का अभिन्न अंग रहे है, फिर चाहे मेरे युवा काल मे इंटर मीडियेट या स्नातक का विध्याध्यन का समय रहा हो या अजीविका हेतु बैंक सेवा मे  प्रवास के दौरान  लखनऊ, सागर, ग्वालियर, पोरसा, रायपुर, भोपाल  या दिल्ली मे पदस्थापना रही हो। मौसम के अनुसार समय दस पंद्रह मिनिट आगे पीछे बेशक रहा हो पर उन दिनों जब ट्रंजिस्टर ही श्रव्य माध्यम के एक मात्र हिस्सा थे या आज आधुनिक तकनीकि के उन्नत मोबाइल मे एफ़एम  रेडियो के माध्यम से विविध भारती की उपलब्धता। विविध भारती की प्रातः कालीन सेवा मेरी ज़िंदगी का आज भी एक अहम हिस्सा है।

1998 मे मै रायपुर से जगन्नाथ पुरी की यात्रा के दौरान मै अपनी कार से  उड़ीसा राज्य के ढेंकानल कस्बे से गुजरा था।  आज 24 साल बाद ढेंकानल एक बार फिर से याद आयेगा ऐसा मैंने सोचा न था। भारत की आज़ादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत पिछले कई सप्ताह से सोमवार और मंगलवार को विविध भारती अपने प्रातः आठ बजे के न्यूज़ बुलेटिन पर भारत की स्वतन्त्रता से जुड़े अज्ञात सेनानियों पर एक सवाल पूंछती है? जिसका उत्तर भी अगले दिन के समाचार बुलेटिन मे विजेता श्रोता के नाम और साक्षात्कार के साथ उद्घोषित करती है। 21 फरवरी 2022 को  मेरे  प्रातः भ्रमण के दौरान के सवाल के अंतर्गत उड़ीसा के उस सबसे कम उम्र के वीर बालक का नाम पूंछा गया था, जिसने अंग्रेज़ सिपाहियों को अपनी नाव से, नदी के पार ले जाने से मना कर दिया था। आज जब ढेंकानल के उस बारह वर्षीय  बालक "बाजी राऊत" के बारे मे सुना तो मन उस वीर बालक के सम्मान मे स्वतः ही झुक गया। काश 1998 मे इस सबसे छोटे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और सबसे कम उम्र के शहीद सेनानी का नाम सुना होता तो मै ढेंकानल के नीलकंठ गाँव अवश्य जाता!! वीर बालक "बाजी राऊत" ने अंग्रेज़ सिपाहियों के आतंक, अत्याचार और जुल्म ज्यादती  के बारे मे जानने के बावजूद उनके आदेश को 11 अक्टूबर 1938 को  बारह वर्ष की उम्र मे अपनी  निर्भीकता और निडरता से मना कर दिया।  वीर बालक बाजी निश्चित ही अपने शारीरिक बल से परे अपने बौद्धिक और मानसिक संकल्प, देश प्रेम तथा अपने आत्मसम्मान के चलते शूरवीरता और साहस की साक्षात प्रतिमूर्ति थे। जिसने अंग्रेज़ आतताइयों को साहस पूर्वक अपनी नाव से  ढेंकानल के नीलकंठपुर घाट से  गाँव   मे बहने वाली ब्राह्मणी नदी के पार छोड़ने के उनके आदेश को मानने से इंकर कर दिया!! बाजी ने अंग्रेजों के जुल्म और अत्याचार के किस्से को सुन रखा था, बाजी राऊत उर्फ वैजा ने न केवल अंग्रेज़ सिपाहियों के नदी के पार  उतारने के आदेश की अवज्ञा की बल्कि कहा, कि तुम लोग हमारे देश और गाँव के लोगो पर अत्याचार और दुराचार करते है, मै तुम्हें अपनी नाव से अपने गाँव ले जाने नहीं दूँगा।

"बाजी राऊत" जैसे नन्हें बालक द्वारा अंग्रेज़ सिपाही की इस अवज्ञा को अपनी तौहीन मानने वाले उस कायर अंग्रेज़ सिपाही  ने अपनी मर्दांगी, बल और बहदुरी का प्रदर्शन उस छोटे निहत्थे बालक के सिर पर अपनी बंदूक की बट से प्रहार कर किया!! अपनी बुज़दिली और पौरुषहीन भीरुता के कुत्सित कृत को उस अंग्रेज़ सिपाही ने एक बार पुनः अंग्रेज़ो की  बदनीयति, बेईमानी और बदइंतजामी को ही दर्शाया। अंग्रेज़ सिपाही की बंदूक की बट के प्रहार लहूलुहान बालक "बाजी राऊत" ने चिल्ला चिल्ला कर अपने गाँव के लोगो को चेतावनी देकर सचेत कर दिया कि अंग्रेज़ सिपाही उनके गाँव मे घुसने का प्रयास कर रहे है! अति रक्त स्राव के कारण वीर बालक बाजी राऊत अंग्रेज़ो से लोहा लेते हुए देश के लिए वीरगति को प्राप्त हो गए और भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास मे सबसे कम उम्र के स्वतन्त्रता सेनानी और सबसे कम उम्र के शहीद के रूप मे अपना नाम  स्वर्ण अक्षरों मे अमर कर दिया। धन्य है वे माता-पिता और धन्य है ढेंकानल के नीलकंठपुर गाँव की वो धरा जिसने वीर बाजी राऊत जैसे वीर बालक को जन्मदिया। अपने मन मे ढेंकानल के नीलकंठपुर की उस वीर धरा के दर्शन करने की अभिलाषा मन मे लिए जब पता चला कि आज भी  हर वर्ष 11 अक्टूबर को नीलकंठपुर गाँव के लोग बाजी राऊत के जन्मदिन पर उनके बलिदान को याद कर सभा का आयोजन करते है। 

आज जब आकाशवाणी के विविध भारती पर उक्त प्रसंग को सुना तो मुझे लगा कि भारत की स्वतन्त्रता के संघर्ष का इतिहास उतना ही नहीं है जो हमे अब तक हमारे पाठ्यक्रम मे  बताया और पढ़ाया गया? छोटे छोटे गाँव और कस्बों मे छुपे हमारे स्वतन्त्रता संघर्ष के इतिहास को एवं स्वतन्त्रता के छुपे सेनानियों को  आज सभी के सामने लाने की आवश्यकता है ताकि भारत की स्वतन्त्रता के इतिहास का सच देश के सामने आ सके। आकाशवाणी का समाचार सेवा  प्रभाग इस काम को बखूवी कर रहा है, जिसका हमे गर्व है।    

वीर बालक "बाजी राऊत" को हार्दिक नमन।    

विजय सहगल

शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

बाबा का मुट्टा

"बाबा का मुट्टा"






अस्सी के दशक तक हर वर्ष स्कूल के ग्रीष्म अवकाश मई जून मे प्रायः हमारी उम्र के बच्चों मे पतंगबाजी का महत्वपूर्ण स्थान रहता था। शाम होते ही बच्चो के झुंड अपनी अपनी छत्तों पर चढ़ कर पतंग उड़ाने का आनंद लेते थे। पतंग को ऊंचे से ऊंचे ले जाने का जुनून रहता था। पतंग के माध्यम से सन् 1749 मे बेंजामिन फ्रेंकलिन द्वारा  तड़ित चालक के आविष्कार के बारे मे हम बच्चे किताबों मे पढ़ ही चुके थे अतः  नये नये प्रयोग पतंग के साथ करते रहते। पतंग मे पुंछल्ला लगा कर उढ़ाना एक मुख्य सगल था। पुंछल्ला कभी कागज और कभी कपड़े को फाड़ कर लगाना सामान्य बात होती लेकिन जब हवा तेज होती तो पुंछल्ला दस-पंद्रह फुट से भी ज्यादा हनुमान की पूंछ  की तरह लंबा होता, कुछ बच्चे इस से भी ज्यादा लंबा पुंछल्ला लगा मानो, पुंछल्ले की प्रतियोगिता मे अपना नाम "गिनी बुक ऑफ वर्ल्ड रेकॉर्ड" मे दर्ज़ कराने की दौड़ मे शामिल हों। ऐसा शायद मेरे शहर झाँसी सहित देश के सभी शहरों और कस्बों मे पतंग बाजी देखने को मिलती थी।      

पतंग उड़ाने मे प्रायः एक सहायक की जरूरत तो पड़ती ही थी। एक पतंग उड़ता तो दूसरा चरखी पकड़ डोर को ढील दे कर पतंग को आकाश मे ऊंचा उड़ाने मे करता या पतंग की डोर को  बापस खींचने पर धागे को चरखी मे लपेटता। ये सार्वभौमिक सत्य था कि पतंग मे सहायक का काम करने वाला छोटा, कमजोर और दबा कुचला होता फिर वह चाहे रिश्ते मे छोटा भाई हों, मित्र या पड़ौसी। एक बात और भी सच थी कि पतंग के कटने, पेड़ या  बिजली के तारों मे उलझने, फटने  या पतंग के न उड़ पाने के सारा दोष  हमेशा सहायक के मत्थे मढ़ दिया जाता!! निश्चित तौर पर बच्चों मे  इस दौरान कहा सुनी, लड़ाई झगड़ा और कभी कभी मार पिटाई भी आम बात थी, जो अगले दिन पतंग उड़ाने के दौरान  सामान्य हो जाती थी। पतंग के लिए आवश्यक हवा न चलने पर बच्चे उन दिनों बच्चे चिल्ला चिल्ला कर एक टोटका कहते "चील-चील हवा चलाओ, बर्ना तेरा अंडा फोडुंगा"!!  

"कटी  पतंग" को लूटने के लिए पतंग के पीछे भागना, एक छत्त से दूसरे के घर की छत्त को फाँदना सामान्य बात थी। बगैर किसी जोखिम की परवाह किए सिर्फ एक मकसद था किसी भी तरह पतंग को कब्जे मे लेना। अघोषित नियम के तहत जिस बच्चे का हाथ पतंग मे पहले लग जाता दूसरे बच्चे मुंह टापते रह जाते।   

मैंने समाचार पत्रों मे एक बार अनेकों पतंगो को एक साथ उड़ाने के बारे मे पढ़ा था। मुझे याद है कि कुछ नया करने के मेरे स्वभाव के कारण एक बार मैंने बचपन मे पाँच-छः पुंछल्ला लगी  पतंगों को जोड़ कर एक साथ उड़ाया था। जो मैंने अपने शहर मे कभी नहीं देखा। कुछ लोग पतंग मे मोमबत्ती आदि लगा रात मे भी उड़ाते थे। पतंग के उड़ाने मे माँझा का एक महत्वपूर्ण भूमिका तो रहती ही थी पर कुछ लोग जो पेंच लड़ाने के शौकीन होते, माँझे की जगह बिजली के ताँबे का तार इस्तेमाल करते, कुछ लोग दरी मे इस्तेमाल होने वाले मोटे धागे का उपयोग करते  ताकि उनकी पतंग न कटे। प्रतिद्वंदी की पतंग को काटने पर "वो काटा" का शोर समूह मे गूंजने लगता। पतंग उड़ाते मे यदि कोई पतंग कट फट जाती तो उसे जोड़ने की जुगाड़ मे आटा घोल लेई बनाई जाती, घर मे चावल हों तो उससे भी काम चलाया जाता। घर मे चावल न हों तो पड़ौसी के यहाँ चावल की पूंछ परख होती। लवेरे के फल या उबले आलू से भी पतंग की मलहम पट्टी कर उसे फिर से उड़ाया जाता। पतंग की बाँस से बनी तीर कमान भी यदि कभी टूट जाती तो एक अन्य छोटी बाँस की तीली को दोनों टूटे सिरों के बीच जोड़ हड्डी जोड़ विशेषज्ञ की तरह जोड़ दिया जाता। पतंग को ठीक कर पुनः उड़ाने मे कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जाती।     

सैकड़ों तरह की रंगीन कागजों से बनी एक रंगी, दो रंगी या बहु रंगी पतंगे आकाश मे चारों तरफ दिखाई देती जो पूरी तरह एक ही आकार अर्थात वर्गाकार ही होती। झाँसी मे एक पतंग साज़ थे  जिनकी पतंगों जा आकार  सामान्य पतंगों से हट कर था। झाँसी मे "बाबा का मुट्टा" के नाम से मशहूर इनकी पतंग को हम लोग "मुट्टा" कहते थे। जहां सामान्य पतंगे वर्गाकार होती पर बाबा की पतंग अर्थात "मुट्टा" की दायें-बाएँ की बांस  की कमान के कोने समकोण न होकर  कुछ गोलाकार लिए होते जो इनकी पतंग की पहली पहचान थी। एक विशेषता इस "मुट्टे" की और थी कि बाबा की हर पतंग पर चाहे वह एक आने की छोटी पतंग हो या आठ आने की  बड़ी, पतंग के ऊपरी हिस्से मे आँखों के आकार का दूसरे रंग का कागज जरूर चिपकाया जाता जिसे "पक्खा" कहा जाता था और पतंग के निचले सिरे पर एक त्रिभुजाकार कागज चिपकाया जाता जो पतंग की खूबसूरती को और भी बढ़ा देता था। ये "पक्खे" एवं त्रिभुजाकार कागज  बाबा की पतंग की दूसरी पहचान थे। आसमान मे सैकड़ों पतंग के बीच बाबा का मुट्टा अपनी अलग आन-बान और शान के साथ  आकाश मे बड़ी बड़ी आँखों के साथ बड़े इतरा कर एक बादशाह की तरह उड़ता दिखाई देता। बाबा की पतंग के मुरीद झाँसी के हर कोने से सागर गेट स्थित उनके आवास पर आते थे।

आज से 35-40 साल पूर्व की यादों को पुनः ताज़ा करने हेतु, झाँसी शहर के एक कोने मे निवासरत बाबा की पतंग अर्थात "मुट्टा" की तलाश मे दिनांक  15 फरवरी 2022 को मै बाबा उर्फ किशोरी लाल के सागर गेट स्थित घर की ओर बढ़ा। चालीस साल मे गलियों मे हुए बदलाब के बावजूद भी मैंने बाबा के घर को पहचान लिया, जहां कभी मै अपने दोस्तों और बड़े भाई के साथ बाबा के मुट्टा को खरीदने आया करता था। गली-मुहल्ले और आस पास की बसाहट मे हुए जमीन आसमान के बदलाब के बावजूद बाबा का घर जस का तस था। ऐसा लगा कि एक समय झाँसी मे पतंग बनाने मे अपनी अलग पहचान बनाने वाले किशोरी लाल उर्फ बाबा जी के मकान को "बदलाब" और "विकास" बिना छूए ही गलियों और मुहल्लों से होकर झाँसी शहर से गुज़र गया हो? घर की जिस दलान मे बैठ मैंने दशकों पूर्व बाबा का मुट्टा खरीदा था उस दलान का आधा  हिस्सा जीर्ण सीर्ण हो टूट चुका था। एक ऐसा पतंग साज़ जो खुद भी पतंग बाज़ था जिसकी पतंग बनाने की कारीगरि और माँजा बनाने के हुनर को राज्य का आश्रय मिलना चाहिये था? जिसके हुनर को एक पहचान मिलनी चाहिये थी? बाबा के मुट्टे की कभी एक अलग शान और पहचान थी। इस पहचान को मुंहताज एक पतंग साज़ अपने साथ इस पतंग साज़ी को कौशल को लगता है अपने साथ ले गया!! उनके सुपुत्र श्री मुन्ना जो अपने व अपने परिवार के जीवन यापन के लिए ऑटो चला कर गुजर बसर करते है। लेकिन खुशी थी कि उनके पुत्र बेशक अपने पिता की तरह पतंग का निर्माण तो नहीं कर पाये पर पतंग के व्यवसाय मे अभी भी जुड़े हुए है। उनका कहना था कि सरकार द्वारा यदि कुछ मदद मिले तो वह पुनः अपने पिता के पतंग निर्माण को शुरू कर सकते है। उनकी पत्नी और बच्चे बाज़ार मे बनी पतंग का व्यवसाय अभी भी अपने घर से  कर रहे है।  मुलाक़ात के दौरान श्री मुन्ना ने बताया कि उनके पिता के द्वारा बनाई पतंगे झाँसी मे तो प्रसिद्ध थी ही बल्कि उनके पिता की बनाई पतंगे यूरोप और अमेरिका तक मे प्रख्यात और विख्यात थी। जब मैंने उनसे बाबा की कोई पुरानी पतंग या उसकी फोटो चाही जो उपलब्ध नहीं थी। उनके पुत्र  द्वारा निर्मित "बाबा के मुट्टा" जैसी एक पतंग मिली तो लेकिन बाबा के हाथ जैसी बनावट और सफाई उसमे दूर दूर तक नज़र न आयी।

आज के समय की विकसित तकनीकी और आधुनिक विज्ञान के इन  टीवी, फ़ेस बुक, व्हाट्सप, ट्वीटर जैसे उत्पाद मे पली बढ़ी इस पीढ़ी जो कैंडी और पवजी खेलने मे व्यस्त है। काश!! उनके पाठ्यक्रम  से परे इन पतंगबाजी,  पतंग या "बाबा के मुट्टा" की  गतिविधियों से ऐरो डायनेमिक्स की जानकारी या गुल्ली डंडे और कंचों से न्यूटन के गति के नियम और निशाने बाजी  सीखी  जाती या पहिये चलाने से संतुलन और गति की दिशा समझी जाती पर आज के समय ये अपेक्षा करना असंगत होगा। काश!! अगर आज की पीढ़ी एवं पुरानी पीढ़ी के मनोरंजन के क्रिया कलापों के बीच समंजस्य बैठाया जाए तो बाबा के मुट्टे जैसे हुनर को कायम रक्खा जा सकता है जो आज लुप्त प्राय होने के कगार पर है।

विजय सहगल             


रविवार, 13 फ़रवरी 2022

चोरी का हेलमेट (कहानी)

"चोरी का हेलमेट" (कहानी)




अनवर अली आज एक बहुत बड़े राजनैतिक हैसियत वाले व्यक्ति है। अपने क्षेत्र से विधायक और राज्य सरकार मे मंत्री भी है। राज्य सरकार मे कैबिनेट मंत्री का पद प्राप्त होना उनकी हैसियत और रसूख को दिखलाता है। राजधानी मे बहुत बड़ा बंगला, कार नौकर चाकर के अलावा उनके दैनिक कार्यक्रमों का लेखा जोखा रखने के लिये सरकार ने उनको एक निजी सचिव भी दे रक्खा है। ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा ने उनकी शान मे चार चाँद लगा दिये है।  आज उसके रुतवे और लोकप्रियता से शहर का हरेक आदमी परिचित है। बदलती हैसियत ने उनके मिज़ाज को भी बदल दिया। अब अन्नु मियां, श्रीमान अनवर अली हो गए है। घर के बच्चे जो कल तक गली के नुक्कड़ वाले की चाट खाने के पैसों के लिये अन्नु मियां के निहोरें करते थे आज पाँच सितारा होटलों मे पीज़ा पार्टी आयोजित करते है।   

पर आज से 2-3 तीन साल पहले तक ऐसा नहीं था। अनवर उर्फ अन्नु मियाँ सत्ता के गलियारों मे पोस्टिंग ट्रांसफर के दलाली करते खूमते फिरते और खुरचन से मिले माल से अपनी घर गृहस्थी चलाते थे और शहर मे राजनीति के छुट भैये नेता थे। सभा और जलूस जलसों मे फर्श बिछाना कुर्सी लगाना ही इनका मुख्य काम था। इनकी एक विशेषता और थी ये किसी एक खूटे से कभी नहीं बंधे। आधुनिक भारत की राजनीति के  गुणों मे सर्व गुण सम्पन्न अन्नु मियाँ ने  मौका परस्ती से कभी कोई परहेज  न करने के कारण उन्हे राजनैतिक दलों मे मौके दर मौके मिलते रहे, जिसका उदाहरण आज वे सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुए  सरकार के मंत्री जैसे पद पर आसीन हो लंबे लंबे भाषण और उपदेश राज्य के नागरिकों को पिलाते है। यातायात सुरक्षा सप्ताह मे उनके दिये गये भाषण ने श्रोताओं की बड़ी तालियाँ बटोरी और उनके आम नागरिकों की जान माल के बचाने की सोच की खूब तारीफ की जब उन्होने कहा हर दो पहिये वाहन  चालकों को हेलमेट पहने बिना वाहन नहीं चलाना चाहिये। हेलमेट के बिना वाहन चलाना जान जोखिम मे डालने जैसा है। भले ही हेलमेट चोरी करना पड़े  पर हमे हेलमेट के बिना वाहन नहीं चलाना है!! आप को अन्नु मियाँ की हेलमेट चोरी की बात अजीब लग सकती है, सुनकर मुझे भी अन्नु मियाँ की बात विचित्र और हास्यास्पद लगी थी!!

लोगो ने जब अनवर अली की उस बात के पीछे छुपी सच्चाई को बताया तो हमे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। दरअसल अन्नु मियाँ राजनीति के शुरुआती दिनों मे अपने  एक मित्र खालिद  के साथ अपने अपने वाहनों से एक कार्यक्रम मे गये हुए थे। कार्यक्रम की बापसी मे जैसे ही उन्होने अपनी मोटरसाइकल स्टार्ट की तो यातायात के सिपाहियों द्वारा हेलमेट के बिना वाहनों का चालान बनाते देख चुपके से खालिद का हेलमेट लेकर चालान से बच के तो निकल गये, पर जब खालिद ने जैसे ही अपनी बाइक चलाने के लिये उठाई तो अपना हेलमेट न पाकर यहाँ वहाँ तलाशने की कोशिश की पर आसपास कहीं  उसका हेलमेट नहीं दिखाई दिया। थक हार कर अब खालिद ने बिना हेलमेट के ही घर की ओर रवानगी डाल दी। शायद उस दिन दुर्भाग्य खालिद का पीछा कर  रहा था। एक चौराहे पर एक अनियंत्रित ट्रक ने खालिद को ज़ोर दार टक्कर मार दी। हेलमेट न पहने होने के कारण खालिद के  सिर मे गंभीर चोटे आयी, उसे अस्पताल मे भर्ती कराया गया पर तमाम कोशिशों के बावजूद उसे बचाया न जा सका। पुलिस और डॉक्टर का कहना था कि यदि खालिद उस दिन हेलमेट पहने होता तो पूरी संभावना थी कि दुर्घटना मे उसकी जान न जाती। खालिद के घर वालों ने इस बात को ज़ोर देकर प्रशासन को कहा कि खालिद ने कभी भी  हेलमेट के बिना बाइक नहीं चलाई और उस दिन भी वह हेलमेट लेकर ही घर से निकला था। लगता है किसी नीच, घिनौने और चोर मानसिकता के व्यक्ति ने उसका हेलमेट चोरी कर लिया और जिसके कारण खालिद की असामयिक मौत हो गयी। पुलिस ने गुमनाम व्यक्ति के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज़ कर मामला कायम कर लिया। पर उस हेलमेट की चोरी के सबूत कभी न मिल पाने के कारण चोरी की रिपोर्ट बंद कर दी गयी।

पर खालिद की मौत की सच्चाई अन्नु मियाँ को हुई तो वह आत्मग्लानि से ग्रसित हो गये। वे देश की अदालत से तो बच गये पर अपनी आत्मा की अदालत से अब तक न बच पाये। उनकी आत्मा उन्हे खालिद की मौत के अपराध से उनको मुक्त न कर सकी, और एका एक आज उनके मुँह हेलमेट पहन कर वाहन चलाने की बात कही, "भले ही हेलमेट चोरी का क्यों न हो"!! 

 

विजय सहगल


शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

कोंछा भावर

 

"कोंछा भावर"







मै अपने गृह क्षेत्र झाँसी मे मटकों और घड़ों अर्थात कुम्भ निर्माण के लिये प्रसिद्ध गाँव कोंछा भावर  का स्मरण करता हूँ तो मुझे संत कबीर का निम्न दोहा और यदि इस दोहे को याद करूँ तो गाँव "कोंछा भावर" स्वतः ही याद हो आता है। "कोंछा भावर" गाँव और "संत कबीर" का ये दोहा मेरे मन मस्तिष्क मे ऐसे रच वस गये है कि एक के स्मरण मात्र से दूसरा स्वतः ही याद हो आता है :-

गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है, गढ़ि गढ़ि काढै खोट।

अंदर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

बुंदेलखंड मण्डल मे स्थित कुम्भ (घड़ा) या मटकों के निर्माण के लिये प्रसिद्ध कोंछा भावर जिला झाँसी का एक ऐसा गाँव है जिसके वारे मे बुंदेलखंड क्षेत्र का  शायद ही कोई वृद्ध, नौजवान या बच्चा इस नाम से परिचित न हो? झाँसी शहर से लगभग आठ किमी दूर इस गाँव की विशेषता है कि यहाँ के बने हुए घड़े, मटके एवं मिट्टी के अन्य पात्र का निर्माण यहाँ सदियों से होता आ रहा है। इन मिट्टी के मटकों की एक विशेषता ये है कि पूरी ग्रीष्म ऋतु के दौरान एवं मई-जून मे  गर्मी की  पराकाष्ठा  के दौरान भी मटकों मे भरा शीतल और ठंडा जल, पीने से आत्मा तृप्त और संतुष्ट  हो जाती है जो कदाचित ही फ्रिज के ठंडे पानी से प्राप्त होती हो? आज दिनांक 03 फरवरी 2022 को अपने गृह नगर झाँसी प्रवास के दौरान मेरी यात्रा विशेष रूप से इस कोंछा भावर के मटका निर्माण की जानकारी देखने, समझने, जानने और इस मटका निर्माण से जुड़े उन परिवारों से मिलने की थी, जिसका निश्चय मैंने काफी दिनों से अपने मन मे वसा रक्खा था।

ग्वालियर और कानपुर के राष्ट्रीय राजमार्ग को जोड़ने वाले इस संधि मार्ग पर स्थित ग्राम कोंछा भावर मे प्रवेश करते ही सामान्य गाँव का सा आभास ही होता है। जब एक राहगीर से मटका निर्माण क्षेत्र से जुड़े परिवारों के बारे मे पूंछ तांछ की तो उसने एक पतली सी गली की ओर इशारा करते हुए जगदीश मास्टर से संपर्क करने को कहा। गली मात्र इतनी ही चौड़ी थी कि मेरा स्कूटर ही आसानी से प्रवेश हो सकता था जो सीधे जगदीश मास्टर के दरबाजे पर ही समाप्त होती थी। जगदीश मास्टर तो नहीं मिले पर राजकुमार जी से भेंट जरूर हो गयी जो मटका निर्माण मे रत थे, पर दुर्भाग्य से बोल नहीं सकते थे क्योंकि वे मूक और बधिर थे। कुछ इशारों से और कुछ पड़ौस मे बैठी महिलाओं ने मटका निर्माण के संदर्भ मे कुछ प्रारम्भिक  जानकारी दी। कुछ अधूरी काली मिट्टी की आकृतियाँ अधबनी सी दिखाई दे रही थी मूक श्री राजकुमार जी ने इशारों से समझाया कि आगे इन्हे गोल मटकों के रूप मे ढाला जाएगा।  कुछ और आगे बढ्ने पर मेरी मुलाक़ात एक पढे लिखे नौजवान श्री हरिकिशन प्रजापति उर्फ कल्ली जी से भी  हुई।  जिन्होने  मुझे इस मिट्टी के घड़े और मटकों के निर्माण की विस्तृत जानकारी दी। उन्होने बताया इस "पुरे" या "टोले" मे प्रजापति समाज के ही लोग रहते है वे स्वयं भी इसी समाज से आते है। पूरे मुहल्ले मे मटका, घड़े, गमले का निर्माण हर घर मे किया जाता है। परिवार की महिलाएं समान रूप से इस कार्य मे न केवल दक्ष है अपितु समान रूप से इस मिट्टी के पात्रों के निर्माण मे सहभागी है। अभी पिछले दिनों वर्षात होने के कारण निर्माण का कार्य कुछ धीमा था। हर घर के सामने इन मिट्टी के वर्तनों के निर्माण मे उपयोग होने वाली मिट्टी के ढेर पड़े हुए थे जिनको तैयार कर आगे मटकों के निर्माण मे  उपयोग मे किया जाएगा।  एक सुंदर नवजात खुली हवा मे लेटा था जिसके नजदीक ही एक लंबी मिट्टी के आकार की आकृति अर्धनिर्मित अवस्था मे पड़ी थी जिसे बताया गया कि यह  तंदूरी रोटी बनाने का तंदूर है। हरिकिशन उर्फ कल्ली जी ने कुम्भ निर्माण के उपयोग मे आने वाले मुख्य दो औजारों के भी दर्शन कराये एवं साक्षात जीवंत प्रदर्शन भी कराया। लकड़ी के एक औज़ार जिसे "थप्पी" कहा जाता है लकड़ी के छोटे, गोल हत्थे पर गोलाकार कटोरी नुमा आकृति पर अर्धचंद्राकार रूप मे धँसी आकृति बनी थी और दूसरी पत्थर की चपटी गोलाकार आकृति थी जिसे "पीढ़ी" कहा जाता है। कल्ली ने बताया कि पीढ़ी को घड़े के अंदर से सहारा दे थप्पी से घड़े के बाहर  चोट कर घड़े को गोलाकृति दी जाती है ठीक बैसे ही जैसे संत कबीर दास जी के उक्त दोहे के अनुरूप  "अंदर  हाथ सहार       दै, बाहर बाहै चोट" को चरितार्थ करती पंक्तियाँ लिखी थी। 

मुझे याद है बचपन मे हमारे मुहल्ले के कुछ सेवभावी व्यक्ति और बुजुर्ग गर्मी के मौसम मे कोंछा भावर मे निर्मित आठ-दस बड़े मटके  जिनकी क्षमता लगभग 200-250 लीटर की रही होती मेरे घर के बाहर चबूतरे पर रखवा दिये जाते थे। शाम और रात को उन घड़ों मे हम पड़ौस के सभी बच्चे जितना पानी नलों से आता उसके अतरिक्त कुएं से भी पानी ला कर सभी घड़ों मे पूरी तरह से भरकर रख देते थे। गर्मी की लपट के थपेड़ो से मटकों का पानी एक दम शीतल और ठंडा हो जाता था। बच्चे दिन भर सड़क से आने-जाने वाले राहगीरों को शीतल जल पिला कर सेवा करते। उन दिनों बर्फ एक विलासिता की वस्तु हुआ करती थी लेकिन कोंछा भावर के मटकों से मिलने वाला शीतल जल वर्फ सी ठंडक को भी  मात करता था। जल पीने वालों की संख्या का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता था कि शाम से पहले ही घड़ों का पानी समाप्त हो जाता था। पशु-पक्षियों एवं गाय को भी जल पिलाने के लिये अलग पात्र का भी प्रावधान किया जाता था, इस हेतु पक्षियों के लिये "सकोरे" एवं पशुओं के लिये "ढिकोली" या "नाद" का निर्माण भी कोंछा भावर मे किया जाता था। दही जमाने के लिए मिट्टी की कुढ़ी का इस्तेमाल सारे हलवाई एवं दूध डेयरी वाले आज भी करते है। शीतल जल पिलाने को एक पुण्य धार्मिक कार्य मानने के  संस्कार हम बच्चों को बचपन से ही परंपरागत रूप से मिले जिनका महत्व आज भी कम नहीं हुआ है।

हमे याद है शहर मे मटकों का व्यापार करने वाले व्यापारी कोंछा भावर के कुम्हार परिवारों द्वारा साइकल से लाये मटकों को क्रय करते थे पर जब मांग बढ़ती तो शहर के व्यापारी साइकल एवं हाथ ठेलों से मटकों को गाँव से ही क्रय कर शहर ले आते। "नूरा" नाम का एक व्यापारी तो अपने हाथ ठेले पर 4x6 की एक लाइन बना कर एक के उपर एक 7-8 लाइन लगा कर एक बार मे लगभग 150-160 मटकों को  लेकर शहर आता था। उसके  घड़ों से भरे ठेले पर एक बार मे लगभग डेढ़ सौ मटकों को इस तरह लाना अपने आप मे सर्कस के  अजूबे से कम नहीं होता था, जिसे रास्ते मे सभी लोग आश्चर्य और कौतूहल से देखते थे।

मै समझता था सदियों से इतने प्राचीन मिट्टी के पात्र बनाने वाले ये प्रजापति परिवार समृद्धि की मिसाल होंगे लेकिन मेरा सोचना सर्वथा त्रुटिपूर्ण और मिथ्या था। 45-47 डिग्री के ज्वलंत तापमान पर क्षेत्र के अमीर-गरीब जैसे हर वर्ग के लोगो को पीढ़ी दर पीढ़ी शीतल जल पिलाने वाले, मटकों के इन निर्माताओं का दर्द जब हरिकिशन उर्फ  कल्ली जी से जाना तो मन उनके समुदाय के प्रति करुणा और व्यथा से द्रवित हो गया। उन्होने बताया कि पिछले दिनों मिट्टी के खनन हेतु सरकार ने जो भूमि उनके समुदाय को आवंटित की पर जिसके  चारों ओर  सम्पन्न और बलशाली लोगो की निजि जमीन से घिरा  होने के कारण वहाँ तक जाने का कोई मार्ग नहीं है।  अतः  पहुँच मार्ग के अभाव मे उक्त भूमि से खनन न हो पाने के कारण  अनुपयोगी पड़ी है। अतः  घड़ों, मटकों के निर्माण मे आने वाली मिट्टी मिलने मे अत्यंत ही कठिनाई होती है। चोरी छिपे एक-एक दो-दो बोरी मिट्टी को रात के अंधेरे मे लाना पड़ता है।  निरंतर शासन के लोगो की चिरौरी करनी पड़ती है। भूमिहारों  से प्रायः धौंस-धपट के कारण परंपरागत मटका निर्माण मे अत्यंत कठिनाई आ रही है। किसी तरह जीवन यापन हो रहा है। अधिकतर महिलाएं एवं बच्चे अभाव की ज़िंदगी जी रहे है।  टोले के कच्चे अध बने मकान और रस्तों को देख ये अनुमान लगाना कठिन न था कि यहाँ का रहन सहन अत्यंत दीन और पिछड़ा हीं था। अत्यंत  पतली एवं संकरी गलियों के इस टोले मे एक भी घर ऐसा नहीं दिखा जिसे संपन्नता की श्रेणी मे रक्खा जा सके।

आज के इस भौतिकता और तकनीकि के दौर मे इन  मिट्टी के जल पत्रों की प्रांसांगिगता कम अवश्य हो गयी है पर समाप्त कदापि नहीं लेकिन यदि सरकार और शासन ने कोंछा भावर के मटके और घड़ों के निर्माताओं को तकनीकी एवं आर्थिक आश्रय नहीं दिया तो आने वाले समय मे शायद कोंछा भावर मे परंपरागत रूप से मिट्टी के मटकों और घड़ों के उध्योग विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाएगा एवं कोंछा  भावर के ठंडे पानी के मटके का निर्माण एक कहानी मात्र बनके न रह जाये।

विजय सहगल