रविवार, 30 जनवरी 2022

चाण्यकपुरी ऑफ ग्वालियर नॉट देल्ही

 

"चाण्यकपुरी ऑफ ग्वालियर नॉट देल्ही"









एक दिन ऐसे ही प्रातः भ्रमण पर जब मैंने एक नौजवान को जनवरी की कड़ाके की सर्दी मे एक कचरे के ढेर को फावड़े से साफ करते देखा। मैंने पूंछने पर उस लड़के ने अपना नाम विक्की बताया था। जब मेरे सहित वहाँ से गुजर रहे लोग सिर से पैर तलक कपड़ो मे ढके आ-जा रहे थे, वह नौजवान पानी से सरावोर कचरे को फावड़े से इकट्ठा कर कचरा गाड़ी मे डाल रहा था। मुझे स्वतः ही शांतिकुंज हरिद्वार मे  पूज्य गुरुदेव प॰ श्री राम शर्मा, आचार्या जी को  वो संदेश याद हो आया कि "आपकी पढ़ाई का कोई महत्व नहीं रह जाता है, यदि आपके द्वारा फैका गया कचरा अगली सुबह कोई अनपढ़ व्यक्ति उठाता है"। "शिक्षित है हम, तो समझदार भी बने"।

जी हाँ मै चर्चा कर रहा हूँ चाण्यक्पुरी की पर दिल्ली की नहीं ग्वालियर की। जहां एक तरफ  दिल्ली के चाण्यक्पुरी देश की शानदार कॉलोनी मे से एक है और जहां देश और दुनियाँ के कुशल  राजनयिक, कूटनैतिज्ञ निवासरत् हैं पर ठीक इसके विपरीत ग्वालियर की इस चाण्यक्पुरी को सबसे निकृष्ट आवासी कॉलोनी कहा जाए तो अतिरंजना न होगी। इस अतिशयोक्ति के लिए जिम्मेदार  नगर निगम नहीं अपितु यहाँ के निवासी स्वयं है जो घर घर कचरा एकत्र करने आने वाली गाड़ी आने के बावजूद कुछ लोग कचरा नाले और स्वनिर्मित घूरे पर डालते है और अधिकांश लोग तटस्थ रह उनके कुकृत्य पर मौन रहते है। इन कुछ अधम सोच के रहवासियों की वजह से इस कॉलोनी को नरक बनाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी। कचरे को सड़क और नालों मे डालने वाले इन निवासियों की मानसिक सोच एक शोध का विषय हो सकती है। शासन को मनोवैज्ञानिकों से आग्रह कर इस पर वृहद विषय मे अनुसंधान कराना चाहिये? इन तटस्थ और मौन रहने वालों पर भी श्री रामधारी सिंह दिनकर की निम्न पंक्तियाँ बड़ी सटीक और सामयिकहै:-

"समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध" 
"जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध"

 

दुर्भाग्य देखिये कि नगर निगम ग्वालियर द्वारा  जब घर घर से कचरा एकत्रित करने वाली गाड़ी लोगो के दरबाजे पर भेजी जा रही है तब इस कॉलोनी के कुछ रहवासियों के बारे मे क्या राय बनाई जानी चाहिये? घर घर कचरा एकत्रित करने वाला वाहन आने के बावजूद ये हाल है तो बगैर कचरा एकत्रित करने वाले समय क्या हाल रहता होगा। ये हाल तब है जब इस कॉलोनी मे अधिकांश रहवासी उच्च विप्रकुल एवं धनसंपन्न समृद्धशाली दुग्ध उत्पादक खेतिहर है। अधिसंख्य रहवासी धर्मपरायण होने के बावजूद देवालय के पास ही कचरा फेंकने मे नहीं झिझकते?  हमारे विचारों और अवधारणाओं  मे इतना अद्धोपतन क्यों?  इस कॉलोनी के कुछ  लोग  उनके घर के दरवाजे पर कचरा गाड़ी  आने के बावजूद कचरा जहाँ तहाँ, नाले या स्वनिर्मित कचरा घर मे डालते है। इस कॉलोनी के धर्मपरायण निवासी बिना इस बात की परवाह किए कि सड़क के पार कॉलोनी वासियों के श्रद्धा और आस्था का केंद्र एक मंदिर भी है। भारतीय कूटनीति के पितामह जिन्होने  कूटनीति का महान ग्रंथ, "चाणक्य नीति" की रचना की, उनके नाम से रखी इस कॉलोनी "चाणक्य पुरी ग्वालियर" को देख उनकी आत्मा भी चित्कार कर कॉलोनी के हालात पर रो रही होगी। जब कॉलोनी के रहवासी सकारात्मक सोच के साथ संगठित न हो एक दूसरे के विरुद्ध "कूट" (छद्म) नीति रचते हो?

गाय जैसे पवित्र पशु को  माता के रूप मे पूजने वाले हम गायों को श्रद्धा सम्मान की दृष्टि से देखते और पूजते है पर वास्तविक आचरण मे हम कितने निष्ठुर और अदयालु है कि सब्जी, फल और बचे हुए भोजन को भी प्लास्टिक की थैलियों मे भरकर सड़क या कचरे घरों मे फेंक देते है और उसमे भी ऐसी ध्रुव गांठ बांधेंगे जिसे जानवर तो क्या आदमी भी सहजता से नहीं खोल सकता। खाने की लालच मे गाय इन प्लास्टिक की थैलियों से भोजन निकालने के निरर्थक प्रयास मे असफल होने के बाद प्लास्टिक की थैली सहित ही उस खाने को खा कर अकाल ही मौत के मुंह मे चली जाती है। प्लास्टिक की थैली मे खाने की वस्तुओं को गांठ बांध फेंकने की इस सर्वदर्शी  समस्या से ये कॉलोनी भी बुरी तरह पीढ़ित है। क्या हम इतना भी नहीं कर सकते कि बचे हुए भोजन, सब्जी, फल जैसे पदार्थों को प्लास्टिक की थैली से मुक्त कर एक स्थान पर डाल दे ताकि गाय उन भोज्य पदार्थों को सरलता और सहजता से खा सके? इस संबंध मे दिनांक 21 मई 2021 को मेरे ब्लॉग  "संकरन" पर भी आप  दृष्टिपात कर सकते है। (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/05/blog-post_29.html )॰ 

पिछले दिनों 18 जनवरी 2022 को नगर निगम के कमिश्नर सहित शासन के उच्च अधिकारियों ने प्रदेश मे शहरों की सफाई रैंकिंग मे पिछड़ने पर चर्चा की। जब गाड़ी पर तैनात सफाई कर्मी "विक्की" ने कहा कि हमारे अधिकारि ऐसे लोगो के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करते जो कचरा, गाड़ी मे न डाल यहाँ वहाँ फेंकते है। मैंने ऐसे कुछ नागरिकों से कचरा, गाड़ी मे न डालने का कारण पूंछा तो उनके उत्तर सुन आश्चर्य मिश्रित आक्रोश भी हुआ जब उन्होने कहा कि हम सुबह गाड़ी आने के पूर्व स्नान कर लेते अतः फिर कचरे को कैसे छू सकते है?  इसलिए कचरा घूरे, सड़क या नाले मे डाल देते है। मेरा मानना है कि यदि नगर निगम, ग्वालियर  के कमिश्नर महोदय  हर घर के सामने एक सफाई कर्मी भी खड़ा कर दे तो ग्वालियर की रैंकिंग सफाई के मामले मे अच्छी नहीं हो सकती जब तक कि ऐसे नागरिकों के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही न  करे जो कचरा गाड़ी आने के बावजूद कचरा सड़कों और नालों मे डालते है। न जाने क्यों हम अंग्रेजों की लाठी डंडे की नीति के बिना कानून के पालन मे विश्वास नहीं करते? अस्सी प्रतिशत सकारात्मक सोच के रहवासियों पर बीस प्रतिशत नकारात्मक सोच के व्यक्ति हावी हो इस गंदगी फैलाने के लिए उत्तरदायी है जो सरकार की स्मार्ट सिटी योजना मे पलीता लगा रहे है। अतः इन नकारात्मक और "स्नान" के बाद गाड़ी आने जैसे  दक़ियानूसी कुतर्क की आड़ लेकर गंदगी फैलाने वाले नागरिकों के विरुद्ध जब तक दंडात्मक कार्यवाही नहीं की जाएगी तब तक ग्वालियर की सफाई रैंकिंग मे सुधार और विकास संभव न हो सकेगा।

ऐसा नहीं की चाण्यक्पुरी मे सब तरफ नकारात्मक सोच के नागरिकों का ही प्रादुर्भाव है, चाण्यक्पुरी के निश्चयात्मक सोच के लोग अपनी तरह से प्रयास तो कर रहे है पर प्रोत्साहन एवं संगठित न होने  के आभाव मे प्रभावशाली भूमिका नहीं निभा पा  रहे है। यदि शासन उन्हे पृष्टभूमि मे थोड़ी सी ऊर्जा प्रदान कर उन्हे वाढवा दे तो इस समस्या का समाधान संभव है।        

चाण्यक्पुरीपुरी से चंद कदम की दूरी पर स्थित न्यू दर्पण कॉलोनी के निवासी जब वहाँ के  बच्चों को सफाई आदि के लिये प्रोत्साहित करते है तो उसके सुंदर परिणाम देखने को मिलते है। इस कॉलोनी के बच्चों और महिलाओं ने 26 जनवरी 2022 "गणतन्त्र दिवस" के राष्ट्रीय पावन पर्व पर मिलकर कॉलोनी मे स्थित कमांडेंट यू॰ एस॰ रावत पार्क  को स्वयं अपने हाथों से झाड़ू लगाकर सफाई का काम किया जो एक प्रसंशनीय कार्य है इसका  जितना भी अभिनंदन और अभिवादन किया जाये कम है। इन बच्चों और महिलाओं ने, न केवल पूरे मैदान का कचरा साफ किया बल्कि कचरे को थैलियों मे एकत्रित कर अगले दिन कचरा गाड़ी मे डाल कर एक आदर्श द्रष्टांत प्रस्तुत किया।  यहाँ के बच्चों के पार्क की सफाई का  एक आदर्श उदाहरण  क्या चाण्यक्पुरी के उन  चंद नकारात्मक सोच के निवासियों  के लिये  प्रेरणा का स्त्रोत  नहीं बन सकता?     

 

विजय सहगल

गुरुवार, 27 जनवरी 2022

कुंठों बाई की बरोसी (बाल कहानी)

 

"कुंठों बाई की बरोसी" (बाल कहानी)





कुंठों बाई गढ़मऊ गाँव की रहने वाली थी। सर्दियों मे वह शाम होते ही बरोसी (सिगड़ी की तरह आग जला कर हाथ सेंकने  का मिट्टी से बना पात्र जो बुंदेलखंड मे "बरोसी" के नाम से प्रचलित है) मे आग जला अपने हाथ सेंका करती। फूस-माघ की कड़क सर्दी मे जब मावठ की वर्षात होती तो घर के बाहर बने छप्पर के तले कुंठों बाई अपने नाती पोते के साथ ठंड से बचने के लिए दिन का अधिकतर समय बरोसी मे आग जला अपने हाथ सेंकती। छप्पर मे मुहल्ले के सारे  बच्चे जो कुंठों बाई को प्यार से दादी कहते और पड़ौसी की महिलाएं भी जो कुछ उन्हे अम्माँ कहती और कुछ  बच्चों के सुर से सुर मिला दादी कह कर ही संबोधित करती और  छप्पर  के नीचे उनके साथ बैठ किस्से कहानी और घर बाहर की बाते करती। इस साल की सर्दी  तो हाड़ काँपा देने वाली थी। बरोसी से दूर होते ही  दांत किट-किटाने लगते। अतः गुंठों बाई के दिन की शुरुआत बरोसी मे छोटी छोटी लकड़ी से आग जलाने से शुरू होती और देर रात राख मे दबे अंगारों को निकाल कर वुझाने पर ही समाप्त होती। इस दौरान उनके प्रातः की चाय, नाश्ता दोपहर और रात का खाना  भी बरोसी के चारों ओर बैठ कर ही होता। इस बहाने घर के लोग, बच्चे और पड़ौसी कुंठों बाई के साथ गपियाते हुए दुनियाँ जहान की बाते करते और  कहानियाँ सुनते।   

घर मे एक चपलून चूहा भी दिन भर दादी के आस पास चक्कर लगता, और जैसे ही कहीं कोई काम से उठता तो मौका पाकर बरोसी के पास पड़े रोटी-सब्जी के दुकड़ों को चट कर जाता। बच्चे भी चपलून चूहे को देख खुश होते। कभी गुड़ की ढेली या अन्य मिठाई के टुकड़े  को खाकर चपलून की आत्मा तृप्त हो जाती तो वह पीछे के दो पैरों  पर खड़े हो अपनी पूंछ हिला कर नाचता जिसे देख बच्चे खुश होकर ताली बजाते। 

चपलून चूहे के दिन अच्छे कट रहे थे कि एक दिन जखौरा गाँव की बब्बन बिल्ली ने आकर कुंठों बाई के घर को अपना आश्रय बनाया क्योंकि उसकी नियत चपलून चूहे पर थी। बब्बन बिल्ली ने अपना डेरा कुंठों बाई के घर के पास ही बनाया और चपलून चूहे की तलाश मे मौके की ताक  मे रहने लगी। बब्बन बिल्ली गाँव के दूसरे घरों मे भी घुस कर घरों का दूध और खाने पर भी अपना हाथ साफ कर देती।

एक रात चपलून चूहे का आमना सामना बब्बन बिल्ली से हो गया। चपलून चूहा रात मे खाने की तलाश मे बरोसी के आस पास मंडरा रहा था वहीं मौके की ताक मे बैठी बब्बन बिल्ली, चपलून चूहे को चट करने की फिराक मे थी। अब क्या था चपलून चूहे ने बब्बन को देखते ही बरोसी से दूर छलांग लगाई, बिल्ली भी उच्छल कर चूहे के ऊपर झपटी। पर बब्बन बिल्ली जब तक चालाक चपलून के ऊपर झपटती चपलून तुरंत ही अपने बिल मे घुस गया। इस आपा-धापि और दौड़-भाग मे बब्बन बिल्ली ने दादी की बरोसी के ऊपर छलांग लगाई तो इस उछल कूंद मे  दादी की  बरोसी पर गिरने के कारण बरोसी कई टुकड़ों मे टूट गई।

जब सुबह गाँव के लोगो ने टूटी बरोसी देखी  तो समझते देर न लगी की ये बब्बन बिल्ली की करतूत है।  जब से बब्बन  बिल्ली उनके गाँव मे आयी तब से उसके उत्पात ने गाँव के लोगो को परेशान कर उनका जीना हराम कर दिया। अब सभी गाँव वालों ने बब्बन बिल्ली को सबक सिखाने की सोची। बब्बन बिल्ली की बजह से चपलून की जान भी हमेशा आफत मे रहती।   चपलून चूहे ने अपनी योजना गाँव वालों को बताई। योजना के मुताबिक एक रात चपलून ने बब्बन बिल्ली के सामने पूंछ उठाके डांस करते हुए उसे ललकारा। बब्बन को चपलून के इस दुस्साहस पर बहुत गुस्सा आया और चपलून से बोली तेरी ये हिम्मत? ठहर! तुझे अभी मजा चखाती हूँ!! इतना कह  कर बिल्ली चूहे के पीछे झपटी। चपलून भी कभी दायें मुड़ता तो बब्बन भी उसके पीछे दायें मुड़ जाती।  वह बाएँ मुड़ता तो बिल्ली भी बाएँ मुड़ जाती। चूहा कहीं ये गया कहीं वो गया, बिल्ली भी  उसके पीछे भागती। आज तो बब्बन ने तय कर लिया था कि वह  चपलून को चट कर के ही मानेगी। इस चूहा बिल्ली की भाग दौड़ मे चपलून ने योजना के मुताबिक दादी कुंठों बाई के घर मे बने  एक कमरे की ओर दौड़ लगा उसमे  घुस गयी। बिल्ली तो आज उसे मारने के लिए दृढ़ निश्चय के साथ आग बबूला हो चूहे  के पीछे भाग रही थी  और चपलून के जाल मे फंस गयी!! जैसे ही बब्बन बिल्ली कमरे के अंदर  पहुंची कमरे मे जमा गाँव के लोगो ने कमरे का दरबाजा बंद कर बब्बन बिल्ली की जम  कर लाठी और  डंडों से पिटाई लगाई। अब तो बब्बन बिल्ली दहाड़ मार मार कर रोने और चिल्लाने लगी!! आज तो गाँव के लोगो के घरों का खाना खाने, दूध पीने और दादी कुंठों बाई की बरोसी को तोड़ने का अच्छी तरह से बदला लिया। जैसे ही कमरे का दरबाजा खुला बब्बन बिल्ली दुम दबाकर ऐसी भागी कि उस दिन के बाद से बब्बन बिल्ली गढ़मऊ गाँव मे फिर दुबारा कभी दिखाई नहीं दी।

विजय सहगल

                 

 

शनिवार, 22 जनवरी 2022

बारसूर के गणेश-दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़)

"बारसूर के गणेश-दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़)"








कल दिनांक 21 जनवरी 2022 को  "सकट गणेश" का पर्व अर्थात "संकट नाशक गणेश चौथ" थी। बचपन मे हमे "सकट गणेश" की पूजा का हमेशा इंतज़ार रहता था। गणेश भगवान की पूजा का तो विधान था ही पर मेरी माँ इस दिन बिशेष तरह के तिली के लड्डू बनाती थी जो मुझे बहुत प्रिय थे। दो तरह के लड्डू का प्रावधान वो पूजा करने के लिए करती थी। एक तो आटे के लड्डू होते और दूसरे काली तिली के लड्डू होते जिनमे अदरक को कूट कर मिलाया जाता।  लड्डू बनाने मे माँ बड़ी मेहनत करती थी। आटे के लड्डू मे किसी विशेष विधि न थी पर काली तिली के लड्डू मे श्रम करना पड़ता था। तिली को भून कर लोहे के खल्लड़ मे अदरक मिला का काफी देर कूटा जाता था जिससे अदरक का रस तिली मे अच्छी तरह मिल जाता साथ ही गुड़ को भी उसी खल्लड़ मे कूट कर फिर लड्डू बनाये जाते। अदरक और गुड़ का जो स्वाद,  निराली गंध और रस लड्डूओं मे आती वह अतुलनीय होती।

मै पहले आटे का लड्डू खाता फिर बाद मे तिली का लड्डू ताकि स्वादिष्ट तिली का स्वाद देर तक मुंह मे बना रहे। एक खास बात और होती स्वादिष्ट मीठा खाने के बाद  मै काफी देर तक पानी नहीं पीता ताकि देर तक मीठे के स्वाद का आनंद ले सकूँ। बचपन मे कुछ शैतानियाँ भी इस दौरान होती, मै कुछ लड्डू छुपा कर रख देता। यदि घर मे भाई बहिनों के बीच लड्डू के बँटवारे को ले कर हो हल्ला होता तो चुप चाप तिली के लड्डू लौटा देता और यदि मामला शांत रहता तो फिर चोरी के लड्डू खाने का कुछ मजा ही और होता!! पर आज कभी ये सोचता हूँ तो बचपन की शैतानियों पर थोड़ी ग्लानि तो होती ही है।

इस अवसर पर भगवान गणेश का स्मरण स्वाभाविक है। आज छत्तीसगढ़ स्थित  "सकट गणेश" पर दंतेवाड़ा जिले के बारसूर के गणेश मंदिर की याद स्वतः ही हो आयी।     

पर इसके पूर्व बस्तर के बारे मे कुछ चर्चा करना चाहूँगा। यूं तो बस्तर के दंतेवाड़ा एवं जगदलपुर प्रकृतिक एवं संस्कृति धरोहरों से भरपूर धार्मिक एवं प्रकृतिक स्थलों से परिपूर्ण है लेकिन नक्सलवादियों और माऊवादियों से ग्रस्त क्षेत्र होने से पर्यटकों का आवागमन नगण्य है। मै अपने रायपुर के साढ़े चार साल के प्रवास के कारण नक्सलवादियों की हिंसा और डर के कारण कभी बस्तर के इन क्षेत्रों मे न जा सका। पर अपने जगदलपुर  प्रवास के दौरान मै अपने साथी ऋतुराज शर्मा के साथ मई 2015 के एक रविवार को दंतेवाड़ा स्थित दंतेश्वरी मंदिर के दर्शनार्थ रवाना हुआ था। इस यात्रा के दौरान जगदलपुर से दंतेवाड़ा के मार्ग मे घने जंगलों से आच्छादित मार्ग पर कार ड्राइविंग के अपने यादगार अविस्मरणीय यात्रा को अब तक नहीं भूला। जगदलपुर से दंतेवाड़ा के बीच बने शानदार पक्की डामर दो मार्ग वाली  सड़क देखते ही बनती है। बस्तर के पूरे क्षेत्र अधोसंरचना मे जो विकास देखा अकल्पनीय था।  लेकिन नक्सलवादियों के खौफ और भय के कारण ही जनसाधारण लोग बस्तर की यात्रा पर जाने से डरते है। मेरा दावा है कि जगदलपुर का चित्रकूट एवं तीरथ गढ़ जलप्रपात एवं कुटुंबसर की धरती की नीचे स्थित गुफाएँ  देखेंगे तो आप रोमांच और आश्चर्य से इन स्थलों को देखते रह जाएंगे। प्रकृति द्वारा निर्मित ईश्वर की इन अद्भुत रचनाओं ने बस्तर क्षेत्र को अपने स्नेह, आशीर्वाद और उपहार  से समृद्ध किया है।  

मेरे साढ़े चार साल के छत्तीसगढ़ प्रवास से मिले अपने अनुभव के आधार पर मै कह सकता हूँ कि जंगल मे अपना अनैतिक, अनर्थकारी और अन्यायी  शासन चलाने वाले ये  नक्सलवादी, गाँव मे संगठित गिरोह की तरह अपराधिक शासन  चलाते है जिन पर अंकुश लगाना अत्यंत आवश्यक है पर साधारण नागरिकों, पर्यटकों पर हमलों या हिंसा की घटनाएँ कम या नगण्य ही देखने को मिली। इस सब के बावजूद मै अपने बैंक सहयोगी ऋतुराज शर्मा के परिवार ने छत्तीसगढ़ सहित देश के लोगो के बीच सबसे सम्मानित एवं  प्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर के दर्शन का कार्यक्रम बनाया बस भ्रमण का थोड़ा उत्साह और जज़्बा दिखाने की जरूरत है। ये स्थान देवी सती की 52 शक्तिपीठों मे से एक है। ऐसी मान्यता है कि देवी सती का "दांत" इस स्थान पर गिरने के कारण   इसका नाम दंतेवाड़ा पड़ा।

11-12वीं शती के बने इन मंदिरों की अपनी अलग  ही विशेषता है। भगवान गणेश को समर्पित इस मंदिर मे बैठी स्थिति मे एकदंत गणेश जी को दो प्रितिमायेँ है। बड़ी मूर्ति 7 फुट एवं छोटी मूर्ति साढ़े 5 फुट ऊंची है जो अलग अलग एक पत्थर पर तराशी गईं है। दोनों देवाधिदेव गणेश के  स्वरूप की वक्रतुंड  बायें  ओर मुड़ी है जो सुख, शांति और समृद्धि का प्रतीक है। दोनों गणेश विग्रह चतुर्भुजा धारी है जिनके एक हाथ मोदक एवं दूसरे हाथ मे अस्त्र धारण किये है, पैरों मे पाजेब को भी स्पष्ट देखा जा सकता है। गणेश का वाहन मूसक भी प्रितमा के नीचे विध्यमान है एवं जनेऊ धरण किये बारसूर नामक स्थान मे स्थित इस ऐतिहासिक गणेश मंदिर के अद्भुद दर्शन अतुलनीय थे। इस स्थान के पास ही बत्तीस पाषाण स्तंभो पर निर्मित बत्तीसा शिव मंदिर, मामा भांजा मंदिर भी स्थित है।

हमारी नक्सलवादी प्रभावित बारसूर के गणेश दर्शन के कुछ दिन बाद एक दिन समाचार पत्रों मे  बारसूर मे नक्सलवादियों द्वारा एक बस को जलाये जाने  का समाचार पढ़ा गनीमत ये थी कि बस मे आग लगाने के पूर्व सभी यात्रियों को बस से उतार दिया गया था।

इस तरह साफ सुथरे शांत एवं पुरातत्व की धरोहर समृद्ध वारसूर गाँव मे भगवान गणेश  के दर्शन अविस्मरणीय थे। "प्रणम्य शिरसा देवं, गौरी पुत्रम विनायकम"!! संकट नाशक  भगवान गणेश की जय!!  

विजय सहगल


गुरुवार, 20 जनवरी 2022

दान का कंबल

 

"दान का कंबल (सत्य घटना पर आधारित कहानी)"




भाग्वती नोएडा की सैक्टर पचास की आम्रपाली ईडेन  पार्क की  इस सोसाइटी के आठ घरों मे वर्तन, झाड़ू पोंछे का काम करती है। इससे मिली मजदूरी से वह अपने चार बच्चों का गुजर वसर बमुश्किल कर पाती है। कमजोर  वर्ग से आयी ये  अनपढ़ महिला प्रातः लगभग सात बजे अपने घर से निकल दोपहर 1-2  बजे घड़ी दो घड़ी सुस्ताने के बाद  दूसरी शिफ्ट के काम, जूठे वर्तन आदि की सफाई के लिये पुनः तीन बजे से शुरू हो शाम को लगभग छः बजे समाप्त कर  अपने घर पहुँचती है। अनुसूचित जाति की इस महिला की कमोबेश ये ही दिनचर्या पूरे साल चलती है। मेहंगाई के इस दौर मे परिवार की परवरिश मे उसके पति और एक बड़ी बेटी भी हिस्सा बंटाते है, तब कहीं तीन अन्य बच्चों की पढ़ाई, घर खर्च और मकान किराये के बाद मुश्किल से 2-3 हजार की बचत को अपने बूढ़े सास-ससुर को खर्चे के लिये गाँव मे भी भेजती है।

आम्रपाली सोसाइटी के इन आठ घरों मे जहां भाग्वती काम करती है के रहवासियों को  शायद ही कभी उसके काम काज से शिकायत रही हो या उसकी ईमानदारी पर शक किया हो। सोसाइटी के रहवासी भी यदा कदा खाने पीने की वस्तुओं और वस्त्रादि दे उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति मे सहयोग करते है। दिसम्बर की इस भीषण सर्दी के प्रकोप मे फ्लैट क्रमांक 604 की उस संभ्रांत महिला ने भाग्वती को एक कंबल दिया। कंबल यध्यपी बहुत  पुराना था, जगह जगह से छन कर उसके छिद्र कंबल के उम्रदराज होने की कहानी व्याँ कर रहे थे पर फिर भी भाग्वती खुश थी कि इस जान लेवा ठंड से उसको कुछ राहत तो मिल ही जाएगी। परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकता जैसे तैसे पुरानी लोई, कंबल  और रज़ाई से पूरी हो गयी थी पर उसके हिस्से की रज़ाई मे पिल्ले (रुई के छोटे-छोटे ढेर बन जाना) पड़ जाने के कारण रुई के जहां तहां गुठले बन गए थे और रज़ाई मे रुई समान रूप से न फैली  होने के कारण ठंडी हवा आती थी। बैसे भी भाग्वती ने सोचा था दिसम्बर के बीस दिन तो गुजर ही गए है और दस दिन की बात है गाँव की दुकान से एक नया कंबल ले बेटे को दे देगी जिसे वह बेहद प्यार करती थी क्योंकि वह "बौरा" (बोल न सकने वाला) था  और उसके हिस्से की रज़ाई से वह अपना काम चला लेगी। रोज अपनी उधेड़-बुन मे जब वह घर जाने के पहले गाँव की उस कपड़े की दुकान से जैसे ही   निकलती हर बार वह  उस कंबल को देखती  जो दुकान के कोने मे रक्खा हुआ था और उसे पसंद था और जिसे उसने खरीदने का मन बनाया हुआ था।

604 वाली मेडम ने जब उसे वह पुराना कंबल दिया तो उसने सोचा चलो अब 8-10 दिन  वह इस पुराने कंबल से काम चला लेगी फिर दस दिन बाद  तो नये कंबल को लेना ही है? भाग्वती ने मेडम से पुराने कंबल की पर्ची बनाने का निवेदन किया ताकि निकासी द्वार पर तैनात गार्ड को पर्ची दिखा वह कंबल घर ले जा सके? पर 604 वाली मेडम  ने भाग्वती को बगैर पर्ची दिये ही कहा, "कंबल पुराना है और यदि गार्ड पूंछे तो इंटरकॉम पर मेरी बात करा देना। बगैर किसी पूर्वाग्रह के जब गेट पर खड़े गार्ड ने भाग्वती से  कंबल की  पर्ची मांगी तो उसने मेडम की बात बताई और गार्ड साहब से फोन पर मेडम से बात करने की प्रार्थना की। लेकिन गार्ड ने सोसाइटी मे हो रही चोरी के मद्देनज़र बड़ी अशिष्टता पूर्वक पर्ची लाने की बाध्यता बतायी। भाग्वती निम्न वर्ग से आने वाली  निर्धन महिला जरूर थी पर गार्ड द्वारा चोरी की बात कह और फोन पर 604 नंबर वाली  मेडम से बात करने से इंकार पर उसका स्वाभिमान जाग  उठा और उसने कंबल वही कूड़ेदान मे फेंक वह अपने घर चली गयी। 

अगले दिन जब भाग्वती रोज की भाँति सोसाइटी मे काम करने पहुंची तो गेट पर तैनात गार्ड ने उसे प्रवेश देने से इंकार कर दिया। भाग्वती ये सुन स्तब्ध रह गयी। उसने जब गार्ड से प्रवेश निषेध का कारण पूंछा? तो उसने बताया कि कल कंबल के मुद्दे पर उसने गार्ड स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार किया और गार्ड को चप्पल मारी!! भाग्वती ये सुन हतप्रभ थी!! स्वतः स्फूर्त मुंहवाद से उसने इंकार नहीं किया पर अभद्रता या दुर्व्यवहार या चप्पल मरने जैसी कोई बात कहीं दूर-दूर तक न थी। पर पुरुष प्रधान समाज ने उस अनपढ़, निर्धन और निम्न वर्ग से आने वाली  महिला की कोई बात सुनने से इंकार कर दिया? यह देख भाग्वती की मनोदशा कुछ क्षणों के लिये बिगड़ी और ऐसा लगा कि उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गयी हो? उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया? एक झटके मे उसकी मेहनत मजदूरी पर पानी फिर गया! उसको अपने सपने बिखरते नज़र आने लगे? क्यों उसने अपने स्वाभिमान के विरुद्ध  पुरुष प्रधान समाज के पौरुषत्व को ललकारा था? यूं भी एक नीच कुल की निर्धन महिला का मर्द से तर्क वितर्क का क्या अधिकार? उसे सफाई का कोई भी मौका दिये बिना गार्ड्स और सोसाइटी के पदाधिकारियों ने उसके सोसाइटी मे प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी।   

भाग्वती को फ्लैट नंबर 604 की अपनी मालकिन पर पूरा भरोसा था कि वह वास्तविक स्थिति को सोसाइटी के गार्ड को बता मामले मे हस्तक्षेप करेंगी? उसे मन के किसी कोने मे उम्मीद थी कि मेडम यदि एक पर्ची लिख देती तो ये क्लेश और संताप देखना या भुगतना न  पड़ता? पर छोटे मुंह बड़ी बात, वह अनपढ़ महिला कैसे पर्ची लिखने की जिद मेडम से कहती? भाग्वती ने सारे घटनाक्रम को बता, मेडम से अपनी निर्धनता को दृष्टिगत  सहायता की गुहार लगायी? अब वह क्रोधावेश मे अपने किए पर अफसोस जाहिर कर गलती मानने को भी तैयार थी। लेकिन जब मेडम ने बताया कि मै घर के काम करने मे लाचार और विवश हूँ, मै लड़ाई झगड़े के किसी झंझट मे पड़ना नहीं चाहती  और इसीलिए ही सोसाइटी के गार्ड्स से तुम्हारे झगड़े के बाद मैंने नई नौकरानी रख ली!! मेडम के जबाव सुन कर भाग्वती हैरान थी पिछले तीन साल से  जिस मेडम की सेवा करने मे उसने अपना जी जान एक कर दिया था उसने तीन वर्ष के रिश्ते को एक झटके मे तोड़ दिया। उसके काम के लिये न आने या देर से आने पर जो मेडम फोन कर-कर नाक मे दम कर लेती थी, आज संकट की इस घड़ी मे कितनी सफाई और सहजता से उसने नाता तोड़ दिया।       

पिछले दिन के  मुंहवाद की याद कर उसे अपने उपर क्रोध आ रहा था, मन ही मन आत्मग्लानि हो रही थी। रह रह कर उसे अपने आप पर क्षोभ हो रहा था कि क्यों उसने  पुराने कंबल का लालच किया? कल तक अपने परिवार के पालन पोषण मे एक अहम योगदान करने वाली भाग्वती को आज 604 वाली मेडम के कारण  सड़क पर ला  खड़ा किया? उसके आँसू भी उन कठोर, पत्थर दिल सुरक्षा गार्ड्स के हृदयों को न पिघला सके क्योंकि उसने मर्द सत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती जो दी थी जिसकी कीमत एक निरीह निर्धन और कमजोर महिला को अपने रोजी रोटी खो कर गँवाना पड़ी। वह पल पल उस घड़ी को कोश रही थी जब पर्ची के बिना उस फटे कंबल की लालच मे आ कर सालों से अपनी जमी जमाई रोजी को ताश के पत्तों की तरह हवा मे विखरते देखा!! वह निरीह महिला आँखों मे सूखे आँसूओं को अपना खोटा नसीब मान अपने हालातों से सम्झौता करने को मजबूर थी क्योंकि वह जानती थी कि ये इस समाज का उसूल है कि  "जवर मारे और रोने भी ना दें?      

विजय सहगल

                 

     

रविवार, 16 जनवरी 2022

सुरक्षा मे चूक

 

"सुरक्षा मे चूक "



प्रधान मंत्री की सुरक्षा मे सेंध का मामला इस समय सारे देश मे सुर्खियों मे छाया हुआ है। पिछले दिनों 5 जनवरी 2022 को पंजाब के भटिंडा से  फिरोजपुर जाने के रास्ते मे तथाकथित किसान प्रदर्शनकारियों ने  हुसैनीवाला से चंद किमी पहले एक फ़्लाइ ओवर पर रास्ता रोक पीएम की सुरक्षा को तोड़ने का प्रयास कर एक गंभीर चुनौती पेश की। पीएम के काफिले को रास्ते मे एक मिनिट के भी लिये रोका जाना उनकी सुरक्षा के संबंध  मे एक गंभीर मामला है और जो देश की सुरक्षा को चुनौती देने के ही समकक्ष ही है। बेहतर होता  इस मुद्दे पर राजनैतिक दलों को एक मत होकर गंभीरता पूर्वक विचार विमर्श करना चाहिए था, क्योंकि देश पहले ही द्रोहीयों और अतिवादियों  द्वारा भारत के दो पदाशीन प्रधानमंत्रियों की देश के अंदर ही नृशंस हत्या का दंश झेल चुका है जिसने  देश के सुरक्षा तंत्र को  एक बहुत बड़ी चुनौती दी थी।

यध्यपि यूपीए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने इस मामले मे अपनी चिंता जाहिर की पर ये सुन कर बड़ा दुःख और अफसोस होता है जब पंजाब एवं छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्रियों का   पीएम की सुरक्षा के संबंध मे ये संदेश देते है कि पंजाब मे प्रधानमंत्री का रास्ता ही तो रोका था! कहीं गोली तो नहीं चली? पत्थर तो नहीं मारा गया? काले झंडे तो नहीं दिखाये गए? तो सुरक्षा मे कहाँ चूक हुई? ऐसा प्रतीत होता है कि इन महानुभावों के अनुसार प्रधानमंत्री की  सुरक्षा मे चूक तभी मानी जाएगी  जब गोली चलेगी, पत्थर फेंके जाएँ या  काले झंडे दिखाये जाए? जैसा कि देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों स्व॰ श्रीमती गांधी एवं स्व॰ श्री राजीव गांधी के मामले मे हुआ!!  क्या ये जरूरी नहीं था कि  ऐसी गंभीर और चुनौती पूर्ण परिस्थितियों को उत्पन्न ही न होने दिया जाता  जो पीएम की सुरक्षा मे सेंध का कारण हों? क्या पीएम के लिये ऐसी आदर्श सुरक्षा नीति के हालात उत्पन्न नहीं किये  जाने  चाहिए थे  ताकि पीएम के उपर या  आस पास भी किसी हमले की आशंका को निर्मूल सिद्ध किया जा सकता हो? यदि पूर्व प्रधानमंत्री द्व्य स्व॰श्रीमती  इंद्रा गांधी और स्व॰ श्री  राजीव गांधी के सुरक्षा कवच इतना सख्त और मजबूत बनाया गया होता जो अभेद्य होता और जिससे इन दोनों प्रधानमंत्रियों को असमय अकाल मृत्यु के दंश से बचाया जा सकता था।  

छत्तीसगढ़ और पंजाब के मुख्य मंत्रियों द्वारा फिरोजपुर मे प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे चूक पर प्रतिक्रिया देते वक्त ये दुहाई देना कि हमने पहले ही "अपने" दो प्रधान मंत्रियों को खोया है मानो श्रीमती गांधी और श्री राजीव गांधी मात्र कॉंग्रेस के प्रधानमंत्री थे, ये मुखिया द्व्यय शायद भूल गए कि ये दोनों देश के करोड़ो लोगो के सहित  दुनियाँ के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री थे। यदि उस समय प्रधान मंत्री की सुरक्षा की चूक को  हमने चुस्त दुरुस्त रक्खा होता तो देश को उन दोनों  प्रधानमंत्रियों की  नीतियों, कार्यक्रमों और विचारों से असमय वंचित न होना पड़ता और देश कदाचित विकास की नयी मंजिलें हांसिल कर चुका होता। इन दोनों मुख्यमंत्रियों की बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि "प्रधानमंत्री पर हमला" और "प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे चूक के विषय मे भेद नहीं कर सके"? हमे याद रखना चाहिये कि फिरोजपुर जैसे मामले मे प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे चूक ही प्रधानमंत्री के उपर हमले का कारण बन सकती थी।   खेद और अफसोस ये है कि ये  माननीय इस बात से अनिभिज्ञ रहे की यदि प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे चूक के अंदेशे को ही समाप्त कर दिया गया होता तो आतंकवादियों और देश द्रोहियों के  हिंसात्मक हमले की नौबत न आती और न ही देश को अपने दो गौरवशाली प्रधानमंत्रियों को असमय, अकाल ही "कालकवलित" होना पड़ता!!

काश जैसे पंजाब मे  सुरक्षा की गंभीर सुरक्षा मे सेंध के पूर्व ही पीएम के आगे के समस्त कार्यक्रम निरस्त कर फ़्लाइ ओवर से बापसी का निर्णय लिया गया और इस तरह एक और अनहोनी को होने से  बचा लिया गया।  उनके सुरक्षा तंत्र मे लगे सुरक्षा अधिकारियों  मे जिस तरह के आकस्मिक निर्णय से देश के प्रधान मंत्री की जीवन रक्षा की गयी अगर ऐसे ही परिस्थितियों मे रक्षात्मक  कदम श्रीमती गांधी और श्री राजीव गांधी के समय उठाए जाते तो वे भी आज हम लोगो के बीच जीवित होते।

ये एक कड़वा सच है कि जो वृक्ष मीठे फल देते है उन्ही पर गली-मुहल्ले के असभ्य, अशिष्ट आवारा किस्म के बच्चे पत्थर फेंकते है। कुछ ऐसा ही आचरण पंजाब काँग्रेस के अध्यक्ष श्री नव जोत सिंह सिद्धू ने प्रधानमंत्री के लिये शर्मनाक, असभ्य और अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल कर एक  वीडियो मे गली गलौज की भाषा मे अपशब्द कहे!! (लिंक संलग्न)।   माननीय प्रधानमंत्री की सुरक्षा मे हुई चूक पर तंज़ कसते हुए इसे ड्रामा करार दिया और कहा कि,  "जब पाँच सौ आदमी पीएम की सभा मे आए तो किसी तरह इज्जत बचानी थी" इसलिये पीएम ने ये ड्रामा किया!! आगे कहा "बताओ जब पंद्रह महीने से किसान दिल्ली के बार्डर पर बैठे थे तो कोई पूंछने नहीं आया और जब प्रधानमंत्री का रास्ता पंद्रह मिनिट के लिये रोका गया तो "अऊँ-अऊँ हो गयी", "अऊँ-अऊँ हो गयी", "अऊँ-अऊँ हो गयी" "ठोको ताली"। ऐसी ही अशिष्ट भाषा मे आगे प्रधानमंत्री द्वारा किसानों के तीन कृषि कानून बापसी पर अपनी प्रतिक्रीया देते हुए पंजाबी मे जिन घिनौने शब्दों का इस्तेमाल किया उसकी अपेक्षा देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल काँग्रेस  के प्रदेश अध्यक्ष से कदापि नहीं की जा सकती थी। इस वीडियो मे (3 मिनिट 8-9सेकोण्ड्स पर) गली छाप अनपढ़ व्यक्ति से भी गिरी भाषा मे सिद्धू ने जो बोला:- असि काले कानून बापस लै लए, "बताऊँ बापस लै लए, थोडे "$....%¥" (अशिष्ट अपशब्द) के विच डूंठा देके बाप्स लिवाये"!!  पंजाब की कोंग्रेसियत भले ऐसी रही हो पर पंजाब की पंजाबियत तो ऐसी कभी नहीं रही। जब पंजाब प्रदेश कॉंग्रेस के अध्यक्ष महोदय की ऐसी भाषा, सांस्कृति और संस्कार है तो कॉंग्रेस का तो भगवान ही मालिक है। सिद्धू की अध्यक्षता मे कॉंग्रेस किस तरह का शासन देगी इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

जब देश मे किसानों सहित  सभी राजनैतिक दलों, संस्थाओं व्यक्तियों  को अभिव्यक्ति की आजादी है तब एक पीएम के नाते न सही देश के एक साधारण नागरिक होने के नाते  क्या उन्हे अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की आज़ादी नहीं मिलनी चाहिये? तब क्यों उन तथाकथित किसानों ने उनका मार्ग अवरुद्ध कर उन्हे बल पूर्वक रोका? क्यों पंजाब पुलिस ने पीएम के मार्ग को अवरोध मुक्त नहीं बनाया ताकि वे भी अपने विचारों को श्रोताओं के समक्ष रक्ख सकते? क्या  अभिव्यक्ति की आज़ादी सिर्फ किसानों को ही मिली है? देश का पीएम को क्या अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं मिलनी चाहिए?

जैसा कि पंजाब के मुख्य मंत्री चरण जीत सिंह चन्नी और प्रदेश अध्यक्ष श्री नवजोत सिंह सिद्धू का मानना था कि साठ-सत्तर हजार  की क्षमता वाले मैदान मे मात्र पाँच सौ श्रोता ही प्रधानमंत्री की सभा मे आये थे इसलिये प्रधानमंत्री ने अपनी इज्जत बचाने के लिए भटिंडा से फिरोजपुर हैलिकोप्टर से न जाकर सड़क रास्ते से जाने का ड्रामा किया और सुरक्षा मे चूक का ठीकरा  हम (पंजाब सरकार) पर फोड़ दिया!!  अगर ये ही सच था तो  मेरा तो मानना है, तब तो पंजाब सरकार को किसी भी कीमत पर रास्ते की सारी रुकावटें दूर कर प्रधानमंत्री के सभा तक के  मार्ग को  प्रशस्त कराया जाना चाहिए था,  ताकि प्रधानमंत्री द्वारा पाँच सौ लोगो की संख्या को सम्बोधित  करने की फजीती एवं जगहँसाई, काँग्रेस पूरे देश और दुनियाँ को दिखा सकती थी। बगैर कुछ किए ही पंजाब की काँग्रेस को  प्रधानमंत्री जी की सभा मे खाली कुर्सियों को संबोधित करने की तस्वीरे प्रचार प्रसार और सोश्ल माध्यमों मे वाइरल करने का सुनहरा मौका मिल जाता। ढ़ोल बजा-बजा कर कॉंग्रेस को पैसठ हजार खाली कुर्सियों मे पाँच सौ श्रोताओं को प्रधानमंत्री का  संम्बोधन का वीडियो/फोटो, इश्तेहार, विज्ञापन समाचार पत्रों और टीवी मे  ही दिखाते रहते तो किसी और चुनाव प्रचार की जरूरत ही न रहती? प्रधानमंत्री के लिये श्रोता विहीन सभा से ज्यादा  अपकीर्ति और अप्रिसिद्धी और क्या हो सकती थी। प्रधानमंत्री और बीजेपी पंजाब सहित सारे देश मे  उपहास का पात्र बनते।  पंजाब सरकार को ऐसा  स्वर्णिम अवसर कदाचित ही मिलता और एक अति मूल्यवान  मुद्दा बिना किसी प्रयास के मिल जाता। सुरक्षित रास्ता प्रदान करने पर उनके "एक पंथ दो काज हो" जाते तथा ये कहावत भी चरितार्थ हो जाती कि  "साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे"।

सोने पे सुहागा ये होता  कि  पंजाब सरकार के उपर प्रधान मंत्री की सुरक्षा मे चूक का "जान लेवा" आरोप भी नहीं लगता। प्रधान मंत्री जैसे अति सम्मानित व्यक्ति की सभा मे  मात्र पाँच सौ लोगो के सम्बोधन से उपजे अपयश और अपकीर्ति के इस वक्तव्य कि "अपने सीएम को थैंक्स कहना कि मैं एयरपोर्ट जिंदा लौट पाया" जैसे वक्तव्य की नौबत ही नहीं आती और वे स्वयं ही कम श्रोताओं के कारण "इज्जत बचाने के जाल" मे फंस जाते?

दुर्भाग्य से पंजाब के मुख्य मंत्री और पंजाब प्रदेश अध्यक्ष द्वारा  प्रधान मंत्री को सुरक्षित सड़क मार्ग प्रदान कर जो प्रसिद्धि और शोहरत मिलती, उस मौके की राजनीति करने का ये सुनहरा मौका वो चूक गए।

विजय सहगल

गुरुवार, 13 जनवरी 2022

हजारिया महादेव, तालवेहट

 

"हजारिया महादेव, तालवेहट"







दिनांक 16 दिसम्बर 2021 को भोपाल से अपनी बापसी के समय अपने अल्प प्रवास पर राष्ट्रीय राजमार्ग से हट कर जब तालबेहट कस्बे मे जाने के लिये सड़क पर प्रवेश करेंगे तो मार्ग के दोनों ओर कच्चे और उबले सिंघाड़े लिये हुए कई महिलाएं एवं बच्चे टोकरी मे सिंघाड़े बेचते हुए बैठे मिलेंगे। मुझे दाहिनी ओर विशाल तालाब से लाये स्थानीय उत्पाद ताजे सिंघाड़ों का विनमय होता दिखा।  कच्चे सिंघाड़े तीस रुपए एवं उबले-छिले सिंघाड़े का भाव मात्र साठ रुपए प्रति किलो था। पोषक तत्वों से भरपूर 100 ग्राम सिंघाड़े से मात्र 97 कैलोरी ऊर्जा, 0.1 ग्राम फैट, पोटेसियम, मैगनीस और कॉपर जैसे खनिज से भरपूर सिंघाड़ा 2 ग्राम प्रोटीन प्रदान करता है। तालबेहट कस्बा सिंघाड़े और कमल ककड़ी अर्थात मुरार का मुख्य उत्पादन केंद्र रहा है। फिर इतने पौष्टिक गुणो से भरपूर आधा किलो सिंघाड़े का खरीदना तो बनता ही था।      

थोड़ा सा आगे बढ़ने पर सड़क के दाहिने एक अति प्राचीन हजारिया महादेव मंदिर का रास्ता था जो तालबेहट के प्रसिद्ध तालाब के दक्षिणी छोर पर स्थित है। इस मंदिर की स्थानीय स्तर पर बड़ी मान्यता है। सावन और शिवरात्रि के समय इस मंदिर मे विशाल मेले का आयोजन होता है जिसमे भारी संख्या मे भक्तजन शामिल होते है। मुझे भी इस दिन इस मंदिर मे भगवान महादेव के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कोई विशेष तीज-त्योहार न होने के कारण उस दिन भक्तों की ज्यादा भीड़ नहीं थी। इस मंदिर के बारे मे ऐसी किंवदंती है कि इस शिवलिंग का आकार दिन-व-दिन, तिल-तिल बढ़ रहा है। इस चमत्कारिक और अलौकि शिवलिंग के बारे मे कस्बे के वृद्ध एवं वरिष्ठ जन बताते है कि पहले बचपन मे वे मंदिर की परिक्रमा आसानी से कर लेते थे पर शिवलिंग और जलहरि का आकार बढ़ने के कारण अब मंदिर के परिक्रमा मार्ग  जलहरि के आकार मे वृद्धि के कारण बंद हो गया। इस बात की पुष्टि हमारी श्रीमती जी भी करती है जिनकी जन्म स्थली भी तालबेहट कस्बा है जहां उनका बचपन बीता है।

1936 मे स्थापित इस मंदिर के शिवलिंग की पिंडी पर बहुत ही कलात्मक रूप से गोलाकार रूप मे 108 शिवलिंग को उकेरा गया है। इस तरह छोटे छोटे शिवलिंग के ग्यारह चक्र को पिंडी पर शिल्पियों द्वारा सुंदर तरीके से बनाए गए अर्थात कुल 11088 शिवलिंगों निर्माण का हुनर देखते ही बनता है। इसी तरह की कलात्मक शिल्पकारी शिव के वाहन नंदी पर भी की गयी है। हरे भरे एवं साफ सुथरे मंदिर प्रांगड़ मे स्थित हजारिया महादेव मंदिर का सौंदर्य प्राकृतिक रूप से बने  तालाब ने इस स्थल के  सौंदर्य मे और भी वृद्धि कर दी है। मंदिर के बगल मे बने खुले आँगन मे खड़े होकर तालाब को देखना मन को सकून और शांति प्रदान करने वाला था। मंदिर मे जलाभिषेक और शिवार्चन करने के पश्चात भगवान शिव को शिरोधार्य प्रणाम कर हम प्रसन्नता पूर्वक बाहर निकले।

मंदिर के बाहर फल-फूल की कुछ दुकानों के अलावा एक मनिहारी की दुकान भी वहाँ थी। महिला द्वारा संचालित इस दुकान की स्वामिनी हाल ही खेत से निकले अदरक को मिट्टी से अलग कर रही थी साथ ही मे इनके बीच इक्का-दुक्का अरबी (सब्जी) को भी अलग कर रही थी। मेरी श्रीमती जी को मेरी पसंद के विपरीत अरबी की सब्जी बेहद प्रिय है।  उन्होने अरबी का भाव पूंछा तो हम हैरान रह गये। खेत से निकली ताजा अरबी मात्र 10/- रुपए किलो थी अतः डेढ़ लोगो ( अरबी की पसंदीदा के कारण श्रीमती को "एक" एवं बेमन से खाने के कारण मै आधा) के हिसाब से एक पाव अरबी बहुत थी। उस महिला ने ऐसे ही अंदाजे से एक पन्नी मे अरबी भर कर दे दी जो लगभग तीनचार -सौ ग्राम से कम न थी। पत्नी ने जब दस का नोट दिया तो उसने बड़े ही निर्मल और संकोच के साथ कहा, "बिन्नु अब नैक सी (थोड़ी) से घुइयाँ (अरबी) के का पईसा ले!", "तुम तो ऐसेई (बिना पैसेके) रख लो", "हमने कौन मंडी से मोल (नगद) लई', "जे तो हमए अपने खेत की है"!  इतनी निश्छलता, अपनत्व और स्नेह आपको  सिर्फ आर्थिक रूप से कमजोर पर विचार मे उदार सम्मपन्नता सिर्फ भारत के उदारमना ग्रामीणों मे ही दिखाई देगी। हमारे बार बार आग्रह के बावजूद उस महिला ने अरबी की कोई कीमत नहीं ली। वास्तव मे अरबी की तो नगण्य  कीमत रही होगी, पर उस महिला के अपनत्व और स्नेह मेरे लिए बेशकीमती था।

मंदिर से लगा हुए ही पैडल वोट और बच्चो के लिए फिसल पट्टी, झूले आदि भी लगे थे पर  पर्यटकों की कम आवक से पार्क सूना था। ऐसा प्रतीत होता है कि मेले-ठेले मे ही लोग यहाँ आते होंगे। यदि मेरे पास समयाभाव न होता तो विशाल और सुंदर सरोवर मे नौकायन अवश्य करता।

एक बार पुनः हजरिया महादेव का जयकारा लगा मै अपने गंतव्य के लिए प्रस्थान कर गया।  

विजय सहगल