शनिवार, 27 नवंबर 2021

चंद्रभान यादव

 

"चंद्रभान यादव"






क्या आप चन्द्र भान से बाकिफ है? शायद नहीं। परिचित तो मै भी नहीं था। पर उस दिन दिनांक 14 नवम्बर 2021 को जब अपने भोपाल प्रवास पर मै अपने मित्र श्री अश्वनी मिश्रा का स्कूटर लेकर बावड़ियाँ चौराहे से अपने घर की तरफ जा रहा था। सड़क से जाने वाले अपने सहयात्रियों के बीच पहली नज़र मे एक मोटरसाइकल को नज़रअंदाज़ कर मै आगे बढ़ गया, पर अचानक  मोटर साइकल के पीछे लगी छोटी सी ट्रॉली ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। मैंने आगे खड़े होकर एक  क्षण पुनः गौर से जा रही मोटर साइकल पर लगी लोहे की जाली से बनी ट्रॉली को देखा जिसने मुझे प्रभावित किया। उस पात्र के बारे मे  कुछ और अधिक जानने के पूर्व मेरे दिल मे आया क्यों ने कुछ सेकेंड्स का एक स्वाभिक विडियो उस व्यक्ति  का मोटरसाइकल से ट्रॉली को ले जाते हुए बनाया जाये! इस हेतु मैंने उस मोटर साइकल से आगे निकल मोबाइल से वीडियो बनाने हेतु पोजिशन ले खड़ा हो गया पर दुर्भाग्य!,  शायद पान के शौकीन उस मोटरसाइकल चालक ने बावड़ियाँ चौराहे से यू टर्न लेकर अपनी ट्रॉली एक पान की दुकान पर खड़ी कर दी और मै उस घटना का विडियो बनाने से वंचित बापस उस पान की दुकान पर उस मोटरसाइकल चालक के बारे मे जानने की उत्सुकता से उसके पास पहुँचा।बातचीत के दौरान उस युवा ने अपना नाम चंद्रभान यादव बताया। मैंने बड़ी जिज्ञासा और उत्कंठा पूर्वक उस मोटरसाइकल का निरीक्षण किया। एक सामान्य मोटरसाइकल को पीछे से  एक कीले के लीवर के माध्यम से लोहे की जाली से बनी पहिये की ट्रॉली से जोड़ा गया था। ट्रॉली मे तरीके से बनी अलमीरा मे बच्चों के लिये बने ऊनी वस्त्र एवं महिलाओं के दैनंदनी आवश्यकताओं की कुछ वस्तुओं को विक्रय हेतु रखा था। आज के इस दौर मे जब युवाओं मे उपलब्ध अवसरों के बावजूद हताशा निराशा के लक्षण दिखाई देते हों। तमाम युवा रोजगार के लिये संसाधनों की कमी के बहाने एवं शासन प्रशासन को कोसते नज़र आते हों, इन अभावों के बीच चन्द्र्भान यादव जैसे युवा एक दिशा देने वाला दिखाई दिया। जो रोजगार के नए नए साधन और माध्यमों के साथ अपनी जीविका उपार्जन कर रहा था।  

नाम की औपचारिकता के बाद जब मैंने चंद्र्भान से उसके व्यवसाय एवं उसकी इस विशेष ट्रॉली गाड़ी के बारे मे पूंछा तो उसने बताया कि पहले वह गाड़ी चलाता था तब उसने पंजाब मे किसानों द्वारा दूध की सप्लाइ हेतु इस तरह की गाड़ी देखी थी। अपने खुद के व्यवसाय के शुरू करने के लिए उसने पंजाब के आईडिया मे कुछ बदलाब के साथ इस ट्रॉली गाड़ी का उपयोग चलती फिरती दुकान के रूप मे किया। जब मैंने चंद्रभान से उसकी शैक्षिक योग्यता के बारे मे पूंछा तो मुझे लगा कि शायद मैंने उसको हीन भावना से ग्रसित कर दिया। मैंने उसका उत्साह वर्धन के आशय से कहा चंद्रभान तुमने वो कम किया है जिसे बड़े से बड़े इंजीन्यरिंग के छात्र नहीं कर सकते। तुम्हारी मेहनत और रोजगार करने की चाह प्रशंसनीय है। मैंने चंद्रभान की मोटर साइकल की कुछ फोटो उसकी ट्रॉली के साथ खींची। चद्र्भान ने ट्रॉली मे विनमय हेतु  रखे सामान से मुझे अवगत कराया।

श्री चंद्रभान के एक बात जिसने हमे और भी ज्यादा प्रभावित किया वो ये थी कि चंद्रभान भोपाल मे निर्माणाधीन इमारतों मे कार्यरत मजदूरों के मध्य ही अपना व्यापार करते है। उनका कहना था कि ये मजदूर शहर के बाज़ारों मे जा कर खरीद फरोख्त करने मे सक्षम नहीं। सर्दी के मौसम की शुरुआत हो चुकी है। उनकी ट्रॉली के पहुँचते ही मजदूर अपने लिए और अपने बच्चों के लिये ऊनी कपड़े क्रय करने पहुँच जाते है। जब कभी मजदूर कपड़ो की कीमत ज्यादा होने के कारण संकोञ्च करता है तो चंद्रभान अपने लाभ के हिस्से को कम कर मजदूर को वह कपड़ा कम कीमत पर भी बेच देते है और कभी कभी बिना लाभ के भी कपड़े मजदूर की मालीहालत और हैसियत देख बेच देते है। कपड़ो की कीमत कम करने की  ये नीति वह ग्राहक के रहन सहन और हैसियत देख कर ही करते है जिनमे मुख्यतः मजदूर ही होते है। अच्छी आर्थिक हैसियत के लोगो से वे तय लाभ के मार्जिन पर ही व्यापार करते है।

किसी गरीब मजदूर के प्रति उनकी हमदर्दी और सहानुभूति की  उनकी इस व्यावसायिक सोच की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। एक ओर जहां पढे लिखे इंजीनियर, स्नातक और अन्य युवा रोजगार हेतु शिकवे शिकायत करते है वही  चंद्रभान जैसे कम पढे लिखे नौजवान बेरोजगारी को  अपने स्वयं के रोजगार के माध्यम से  अपनी नयी बाइक ट्रॉली के आविष्कार के साथ चुनौती स्वीकार कर अपना रोजगार सफलता पूर्वक चला रहे है तो उनके इस कार्य की तारीफ तो होनी ही चाहिये। जब मैंने पूंछा कि उनके रोजगार से उनके परिवार का जीवन यापन कैसा चल रहा है? तो चंद्रभान ने ईश्वर के प्रति आदर और सम्मान मे हाथ जोड़ कर धन्यवाद दिया। उन्होने बताया हमारी अवश्यकताओं की पूर्ति उनके इस व्यवसाय से हो जाती है। बच्चे स्कूल मे पढ़ने जाते है। नजदीक के गाँव मे ही छोटा सा मकान है और वे परिवार के साथ सुख पूर्वक सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर रहे है। अंबानी, अदानी जैसे धनाढ्य व्यक्ति को देख लगता है कि जीवन मे आर्थिक उपलब्धि प्राप्त करने की कोई सीमा नहीं पर संतुष्टि का जो स्तर  एवं सुख का जो अनुभव मैंने  चंद्रभान जैसे युवा के चेहरे पर देखा, शायद ही इन धनाढ्यों को नसीब होता होगा? इस युवा को देख  अत्यंत प्रसन्नता हुई, ईश्वर से उनके सुखी एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करते हुए मैंने बावड़ियाँ चौराहे से अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

विजय सहगल                         

सोमवार, 22 नवंबर 2021

रानी कमला पति रेल्वे स्टेशन

 

"रानी कमला पति रेल्वे स्टेशन"







आज मै भोपाल के हबीबगंज स्टेशन के नये नामांतरण आदिवासी रानी "रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन" करने पर रानी द्वारा  अपने सम्मान और स्वाभिमान के रक्षार्थ जलसमाधि लेने के शौर्य की चर्चा नहीं कर रहा अपितु उस दिन के आँखों देखे हाल का व्योरा लिख रहा हूँ।  मै अपने भोपाल स्थित फ्लैट को किराये पर देने के हिसाब से कुछ दिन के प्रवास पर भोपाल मे था। लक्ष्य पूर्ण न होने के कारण 15 नवम्बर 2021 को मुझे हबीबगंज, भोपाल से ग्वालियर यात्रा करनी थी। आरक्षण शताब्दी एक्सप्रेस से था। मै अपने भाग्य को साराह रहा था कि आज 15 नवम्बर को ही हबीबगंज रेल्वे स्टेशन का गौड़ आदिवासी रानी  "रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन" नामांतरण किये जाने  वाली इस अहम घटना का मै साक्षात गवाह होने का सौभाग्य बगैर किसी प्रयास के प्राप्त कर रहा हूँ। इस नामांतरण की महत्वपूर्ण घटना का श्री गणेश भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कर कमलों से होने जो जा रहा था। इस हेतु एक बड़ा कार्यक्रम स्टेशन के प्लैटफ़ार्म नंबर एक  पर रखा गया था, जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को संबोधित करना था।

मुझे अंदेशा था कि सुरक्षा व्यवस्था के चाक-चौबन्द के चलते मुझे गाड़ी के छूटने के तय समय 3.15 दोपहर से कम से कम 2 घंटे पूर्व निकलना चाहिए। चूंकि हमारे घर आकृति ग्रीन सोसाइटी के गेट से ही भोपाल बस के रूट नंबर टीआर1 से शुरू होता है अतः बस आसानी और सहजता से उपलब्ध थी। अतिरिक्त सावधानी के तौर पर मै अपने घर के सोसाइटी से लगभग साढ़े बारह बजे लगभग 3 घंटा पूर्व निकला। पीएम की सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से बस ने शिवाजी नगर के महावीर द्वार के नजदीक छोड़ दिया। वहाँ बने बैरिकेड पर उपस्थित पुलिस कर्मी को जब मैंने अपना यात्रा टिकिट दिखाया तो उसने कहा आपके पास टिकिट है तो आप पूर्व हबीबगंज रेल्वे स्टेशन अर्थात रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन जा सकते है, पर आपको पैदल ही स्टेशन जाना होगा। मै खुश था और सूटकेस मे लगे पहियों को खींचता हुआ बीजेपी कार्यालय होते हुए लगभग एक किमी दूर स्थित रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन की ओर चल पड़ा। मुख्य सड़क पर आते ही अगले पढ़ाव पर पुलिस अधिकारियों का रुख बदला नज़र आया और उन्होने स्टेशन के प्लेटफ़ार्म नंबर एक पर जाने देने से साफ  इंकार कर दिया कि यहाँ से किसी भी व्यक्ति को प्रवेश की इजाजत नहीं है। उन पुलिस अधिकारियों के समक्ष टिकिट और वरिष्ठ नागरिक होने की सभी दलीले व्यर्थ थी। उन पुलिस अधिकारियों ने प्लैटफ़ार्म नंबर 7 की ओर का रास्ता दिखाया जो सड़क के पार ही था। वहाँ खड़ा पुलिस कर्मचारी कुछ ज्यादा ही मुस्तैद था और उसने आगे बढ्ने की किसी भी अनुमति से इंकार कर दिया यहाँ तक कि मेरे आग्रह पर उसने मेरी बात डीएसपी महोदय से करा मुझे निरुत्तर कर दिया। मैंने वहाँ खड़े मीडिया कर्मियों से भी अपनी आपबीती सुनाई पर पर सत्ता शासन से प्राप्त सुखुपभोग ने उन्हे भी आम आदमियों को होने वाली असुविधा को देखने की रोशनी उनकी आँखों से छीन ली थी।   

अब मै भरी दोपहर की तेज धूप मे, तूफान मे फंसे समुद्री जहाज की तरह यहाँ वहाँ थपेड़े खा रहा था और चारों तरफ अपने कर्तव्य मे मुस्तैद भोपाल  पुलिस कर्मियों के बीच असहाय हो यहाँ वहाँ व्यर्थ प्रयास कर रहा था। झक मार कर जहां पर बस ने छोड़ा था वही पर बापस पैदल आने को मजबूर था। मुझे एक बार फिर माननीय शिवराज सिंह उर्फ मामा जी पर लिखे ब्लॉग "अंधेर नागरी चौपट मामा" की याद हो आई (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/02/blog-post_23.html)।  

बमुश्किल आधा किमी के रास्ते मे पुलिस कर्मियों के बीच आपसी संवाद की कमी दुःखद थी जिसमे आम नागरिक दो पाटों के बीच पिसने को मजबूर था। हम प्रधानमंत्री की सुरक्षा-व्यवस्था का सम्मान करते  पर है शासन-प्रशासन को आम नागरिकों की भी न्यूनतम सुविधाओं का भी तो कम से कम ध्यान रखना चाहिए? जिसका आभाव पुलिस प्रशासन के अमानवीय व्यवहार से परिलक्षित हो रहा था। जिस पुलिस अधिकारी, कर्मचारी की जो मर्जी हुई उसने प्रधानमंत्री की सुरक्षा के नाम पर अपने आदेश को लागू कर दिया फिर आम नागरिक या वरिष्ठ नागरिक को कितना भी शारीरिक या मानसिक कष्ट क्यों न हो?

एक युवा छात्र अंकित दुबे की सहायता से जैसे तैसे हम अंबेडकर चौराहा बोर्ड ऑफिस पहुंचे जहां से एक ऑटो पकड़ हम रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन के पाँच नंबर प्लैटफ़ार्म पर पहुंचा  जहां पर जाने की अनुमति सामान्य यात्रियों को थी। छात्र अंकित के अनुरोध पर उनकी स्कूटी का नंबर हमने छुपा दिया।  चारों तरफ सफसफ़ाई की चाक-चौबन्द व्यवस्था थी। यहाँ पर भी एक बार पुनः  पुलिस अधिकारियों मे संवाद की कमी और अमानवीय व्यवहार की झलक दिखाई दी। प्रवेश द्वार पर राज्य पुलिस एवं रेल्वे पुलिस फोर्स के अधिकारी एवं कर्मी सुरक्षा मे तैनात थे, जिनमे अधिकतर व्हाट्सप-व्हाट्सप्प खेल रहे थे। प्रवेश द्वार पर स्टेशन के नाम बदलाव का कार्य संबन्धित रेल स्टाफ द्वारा किया जा रहा था। गेट पर स्थित सुरक्षा कर्मियों ने बताया कि आपकी ट्रेन के निश्चित समय 3.15 बजे से पंद्रह मिनिट पूर्व ही आपको प्लैटफ़ार्म पर जाने की अनुमति होगी तब तक आपको यही इंतजार करना होगा। पुलिस अधिकारियों के आदेश को शिरोधार्य करने के अलावा, खुले आसमान के नीचे तेज धूप मे इंतज़ार के सिवा कोई अन्य विकल्प तो था नहीं!! क्योंकि इस विश्व स्तरीय रेल्वे स्टेशन के पार्किंग स्थल पर कहीं  कोई शेड की व्यवस्था नहीं थी जिसके नीचे छुप धूप या पानी से बचा जा सके।

भला हो उन स्टेशन अधीक्षक महोदय का जो अपनी आधिकारिक यूनीफ़ोर्म मे उसी समय स्टेशन के बाहर आये जिस समय कुछ अन्य यात्री भी पीएम महोदय की सुरक्षा चक्रव्यूह से बचने के लिए घरों से 2 घंटे पूर्व स्टेशन पहुंचे थे। पुलिस ने उन्हे भी गाड़ी के छूटने के पंद्रह मिनिट पूर्व तक खुले आसमान मे इंतजार करने का हुक्म सुना दिया था। लेकिन स्टेशन अधीक्षक महोदय ने हस्तक्षेप कर कन्फ़र्म टिकिट होल्डर को प्लैटफ़ार्म पर जाने की अनुमति दे दी। अपनी आदत के मुताबिक मैंने शालीनता पूर्वक पुलिस अधिकारियों को उनके  आपसी संवाद के आभाव मे यात्रियों को होने वाली परेशानी की ओर ध्यानाकर्षित कराया पर शायद उनके लिये ये कोई नई बात नहीं थी उनके लिये ये आम आदमी की दुःख तकलीफ देखते रहना एक नित्य पृक्रिया थी।

अब तनिक इस विश्व प्रसिद्ध स्टेशन की स्थिति पर  दृष्टिपात कर ले। स्टेशन के दोनों ओर के प्रवेश द्वारों की बनावट जरूर आकर्षक तरीके से हवाई अड्डों की तरह थी पर हबीबगंज उर्फ रानी कमलापति स्टेशन के प्लैटफ़ार्म पूर्व की तरह है बड़े एवं साफ सुथरे थे। पहले इस स्टेशन पर एक प्लैटफ़ार्म से दूसरे पर जाने हेतु बने पुल पर सीढ़ियों की जगह लंबे  रेंप बनाए गए थे जिन पर यात्री बगैर किसी थकावट के आवागमन कर सकता था जिन्हे तोड़ कर अब सीढ़ियों के साथ स्वचालित सीढ़ियाँ अर्थात एस्कलेटर बनाये गए थे। बिजली या किसी तकनीकी खराबी के आभाव मे अब प्लैटफ़ार्म बदलने मे हम जैसे वरिष्ठ नागरिकों को दादा-नाना याद हो आयेंगे? हाँ एक विश्व स्तरीय अतरिक्त भूमिगत पैदल मार्ग का निर्माण भी प्लैटफ़ार्म को जोड़ने के लिये बनाया गया है जो रेल पटरियों के नीचे से यात्रियों को एक प्लैटफ़ार्म से दूसरे पर जाने की सुविधा प्रदान करता है। इस सामान्य क्षैतिज मार्ग पर बाएँ मुड़ कर आप प्लैटफ़ार्म नंबर एक पर जा सकते है एवं दाहिने मुड़ आप पाँच नंबर पर जा सकते थे।  इस तरह की सुविधा मैंने दशकों पूर्व कानपुर सेंट्रल रेल्वे स्टेशन पर देखी थी जो आज भी सुचारु रूप से जारी है सिवाय एक बदलाव के कि कानपुर मे इस सामान्य  क्षैतिज मार्ग को  लोग रात-विरात  इसे  मूत्रालय की तरह उपयोग करते है जो यहाँ अभी इस भूमिगत पैदल मार्ग मे देखने नहीं मिला। जो एक अन्य बदलाव था कि प्लैटफ़ार्म पर बना शेड सीमेंट की शीट की बजाय आधुनिक घुमावदार टीन शेड से बना था। जगह जगह टीवी स्क्रीन पर समय, प्लैटफ़ार्म नंबर, बोगी नंबर दर्शाते स्क्रीन लगे थे जिनमे खाली समय पर बंसल टीवी के विज्ञापन दिखाये जा रहे थे जिसे इस विश्व स्तरीय स्टेशन के रख रखाव का ठेका दिया गया था। मै अपनी भोपाल पदस्थपना के दौरान सैकड़ों बार इस स्टेशन पर आया या गया हूँ, पूर्व की भांति साफ सुथरे बड़े प्लैटफ़ार्म पर  प्रवेश और निकासी द्वार के अतिरिक्त रेल्वे स्टेशन पर ऐसा क्या विश्व स्तरीय बदलाब किया गया मुझे समझ नहीं आया। हाँ प्लैटफ़ार्म नंबर एक पर पार्किंग के बगल मे एक 7-8 मंजिल निर्माणरत बिल्डिंग जरूर नज़र आयी जिस पर  बंसल टीवी का बोर्ड लगा हुआ था (आखिरी चित्र) जो शायद विश्व स्तरीय रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन के  निजीकरण का परितोषिक रहा होगा।

विजय सहगल                          

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

अपहरण -2

"अपहरण -"




मैंने अपने ब्लॉग 13 जून 2021 मे एक अपहरण की घटना का जिक्र किया था (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/06/blog-post_13.html) और उसमे एक अन्य अपहरण की घटना लिखने का जिक्र किया था। आज अपहरण की उस  दूसरी घटना का विवरण पर ब्लॉग लिख रहा हूँ।  डबरा मे पदस्थपना की वो घटना मुझे आज भी ताज़ा है। 2008 या 09 की बात है। शाखा मे लंच के बाद का समय था। अचानक हमारे एक स्टाफ सदस्य के घर से  फोन आया कि उनका  बेटा जो उनके घर के नीचे की गली मे खेल रहा था, कुछ लोग उसे मोटरसाइकल पर बैठा कर ले गये। सूचना गंभीर थी। हमारे स्टाफ सदस्य तुरंत घर की ओर दौड़े। घटना की पूर्ण जानकारी अप्राप्त थी अतः मैंने अपने  दो साथियों को भी पीछे पीछे उनके घर रवाना किया। उनको हिदायत थी कि घटना की जो भी जानकारी हों मुझे भी तुरंत अवगत कराये। एक अस्थाई सबस्टाफ के साथ मै ही  शाखा मे शेष था। कुछ देर बाद ही एक अन्य स्टाफ सदस्य जो पीढ़ित साथी के घर पर पहुँच गये थे, ने फोन कर सूचित किया कि बच्चा मकान के नीचे गली मे अन्य बच्चों के साथ खेल रहा था। अचानक मोटरसाइकल पर सवार दो लोगो मे से एक ने बच्चे को गोद मे उठा मोटरसाइकल पर बैठाया और वहाँ से फरार हो गये। साथ मे खेल रहे बच्चों ने तुरंत ही घटना की खबर बच्चे की माँ को दी। हमारे स्टाफ की श्रीमती जी ने तुरंत ही फोन पर अपने पति को शाखा मे फोन कर घटना से अवगत कराया। सूचना पा कर हमारे साथी तो तुरंत ही घर निकल गये पर घटना की खबर से शाखा मे सन्नाटा छा गया।

कुछ सूझ नहीं रहा था क्या करे। किम कर्तव्य विमूढ़ की स्थिति थी। हमारे स्टाफ जिनका बेटे को जो असामाजिक तत्व ले के गये क्या बीत रही होगी इसकी कल्पना ही की जा सकती है। अचानक मैंने अपने आपको नियंत्रित कर घटना की जानकारी अपने प्रादेशिक कार्यालय को दी और अनुरोध किया कि अपने स्तर पर आपको जो भी उचित जान पड़े कीजिये तब तक मै अन्यन्त्र फोन करता हूँ। अब तो जैसे मुझे राह सूंझ गई मैंने अपने संगठन के साथियों को फोन पर इस आपात घटना की खबर कर कहा कि कानून व्यवस्था से जुड़े शासन-प्रशासन के उच्च अधिकारियों को घटना से अवगत करा पुलिस प्रशासन का सहयोग ले।

हमारी शाखा परिसर के स्वामी श्री हरी बाबू शिवहरे जो डबरा के गणमान्य नागरिक भी है को भी फोन कर बच्चे के अपहरण की घटना से अवगत करा अपने प्रभाव का इस्तेमाल पुलिस प्रशासन से त्वरित सहयोग लेने का अनुरोध किया ताकि बदमाश जो शहर के आसपास ही होंगे घेराबंदी हो सके। हमारे बैंक परिसर  के मालिक के भाई श्री आर के शिवहरे  जो उन दिनों इंदौर मे डीआईजी पदस्थ थे एवं मेरे अच्छे परिचित भी थे उन्हे भी फोन कर घटना की जानकारी दे मदद की अपील की। चूंकि डबरा जिला ग्वालियर के अंतेर्गत होने के कारण ग्वालियर की शाखाओं मे पदस्थ साथी मैनेजरों को भी तुरंत फोन कर उक्त सनसनीखेज घटना से अवगत करा अनुरोध किया कि 4-5 लोग एकत्रित होकर ग्वालियर स्थित जिला पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर घटना मे अविलंब कार्यवाही के लिये कहे। हमारी शाखा के ही एक सम्मानित ग्राहक जो डबरा के आगे ही दतिया राष्ट्रीय राजमार्ग पर थाना इंचार्ज थे से भी सतर्कता के लिये कार्यवाही का अनुरोध किया। उस समय मुझे जो जिस किसी भीव्यक्ति का स्मरण आया जो इस घटना मे मेरी सहायता कर सकता था उसे मैंने फोन कर सहायता की अपील की जिसमे मेरी शाखा के एक मीडिया कर्मी भी शामिल थे।

इसी बीच त्वरित गति से ग्वालियर के साथी प्रबन्धकों ने श्री सूर्यवंशी जी, जिला पुलिस अधीक्षक ग्वालियर से मुलाक़ात की। श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय को तब तक इस अपहरण की जानकारी मिल चुकी थी। उन्होने हमारे साथियों को अवगत कराया कि घटना मे अवशयक कार्यवाही शुरू हो चुकी है। अब तक घटना की जानकारी स्थानीय स्तर से लेकर  प्रादेशिक स्तर पर कानून व्यवस्था से संबन्धित विभागों को पहुँच चुकी थी।         

घटना के बमुश्किल 20-25 मिनिट मे जिन जिन महनुभावों, मित्रों, शुभचिंतकों को फोन कर अपहरण की घटना मे सहयोग की अपकेक्षा की थी, परिणाम भी आने लगे। डबरा पुलिस ने त्वरित कार्यवाही कर शहर के सभी नाकों पर गश्त बड़ा दी। शहर से जाने वाली सड़कों पर विपरीत दिशा से आ रहे लोगो से अपहृत बच्चे की जानकारी ली तो ज्ञात हुआ कि भितरवार रोड पर दो मोटर साइकल सवारों के बीच एक बच्चे को देखा गया है। अब डबरा पुलिस की गाड़ियों का  रुख भितरवार रोड पर भितरवार कस्बे की ओर था। वही भितरवार पुलिस को सूचना दी गई कि वो डबरा जाने वाली सड़क की तरफ कूँच करे। इस सम्पूर्ण कार्यवाही को डबरा के तत्कालीन एसडीओपी श्री चौबे जी (पूरा नाम याद नहीं) स्वयं अंजाम दे रहे थे।

मध्य प्रदेश पुलिस की द्रुत और तेज कार्यवाही के कारण भितरवार शहर की प्रवेश सीमा पर ही अपहरणकर्ताओं और पुलिस का सामना हो गया। डबरा से भितरवार की दूरी लगभग 40 किमी॰ रही होगी एसडीओपी महोदय पीछा करते हुए अपराधियों के नजदीक जा पहुंचे। आगे और पीछे से पुलिस की दविश को देख अपहरणकर्ता चौंक गये। उन्हे अंदेशा नहीं था कि उनके इस कुत्सित कृत पर पुलिस तीव्र और  त्वरित गति से बदमशों के पीछे लगी है। इस  आपाधापी मे अपहरणकर्ता बच्चे को छोड़ एक स्थानीय सूखी नदी पर बने पल की ओर मोटर साइकल छोड़ कर भागे। पुलिस ने तेजी से भाग कर  पहले बच्चे को अपने कब्जे मे सुरक्षित लिया ताकि गुंडे-बदमाश उसे किसी भी हिंसा आदि से क्षति न पहुंचा सके। अन्य पुलिस बल उन उन्हे दबोचने हेतु उनके पीछे दौड़ा। बाद मे जैसा कि पुलिस अधियाकरी महोदय ने अवगत कराया कि बदमाश बच्चे को छोड़ भितरवार कस्बे के बाहर नदी पर बने पुल पर पुलिस के घेरे मे फंस गये जिसमे एक बदमाश ने पुलिस से बचने की चेष्टा मे नदी पर बने पुल से छलांग लगा दी! नदी सूखी थी रेत मे ऊंचाई से कूदने के कारण उसकी मौत हो गयी। कुछ लोगो की कानाफूसी मे जानकारी लगी कि उक्त बदमाश को पुलिस ने मुठभेड़ मे मार गिराया। हालांकि इस मुठभेड़ की कार्यवाही की स्पष्टता की पुष्टि अब तक भी सुनिश्चित नहीं है।

हमारे ग्वालियर शाखा के स्टाफ विजय गुप्ता, यशवीर सिंह, राजेंद्र सिंह आदि पुलिस अधीक्षक महोदय ग्वालियर से मिलकर उनके कार्यालय से बापस बाहर निकले ही  थे कि पुलिस अधीक्षक महोदय ने उन सबको बापस बुलवाकर सूचना दी की अपहृत बच्चे को सकुशल बरामद कर एक बदमाश को गिरफ्तार कर लिया गया है जबकि दूसरा बदमाश पुलिस से बचने के चक्कर मे नदी के पुल से कूदने के कारण मारा गया।    

बाद मे ग्वालियर पुलिस अधीक्षक महोदय के डबरा प्रवास पर हम बैंक के स्टाफ के लोग उनसे मिले और पुलिस स्टाफ एवं विशेषकर एसडीओपी श्री चौबे की इस अपहरण की घटना मे  त्वरित, शीघ्र एवं तीव्र कार्यवाही पर अनेकानेक आभार एवं धन्यवाद ज्ञपित किया जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम थी साथ ही इस घटना मे हमारे बैंक के कुछ सम्मानीय ग्राहकों, मित्रों, बैंक के बरिष्ठ अधिकारियों साथियों ने पुलिस प्रशासन के समक्ष घटना को लाकर जो अप्रत्यक्ष सहयोग किया वह भी कम नहीं था। जिसके के कारण एक अनहोनी घटना होने से बच गयी।

विजय सहगल            

रविवार, 7 नवंबर 2021

पेंगोंग त्सो लेक

 

"पेंगोंग त्सो  लेक"







20 सितम्बर 2021 के दिन हमारे समूह को पेंगोंक लेह के लिये प्रस्थान करना था। दुनियाँ की सबसे ऊंची खारे समुद्र की झील पेंगोंक जिसकी नुब्रा घाटी से दूरी लगभग 274 किमी॰ थी जिसको लगभग आठ घंटे के लक्षित समय मे पूरा करना था। बस के चालक पुंचुक की जगह अब रिंछिन थे। आज की यात्रा भी पिछले दिनों से कठिन और दुरूह होने वाली थी। बस चालक ने बताया कि यात्रा का कुछ रास्ता अति दुर्गम और पत्थरीला है। नुब्रा घाटी के गगनचुंबी उघारे पर्वतों को अपनी यादों मे  सँजोये हम लोग सुबह के नाश्ते के बाद  पेंगोंक झील के लिये आगे बढ़े। पर्वतों की ऊंचाई वाली बीमारी के विरुद्ध ली जाने वाली  दबा डायमोक्स  की कुछ अतरिक्त गोलियां स्टॉक मे जमा की ताकि इस दुर्गम ऊंचाई के डर और रूग्णता से निजात मिल सके। रास्ता लंबा और कठिन भी था। दूर-दूर तक ठंडे रेगिस्तान मे जहां तक निगाह जाती ऊंचे ऊंचे निर्जन पहाड़ नज़र आते मानों वनस्पति विहीन होने को  अभिशप्त हों?

सारे रास्ते मे कहीं कोई आवास नज़र आये-न-आये पर सेना की चैकसी पूरी चाक-चौबन्द थी। सैनिक वाहन सारे रास्ते आते जाते नज़र आते। कुछ जगह तो अल्पाहार और लघु शंका आदि की व्यवस्था स्थानीय लोगो द्वारा सैनिकों के सहयोग मे ही उपलब्ध करायी जा रही थी। ऐसे ही "तंगत्से" स्थान पर एक छोटे पर पर्यटकों की भीड़ वाले रेस्टुरेंट मे हल्का फुल्का लंच लिया क्योंकि अभी लगभग 3 घंटे की रास्ता शेष थी।

अब हम लोग श्योंक नामक गाँव मे पुलिस जाँच चौकी पर कुछ देर के लिये रुके तो ड्राईवर ने बताया कि यहाँ से एक रास्ता पेंगोंक त्सो झील को एवं दूसरा रास्ता दौलत बेग ओल्दी के गलवान घाटी की ओर जाता है जो चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा के नजदीक है। गलवान घाटी का नाम सुनते ही पूरे शरीर मे रोंगटे खड़े कर देने वाले रोमांच का अनुभव हो  उठा और सहसा ही भारतीय सेना के उन बीस वीर सपूतों की याद हो आयी जिन्होने कर्नल संतोष बाबू के नेतृत्व मे 15 जून 2020 को देश की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुति दी थी। गलवान घाटी के  उन बीस  वीर सैनिकों की तस्वीरे आँखों के सामने आ गयी जिन्होने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया थी। शहीद भूमि तक तो सुरक्षा कारणों से पहुँचना संभव न था पर एक मिनिट उस रास्ते की ओर मुंह करके उन बहादुर सपूतों को अपनी मौन एवं विनम्र श्रद्धांजली अर्पित कर उस पथ को नमन किया जो गलवान घाटी की ओर जाता था।  उन शहीदों को श्रद्धांजलि  रूप मे दिनांक 6 जुलाई 2020 लिखित भावांजलि  का लिंक आज पुनः आप लोगो के साथ सांझा कर रहा हूँ - https://sahgalvk.blogspot.com/2020/07/blog-post_6.html

अब हमारी अगली मंजिल श्योंक गाँव से 57 किमी॰ पेंगोंक झील थी जहां हम लोगो का एक रात्री प्रवास था। 134 किमी॰ लंबी इस झील का लगभग 33% अर्थात लगभग 45 किमी॰  हिस्सा हिंदुस्तान के कब्जे मे है बाकी शेष 66% अर्थात लगभग 87 किमी॰ हिस्सा चीन के पास है। पूर्वी लेह-लद्धख को पश्चिमी तिब्बत से जोड़ने वाली इस खारी झील का पूरा हिस्सा सर्दियों के चरम पर जम जाता है। ऐसी चर्चा थी कि ये समुद्री जल से भी खारे  पानी की झील है इस शंका को दूर करने हेतु जैसे ही मैंने झील के पानी का स्वाद लेने हेतु चुल्लू से पानी लिया तो मुझे इसका खारा पन समुद्री जल से काफी कम लगा लेकिन तेज चलती हवा और ठंडक ने हथेली को ठंडक से सुन्न कर दिया तुरंत ही रुमाल से पानी को पोंछने पर राहत लगी। तेज ठंडी हवाओं ने टोपी, मफ़लर ग्लब्स  पहनने को मजबूर कर दिया। लेकिन झील के प्राकृतिक  सौन्दर्य ने उपस्थित सभी सदस्यों का मन मोह लिया। समुद्र की  सी उफनाती लहरों का जिनका आवेग समुद्र से काफी कम था हिलोरे  ले रही थी, लेकिन निस्तब्ध वातावरण मे लहरों की आवाज को स्पष्ट सुना जा सकता था।  हमारे ग्रुप के सभी सदस्यों ने अपनी उपस्थिती को व्यक्तिगत और समूहिक रूप से विभिन्न कोणों और दृष्टिकोणो से अपने अपने मोबाइल फोन के कैमरों मे कैद किया।

झील के पानी के बदलते रंग ईश्वर जनित इस चित्रकारी के त्रिदर्शीय आयाम के दर्शन करा रहे  थे। पानी की शतप्रतिशत पारदर्शिता इस बात का संकेत थी कि झील एवं यहाँ का पर्यावरण पूर्णतयः प्रदूषण मुक्त है। दिल्ली जैसे शहरों मे रह रहे लोगो के लिए प्रदूषण मुक्त वातावरण किसी सपने से कम न था।  हिलोरे लेते पानी के नीचे के एक-एक कण और पत्थर के टुकड़ों को पूर्णतः स्पष्ट देखा जा सकता था। तमाम कोशिशों और प्रयासों के बावजूद किसी जलचर  मछ्ली के दर्शन नहीं हुए। वनस्पति एवं जंतुओं से विहीन इस झील और पर्वत मे दूर दूर तक नितांत वीरानी के दर्शन कहीं आत्मा से परमात्मा के साक्षात्कार का अहसास करा रहे थे जिसे शब्दों के परे दिल मे ही महसूस किया जा सकता था।  झील के दूसरी तरफ दिखाई दे रहे पहाड़ो पर ऐसा प्रतीत होता मानों लाल-सुनहरी, मटियानी रंग की  रेत के टीलों पर जमी सफ़ेद बर्फ की लकीरे शरीर पर दिखाई देने वाली श्वेत रक्त धमनियाँ हों। इन उघारे वनस्पति विहीन पहाड़ों के पीछे वर्फ से ढँकी चोटियाँ किसी वयोवृद्ध साधू सा अहसास करा रही थी जो अपनी सफ़ेद जटाओं को विखेर अपनी सुधबुध भूल तपस्या मे लीन हों। पर्यटन की दृष्टि से मीलों दूर झील के किनारे पर बनी अष्ट भुजाकार चबूतरे पर आठ लौह खंबों पर पड़े लाल रंग का टीन शेड की आकृति इस झील का एक पहचान चिन्ह बन चुकी है। टीन शेड के नीचे सुंदर अर्ध वलयाकार लोहे की छड़ों पर छोटी छोटी पत्तियों की ज्योमिति आकृतियाँ सुंदर दिखाई दे रही थी। मानव निर्मित ये लौह स्तंभों पर टिकी आकृति के दोनों ओर मीलों दूर तक दिखाई देने वाले रेगिस्तान मे एक आश्रय स्थल का अहसास कराती है जो सकारात्मकता से परिपूर्ण भरपूर ऊर्जा चारों ओर बिखेरती प्रतीत होती है।           

हम लोगो का दुर्भाग्य है कि प्रकृतिक सौन्दर्य से भरपूर स्थानों को फिल्मों से जोड़ कर याद रखने और उससे अपने आपको जोड़ कर अपने सौभाग्य को सराहने की परंपरा है जिसका मै धुर विरोधी हूँ। पेंगोंग झील के किनारे इस  स्थान पर एक फिल्म के कुछ प्रतीक चिन्हों को सँजो कर लोग फोटो खिंचवा रहे थे।  मै उक्त फिल्म और उसके "टपोरी नचैये"  का  यहाँ उल्लेख कर इस पेंगोंग त्से जैसे प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर इस अत्यंत खूबसूरत स्थान के कद और महत्व को कम करना नहीं चाहता। 

झील के किनारे दो ढाई घंटे के भ्रमण पश्चात हम लोगो अपने आश्रय स्थल टेंटों की ओर रवाना हुए। इस पूरे क्षेत्र मे कोई स्थायी संरचना और भवन दिखाई नहीं दिया। टेंट की व्यवस्था मे रत योगेन्द्र सिंह ने बताया कि अक्टूबर माह के शुरू होने के कुछ दिन बाद ही हम लोग शीत कालीन मौसम की शुरुआत के पूर्व यहाँ से प्रस्थान कर जाएंगे क्योंकि चारों तरफ बर्फवारी होने के कारण यहाँ रुकना असंभव हो जाता है। लेकिन इस जघन्य सर्दी के बावजूद हमारे सेना और सुरक्षा बलों के जवान यहाँ से मीलों आगे तक देश की रक्षार्थ तत्परता से डटे रहते है जिनके सामने  श्रद्धा और सम्मान से सिर स्वतः ही नतमस्तक हो झुक जाता है।

हमारे एक साथी ने कार्यक्रम बनने के दौरान शंका जताई थी कि पेंगोंग के टेंट मे व्यवस्थापक  रात के ओढ़ने बिछाने के कपड़ों का अभाव उत्पन्न कर उपलब्ध नहीं कराते है?  जिससे सर्दी मे रात काटना कठिन हो जाता है। मै  चिंतित था पर एक एक अतिरिक्त रज़ाई और कंबल देख उक्त आशंका निर्मूल साबित हुई। टेंट लगभग वायु रोधी थे। रात भर चली साँय-साँय हवाओं के बावजूद  टेंट के अंदर सर्दी का कोई असर नहीं था। हम लोग अच्छी भरपूर नींद के बाद जब सुबह छह बजे के लगभग जागे तो अपने कुछ साथियों के साथ पुनः पेंगोंग झील के किनारे सुबह का लुत्फ लेने झील किनारे पहुँच गए। कलकत्ता के कुछ पर्यटकों से सौजन्य भेंट हुई। झील किनारे अपनी आस्थाओं इच्छाओं  के प्रतीक एक के उपर एक कई पत्थरों की आकृति देखी  जो शायद ईश्वर से अपनी  मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु निवेदन का प्रतीक थी। तस्वीर को लेते हुए मैंने भी ईश्वर से उस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण करने  हेतु गुहार लगाई। झील से उपर बने सफ़ेद टेंट की कतारें सुंदर दिखाई दे रही थी जिनमे वातावरण के विपरीत मानव श्रम और कौशल ने पर्यटकों को एक सुखद आश्रय उपलब्ध कराया था। 

इस तरह हम एक बार फिर से पेंगोंग से लेह की यात्रा के लिए तैयारी मे लग गए।

विजय सहगल