"चंद्रभान
यादव"
क्या आप चन्द्र भान से बाकिफ है? शायद नहीं। परिचित तो मै भी नहीं था। पर उस दिन दिनांक 14 नवम्बर 2021 को जब अपने भोपाल प्रवास पर मै अपने मित्र श्री अश्वनी मिश्रा का स्कूटर लेकर बावड़ियाँ चौराहे से अपने घर की तरफ जा रहा था। सड़क से जाने वाले अपने सहयात्रियों के बीच पहली नज़र मे एक मोटरसाइकल को नज़रअंदाज़ कर मै आगे बढ़ गया, पर अचानक मोटर साइकल के पीछे लगी छोटी सी ट्रॉली ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। मैंने आगे खड़े होकर एक क्षण पुनः गौर से जा रही मोटर साइकल पर लगी लोहे की जाली से बनी ट्रॉली को देखा जिसने मुझे प्रभावित किया। उस पात्र के बारे मे कुछ और अधिक जानने के पूर्व मेरे दिल मे आया क्यों ने कुछ सेकेंड्स का एक स्वाभिक विडियो उस व्यक्ति का मोटरसाइकल से ट्रॉली को ले जाते हुए बनाया जाये! इस हेतु मैंने उस मोटर साइकल से आगे निकल मोबाइल से वीडियो बनाने हेतु पोजिशन ले खड़ा हो गया पर दुर्भाग्य!, शायद पान के शौकीन उस मोटरसाइकल चालक ने बावड़ियाँ चौराहे से यू टर्न लेकर अपनी ट्रॉली एक पान की दुकान पर खड़ी कर दी और मै उस घटना का विडियो बनाने से वंचित बापस उस पान की दुकान पर उस मोटरसाइकल चालक के बारे मे जानने की उत्सुकता से उसके पास पहुँचा।बातचीत के दौरान उस युवा ने अपना नाम चंद्रभान यादव बताया। मैंने बड़ी जिज्ञासा और उत्कंठा पूर्वक उस मोटरसाइकल का निरीक्षण किया। एक सामान्य मोटरसाइकल को पीछे से एक कीले के लीवर के माध्यम से लोहे की जाली से बनी पहिये की ट्रॉली से जोड़ा गया था। ट्रॉली मे तरीके से बनी अलमीरा मे बच्चों के लिये बने ऊनी वस्त्र एवं महिलाओं के दैनंदनी आवश्यकताओं की कुछ वस्तुओं को विक्रय हेतु रखा था। आज के इस दौर मे जब युवाओं मे उपलब्ध अवसरों के बावजूद हताशा निराशा के लक्षण दिखाई देते हों। तमाम युवा रोजगार के लिये संसाधनों की कमी के बहाने एवं शासन प्रशासन को कोसते नज़र आते हों, इन अभावों के बीच चन्द्र्भान यादव जैसे युवा एक दिशा देने वाला दिखाई दिया। जो रोजगार के नए नए साधन और माध्यमों के साथ अपनी जीविका उपार्जन कर रहा था।
नाम की औपचारिकता
के बाद जब मैंने चंद्र्भान से उसके व्यवसाय एवं उसकी इस विशेष ट्रॉली गाड़ी के बारे
मे पूंछा तो उसने बताया कि पहले वह गाड़ी चलाता था तब उसने पंजाब मे किसानों द्वारा
दूध की सप्लाइ हेतु इस तरह की गाड़ी देखी थी। अपने खुद के व्यवसाय के शुरू करने के
लिए उसने पंजाब के आईडिया मे कुछ बदलाब के साथ इस ट्रॉली गाड़ी का उपयोग चलती फिरती
दुकान के रूप मे किया। जब मैंने चंद्रभान से उसकी शैक्षिक योग्यता के बारे मे
पूंछा तो मुझे लगा कि शायद मैंने उसको हीन भावना से ग्रसित कर दिया। मैंने उसका
उत्साह वर्धन के आशय से कहा चंद्रभान तुमने वो कम किया है जिसे बड़े से बड़े
इंजीन्यरिंग के छात्र नहीं कर सकते। तुम्हारी मेहनत और रोजगार करने की चाह
प्रशंसनीय है। मैंने चंद्रभान की मोटर साइकल की कुछ फोटो उसकी ट्रॉली के साथ
खींची। चद्र्भान ने ट्रॉली मे विनमय हेतु
रखे सामान से मुझे अवगत कराया।
श्री चंद्रभान के
एक बात जिसने हमे और भी ज्यादा प्रभावित किया वो ये थी कि चंद्रभान भोपाल मे
निर्माणाधीन इमारतों मे कार्यरत मजदूरों के मध्य ही अपना व्यापार करते है। उनका
कहना था कि ये मजदूर शहर के बाज़ारों मे जा कर खरीद फरोख्त करने मे सक्षम नहीं।
सर्दी के मौसम की शुरुआत हो चुकी है। उनकी ट्रॉली के पहुँचते ही मजदूर अपने लिए और
अपने बच्चों के लिये ऊनी कपड़े क्रय करने पहुँच जाते है। जब कभी मजदूर कपड़ो की कीमत
ज्यादा होने के कारण संकोञ्च करता है तो चंद्रभान अपने लाभ के हिस्से को कम कर
मजदूर को वह कपड़ा कम कीमत पर भी बेच देते है और कभी कभी बिना लाभ के भी कपड़े मजदूर
की मालीहालत और हैसियत देख बेच देते है। कपड़ो की कीमत कम करने की ये नीति वह ग्राहक के रहन सहन और हैसियत देख कर
ही करते है जिनमे मुख्यतः मजदूर ही होते है। अच्छी आर्थिक हैसियत के लोगो से वे तय
लाभ के मार्जिन पर ही व्यापार करते है।
किसी गरीब मजदूर के
प्रति उनकी हमदर्दी और सहानुभूति की उनकी
इस व्यावसायिक सोच की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। एक ओर जहां पढे लिखे
इंजीनियर, स्नातक और अन्य युवा रोजगार हेतु शिकवे शिकायत करते है
वही चंद्रभान जैसे कम पढे लिखे नौजवान
बेरोजगारी को अपने स्वयं के रोजगार के
माध्यम से अपनी नयी बाइक ट्रॉली के
आविष्कार के साथ चुनौती स्वीकार कर अपना रोजगार सफलता पूर्वक चला रहे है तो उनके
इस कार्य की तारीफ तो होनी ही चाहिये। जब मैंने पूंछा कि उनके रोजगार से उनके
परिवार का जीवन यापन कैसा चल रहा है? तो चंद्रभान ने ईश्वर के
प्रति आदर और सम्मान मे हाथ जोड़ कर धन्यवाद दिया। उन्होने बताया हमारी अवश्यकताओं
की पूर्ति उनके इस व्यवसाय से हो जाती है। बच्चे स्कूल मे पढ़ने जाते है। नजदीक के
गाँव मे ही छोटा सा मकान है और वे परिवार के साथ सुख पूर्वक सम्मानजनक जीवन व्यतीत
कर रहे है। अंबानी, अदानी
जैसे धनाढ्य व्यक्ति को देख लगता है कि जीवन मे आर्थिक उपलब्धि प्राप्त करने की
कोई सीमा नहीं पर संतुष्टि का जो स्तर एवं
सुख का जो अनुभव मैंने चंद्रभान जैसे युवा
के चेहरे पर देखा, शायद
ही इन धनाढ्यों को नसीब होता होगा? इस
युवा को देख अत्यंत प्रसन्नता हुई,
ईश्वर से उनके सुखी एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करते हुए मैंने बावड़ियाँ चौराहे
से अपने घर की ओर प्रस्थान किया।
विजय सहगल