गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

निरक्षण का राग दरबारी

"निरक्षण का राग दरबारी"

 



कुछ दिन पूर्व मैंने अपने ब्लॉग "गैर निष्पादक परिसंपातियाँ" पर बैंक अधिकारी के कार्य प्रणाली पर दृष्टिपात किया था (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/11/blog-post_20.html) आज बैंक के निरीक्षण के महत्व पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहा हूँ।  बैंक के निरीक्षण का कार्य कहने सुनने मे तो अति महत्वपूर्ण विभाग और कार्य प्रतीत होता है पर  निरीक्षण के कार्य को शाखाएँ कितने गंभीरता से लेती है उसकी एक बानगी मै आपके साथ सांझा कर रहा हूँ। यूं तो तत्कालीन नवांगंतुक अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ने निरीक्षण विभाग को बैंक का आँख कान जैसे अलंकारों से नवाज कर इस विभाग की प्रशंसा की थी तब लगा था कि हम भी बैंक के विकास मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। पर वास्तविक धरातल पर ऐसा था नहीं। एक समय निरीक्षणालय, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र मे 17-18 निरीक्षकों के अतरिक्त 6 कार्यालीन स्टाफ भी था। कालांतर मे  एक-एक कर उक्त छह स्टाफ मे 2 तो सेवानिवृत हो गए एवं अन्य चार का स्थानंतरण हो गया। काम का सारा वोझ से कार्यलय का कार्य प्रभावित होना स्वाभिक  था। कार्यालय प्रमुख के साथ पदस्थ एक  अतरिक्त एजीएम भी कार्यालय मे पदस्थ थे। उनका अधिकतर प्रवास प्रधान कार्यालय मे वीता था। मैंने प्रमुख सर से कार्य विभाजन कर कुछ काम को उन्हे आवंटन हेतु निवेदन किया। एजीएम साहब का मानना एवं कहना था प्रधान कार्यालय मे एजीएम कार्य नहीं करते अपितु उनके अधीन अधिकारी ही कार्य करते है। छः लोगो के काम को एक अधिकारी द्वारा करने पर मैंने प्रतिवाद किया और जैसे तैसे कार्यालय के कार्य का विभाजन दो लोगो के बीच हो गया।

नियमित निरीक्षण (आरबीआईए) का कार्य हमारे वरिष्ठ एजीएम साथी देख रहे थे पर पूरे डाटा का संकलन हमारे जिम्मे था। इस निरीक्षणालय मे एक चलन था कि निरक्षक शाखा का निरीक्षण समाप्त कर रिपोर्ट के तीन सेट बना शाखा प्रबन्धक के सुपुर्द इस अनुदेश के साथ  कर देते है कि पहली फ़ाइल शाखा अपने पास रख शेष दो फ़ाइल एक प्रादेशिक कार्यालय और दूसरी प्रादेशिक निरीक्षणालय को प्रेषित कर दे तत्पश्चात इंस्पेक्टर वही से किसी अन्य शाखा के निरीक्षण हेतु प्रस्थान कर जाते थे। बैंक की नीति/नियमानुसार शाखा प्रबन्धक से अपेक्षा की जाती थी कि नियमित निरीक्षण रिपोर्ट मे उल्लेखित गंभीर त्रुटियों को 45 दिन मे एवं शेष अन्य त्रुटियों को 90 दिन मे निराकरण फ़ाइल को बंद कराएं।

एक दिन बड़ी आश्चर्य जनक घटना सामने आई। दिसम्बर माह मे कार्यालय प्रमुख की नज़र दो शाखाओं के निरीक्षण रिपोर्ट पर पड़ी। मेरे अनुसार उन दो शाखाओं का निरीक्षण नहीं हुआ था पर उनका कहना था कि उक्त शाखाओं का निरीक्षण हो चुका है। नियमित निरीक्षण का कार्य देख रहे एजीएम साहब से जब चर्चा हुई तो उन्हे भी स्मरण हुआ कि उक्त दोनों शाखाओं का निरक्षण तो हो चुका है। चूंकि निरीक्षण रिपोर्ट की फ़ाइल कार्यालय  मे न आने के कारण निरीक्षण रिपोर्ट का डाटा अपडेट नहीं हुआ था। गहराई से जब उन अधिकारी महोदय ने छान बीन की तो ज्ञात हुआ कि उंक्त शाखाओं का निरीक्षण हुए तो छः माह हो गए!! पर शाखा प्रबन्धकों ने निरीक्षण की उक्त रिपोर्ट न तो प्रादेशिक कार्यालय मे प्रेषित की और न ही दूसरी प्रति प्रादेशिक निरीक्षणालय को प्रेषित की जिसके कारण उक्त फ़ाइल का डाटा रिकॉर्ड मे शामिल ही नहीं हुआ।

जब उन शाखा प्रबन्धकों से इस संबंध मे पूंछ-तांछ की तो पता चला निरीक्षण रिपोर्ट अभी भी उनकी शाखाओं मे पड़ी धूल खा रही है। उक्त शाखाओं के प्रबन्धकों से कारण बताओ नोटिस जारी कर औपचारिकताओं की पूर्ति की गई।

शाखाओं और नियंत्रण कार्यालयों द्वारा निरीक्षण के महत्व को उक्त घटना से देखा और समझा जा सकता है कि जिस निरक्षण फ़ाइल को त्रुटियों का निराकरण कर तीन माह मे बंद किया जाना था उक्त निरीक्षण रिपोर्ट पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया और छः माह तक शाखा मे पड़ी धूल खाती रही। उक्त घटना ने मुझे भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था पर श्री लाल शुक्ल जी द्वारा लिखित उपन्यास "राग दरबारी" की यादें पुनः एक बार ताजा कर दी एवं निरीक्षण के कार्य का बैंक मे महत्व भी परिलक्षित हो गया।

विजय सहगल  

 

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

लोकतन्त्र का हरण

"लोकतन्त्र का हरण?"





आज 6  अप्रैल 2021 को माननीय समाज पार्टी राज्य सभा सांसद श्रीमती जया बच्चन ने टोली गंजविधान सभा क्षेत्र के टीएमसी  विधायक के पक्ष मे प्रचार किया। किया भी जाना चाहिए ये उनका लोकतान्त्रिक अधिकार है कि वे किसके पक्ष मे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करें। माननीय जया जी के वक्तव्य की शुरुआत बिल्कुल फिल्मी अंदाज मे तमतमायेँ चेहरे की भाव भंगिमा के साथ थी। जिसे मै हू-ब-हू रख रहा हूँ साथ ही हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत है:-  

I  want to say that Do not hijack my religion from me. Do not! never.  Do not hijack my democracy and democratic right from me!! and when I  say "me" , I represent  all the people and that is why I am here. Because  Mamta Bainerji is fighting, strugglingA single lady to preserve the democratic right of every individual of Bengal. Bengal thinks and does much  before rest of the country and the world does॰ पूरा विडियो लिंक के माध्यम से देखा जा सकता है। (https://www.youtube.com/watch?v=ytR5EZBjWxU)

हिन्दी रूपांतर- मै कहती हूँ कि मुझसे  मेरे धर्म का बलात हरण मत करों, कदापि नहीं!! कभी नहीं!! मेरे प्रजातन्त्र एवं मेरे प्रजातांत्रिक अधिकारों का बलात हरण मुझसे मत करो!! और जब मै कहती हूँ "मेरे" अर्थात सभी लोगो के जिनका मै प्रतिनिधित्व करती हूँ और इसीलिए मै यहाँ हूँ!! क्योंकि ममता बैनर्जी, एक मात्र महिला, बंगाल के प्रत्येक व्यक्ति के  लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा के लिये  लड़ रही है, संघर्ष कर रही है। जब देश और दुनियाँ कुछ करने का विचार करती है, तब तक बंगाल, उनसे बहुत आगे सोच कर अंजाम तक पहुंचा देता है।   

शुरुआत मे बंगाली भाषा मे बंगाल की उन्नति के लिए उनकी अपील ममता बैनर्जी के पक्ष मे थी, समझ आता है। लेकिन  हिन्दी सिने जगत का दुर्भाग्य रहा कि हिन्दी के माध्यम से प्रसिद्धि और समृद्धि प्राप्त करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियाँ जिनके प्रसंशक इनको अपने सिर आँखों पर बैठाते है। जब ये अपनी मातृ भाषा मे बात करते है तो प्रशंसनीय है लेकिन  प्रायः हिन्दी भाषा के उपर अँग्रेजी भाषा को संवाद मे प्राथमिकता देना सरहनीय नहीं अपितु निंदनीय है। कुछ ऐसा ही व्यवहार एवं आचरण श्रीमती जया जी द्वारा उनकी पत्रकार वार्ता मे देखने को मिला।  श्रीमती जया बच्चन के तेवर उस वक्तव्य मे बड़े तीखे थे जब उन्होने अपने बंगाली और अँग्रेजी मिश्रित वक्तव्य मे कहा जिसका हिन्दी रूपांतर यूं था  "मै ये कहना चाहती हूँ कि "मुझ से मेरे धर्म का बलपूर्वक हरण मत करो"। एक महा नायिका ने बिलकुल सही फरमाया, कौन मूढ़मति ऐसा दुस्साहस कर सकता है जो  देश के जाने माने परिवार से उसका धर्म बलपूर्वक छीन सके? कौन सा ऐसा धृष्ट/ढीठ होगा या जो अपना सत्यानाश कर आत्मघात करने के लिए आमादा होगा  जो अभिनय के क्षेत्र के दिग्गज अभिनेत्री  का धर्म का हरण कर सके? आखिर इशारा किस व्यक्ति या राजनैतिक दल पर था? निश्चित तौर पर बंगाल पर शासित वर्तमान टीएमसी सरकार  पर तो होगा ही नहीं क्योंकि वे तो ममता बैनर्जी  सरकार के समर्थन मे प्रचार करने जो आई थी। लेकिन श्रीमती बच्चन शायद ये भूल गई कि जिस ममता दीदी के समर्थन मे आज वो बंगाल मे प्रचार करने आयी थी उनके ही पिछले कार्यकाल मे इन्ही दीदी ने "सरस्वती मूर्ति पूजन/विसर्जन" पर प्रतिबंध लगा भद्र बंगाली समुदाय  के धर्म का बलात हरण कर प्रतिबंधित किया था!! वो तो भला हो माननीय न्याय व्यवस्था का जिसके कारण  माननीय कलकत्ता हाई कोर्ट के हस्तक्षेप से 21 सितम्बर 2017 को इस त्रुटि पूर्ण धर्म भेद करने वाले निर्णय को निरस्त किया गया था। इसी  कारण वे अपनी इस मनमानी और निरंकुश कारगुजारी मे सफल न हो सकी थी। सही है मेडम बच्चन "बड़े आदमी का धर्म तो धर्म है और गरीब असहाय के धर्म को कोई भी ऐरा गैरा नत्थू अपनी निरंकुशता का परिचय दे कभी भी प्रतिबंध लगा दे? आदरणीय जया जी आज आप अपने धर्म के हरण के लिये हैरान, परेशान है? क्या आपमे साहस है कि गरीब, और असहाय के धर्म पालन हेतु  आप ममता बैनर्जी से "सरस्वती पूजन पर लगाए प्रतिबंध के वारे मे सवाल पूंछ सकें?

माननीय सांसद जया बच्चन जी मुझे उम्मीद ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आपकी सासु माँ ने धर्म के रक्षार्थ गुरु तेग बहादुर जी के शीश बलिदान की कथा अवश्य बताई होगी या आप स्वयं भी जानती होंगी। अपने लिये तो दुनियाँ लड़ती है लेकिन मै आपको गुरुवाणी की वो पंक्तियाँ स्मरण कराना चाहता हूँ  "सूरा सो पहचानिए, जो लरै दीन के हेत, पुरजा-पुरजा कट मरै कबहू ना छाडे खेत" को सच किया।

एक बात और माननीय सांसद महोदय, अभिनय के क्षेत्र मे पारंगत और पराकाष्ठा प्राप्त व्यक्ति  मानवता, देश और समाज पर आये संकट के समय मर्सिडीज कार खरीद का भौड़ा प्रदर्शन नहीं करते अपितु अभिनय के महा नायक तो  सोनू सूद जैसे लोग है जो मानव धर्म निभाने के लिये अपने धर्म हरण  का छद्म स्यापा न करते हुए मानव सेवा के लिये गरीब मजदूरों, श्रमिकों और मेहनतकश लोगो की सेवा मे सड़कों पर खड़े रहते है।       

अगली कढ़ी के रूप मे माननीय जया जी ने अपने प्रजातंत्र एवं लोकतान्त्रिक अधिकारो के बलपूर्वक हरण के विरुद्ध चेताया। एक जन प्रतिनिधि के नाते बंगाल के प्रत्येक व्यक्ति के लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा के लिये ममता बैनर्जी के  संघर्ष का समर्थन किया!! बहुत अच्छा लगा कि उनके  दल समाजवादी पार्टी की कितनी निष्ठा, समर्पण एवं सम्मान लोकतन्त्र के लिये है। मेडम, आप को 2 जून 1995 के लखनऊ  गेस्ट-हाउस कांड का स्मरण तो होगा ही। किन लोकतान्त्रिक मूल्यों के रक्षार्थ उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती पर आपके दल की विचारधारा से पोषित समर्थकों और  अनुयायियों ने हिंसक आक्रमण किया था? कौन से प्रजातान्त्रिक मूल्यों के संस्थापनार्थ आपके दल के समाजवादीयों ने हिंसक अशोभनीय एवं निर्लज्ज आचरण कर "गेस्ट हाउस कांड" का प्रतिपादन किया था। जिन लोकतान्त्रिक अधिकारों की आप बात कर रही है, आपके समाजवादी दल ने प्रजातन्त्र की रक्षार्थ कौन सा उदाहरण प्रस्तुत किया था जिसे आप लोकतन्त्र के इतिहास का उदाहरण बताएँगी?  सुश्री मायावती भी एक महिला के नाते समाज के दबे-कुचले वर्ग के लिए संघर्षरत थी। उनकी मान मर्यादा को आपके दल के लोगो ने  किस तरह तार-तार किया, देश आज भी उसे भूला नहीं है! क्या एक महिला और सांसद होने के नाते एक बार भी आपके दिल मे अपने दल के सदस्यों के  अमर्यादित आचरण के विरुद्ध आक्रोश नहीं आया?

14 अप्रैल 2019 को आप ही के दल के सांसद मोहम्मद आज़म खान की रामपुर मे जयप्रदा पर की गई  वो निर्लज्ज, शर्मनाक और आपत्ति जनक टिप्पड़ी तो याद होगी ही जिसका उल्लेख करने मे भी मुझे घिन आती है! क्या विचार रखती है आज़म खान और उनकी जयप्रदा पर की गई टिप्पड़ी के वारे मे? अदरणीय जया बच्चन जी आप माने या न माने, वास्तव मे ये दोनों ही घटनाएँ लोकतन्त्र के नाम पर कलंक और काला धब्बा थी। लोकतन्त्र ही नहीं महिलाओं की मान मर्यादा पर लगातार चोट!! जैसे अनेकों दृष्टांत, मिसाल और नमूने आपके दल मे भरे पड़े है जिनका आप सांसद होने के नाते प्रतिनिधित्व करती है।      

जिस लोकतन्त्र की  बलात हरण की और उसके रक्षण की दुहाई आप दे  रही है पिछले दस बरस से बंगाल मे उसके चीर हरण, देश सहित सारी दुनियाँ ने देखा और विशेष कर बंगाल के भद्र जनों ने महसूस किया है। पूर्व मे जिन वामपंथियों द्वारा जो कमीशन खोरी, चंदा बसूली, चिट फंड घोटालेवजी का अभियान, अपने संगठित गुंडा गिरोह के माध्यम से दशकों तक पश्चिमी बंगाल मे किया जाता रहा, विश्वास था कि ममता दीदी के आने से उससे आम जनों को राहत मिलेगी। लेकिन हा!! दुर्भाग्य पिछले दस वर्षों मे कट मनी, टोलाबाजी, गुंडा बसूली  पश्चिमी बंगाल मे अब तक बदस्तूर जारी है।  किस तरह लोकतान्त्रिक अधिकारों का बलपूर्वक हनन किया जा रहा है! राजनैतिक मत भिन्नता मे आये दिन हिंसा आम बात है, लोकतान्त्रिक अधिकारों से मिले मताधिकार के प्रयोग पर टीएमसी के गुंडा तत्व हत्या करने पर भी नहीं चूकते जिसके अनेकों जीते  जागते  उदाहरण पश्चिमी बंगाल के  पिछले दौर के मतदान के दृश्य, समाचार पत्रों और "दृश्य माध्यम" के माध्यम से  सर्वविदित है। वर्तमान पदस्थ मुख्यमंत्री किस तरह सुरक्षा बालों के विरुद्ध संघर्ष के लिये लोगो को भड़का रही है ये आज दिनांक 10 अप्रैल 2021 की घटनाओं से जग जाहिर है। देश और दुनियाँ मे अपनी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, और बुद्धिजीविक पहचान बनाने वाले बंगाली भद्रजनों के विरुद्ध जो अभद्र व्यवहार बंगाल मे हो रहा है, राजनैतिक पर्यटन पर पश्चिमी बंगाल पधारे आप जैसे "शुभद्र जन" उसे क्या जाने??

ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी ने जो संदेश तीन बंदरों के माध्यम से हम सब को दिया था उसमे आपने अपनी सुविधा और सहूलियत अनुसार आवश्यक संशोधनों कर अंगीकार कर लिया है। जिसके अनुसार "बुरा देख कर भी मौन रहने", "बुरा सुन कर भी मौन रहने", बुरा बोल  कर भी मौन रहने"!! की नीति और रीति अपना ली हो। लेकिन कदाचित ही कोई सच्चा समाजवादी ममता दीदी के समर्थन और तथाकथित समाजवादीयों के साथ खड़े होने मे अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता हो!! 

विजय सहगल


बुधवार, 7 अप्रैल 2021

धनी राम

 आदरणीय  प्रधान मंत्री जी,

ये है श्री धनी राम जी, शारदा बालग्राम, न्यू सिटी सेन्टर ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में गार्ड है। उम्र 48 वर्ष। कल 7 अप्रैल 2021 को मुरार जिला अस्पताल ग्वालियर में कोविड वैक्सीन लगवाने 11 बजे अपने आधार कार्ड के साथ गए थे। वैक्सीन के लिये उनका दूसरा प्रयास था। कर्मचारियों ने ये कहकर टरका दिया कि तुम स्वस्थ हो तुम्हें वैक्सीन की जरूरत नही। पहले मोबाइल नम्बर के कारण बापस किया था। महोदय ये कर्तव्यहीन, निष्ठुर कर्मचारी कैसे गरीब और दबे कुचले वर्ग के साथ  कोविड वैक्सीनेशन के कार्यक्रम को  पलीता लगा असफल बनाने में लगे है। कृपया जांच कर सख्त कार्यवाही करे।

विजय सहगल



मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

शहरे खांमोंशा

 

"शहरे खांमोंशा"



कुछ दिन पूर्व मैंने एक ब्लॉग लिखा था "टॉइलेट एक अप्रेम कथा (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/10/blog-post_16.html) जिसमे बैंक हेतु शाखा परिसर लेते समय टॉइलेट की उपेक्षा के संबंध मे प्रबंधन के रुख के बारे मे लिखा था। इस बार एक ब्रांच के शाखा परिसर के अपने अनुभव के बारे मे विचार सांझा कर रहा हूँ। मुझे प्रबंधन द्वारा शाखा के नवीन परिसर लेने की नीति नियम के अनुसार प्रबंधन भरसक कोशिश करता होगा कि बैंक परिसर की स्थिति ऐसी जगह हों जहां वर्तमान मे व्यवसाय अच्छा मिले और साथ मे भविष्य मे भी व्यापार व्यवसाय की अच्छी संभावना हो।

अपने निरक्षण कार्यालय मे पदस्थपना के दौरान कुछ शाखाओं के परिसर की व्यापारिक दृष्टि से स्थिति या मौके की जगह पर शाखा का खोलना अजीब लगा था। एक शाखा के निरीक्षण के दौरान तो एक अजीब ही घटना घटी। उस  शाखा मे निरीक्षण के दौरान  एक बार लंच पर जाते समय शाखा के कुछ दूरी पर एक सुंदर सी हरे भरे पेड़ो से घिरी एक  खूबसूरत प्रवेश द्वार से बनी निर्माण आकृति के पास से  होकर निकले तो  देखा प्रवेश द्वार बहुत ही अच्छे कीमती पैंट से रंगा हुआ था।  ऐसा प्रतीत होता था अंदर कहीं किसी  बड़े धनाढ्य  आदमी का बंगला हो क्योंकि बाहर से घने पेड़ो के कारण  अंदर कुछ दिखाई नही  देता था। सुंदर प्रवेश द्वार पर स्टील धातु के बड़े  आकार के चमकदार बड़े शब्दों से लिखा था "शहरे खाँमोशा" तब हमे लगा शायद अंदर कोई हाउसिंग सोसाइटी होगी। मैंने जिज्ञासा वश उस  शाखा प्रबन्धक जिनका नाम आज भी याद है "श्री रंगैया बाबू" था से पूंछा?  ये किसी धनाढ्य व्यक्ति का बंगला लगता है? या कोई हाउसिंग सोसाइटी है? तो उन्होने अपनी मधुर मीठी दक्षिण भारतीय (वे आंध्रा के रहने बाले हैं) हिन्दी मे बताया "न सर, ये तो वोहरा मुस्लिम का ग्रेव यार्ड (कब्रिस्तान) है" जहां वे लोग शहर के अपनी कम्यूनिटी के मृतक लोगो को दफनाते है। मै सुनकर आश्चर्य चकित था और अपनी हंसी न रोक सका और सोचा कही खुदा न खास्ता देर रात ब्रांच खुली तो कोई खूबसूरत हूर  के भेष मे कोई भूत प्रेत या प्रेतनी   बैंक मे खाता खुलवाने या जमा/निकासी के लिये न आ जाये, रंगैया! जरा सावधान रहना ?

हो सकता है मै गलत हौऊ या पता नहीं क्यों मुझको लगता है या शायद आपको भी लगता होगा  कि हमारे प्रबंधन को  बैंक परिसर के लिये मुख्य बाज़ार या व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जगह पर कोई परिसर क्यों नहीं मिलते? वही अन्य बैंक या प्राइवेट बैंक को वही उसी शहर मे ही समुचित जगह उपलब्ध कैसे हो जाती है?? जबकि दोनों ही व्यावसायिक संस्थान के नाते ज्यादा से ज्यादा और अच्छे से अच्छा व्यवसाय प्राप्त करना चाहते है। मै जानता और मानता हूँ कि हमारे बैंक के स्टाफ अपनी उत्तम और कुशल ग्राहक सेवा के लिये जाने और माने जाते है पर महज ग्राहक सेवा का महत्व जंगल मे तो नहीं ही आँका जा सकता? इसके लिये व्यवसायिक लोकेशन का अपना अलग महत्व है जिसके कारण हमारे प्रबन्धक वार्षिक लक्ष्यों की प्राप्ति मे अन्य प्राइवेट बैंकों से  प्रायः पिछड़ जाते है।

 

विजय सहगल

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

ओबीसी-अवसान

 

                   "ओबीसी-अवसान"






आज 1 अप्रैल 2021 को ओरिएंटल बैंक के पीएनबी मे  समामेलन का एक वर्ष पूर्ण हो गया है। इस दुःखद अवसान के पहले वर्ष मे अभी भी कुछ चिन्ह पूर्व ओबीसी या पूर्व यूनाइटेड बैंक के पंजाब नेशनल बैंक के  मुख्य बोर्ड पर दिखाई दे रहे हों लेकिन आने वाले समय मे शायद ये चिन्ह भी ज्यादा समय पीएनबी बैंक के सूचना पट पर दिखाई न पड़े और ओबीसी के "चिन्ह" हमारी स्मृतियों मे ही शेष रह जायें।  

मेरे जैसे हजारों साथियों का पूर्ववर्ती ओबीसी, ज़िंदगी का एक हिस्सा हुआ करता था। मुझे याद है अस्सी के दशक मे मेरे जैसे अनेक युवा ओबीसी परिवार का हिस्सा बने थे। बैंकिंग उद्धयोग मे एक अलग ही सांस्कृतिक पहचान थी ओबीसी की जिसे "ओबीसी कल्चर" के नाम से पहचान मिली। लेकिन कलांतर मे सरकार और सरकारी नीतियों के कारण पीएनबी के साथ समामेलन पश्चात अपने अस्तित्व को खो बैठा। मुझे याद है 1980 के दशक मे जब कभी संगठन के नेतृत्वकारी साथी बैंक के इतिहास के उस नाजुक और बुरे दौर की चर्चा करते थे जब बैंक प्रबंधन ने बैंक को बेचे जाने का निर्णय लिया था और कैसे संगठन ने उस बुरे दौर से बैंक को निकाल उसके अस्तित्व को बचाया था। बड़े-बड़े  ओजस्वी वक्ता अपनी धाराप्रवाह भाषणों मे हम जैसे नवयुवाओं को प्रभावित करते थे।

उस दौर मे प्रबंधन और संगठन के बीच एक सम्मान जनक रेखा खींची हुई थी। एक दूसरे के अधिकार क्षेत्रों मे दखल या अतिक्रमण न करने का एक अलिखित सम्झौता था जो लंबे समय तक निभाया जाता रहा। कर्मचारियों अधिकारियों के प्रोन्नति, स्थानांतरण जैसे मुद्दे आपसी सहमति और समंजस्य से हल किये जाते रहे। इसका सबसे बड़ा कारण सामान्य कर्मचारी/अधिकारियों का साधारण बैंक स्टाफ  के बीच से ही निकल उच्च प्रबंधन मे पहुँचना था। बेशक बुरे दौर मे प्रबंधन और संगठन ने ओबीसी के अस्तित्व को बचाया हो लेकिन कालांतर मे संगठन और प्रबंधन के बीच एक बहुत ही झीना सा या यूं कहे न दिखाई देने वाला पारदर्शी पर्दा शेष रहा था। पारदर्शी पर्दा प्रबंधन और सगठन को दो भागों मे विभक्त करता था जो संस्थान के विकास और स्वस्थ रिश्तों  की दृष्टि से आवश्यक था। लेकिन जब विभक्त करने वाला पर्दा इतना झीना हो जाये की दोनों पहलू एक नज़र आने लगे तो समस्या की शुरुआत होने लगी। इस व्यवस्था मे एक बहुत बड़ी खामी भी नोट की गई कि यदि कोई अधिकारी/कर्मचारी अपने मतैक्य या मतभिन्नता के चलते प्रबंधन या संगठन मे किसी एक से भी असहमत होता तो दूसरे का स्वतः ही दुश्मन हो जाता। जिसके चलते बैंक के आंतरिक ताने-बाने को काफी नुकसान पहुंचा।  जिसके कारण  प्रोन्नति ट्रान्सफर आदि मे स्टाफ के बीच धीरे धीरे असंतोष भी पनपने लगा। इसका एक नकारात्मक पहलू यह भी था कि तत्कालीन प्रबंधन और संगठन के कुछ सदस्यों के मधुर रिश्तों ने अपने स्वार्थपूर्ति हेतु एक दूसरे के स्याह कृतों  को नज़रअंदाज़ कर अनदेखी करनी शुरू कर दिया। एक तरफ कुछ उच्च प्रबंधन अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर अपनी रीति नीति के चलते मन का धन किया वहीं संगठन के कुछ उच्च नेतृत्व कारी साथियों ने प्रबंधन के साथ मिलीभगत कर  पिछले दरवाजे से अपने नज़दीकि रिशतेदारों (भाई-भतीजों, बेटे-बेटियों) एवं नज़दीकि के नज़दीकि रिशतेदारों (मामा, फूफा, मौसा के भी मामा, फूफा मौसा के बच्चों) के  सबस्टाफ के रूप मे नियुक्तियाँ बैंक मे कराई और कुछ समयोपरांत वे क्लर्क, अफसर और मैनेजर के रूप मे बैंक मे पदस्थ दिखाई देने लगे, तब कैसे और किस मुंह से वे संगठन के पदाधिकारी अपने  सामान्य कर्मचारी और अधिकारियों के मौलिक अधिकारों के लिये प्रबंधन से लड़ेते?? उच्च प्रबंधन के कुछ अधिकारियों ने इस बैक डोर भर्ती मे थोड़ी मर्यादा का पालन किया। उन्होने रिश्तेदारों को तो भर्ती नहीं किया लेकिन अपने घर के खानसामा-कुक, घर के नौकर, धोबी, कपड़े धोने, माली, ड्राईवर आदि की निर्वाध भर्ती की।    मुझे लखनऊ की वो घटना याद है जब हम जैसे युवाओं ने हाल ही मे बैंक जॉइन किया था। एक साधारण सी घटना मे शाखा के एक सब स्टाफ ने एक लिपिक स्टाफ के साथ झूमा झटकी करदी। हाल ही के दिनों मे कॉलेज से निकले युवा जोश ने उच्च प्रबंधन से शिकायत की। लेकिन लीपा-पोती कर संबन्धित स्टाफ ने माफी मांग कर मामले को रफा दफा कर दिया। तब हमे ज्ञात हुआ कि स्थानिय नेता जी के बैंक मे 50-60 या इससे अधिक  सदस्य बैंक मे सब स्टाफ के पदों पर भर्ती है और उनका डर और दहशत मुहल्ले के स्थानीय "शोहदे" से कम नहीं थी। ऐसा नहीं था कि उक्त बैक डोर एंट्री केंद्रीकृत थी अपितु ये बीमारी देश के सभी प्रान्तों मे पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण एक समान रूप से व्याप्त थी और बदस्तूर समामेलन तक जारी रही। जिस नेता का जो क्षेत्राधिकार था उसने अपने क्षेत्र मे इस पिछले दरबाजे की  भर्ती का बड़ी निर्लज्जता से   भरपूर दोहन किया। जिन लोगो ने तत्कालीन बैंक के आढ़े समय मे बैंक को  बचाने मे परिस्थिति जन्य संघर्ष किया था दुर्भाग्य से उन्ही लोगो मे से कुछ ने बाद मे बैंक के अच्छे समय मे दुधारू गाय की तरह बैंक का भरपूर दोहन किया।                 

दुर्भाग्य से हम जैसे  अधिकारी/कर्मचारी इन नेताओं के तालुओं के रसास्वादन की सूची मे नहीं थे अर्थात जिनका कोई माई-बाप प्रबंधन या संगठन मे नहीं था वे "मधुर स्वाद", "कृपा पात्र"  से वंचित रह  और  सदैव ही "बैंक की नीति, नियमानुसार" ही प्रोन्नति/ट्रान्सफर/पोस्टिंग से संचालित होते रहे, कभी भी प्राथमिकता की सूची मे न आ सके।  

जैसे जैसे बैंक का विस्तार हुआ कम्प्युटर सेवी, श्रेष्ठ योग्य  नई युवा पीढ़ी ओबीसी परिवार मे शामिल होने लगी, कर्मचारी संगठन के कुछ मुख्य क्षत्रपों मे आपसी स्वार्थ, अहम और अहंकार के टकराव के कारण वे सभी अपनी स्थिति को स्थिर बनाये न रख सके और ईर्ष्या, वैमनस्य के चलते अपनी स्थिति से गिर गये। अपने वर्चस्व और दंभ के कारण आपसी विखराव स्पष्ट दिखाई देने लगा। प्रबंधन के आश्रय और पोषण के चलते, ओबीसी के कर्मचारी और अधिकारी संगठनों मे पाँच सितारा सांस्कृति के कारण संगठन के पुरोधाओं ने कभी दूसरी लाइन की नेतृत्व को पनपने ही नहीं दिया। संगठन की सुख सुविधाओं के उपयोग और उपभोग की स्वार्थसिद्धि के चलते सेवानिवृत्ति के बावजूद  जीवनपर्यंत संगठन छोड़ने को तैयार न थे, कुछ तो मृत्यपर्यंत संगठन के सर्वोच्च पदों को सुशोभित करते रहे।  इसकी एक बानगी का उल्लेख मैंने अपने ब्लॉग मजबूत हाथ (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/01/blog-post_16.html) मे किया था। उनकी इस ऐश्वर्य पूर्ण जीवन पद्धति के चलते उनको न केवल संगठन के मूल उद्देश्यों से भटका दिया बल्कि मजदूर संगठनों के बीच उनको "शाही श्रमिक संगठन" के रूप मे कुख्यात!! कर दिया। इस तरह एक संगठन के नाम पर चाटुकारों का समूह खड़ा हो गया। सिर्फ संगठन की अगुआई करने वाले नेताओं का  यशोगान करने वाले भाट, चारण और दरबारी कवि ही संगठन से लाभान्वित होने लगे, इनके दीगर अन्य सामान्य युवा अधिकारियों और कर्मचारियो ने जिनका  संगठन मे कोई धनी-धोरी नहीं था, संगठन  से किनारा करना शुरू कर दिया जिसकी परिणाम बैंक के मर्जर पश्चात बड़ी संख्या मे कर्मचारी अधिकारियों का अपने पैतृक संगठन एआईबीईए/एआईबीओए को छोड़ अन्य संगठन मे जाने के रूप मे स्पष्ट देखा जा सकता है। देख कर दुःख तो तब और ज्यादा हुआ कि संगठन के इन तथाकथित त्याग और बलिदान करने वाले नेताओं ने अधिकारियों के इस पलायन मे अपनी आँख और कान बंद कर महाभारत मे भीष्म पितामह की तरह अन्याय पर मौन रहे।

सामान्यतः श्रम संगठन की रीढ़ उसके सामान्य सदस्य होते है। विशेषतौर पर बैंकों  मे कर्मचारी एवं अधिकारी संगठन का आपसी तालमेल, एक दूसरे के प्रति समर्पण और विश्वास उसकी मजबूती को दर्शाता है। अधिकारी संगठन को पद और सुख सुविधाओं मे बड़े होने के बावजूद कर्मचारी संगठन को ही "बड़े भाई" की भूमिका से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। दशकों तक इन नेताओं ने अपनी निजी दंभ, अहं और घमंड की पूर्ति हेतु एक दूसरे को नीचा दिखाने मे कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी। यहाँ तक रिश्तों मे इतनी गहरी खाई खुद गई कि अपनी छद्म महत्वाकांक्षा और ईगो एवं बच्चों से भी गिरी सोच के चलते अपने सम्मेलनों और कार्यक्रमों मे एक दूसरे के पदाधिकारियों और सदस्यों को आमंत्रित करना भी समाप्त कर दिया। सामान्य शिष्टाचार के अभाव एवं श्रमिक संगठनों के बीच ऐसे कटु रिश्ते शायद ही किसी अन्य बैंक या संस्थान मे देखने को मिले।  ऐसी ही एक कटुता और ईर्ष्या पूर्ण एक  सम्मेलन का मै गवाह रहा जब भोपाल मे कर्मचारियों के चल रहे एक महा सम्मेलन मे अधिकारी संगठन  के सदस्य सम्मेलन स्थल से चंद मीटर की दूरी पर सड़क के दूसरी ओर होटल मे बैठे रहे। दुर्भाग्य से ओबीसी मे इन दोनों संगठनों की नेताओं की अहं और अहंकार रुपि अधोपतन कारी सोच ने दशकों तक  अधिकारियों/कर्मचारियों  का बड़ा अहित किया है जिसका भरपूर फायदा प्रबंधन ने बांटो और राज करो की नीति अपना कर चरितार्थ किया।

यूनियन की विलासता पूर्ण शैली एवं प्रबंधन के राज्याश्रय के चलते संगठन के संघर्ष का जज्बा पूर्णतः समाप्त कर दिया। एक  कहावत है कि कदाचित "वो सेना ही युद्ध मे विजयी होती है जो शांति काल मे भी युद्ध का अभ्यास करती है"। इस कहावत को सच मे परिवर्तित करने के सभी तत्वों के आभाव के चलते बैंक यूनियन/संगठन निरापद न रह सके। श्रम संगठन के आभूषण रूपी साहस, हिम्मत और अन्याय के विरुद्ध आंदोलन  के आभाव के चलते एक भली तरह चल रहे रीजन के प्रमुख द्वारा अपने निरंकुश शासन को मेरे सहित अनेक  सदस्यों द्वारा देखा और भोगा गया। संगठन द्वारा अनीति के विरुद्ध प्रतिकार की कमजोरी के चलते उन उच्च पदस्थ अधिकारी ने भ्रष्टाचार की सारी हदे पार होते दिखी और जो तत्कालीन समय सर्वविदित थी किन्तु संगठन मे पराक्रम के आभाव के चलते वे अपना कदाचार और अनाचार रूपी उल्लू सीधा करने मे कामयाब  रहे।                           

ये सच है कि ओबीसी के सभी साथी चाहे वे उच्च प्रबंधन मे हों या अधिकारी/कर्मचारी रहे, अधिकतर साथियों ने ईमानदारी और मेहनत से ओबीसी परिवार की सांस्कृति को पोषित किया। आपसी भाईचारे के साथ बैंक के विकास मे अपना सर्वोच्च परिणाम दिया लेकिन कुछ नेताओं और प्रबंधन के कुछ लोगो के कारण बैंक की छवि धूमिल हुई। आज का दिन आत्मनिरीक्षण और आत्ममंथन का है कि कैसे एक श्रेष्ठ संस्थान का अवसान हुआ और जो धीरे धीरे दुनियाँ के पटल से ओझल हो इतिहास की घटना के रूप मे जाने जाते के निकट है। बैंक के मर्जर का ठीकरा सरकार और सरकारी नीतियों पर फूटने के कारण अच्छा ही हुआ कि बैंक  के अवसान के लिये वास्तविक रूप से जिम्मेदार  उन प्रबंधन और संगठन के तथाकथित नेताओं की शाख को बट्टा लगाने से बचा  लिया।   

विजय सहगल