शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

किले का मैदान, झाँसी

 

"किले का मैदान, झाँसी"










मै किले का मैदान, झाँसी बोल रहा हूँ। देश की राजधानी दिल्ली मे जो दर्ज़ा लाल किले के मैदान को हासिल है वो ही दर्ज़ा मुझे झाँसी मे हांसिल था। झाँसी  किले की उत्तरी  तलहटी मे स्थित मैंने जहां  सन् 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संघर्ष  मे झाँसी की महारानी लक्ष्मी बाई को अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष को बहुत नजदीक से देखा है वही सन् 1947 की  देश की आज़ादी के पूर्व एवं पश्चात  गांधी, नेहरू की अगुवाई मे झाँसी के युवाओं को अंग्रेजों के विरुद्ध अपने आगोश मे आंदोलन करते देखा है। स्वतन्त्रता के पश्चात देश की जिन  राजनैतिज्ञों को मैंने   सत्ता प्राप्ति हेतु अपने सीने पर मंच प्रदान किया था और जिनके आवाहन पर  झाँसी की जनता ने उनको सत्ता की शीर्ष पर बैठाया उनमे  श्रीमती   इंद्रा गांधी, श्री अटल बिहारी बाजपई, चौधरी चरण सिंह, और चन्द्र्शेखर जैसे नेताओं ने प्रधानमंत्री पद हांसिल कर  देश की बागडोर सम्हाली। न केवल राजनीति बल्कि झाँसी मे होने वाली सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी मै गवाह हूँ। मानस प्रचारिणी/मानस प्रसारणी  सभा द्वारा प्रति वर्ष कराये जाने वाले सम्मेलन मे  मानस  मर्मज्ञों के सप्ताहांत चलने वाले प्रवचनों की रौनक तो देखते ही बनती थी। सर्दी के मौसम मे चारों ओर पंडाल लगाकर फर्श पर धर्मपरायण मानस प्रेमी रामचरित मानस का श्रवण-मनन करते थे। सितम्बर 1965 की ऐसी ही एक रात मे मानस सम्मेलन के कार्यक्रम मे पाकिस्तान द्वारा भारत पर नापाक हमले  के कारण ब्लैक आउट घोषित होने और किले की प्राचीर पर लगे आपातकालीन सायरन के बजने के  कारण देश की रक्षा-सुरक्षा की खातिर कार्यक्रम को अचानक स्थगित करने का प्रसंग भी मैंने अपनी आँखों से  देखा है।   

 

हर मौसम मे झाँसी के बाल-बृंद, किशोर-युवा, वृद्ध और नर नारियों ने मुझे अलग अलग मौसम मे अपने ही तरह का आदर-सम्मान, प्रेम और अपनत्व दिया था। जहां सर्दियों की गुन-गुनी धूप मे किशोर और बच्चे मैदान मे खेलते, दौड़ते-भागते वही वृद्ध एवं वरिष्ठ जन अपने अपने समूह मे  प्राचीर के नीचे पहाड़ी पर पड़े बड़े-बड़े पत्थरों पर धूप का आनंद लेते चर्चा परिचर्चा करते।  वही गर्मियों मे यही माहौल शाम से देर रात तक मेरे आँगन मे दोहराया जाता।     

 

एक समय वैभवशाली इतिहास का गवाह रहा, मै  "झाँसी के किले का  मैदान" आज  अपनी बदहाली पर मौन खड़ा आँसू बहा रहा हूँ। ये जो बदहाली निराशा और दुःख की तस्वीरे जो आप देख रहे है वो 3 जनवरी 2021 की है। लेकिन मेरे साथ जुल्म-ज़्याती पिछले लगभग चार दशकों लगातार जारी है। रानी झाँसी के जीते जी मेरा वैभव चरम पर था। लुटेरे, षड्यंत्रकारी  अंग्रेज भी झाँसी नगर और  किले सहित इस मैदान को नष्ट-भ्रष्ट करने की हिम्मत नहीं दिखा पाये। लेकिन कैसा दुर्योग, हा! दुःख!! और संताप!! कि मेरी दुर्दशा स्वतन्त्रता के पश्चात अपने ही लोगो ने की, जिन्हे रानी झाँसी के गौरव और मर्यादा से कोई वास्ता न था। स्वतन्त्रता के पूर्व जो गोरे अंग्रेज़ हमारे स्वरूप को आँख उठा कर भी मैला कुचैला करने का साहस न कर पाये स्वतन्त्रता के बाद नगर के  धूर्त और मक्कार  काले अंग्रेज़ और उनके अनुयायियों ने अपने दुस्साहस से मेरी छवि को अपने कुटिल इरादों से ऐसा बदनुमा दाग लगाया जिसे आज भी मै बड़ी पीढ़ा और दर्द  से भुगत रहा हूँ। आइये मै अपनी वेवशी और दुर्दशा की कहानी आज आपके साथ सांझा करूँ :-

जो समाज, शासन  अपने राष्ट्रीय नायकों पर अभिमान न करे और उनके स्मारकों को संरक्षित और सुरक्षित न रख सके कदाचित ही उस राष्ट्र के नागरिकों को देश के सम्मानीय   नागरिक होने का दर्ज़ा हांसिल हो? खेद और अफसोस का विषय है जिस वीरांगना रानी झाँसी   को लोग आज भी  प्रातः स्मरणीय कहते है और  जिसे  देश के सन 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम का  अग्रणी योद्धा होने का  गौरव हांसिल हो एवं जिनका नाम देश के इतिहास मे स्वर्ण अक्षरों मे उल्लेखित है, जिनके वारे मे  देश की मूर्धन्य कवित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी काल जयी रचना मे लिखा हो :-


"चमक उठी सन सत्तावन मे, वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुंह, हमने सुनी कहानी थी॥
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥ खूब लड़ी ..........."

उस महान अमर स्वतन्त्रता सेनानी झाँसी की महारानी लक्ष्मी बाई  की आत्मा आज  वैकुंठ धाम से अपने प्राणों से भी प्यारी झाँसी के किले की घाटी के मैदान की दुर्दशा पर आँसू बहा रही होंगी कि जिस झाँसी की आन बान और शान के लिये उसने अपने प्राणों का बलिदान किया, उसके ऐतिहासिक किले और उसकी घाटी को कृतघ्न झाँसी के नीति निर्धारकों  ने कूड़े के ढेर मे परिवर्तित कर दिया। वहाँ झाड़-झंकाड़ के बीच झाँसी की नगर  पालिका के प्रशासकों ने मनमानी और अशुद्ध आचरण द्वारा  न केवल रानी झाँसी के गौरव और गरिमा को ठेस पहुंचाइ बल्कि   मकानों की मुरम और मलमा के अंबार लगा "कचरे का डम्पिंग यार्ड" बना डाला!! मुझे  कचरे का "घूरा" अर्थात मैदान को  "कूड़ा घर" मे तब्दील कर दिया। किले के मैदान को पुरानी गाड़ियों का कबाड्खाना एवं अवैध कार पार्किंग का अड्डा बना दिया। दुःख, खेद और अफसोस का विषय तब और भी हो जाता है जब झाँसी के आम नागरिक, राजनैतिज्ञ, गणमान्य नागरिक, सामाजिक संगठन, सांसद और विधायक सहित नगर निगम के जनप्रितिनिधि पारिषदों,  नगर की इस    अनमोल विरासत  "किले के मैदान"  की गंदगी, बदइंतजामी और बदहाली पर मौन है?? आज देश और दुनियाँ के पर्यटक झाँसी की ऐतिहासिक इमारत किले की प्राचीर से जब किले के मैदान मे जमा कचरे और उस पर बिलबिलाते कीड़ों, विचरते  जानवरों और वातावरण को प्रदूषित करने वाली बदबू   को देखते होंगे तो निश्चित ही झाँसी की कृतघ्न जनता और नकारा प्रशासकों एवं दोगले राजनैतिज्ञों पर हैरानी जताते हौंगे। जिस किले की तलहटी के मैदान मे बच्चे और युवा  मैदान मे खेलते थे,  बुजुर्ग तलहटी के छोटे बड़े पाषाणों मे बैठ सर्दियों मे धूप सेंकते थे, गर्मियों की शाम किले की तलहटी मे शीतल हवा का आनंद उठा कर अपने सौभाग्य को सराहते थे कि  वे वीरांगना रानी  झाँसी की नगरी  के रहवासी है!! आज उस मैदान को लोग दिन मे  मूत्रालय एवं रात्रि मे असामाजिक तत्व मदिरालय की तरह उपयोग  कर रहे है। निश्चिय ही महारानी की आत्मा चित्कार रही होगी कि उसके जीते जी जिन  विदेशी अंग्रेज़ आक्रांताओं को उसने  अपनी तलवार की चमक के बल पर ललकार कर कहा था  कि "मै अपनी झाँसी नहीं दूँगी" उस झाँसी को अपने ही लोगो ने लूट कर अतिक्रमण का विभत्स और घिनौना अड्डा बना डाला। किसी शायर ने ठीक ही लिखा है:-


"मुझे अपनों ने लूटा, गैरों मे कहाँ दम था"।
"मेरी कश्ती वहाँ डूबी, जहां पानी बहुत कम था"॥

 

विजय सहगल         

 

7 टिप्‍पणियां:

शंकर भट्टाचार्य ने कहा…

सहगल साहब आपके लेख में आपके दर्द बहुत ही ज्यादा झलक रहा है। झांसी का दर्द भी आपको अपने आगोश में ले चुका है। आप बिल्कुल सही कहा। हमारे देश में इंसान कहां बसता है? उछल कूद करने वाले ही यहां के रहवासी होते हैं!
आपकी लेख पढ़कर मुझे भी बहुत दुख हुआ। ग्वालियर शहर भी तो झांसी की रानी का एक स्मृतिबिजरीत रथशहर है! उस रास्ते से मैं भी आते जाते समय झांसी की रानी को प्रणाम करके जाता हूं 🙏🏻
जब झांसी के रहवासियों को कोई चिंता नहीं है तब एक उपाय है। झांसी जागरण मंच के सदस्यों को एक रैली निकालकर नगर निगम में चिट्ठी देना चाहिए। नगर निगम के सहयोग बिना इतना बड़ा एरिया साफ सफाई नहीं हो सकता। इसमें शासन का हाथ होना बहुत जरूरी है। जरूरत पड़े तो ध्यानाकर्षण हेतु आदरणीय योगी आदित्यनाथ जी को भी चिट्ठी दिया जा सकता है। मुझे भरोसा है कि काम हो जाएगा।
झांसी की किले के बारे में आपकी जो चिंता है वह जगजाहिर है और आपका यह लेख बहुत ही अच्छा है!

- शंकर भट्टाचार्य, ग्वालियर।

Unknown ने कहा…

सहगल साहेब का लेख शानदार है झांसी किले के मैदान का इतिहास व वर्तमान दशा पर सच्चाई को दर्शाने के लिए फीटो भी लिए गये आप जैसे झांसी शहर के युवाओं को अपने नौकरी या जिंदगी के भरण पोषड के लिए शहर छोड़ना पड़ा होगा.
लेकिन आप जैसे वहाँ और भी शहर में रह कर यह सब देखने को मजबूर होंगे कहने को तो उनके पास भी बहुत शब्द होंगे जो आज भी किले के मैदान में धूप शेकने पटियों पर बैठते होंगे हो सकता है उनके पास लिखने की ताकत न हो या किसी के पास साधन न हो
मेरा बस चले तो श्रम दान करना शुरू कर दूँ शायद धीरे धीरे और भी लोग जुड़ने लगे जगह कोई भी हो सफाई तो रहना ही चाहिए
मुझे भी इस वर्ष 35 वर्ष हो जायेंगे तब से झांसी छूटा हुआ है आपके लेख पढ़ कर अपने बचपन के दिनों को याद करता रहता हूँ
आपका लेख जरूर कुछ कर दिखायेगा और मैदान पूर्व की तरह दिखता हुआ नजर आयेगा ऐसी आशा है
माता दीन वर्मा 8989648625

Unknown ने कहा…

आपकी लेखनी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है वैसे भी झाँसी में जागरुकता की कमी रही है और राजनीतिज्ञों ने झाँसी के पतन के साथ अपनी उन्नति की है.आपने झकझोरा जरूर है पर स्थानीय लोगों को आगे आकर आवाज उठानी होगी शासन तो उत्तर प्रदेश का ईमानदार है बस उन तक बात कौन पहुंचाएगा यह झाँसी के लोगों को करना होगा.

Pradeep Srivastava ने कहा…

बचपन की यादों को आपने ताज़ा कर दिया ।आजकी दुर्दशा का वर्णन पढ़कर बहुत दुख हुआ ।आशा है कि इस लेख को पढ़कर शहर में कुछ जागरूकता आए ।

Pradeep Srivastava ने कहा…

बचपन की यादों को आपने ताज़ा कर दिया ।आजकी दुर्दशा का वर्णन पढ़कर बहुत दुख हुआ ।आशा है कि इस लेख को पढ़कर शहर में कुछ जागरूकता आए ।

Pradeep Srivastava ने कहा…

बचपन की यादों को आपने ताज़ा कर दिया ।आजकी दुर्दशा का वर्णन पढ़कर बहुत दुख हुआ ।आशा है कि इस लेख को पढ़कर शहर में कुछ जागरूकता आए ।

azadyogi ने कहा…

बहुत ही करुणामयी चित्रण । धन्यबाद ।