गुरुवार, 28 जनवरी 2021

सुरकुंडा देवी मंदिर, धानौल्टी, उत्तराखंड

 

"सुरकुंडा देवी मंदिर, धानौल्टी, उत्तराखंड"








पिछले दिनों 14 जनवरी 2021 को सीपी, दिल्ली मे ट्रैवल ग्रुप ऑफ इंडिया (टीजीआई) के एक कार्यक्रम मे जाना हुआ था। ये किसी एफ़बी पर किसी  ग्रुप मे मेरी पहली मीटिंग थी। सोचा न था इतने अच्छे लोग एकसाथ एक जगह मिलेंगे। श्री राकेश कटारिया जी के नेत्रत्व मे संचालित ग्रुप की ये पहली मुलाक़ात एक यादगार मुलाक़ात रही। ग्रुप की बुरांसखंडा मे सरकुंडा देवी मंदिर की  यात्रा का निमंत्रण मिलने पर जिज्ञासा मिश्रित उत्साह था क्योंकि मै पहली बार किसी ट्रवल्लर्स ग्रुप मे यात्रा पर जा रहा था।    

मेरी एक कमी है स्वादिष्ट भोजन मे मिष्ठान ग्रहण करने के बाद मै कोई चाय, कॉफी, पान, पान मसाला या माउथ फ्रेसनर नहीं लेता ताकि मुंह मे  स्वादिष्ट मिष्ठान का स्वाद देर तक बना रहे। कुछ ऐसा ही संयोग इस यात्रा मे रहा कि सरकुंडा देवी मंदिर के नयनभिराम छवि उस सुखद मिष्ठान की तरह मै अपने मन मे देर तक रखना चाहता था। यही कारण है कि यात्रा के  अंतिम पढ़ाव का वर्णन  लिखने की शुरुआत पहले कर रहा हूँ।  यात्रा के आरंभ का विवरण  अगली कड़ी के रूप मे बाद मे प्रस्तुत करेंगे।

गणतन्त्र दिवस के पवित्र दिन 26 जनवरी 2021 की प्रातः 10 बजे के लगभग ट्रैवलर्स ग्रुप ऑफ इंडिया के कारवां ने वुरांसखंडा से सुरकुंडा देवी मंदिर के दर्शन हेतु प्रस्थान किया। हमारे कार रूपी रथ मे मेरे सहित छः रथी सवार थे और सारथी के रूप मे श्री पुष्कर रावत जी थे  जिनकी रथ संचालन की दक्षता की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है।      

पौराणिक कथानुसार भगवान शिव की पत्नी सती ने यज्ञ मे भगवान शिव को आमंत्रित न करने के कारण अपने प्राणों की  आहुति दे दी थी। किवदंती है कि ये वो पवित्र स्थान है जहां पर सती का सिर गिरा था। ऐसी मान्यता है कि सुरकुंडा देवी के इस  मंदिर मे माँ के दर्शन से भक्तों की मनो कामनाएँ पूर्ण होती है। इन्ही श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के भाव लिये हम लोग अपने ग्रुप के अन्य सदस्यों के साथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर जा पहुंचे। ग्रुप चर्चा मे बताया गया था कि प्रवेश द्वार से मंदिर की दूरी लगभग डेढ़ कि॰मी॰ है। कुछ सहयात्रियों ने हम लोगो के साथ प्रवेश द्वार तक की यात्रा तो की पर अपनी मंदिर तक चढ़ने की असमर्थता के वशीभूत  नीचे से ही सरकुंडा माँ के श्री चरणों मे प्रणाम कर चाय की दुकान पर ही सभी के बापसी आने तक अपना डेरा डाले रहे।

लेकिन प्रवेश द्वार की सीढ़ियाँ चढ़ने पर ही मैंने  अपनी क्षमता का अंकलन कर लिया और बहादुरी से निर्णय लिया कि पैदल मंदिर तक चढ़ना हमारे बूते की बात नहीं और कुछ दूरी पर ही उपलब्ध घोड़े की सहायता लेने के निर्णय मे एक पल की भी देरी नहीं की। मेरा निर्णय मेरी उम्र और क्षमता के अनुरूप सही था क्योंकि मंदिर तक पहुँचने का मार्ग सीमेंट से बना तो था पर काफी ऊंचाई लिये हुएँ था कहीं कहीं ऊबड़ खाबड़ भी था जो हम जैसे उम्रदराज लोगो के लिये कठिन चढ़ाई लिये हुए था। घोड़े के मालिक ने मुझे घोड़े पर  पर सवार किया।  मुझे ये जानकार प्रसन्नता थी कि मेरे सारथी श्री केशव सिंह जी है।  जब बासुदेव भगवान  श्री कृष्ण जिसके रथी हों उनका  भवसागर के पार होना निश्चित है तो फिर सरकुंडा देवी के दर्शन हेतु जिस घोड़े के मालिक साक्षात श्री केशव मेरे साथ थे  तो मंदिर की यात्रा तो सफल होने ही थी। घोडा अपने तय मार्ग से उपर चढ़ रहा था। रास्ते मे ऊंची ऊंची सीमेंट की बेढब सीढ़िया और कहीं बड़े बड़े गड्ढे की बाधाओं को घोड़े ने बड़ी आसानी से पार कर लिया। घोड़े के रथी श्री केशव कभी दायें खिसक कर बैठने तो कभी आगे झुक कर बैठने का निर्देश देते, कभी घोड़े को चाबुक का भय दिखा मंथर गति से उपर चढ़ने का निर्देश देते। घोड़े की सफल सवारी पश्चात अब मंजिल सामने ही थी। मै पूर्व मे गौरी कुंड से केदारनाथ मंदिर तक का 12-13 किमी॰ ट्रेक कर चुका था पर ये डेढ़ दो किमी॰ की चढ़ाई काफी खड़ी, ऊंची व कठिन थी।  

यात्रा मे यध्यपि नौजवान, बच्चों, पुरुष महिलाओं के साथ साथ कुछ प्रौढ़ भी मंदिर तक चढ़ने के हौसले के साथ आगे बढ़ रहे थे। एक नौजवान तो एक पोलियो ग्रस्त युवा को अपनी पीठ पर बैठा चढ़ने के प्रयास के मार्मिक दृश्य को देख मेरा हृदय करुणा से भर गया। पोलियो ग्रस्त युवा का उस नौजवान से क्या रिश्ता था, वो उस युवा का दोस्त था, भाई था या कोई और मै नहीं जानता पर ये निश्चित था कि उसने अपनी  दोस्ती या भाई के रिश्ते बड़ी सिद्दत और समर्पण के साथ निभाया। ऐसे दोस्ती या भाईचारे प्रायः देखने को नहीं मिलती! ऐसे रिश्ते को  मेरा नमन। एक और युवा को साइकिल के साथ पहाड़ की चढ़ाई करते देख भी युवा पीढ़ी के बहादुराना कृत को देख देश के सुखद, सुनहरे व उज्ज्वल  भविष्य को देख खुशी हुई।

मंदिर मे प्रवेश करते ही विशाल प्रांगण मे सूर्य की स्वर्णिम प्रभा मे प्रकाशित एवं  स्वर्ण आभा से चमकता पाँच मंजिला सुरकुंडा देवी का भवन नयनभिराम था। बौद्ध शैली मे बना ये भव्य, विशाल  मंदिर अत्यंत ही आकर्षित एवं सुंदर था। मंदिर के सामने दूर हिमालय पर्वत की हिमाच्छादित चोटियाँ देवलोक का आभास करा रही थी। बर्फ से लदी चोटियाँ ऐसा आभास करा रही थी मानों स्वर्ग  से दुग्ध की धाराएँ फूट नदी के रूप मे आवेग के साथ  पृथ्वी पर आने को आतुर हों।

लंबी कतारों मे अपनी बारी की प्रतीक्षा करता हुआ धीरे धीरे आगे बढ़ा। माँ सुरकुंडा देवी के प्रति आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास लोगो के चेहरे पर साफ दिखाई देता था। माँ सुरकुंडा देवी के दर्शन की अभिलाषा एवं आकांक्षा के उत्साह ने  मंदिर आने तक की थकावट लोगो के  चेहरे से तिरोहित हो चुकी थी। मंदिर मे माँ सुरकुंडा देवी के दर्शन मन और हिर्दय को आनंद देने वाले थे। माँ के चरणों मे दंडवत कर अपने भाग्य को धन्य एवं कृतार्थ मानता हुआ मंदिर से बापस चल दिया। मंदिर प्रांगण की  एक पूरी परिक्रमा कर बापस अपने गंतव्य के लिये धीरे धीरे पहाड़ से उतरता हुआ चल दिया  जो चढ़ने के मुक़ाबले अनेकों गुना आसान और सरल था।

जय माँ सुरकुंडा देवी की-जय!!

 

विजय सहगल                           

 

3 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Excellent Sirji 🙏

azadyogi ने कहा…

बहुत ही सुंदर, पता नहीं मै माँ सुरकंडा देवी जी का दर्शन कर पाऊंगा या नहीं, उन्हें मैं यहीं से प्रणाम करता हूँ, अभी में 71वीं में चल रहा हूँ, माँ का आशिर्बाद रहा तो अवश्य जाऊंगा । ----- योगेन्द्र प्रसाद आजाद, पटना ।

Deepti Datta ने कहा…

Atyant sundar varnan sir. I hv also been to Surkanda Devi once on scooter. Bhawan tak pahunchne par aisa prateet hota hai jaise sab kutch chhodkar bas vahin baith jao...Apaar aatmik anand ki anubhuti hoti hai