"बुरान्सखंडा (पहला पढ़ाव-हरिद्वार)"
संक्रांति वाले दिन 14 जनवरी 2021 को मै ट्रैवल
ग्रुप ऑफ इंडिया के एक एकत्रीकरण मे कॅनाट प्लेस नई दिल्ली मे शामिल हुआ था। 45-50
लोगो से तब मुलाक़ात हुई थी, वहीं तब पता चला था कि
ग्रुप का बुरान्सखंडा जाने का कार्यक्रम है पर सीट सारी पहले ही बुक हो चुकी थी।
ग्रुप प्रमुख श्री कटारिया से भी उसी मीटिंग मे मुलाक़ात हुई थी। मैंने उन्हे कह
रखा था कि कोई भी संभावना हो तो मुझे भी साथ चलने का मौका दे। सौभाग्य से चलने के
दो दिन पूर्व कुछ लोगो का कार्यक्रम मे किन्ही आवश्यक कारणों से जाना स्थगित हो
गया था। श्री कटारिया जी की सूचना आई कि यदि चलना है तो आवश्यक शुल्क तुरंत जमा
करा अपनी विचारधीन सीट को कन्फ़र्म कराएं। मैंने तुरंत ही रात 10-11 बजे पैसे भेज
अपना स्थान सुरक्षित कराया एवं धन प्रेषण की सूचना दी। कटारिया जी ने पूंछा आप
कैसे बुरान्सखंडा पहुंचेंगे। चूंकि कार्यक्रम
के मुताबिक सभी सदस्यों को बुरान्सखंडा अपने साधन से पहुँचना था। मैंने बताया
ट्रेन से देहरादून पहुँच जाऊंगा वहाँ से कोई साधन देख लेंगे। दिल्ली की मीटिंग मे ग्रुप
की चर्चा मे एक "टेग लाइन" सुनी थी "दोस्ती पक्की पर खर्चा अपना अपना"।
अच्छा लगा था क्योंकि धन संबंधी पारदर्शिता आपसी प्रेम सद्भाव को बनाए रखने मे एक अहम
भूमिका निभाता है एवं जो आपसी निष्ठा और विश्वास की बुनियाद भी है। उन्होने
प्रस्ताव भी दिया कि यदि आप चाहें तो एक सदस्य अपने कार से दिल्ली से ही बुरान्सखंडा
जायेंगे आप उनके साथ सीट सांझा कर सकते
है। पाँच अन्य लोग भी साथ मे होंगे। जो भी यात्रा व्यय होगा आप लोग आपस
मे सांझा कर लेना। अंधे को क्या चाहिये दो आंखे, इससे अच्छा क्या प्रस्ताव हो सकता था। मैंने तुरंत
ही हाँ भर दी। तब मुझे लगा कि ग्रुप मुखिया के नाते श्री कटारिया जी मे कुछ विशेष
तो है जो एक मुझ जैसे अपरचित, नए सदस्य का भी इतना ख्याल रखा। लेकिन ये तो उनका सहज स्वभाव ही था जो यात्रा के दौरान सभी सदस्यों
के साथ मैंने देखा।
यात्रा वाले दिन हमारी कार के छः सहयात्रियों का एक
व्हाट्सप उप ग्रुप बना दिया ताकि दिल्ली से प्रस्थान के लिए हम आपस मे अपना
प्रोग्राम तय कर ले। श्री पुष्कर रावत जी जिनकी कार मे हम लोग जा रहे थे हमारा नेतृत्व
कर रहे थे। कार मे 62 वर्षीय मै सबसे वरिष्ठ एवं 17-18 वर्षीय समीर सबसे छोटा था
बाकी के चार सदस्य दोनों के वीच के वय के थे। प्रातः छः बजे आनंद बिहार से ईश्वर
को स्मरण कर अपने प्रथम पढ़ाव हरिद्वार के लिये प्रस्थान किया। कुछ डर था किसान
आंदोलन के कारण कोई बाधा उत्पन्न न हो? पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।
200 किमी॰ तक की हरिद्वार यात्रा पुष्कर जी के कुशल
कार चालन के कारण बगैर किसी अवरोध और बाधाओं के पूरी हुई। इस यात्रा के दौरान
हमारे अन्य यात्री श्री तुषार जी जो युवा सहयात्री समीर के पिता श्री थे एवं
जमशेदपुर से आये ग्रुप सदस्य श्री रिंकू गर्ग थे। एक अन्य सदस्य श्री शरद हम लोगो
के साथ बाद मे हरिद्वार से शामिल हुए। अपने प्रथम पढ़ाव हरिद्वार तक की लगभग 5 घंटे
की यात्रा मे आपसी बातचीत, विचार विमर्श के बाद हमे ऐसा महसूस हो रहा था कि हम सभी यात्री
एक दूसरे से सालों पूर्व से परिचित हों। यात्रा मे सभी एक दूसरे की आवश्यकताओं
चिंताओं को ध्यान कर एक ऐसी निकटता अनुभव कर रहे जो प्रायः घनिष्ठ मित्र एक दूसरे
की करते हों। पुष्कर जी इस कार ग्रुप के प्रमुख के नाते उस स्प्रिंग की तरह थे जो फैलने
पर वरिष्ठ के साथ सिकुड़ने पर अनुज के साथ और मध्यम स्थित मे युवाओं के साथ अपना सामंजस्य
बड़ी आसानी से स्थापित कर लेते।
हरिद्वार मे होटल गंगा व्यू मे रुकने के पहले से ही
व्यवस्था थी। रूम मे सामान रख हम सभी ने हर की पौढ़ी की तरफ प्रस्थान किया। तुषार
जी एवं उनका बेटा काफी लंबे अंतराल के बाद हरिद्वार आ रहे थे। श्री रिंकू जी भी
पहली बार ही आये थे। पुष्कर जी यध्यपि
अपने पैतृक निवास पर हरिद्वार होकर ही जाते रहे पर हर की पौढ़ी पर आने का संयोग नही
हुआ। गंगा नदी की अविरल तीव्र धारा को देख सभी आनंद और उत्साह से सरावोर थे। पौढ़ी
के पूर्व एक दो घाटो पर फोटोग्राफी कर
ग्रुप एवं खुद की सुनहरी यादों को मोबाइल एवं कैमरे मे कैद किया। इसके साथ साथ
किशोर समीर ने हरिद्वार के प्रसिद्ध खान पान को गूगल पर ढूंढ कर उन दुकानों की भी
तलाश की। हरिद्वार की पतली छोटी गलियों मे शीघ्र ही त्यागी जी की मथुरा की
प्रसिद्ध रबड़ी की दुकान से रबड़ी की शुरुआत की। प्रकाश की कुल्फी भी का रसास्वादन भी
इस क्रम मे हुआ। यद्यपि जैन साहब के "कांजी वड़ा" तलाशने मे कठिनाई हुई
लेकिन "मेहनत करने वालों की हार नहीं होती" की नीति पर कांजी वड़े, चाट एवं गोलगप्पे आखिर पा
ही लिये।
मनसा देवी मंदिर के दर्शन हेतु उड़न खटोले की
सेवायें ले माता के दरबार मे हाज़िरी लगाई। और आज के अंतिम पढ़ाव "हर की पौढ़ी"
पर गंगा माँ की आरती के लिये एक अच्छे स्थान को निशाना बना लगभग चार बजे गंगा जल
का आचमन कर उस स्थान पर ही सभी लोगो ने डेरा जमा बैठ गये। आरती मे अभी काफी वक्त
था रावत जी ने अपने कैमरे का ट्राइपॉड सेट किया और हम सभी आपस मे गपियाते,
बतियाते चर्चा करते रहे। मै पहले भी अनेकों बार हर की पौढ़ी पर गंगा आरती मे शामिल
हुआ पर उस दिन एक उल्लेखनीय बात जो मैंने देखी की गंगा नदी का पानी इतना स्वच्छ
निर्मल आसमानी नीला एवं साफ था कि घाट पर स्थित नदी की नीचली सीढ़ियों की तली एक दम
साफ दीख रही थी। मुझे लगता है कि ये सरकार की निर्मल गंगा अभियान का प्रभाव ही था जिसके लिये सरकार को बधाई देना
तो लाज़मी था।
ठीक छः बजे गंगा मैया की जय कारों के साथ नयनभिराम
आरती के दृश्य से आँखे नहीं हट रही थी। विशाल आरती की छवि कलकल बहती नदी मे बहुत
ही सुंदर प्रतीत हो रही थी। बीच नदी मे एक काले बगुले को भोजन की तलाश मे विचरते
देखना इस बात का गवाह था की गंगा के स्वच्छ, अविरल, निर्मल धारा से मानव ही नहीं प्रकृति के जलचर भी
आनंद और उत्साह महसूस कर रहे हों। गंगा सेवा समिति के स्वयं सेवक भी घाट को साफ
सफाई रख कर भक्तों को सुव्यवस्थित तरीके से बैठा कर अपने सेवा भाव को दर्शित कर
रहे थे। लगभग एक घंटे की आरती की छटा से सभी अपने को धन्यभागी मान माँ गंगा की
धारा मे नत मस्तक थे। अपने उपर गंगा जल की छींटे मार शरीर और मन को पवित्र कर हमने
अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया ताकि अगले दिन बहुत सवेरे बुरान्सखंडा की ओर
प्रस्थान किया जा सके।
विजय सहगल


5 टिप्पणियां:
आपका साथ,हमारा विश्वास
यहां तक तो हम आप के विश्वास पर खरे उतरे
आगे पढ़ते है क्या लिखते हो
Shaandaar agli yatra ka varnan ka intjaar 👌🙏
Bahut sundar sir. Kya hum bhi aapke travel group ke member ban sakte hein
सच मानिए तो यह यात्रा मुझे अपने परिवार के साथ कि गयी यात्राओं जैसी ही लगी जिसमे पितातुल्य आप, भाई जैसे रिंकू जी, अति ऊर्जावान अनोखे व्यक्तित्व के धनी पुष्कर जी थे और निसंदेह इस माहौल को देने का श्रेय में आदरणीय कटारिया जी को देना चाहूंगा और बार -बार आप के साथ फिर से यात्रा करना चाहूंगा।
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