पिछले दिनों 9 जनवरी को किले के मैदान झाँसी पर ब्लॉग (https://sahgalvk.blogspot.com/2021/01/blog-post_8.html) लिखा था, पर दिल मे उठी टीस अभी शांत भी न हुई और शब्द बन के पुनः बिखर गये जिन्हे समेट कर आपके सामने रख रहे है। -विजय सहगल
"मै झाँसी की रानी बोल रही....."
हे कृतघ्न राज्यवासी मेरे,
मै झाँसी की रानी बोल रही।
"मैदान किले" के हालत पे,
घुट आँसू आँखों घोल रही॥
तुमको निज गौरव ज्ञान नहीं,
झाँसी का अभिमान नहीं।
जिसकी खातिर बलिदान हुई,
उस माटी का अपमान वहीं?
घर के लोगो का ढीठपना,
ऐसा होगा रोका भी न गया?
पर बूढ़े सहज सयाने थे,
इस ढीठपने टोका भी न गया?
माना संग्राम पुराना था,
सन सत्तावन की माटी मे।
पर, खड़ी आज भी प्राचीरे
बन गवाह किले की घाटी मे।
बेशक उस आँगन, न आते।
न फूल "चौक" चढ़ा जाते॥
कीचड़ कचरे से सराबोर।
मल, मूत्र, मैल, विचरत ढोर॥
जिस आँगन वीर समाते थे।
मुक्ति दिवस मनाते थे॥
हा! शील, शोक, शर्म, लज्जा,
"विपदा" का मेघ घना काला।
मेरे प्यारे से आँगन को,
कचरे का ढेर बना डाला?
जीते जी मै कहती ही रही,
"मै अपनी झाँसी नहीं दूँगी"।
धोखा दे "गोरन" छीन लई,
ले पुनर्जन्म लड़ूँगी मै॥
सन् सत्तावन से भटक रही,
नगरी की गलियाँ न्यारी हैं।
माँ हूँ, धिक्कार नहीं सकती,
"झाँसी प्राणों", जो प्यारी है॥
दुनियाँ मे डंका बजा दिया,
जब "गोरन", झाँसी "रार" भई। (गोरन= अंग्रेज़)
हा! "दुर्दैव" हमारा था,
"रानी" घर मे ही हार गई॥
"सौगंध तुम्हें"!, इस आँगन की,
"मर्यादा" पर मुँह खोलो?
"मर्दानी" इतिहास लिखूँगी फिर,
हे मौन "बुंदेले हर बोलो??
हे मौन "बुंदेले हर बोलो??
विजय सहगल




2 टिप्पणियां:
Great Subhadra Kumari chouhan ko replace kar diya.
सचमुच आपने "खूब लड़ी मर्दानी, बह तो झांसी बाली रानी थी ,,,, कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान लिखित कविता की याद दिला दी, जिसे मैंने कक्षा 10 में वर्ष 1962 में पढ़ी थी । बहुत ही सुन्दर कविता -- खत्री योगेन्द्र प्रसाद आजाद, पटना सिटी ।
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