"मजबूत
हाथ"
बैंक की सेवा मे लगभग उन्तालीस साल के सेवा काल के तमाम खट्टे मीठे अनुभव जीवन की गठरी मे समेटे रखने के साथ ही
लगभग इतने साल की ही अनेकों अनुभूतियाँ
बैंक के संगठनों के साथ भी जुड़ी हुई है जिनका यदा कदा स्मरण होना लाज़मी है। कुछ
ऐसा संयोग मेरे साथ जुड़ा रहा कि मै सेवा के प्रारंभिक समय से ही संगठन से जुड़ा रहा। संगठन मे सक्रिय
भागीदारी शायद नहीं रही लेकिन हमारी
भागीदारी निष्क्रिय भी नहीं थी। कहने के
तात्पर्य यह है कि संगठन के कार्यों या भागीदारी मे जहां कहीं भी मै रहा हमारी उपस्थिती अपरिहार्य रही जिसे उल्लेखनीय वेशक न माना जाये लेकिन नज़रअंदाज़
भी नहीं की गयी। जिसका मुख्य कारण मेरा लखनऊ पदस्थापना के समय श्री यू.सी. बाजपेई,
श्री आरपीसिंह, इंदौर के श्री आलोक खरे,
रायपुर मे कॉम॰ डी.के. चटर्जी,
भोपाल मे श्री वीरू भाई जैसे समर्पित निष्ठावान साथियों से संपर्क,
सानिध्य एवं संगठन के प्रति स्वभावगत रुझान रहा। मेरी ओरिएंटल बैंक के संगठनकारी शीर्ष नेतृतत्व के सानिध्य और संपर्क के रहते इनके
बारे मे राय हमेशा से अलग रही। मेरा हमेशा
से मानना रहा कि हमारे बैंक की यूनियन
अन्य बैंको या बैकों के अखिल भारतीय संगठन से एक मायने मे सर्वथा भिन्न
रही, वह थी यहाँ के नेतृत्व कारी नायकों की पाँच सितारा
सांस्कृति और संगठनात्मक कार्यों मे भी "फाइव स्टार" रहन सहन। यही कारण
रहा कि मै हमेशा अपने बैंक यूनियन्स को "रॉयल यूनियन" अर्थात "शाही
संगठन" कहा करता रहा।
शायद 1998 की ही बात थी। मुझे याद है कि
रायपुर की पदस्थापना के दौरान बैंक कर्मियों के छत्तीसगढ़ मे सर्वोपरि एवं निर्विवाद
नेता कॉम॰ डीके चटर्जी जी का एक बार फोन
आया कि श्री ए बी वर्धन, महासचिव भारतीय
कम्यूनिस्ट पार्टी का रायपुर प्रवास है जो पोस्ट ऑफिस कर्मचारी संगठन,
रायपुर के किसी कार्यक्रम मे भाग लेने
हेतु आ रहे थे। उनको रायपुर हवाई अड्डे से शंकर नगर स्थित गेस्ट हाउस लाने हेतु
कार की सेवाये चाही थी। मैंने चटर्जी दादा को बोल रखा था कि कभी भी संगठन के कार्य
हेतु आने जाने के लिये मेरी कार की सेवाओं की आवश्यकता लगे तो निसंकोच ले सकते है। मुझे
खुशी थी कि अखिल भारतीय स्तर के कद्दावर नेता श्री ए बी बर्धन को अपनी साधारण मारुति 800 मे
बैठाने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हो
रहा था। मुझे इस बात का और भी फख्र था कि
अखिल भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी का महासचिव एक नॉन-ए॰सी॰ कार से अप्रैल-मई मे
रायपुर की भरी दोपहरी गर्मी के मौसम मे हवाई अड्डे से अपने गंतव्य तक 18-20
किमी की यात्रा कर रहा था। वे चाहते तो बड़ी लक्जरी एसी कार की मांग कर सकते थे।
लेकिन एक सच्चे मजदूर संगठन के नेता ने वो ही आचरण प्रस्तुत किया जो एक सच्चे
मजदूर संगठन से अपेक्षा थी। क्या ओरिएंटल बैंक के अधिकारी/कर्मचारी संगठन के अखिल भारतीय अध्यक्ष या महासचिव तो दूर
की बात है किसी अदने से स्थानीय स्तर के नेता से ये अपेक्षा की जा सकती थी कि वह सड़ी सी मारुति 800,
नॉन-एसी कार मे बैठना भी गवारा करता?
मुझे इस बात का घोर आश्चर्य था कि ओरिएंटल
बैंक के अधिकारी संगठन जैसी एक छोटी इकाई का
एक महासचिव एक शानदार लक्ज़री बड़ी
वातानुकूलित कार जिसकी लागत शायद 15-16 लाख थी,
अपने संगठनिक उपयोग के लिये संगठन के
खर्चे से ले सकता है!! और जिसके ड्राईवर का वेतन आदि भी संगठन वहन कर सकता है?
हमे इस बात पर शक है, कि अखिल भारतीय बैंक अधिकारी संगठन के महासचिव या इसके
पैतृक संगठन भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के महासचिव भी ऐसी शानदार गाड़ी का उपयोग
अपने निजी या सांगठनिक आवश्यकताओं के लिये
करता हो?? कदाचित उक्त मजबूत धारणा के वशीभूत ही मै
ओरिएंटल बैंक के अधिकारी संगठन को "शाही संगठन" कहता रहा था।
राजनैतिक दलों की विलासतापूर्ण जीवन शैली की
ये बुराइयाँ हमारे बैंक के अधिकारी संगठन मे भी विध्यमान हो गई जो हमारे बैंक के संगठन की
अधोगति का मुख्य कारण रही। बैंक के स्थानीय शहरी अधिकारी संगठन से लेकर अखिल भारतीय स्तर के क्षत्रपों मे
कुछ को छोड़ कर बगैर किसी सकारात्मक और रचनात्मक कार्य किये पद पर जीवन पर्यंत बने
रहने की अप्रितम लालसा ने हमारे बैंक और संगठन का बड़ा अहित किया। इन्होने संगठन की
विलासता पूर्ण शैली पर वर्चस्व बनाये रखने
की अपनी आजीवन अभिलाषा के कारण अखिल
भारतीय स्तर से प्रांतीय स्तर की इकाइयों मे "सेकंड लाइन" को कभी
प्रोन्नत करने की जहमत ही नहीं उठाई?
बल्कि ऐसे किसी भी व्यक्ति के प्रयास को हतोत्साहित किया। हर स्तर पर पूर्व मे जमे पदधारियों ने सांठगांठ
कर हमेशा अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये नौजवान पीढ़ी को संगठन के पास भी नहीं
फटकने दिया। नौजवान पीढ़ी को संगठन मे लाने
की कभी कोई कोशिश तो दूर छद्म प्रयास भी नहीं किये।
ठकुरसुहाती की तर्ज़ पर नेताओं की पीठ सहलाने
बाले और तलुबे का रसास्वादन करने वालों को ही अपनी टीम मे शामिल किया। अपनी निजी
अहम और स्वार्थ पूर्ति के अहंकार ने संगठन के नये नौजवान साथियों एवं आम सदस्यों
को संगठन से इतना दूर कर दिया कि संकट के समय आम सदस्यों ने नेताओं से दूरी बना ली
जिसके कारण संगठन की संगठनात्मक शक्ति का ह्रास
हुआ जो कि सर्वविदित है। अपने चंद चहेते लोगो के हितों के अलावा बैंक के नये
नौजवान अधिकारियों से संपर्क न रखने एवं उनके हितों को नज़रअंदाज़ करने के कारण ही बैंक
के मर्जर के बाद एका एक अधिकतर अधिकारियों द्वारा एआईबीओए को छोड़ कर दूसरी यूनियन
मे शामिल होना इसका बड़ा जीवंत ज्वलन उदाहरण है।
पिछले दिनों दिल्ली पदस्थपना के दौरान मुझे दिल्ली राज्य बैंक ऑफिसर एसोशिएशन की सामान्य सभा मे शामिल
होने का सौभाग्य मिला। शायद 2017 का साल था। वाईएमसीए सभागार मे सामान्य अधिवेशन
का आयोजन किया गया था। मै भी अधिकारी संगठन के सदस्य के नाते उत्सुकता वश
कॉन्फ्रेंस मे शामिल होने के निश्चिय के
साथ तय समय एवं स्थान पर पहुंच गया। अन्य
शहरों के मुक़ाबले देश की राजधानी दिल्ली जैसे महानगर मे सदस्यों का उत्साह निष्ठा
और समर्पण उल्लेखनीय तो नहीं पर ठीक ठाक
ही कहा जा सकता था। सम्मेलन की शुरुआत शाम के छह सात बजे हुई। हाल के क्षमता के
हिसाब से सदस्यों की संख्या लगभग दो सौ के आसपास थी। परंपरा के मुताविक स्वागत आदि
की परंपरा के निर्वहन पश्चात महासचिव की
रिपोर्ट आदि की औपचारिकता भर नज़र आई। कॉम॰
शर्मा के उद्घाटन सम्बोधन उनकी कर्मचारी संगठन के प्रति निष्ठा और समर्पण के
अनुरूप था। नई कार्यकरणी के गठन के समय यहाँ भी सेवा निवृत्त दशकों से पदस्थ पुराने
नेतृत्व की पद ने छोड़ने की लालसा स्पष्ट द्रष्टि गोचर हुई। यहाँ भी चुनाव की
औपचारिकता भर निभाने की रस्म अदा की जा रही थी। पूर्व मे गठित कमेटी जिसमे महासचिव एवं अध्यक्ष मंचासीन
थे जो दोनों ही बैंक की सेवा से 7-8 वर्ष
पूर्व सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनकी भाषण
शैली के मेरे सहित अनेकों साथी मुरीद थे पर इसके अतिरिक्त कभी कोई उल्लेखनीय रचनात्मक कार्य कभी देखा या सुना हो याद नहीं। संख्या
बल ही हमेशा उनके स्थानीय स्तर से राज्य स्तर तक यहाँ तक कि अखिल भारतीय स्तर तक पहुँचाने मे मुख्य कारक रहा। यहाँ भी महासचिव सहित
एक अन्य कॉम॰ जो प्रेसिडेंट पद के लिये
नामित थे। निर्विरोध निर्वाचन की पृक्रिया पूरी होती इसके पूर्व एक कॉम॰ संजय खान
जो शायद पीएनबी या सेंट्रल बैंक से थे,
तुलनात्मक रूप से काफी यंग थे उन्होने मंच पर आकार सेवानिवृत्त व्यक्तियों द्वारा
कमेटी मे उनकी पुनः पदस्थपना का विरोध
किया।
ट्रेड यूनियन मे परिपक्व साथी कॉम महासचिव का एक रूप मैंने एआईबीओए की चेन्नई स्थित
कॉन्फ्रेंस मे पूर्व मे देख चुका था जहां
उन्होने कॉम॰ श्रीधरन का महासचिव पद पर नामांकन का इस विना पर विरोध किया था
क्योंकि कॉम॰ श्रीधरन उस समय तक सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनकी ओजस्वी वाणी मे "रिटाइरी-रिटाइरी बापस जाओ" के वो
नारे और चेन्नई का वो मंजर हमे आज भी याद है। आज वही कॉम॰ जो स्वयं भी 6-7 साल पूर्व बैंक
सेवा से निवृत्त हो चुके थे लेकिन आज वे दिल्ली राज्य बैंक ऑफिसर असोशिएशन के
महासचिव पद के प्रत्याशी थे। एक ही चेहरे पर अनेकों मुखैटों का एक अनुपम उदाहरण मुझे
साक्षात सम्मेलन मे देखने को मिला। पर संजय खान के विरोध के कारण कॉम महासचिव का
वह ऐतिहासिक सम्बोधन मुझे आज भी याद है। जिसमे उन्होने कॉम॰ संजय खान के विचारों
पर कटाक्ष कर उनकी आलोचना ही नहीं की बल्कि स्वयं और कॉम॰ अध्यक्ष (दोनों ही सेवानिवृत्त) को संगठन के लिये
समर्पित एवं निष्ठावान एवं निस्वार्थ साथी बताया। कॉम॰ संजय खान के सेवानिवृत्त
साथियों के चुने जाने पर सवाल पर अपना वचाव
करते हुए उन्होने आगे आ कर कहा जिसका भाव ये था "कि हम कोई पद की लालसा और लालच की बजह से कमेटी मे
नहीं आ रहे है बल्कि हम चाहते है कि कमेटी की बागडोर मजबूत हाथों को
सौंपे"। हम ऐसे ही खून पसीने से
सींची कमेटी को यूं ही किसी कमजोर नेतृत्व को नहीं सौंप सकते?
हम चाहते है नौजवान साथी आयें पर दुःख है हमे आज कोई ऐसे साथी नज़र नहीं आते जिनके
हाथों मे इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी सौंप सके?
बड़ी तालियाँ पिटी थी हाल मे। घोर आश्चर्य इस बात का था कि ये बाते एक ऐसे वरिष्ठ
साथी कह रहे थे जिन्होने कॉम॰ श्रीधरन जैसे व्यक्ति का सेवानिवृत्ति के कारण
अध्यक्ष पद पर आसीन होने का विरोध कर
स्वयं एआईबीओ के अध्यक्ष पद पर आसीन हुआ था। यहाँ भी पर्दे के नजदीक संजय खान को
मजबूत हाथों के गुर सिखाने की ज़िम्मेदारी लेते हुए कॉम खान संगठन को कोई अदना
पद दे वे दोनों पुनः महासचिव और
प्रेसिडेंट के पद पदासीन हो गये/ सत्तारूढ़
हो गये और शायद आज की तारीख मे भी पदासीन हों??
एक मजेदार बात जान कर आपको हैरानी एवं
आश्चर्य होगा कि कॉम॰ महासचिव जैसे
रचनात्मक कार्यों, सोच और विचारों तथा
संगठनात्मक नीतियों, नियम और कानून मे आस्था व्यक्त कर "मजबूत हाथों" बाले कॉम॰ को दिल्ली राज्य संगठन की बागडोर तीन वर्ष के लिये
सौंपी गई थी पर इन माननीय नेतागणों ने हाथ मजबूत करने के प्रयास मे बगैर किसी चुनावी जनादेश के दिल्ली प्रदेश संगठन
को तीन वर्ष की जगह 11 वर्ष तक चलाते
रहे!! इन आठ वर्षों का अवैधानिक कार्यकाल मे संगठन को तो क्या मजबूत किया होगा पर अपना
"मजबूत हाथ" वाला वर्चस्व लगातार ग्यारह साल तक चलाते रहे। उनके त्याग
और बलिदान के "मजबूत हाथ" पर एक बड़ा सवालिया निशान जरूर था?
संगठन के हाथ मजबूत हुए या नहीं पर इस अवैधानिक कार्यकाल की अहर्निश सेवा के
"हेतु" (कारण) शोध का विषय अवश्य है?
शायद अपने यूनियन के दायित्वों के निर्वहन के कारण इन ग्यारह सालों मे कॉन्फ्रेंस करने की सुध न रही हो??
ऐसे सक्रिय संगठन के समर्पित मजबूत हाथों
बाले निष्ठावान कॉमरेड को लाल सलाम!!!!!!!
विजय सहगल


2 टिप्पणियां:
संगठन के प्रति समर्पित कोई भी कामरेड निष्काम भाव से जो संगठन की सेवा करता है जो स्वाभिमानी भी है ऐसी स्थितियों का निश्चय ही विरोध करेगा यह दूसरी बात है लोग इससे सहमत तो होंगे परंतु साथ नहीं देंगे
सहगल जी द्वारा लिखा मजबूत हाथ देखा और पढ़ा भी ,मेरा सभी वरिष्ठ मित्रों से निवेदन है अब आप सभी सेवाओं से मुक्त है संगठन,और राजनीति पर अपनें विचार लिखें , अनुभव सांझा करें,चाहे जो विचार हों,जो भी अच्छा बुरा अनुभव रहा हो पढ़कर अच्छा लगेगा,ग्रुप में नई शुरुआत होगी। BY DK SHUKLA ON WHATSAPP
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