मंगलवार, 12 जनवरी 2021

अजनबी - टी॰सी॰

 

"अजनबी - टी॰सी॰"

 




1994-95 की शायद बात थी। उन दिनों मेरी पोस्टिंग पोरसा (जिला मुरैना, मध्य प्रदेश) मे थी एक नॉन फ़ैमिली स्टेशन। पोरसा और उसके आसपास 5-6 बैंक और कुछ राज्य सरकार के कार्यालय भी थे। इन संस्थानों मे कार्यरत स्टाफ प्रायः हफ्ते के हफ्ते आवागमन करता था। कुछ लोग जिनके पास साधन और परिस्थितियाँ अनुकूल थी दैनिक अप-डाउन भी करते थे। अधिकतर लोगो  ने अपने परिवार मुरैना मे रखे  थे, क्योंकि पोरसा मे  आर्थिक सम्पन्नता  होते हुए भी   पढ़ाई लिखाई आदि की सुविधाएं शहरों जैसी न थी। मैंने भी अपना परिवार झाँसी अपने गृह नगर मे रखा था। शनिवार को जाकर सोमवार को बापसी का सिलसिला था। उस समय पोरसा आज की तरह उतना विकसित न था एवं आवागमन के अच्छे साधन न थे।

जब कभी प्रबन्धक मीटिंग जो प्रायः शनिवार या रविवार को प्रादेशिक कार्यालय,  भोपाल मे आयोजित की जाती थी। तब एक लाभ ये मिलता मध्य रास्ते मे स्थित होने के कारण झाँसी रुकना हो जाता था। कभी कभार एकाध छुट्टी ले झाँसी प्रवास ज्यादा सुखद हो जाता था। अतः प्रायः भोपाल से बापसी मे ट्रेन का एडवांस रिज़र्वेशन हमने कभी नहीं कराया। जैसे ही जिस भी समय प्रबन्धक मीटिंग खतम होती तुरंत ही भोपाल स्टेशन पहुँच सेकंड क्लास का साधारण टिकिट लेता और जो भी उपलब्ध ट्रेन होती उसमे सवार हो जाता। चूंकि भोपाल झाँसी पूरे दिन इतनी अधिक गाडियाँ है की आप जब भी प्लेटफॉर्म पर पहुँच जाए 15-20 मिनिट मे कोई न कोई गाड़ी मिल ही जाती थी। सामान कोई ज्यादा होता न था इसलिये आवारा पंछी  की तरह उपलब्ध ट्रेन मे लपक कर चढ़ जाते। सेकंड ए॰सी॰ क्लास मे एकाध सीट मिलने के 99% संभावना बनी रहती। ऐसा एक भी मौका याद नहीं जब झाँसी की सीट न मिली हो क्योंकि अधिकतर सुपरफास्ट ट्रेन सीधे भोपाल से चल कर झाँसी रुकती थी। साधारण किराये और सेकंड एसी के अंतर का किरया दे प्रायः रात मे दस-बारह बजे के बीच झाँसी पहुँचना हो जाता था।

एक बार प्रबन्धक मीटिंग से यूं ही भोपाल से बापसी थी। अन्य अवसरों की तरह बड़े आराम से उपलब्ध ट्रेन मे मै चढ़ गया। शायद जीटी एक्सप्रेस ट्रेन थी। प्लेटफॉर्म पर ही  सेकंड एसी के टीसी महोदय से संपर्क करने पर उन्होंने हमे कोच और सीट नंबर बतला दिया और मै बड़े आराम से  अपनी सीट पर जाकर लेट  गया। लगभग बीस-पच्चीस मिनिट बाद हमने टीसी के आने की आहट सुनाई दी जो हमारी सीट के पहले बगल बाली कैबिन मे टिकिट चैक करते  हुए  आ रहे थे। हर बार की तरह मैंने साधारण टिकिट और सेकंड एसी टिकिट के अंतर की राशि के लिये पर्स निकाला। लेकिन मेरे  पर्स मे समुचित अंतर की राशि न होने से मै चौंक कर हैरान परेशान हो गया। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था पता नहीं किस गफलत मे ऐसी गलती हो गई।  ठीक से याद तो नहीं पर अंतर की राशि पाँच-छः सौ रूपये के बीच थी। पर्स की सारी जेब तलाशने के बावजूद शायद दो-ढाई सौ रूपये कम थे। अब मै सकते मे था। मन ही मन सोच कर चिंतित था कि टीसी पता नहीं क्या क्या बोलेगा। मन ही मन सोच कर डर लगा कहीं  वो ऐसा न कह दे कि "औकात भिखारियों की शौक नाबाबों के", जेब मे पैसे नहीं और चल दिये  सेकंड एसी मे सफर करने!! तमाम शंकाओं  कुशंकाओं के बीच ये भी लगा कि  हो सकता है टीसी,  गुस्से मे बुरा भला कह साधारण डिब्बे मे या स्लीपर क्लास मे जाने को न कह दे? या गांधी जी की तरह अगले स्टेशन पर धक्का दे कर ट्रेन से बाहर न निकाल दे? अनेक तरह की भावनाएं  मन मे आ-जा रही थी। लेकिन मै अब तक इस उधेड़-बुन मे मानसिक रूप से तैयार था कि टीसी महोदय को यथा स्थिति बता उनको शेष धनराशि झाँसी प्लेटफ़ोर्म पर देने की कोशिश करेंगे क्योंकि झाँसी गृह क्षेत्र होने के कारण बहुत से मित्र और रिश्तेदार रेल्वे मे है।  यदि नहीं भी कोई मिला तो किसी का परिचय दे पैसे टीसी साहब के घर सुबह पहुंचा देंगे।   

जैसे ही टीसी हमारे पास आया तो मैंने अंतर की राशि की रसीद बनाने को कहा। मैंने अपना परिचय दे उनको वास्तविक स्थिति से अवगत करा लगभग दो-ढाई से रूपये कम होने की बात बताई। पर जैसा पहले से सोचा था कि शेष राशि उन्हे सुबह उनके घर पर दे देंगे। लेकिन हमारी सोच के विपरीत उक्त टीसी महोदय काफी सज्जन थे। उन्होने हमे निश्चिंत हो यात्रा करने का ढान्ढस बँधाया, तब कहीं जान मे जान आयी। मैंने अपनी तसल्ली के लिये उनका नाम और पता देने का आग्रह किया जो उन्होने स्वीकार कर हमे बताया। इन परिस्थितियों मे नींद तो कहाँ आती लेकिन फिर भी 3-4 घंटे करवट बदल सोने की कोशिश करता रहा। मध्य रात्री को जैसे ही झाँसी आया मैं शीघ्रता पूर्वक  सामान उठा प्लेटफॉर्म पर उतरा और कोशिश की कि कोई परिचित बंदा मिले तो हमारे सिर से चिंता का बोझ हल्का हो पर प्लेटफॉर्म से निकासी गेट तक कहीं कोई परिचित न मिला।

बाहरी गेट पर निकलने पर तमाम ऑटो बालों की भीड़ झपट पड़ी, सभी पूँछने लगे कहाँ जाना हैं? अचानक से मेरे दिमाक मे विचार कौंधा और मैंने एक ऑटो बाले से अपने घर का पता बता चलने का भाड़ा पूंछा? उसने जो भी पैसे बताये मैंने अपनी सहमति जता उसको अपना बैग दे उससे कहा कि तुम मुझे ढाई सौ रूपये दो मै तुम्हें घर चल कर किराये के साथ देता हूँ। ऑटो बाला भी भला आदमी था उसने हमे वांछित राशि नगद दे दी। मैंने तुरंत ही टीसी कार्यालय की ओर तेजी से रुख किया जो वहीं निकासी गेट के करीब था। वहाँ पर उक्त टीसी महोदय मिल गये मैंने उन्हे अंतर की राशि बापस कर अत्यंत आभार व्यक्त किया। उन्होने सौजन्यता वश "नाहक ही परेशान होने की बात कही"  पर हमने कहा कि एक परिचित के मिल जाने के कारण ही मै उक्त राशि बापस करने आया यूं भी बापस तो करना ही थी। उन्होने मुस्करा कर हमारा आभार स्वीकार किया। अब तक मै ऑटो से अपने घर पहुँच कर ऑटो बाले को समुचित राशि से कुछ अतरिक्त राशि दे उसका भी आभार जताया।

झाँसी के उक्त टीसी महोदय  का नाम अब तो स्मरण नहीं रहा पर उन अनाम सज्जन टीसी महोदया को ढूँढने मे यदि हमारे सम्मानीय पाठक सहायता करेंगे तो उन सज्जन टीसी साहब के साथ उनका भी अत्यंत आभारी रहूँगा।

विजय सहगल                                   

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

आप के सात और कोई सफर किया था क्या? क्योंकि हम शब्द उपयोग करने से संदेह हुआ सेहगल जी। कथन सरल एवं स्पष्ट थी। बदायूं जी।

बेनामी ने कहा…

वाह, सच में आज भी इंसानियत जिंदा है, इस इंसानियत की वजह से ही यह संसार चल रहा है।