"मेरे हिस्से की धूप?"
गाँव छोड़ कर,
शुद्ध हवा को तरसे।
खेत छोड़, घटा,
जैसे जंगल मे बरसे॥
रोज हवा से बातें होती,
धूप से नाता था।
जो होता दिल मे नाम,
ज़ुबा पे आता था॥
शहरों में वो बात कहाँ,
शोर" में बहरे हैं।
असली मुहँ के ऊपर भी,
नकली चेहरे है॥
गौरैया के बिना,
कही घर होता है?
बिना मुढ़ेर के मानो,
कौवा रोता है॥
गऊ की शाला,
चौपाल गाँव की।
खो गई यहाँ,
"नीम" की छाँव भी॥
कोयल की कूंक कहाँ,
जहर हवा मे दिखता है।
पड़ा रहे घायल सड़कों पर,
राही कहीं, कहाँ रुकता है॥
शहर मे हूँ, फिर भी,
आत्मा, गाँवो मे बसती है।
पहिये रौंद रहे सड़कों पर,
जिंदगियाँ, जो सस्ती है॥
मानवता ले रही,
आखिरी साँसे हैं।
दौड़ रही शहरों मे,
जिंदा लाशें है॥
निकलेगा नव सृजन सूर्य,
नित नव किरणों संग।
बिखेर, खेत खलिहानों मे,
सतरंगी रंग॥
जीवन की आपाधापी मे,
सदाचार जीवन देखा है?
शहरों की ऊंची मीनारों मे,
नहीं कोई लक्ष्मण रेखा है।
पर, कंक्रीट के जंगल मे,
करुणा सो गई?
मेरे हिस्से की धूप,
यहाँ कहीं खो गई??
विजय सहगल


3 टिप्पणियां:
बहुत खूब
अच्छा लिखा ।
करुणा नहीं है शहरों । धूप उजाला लाती है ।
पर दिल के एक कोने में ,करुणा ही रह जाती है ।।
दया नहीं , धरम नहीं शहरी हवा विषेली है ।
गांवों में नीम की डाली पतझड़ में भी भाती है ।।
रिश्ते मीठे है अपने घर ,आम्मा की डांट सुहानी है ।
पापा के हंसते चेहरे से जिसकी हर शाम सुहानी है ।।
कविले तारीफ ।
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