"दविंदर सिंह, डीएसपी, जे॰ एंड के॰
अभी कुछ दिन पहले जब समाचार पत्र मे पढ़ा कि
जम्मू-कश्मीर के श्री नगर मे पदस्थ उप पुलिस अधीक्षक रैंक का अधिकारी दो
आतंकवादियों के साथ उसकी सरकारी कार मे
यात्रा करते पकड़ा गया। इस अधिकारी ने आतंकवादियों को अपनी आधिकारिक कार से श्री नगर
से दिल्ली छोड़ने के एवज मे लाखों रूपये की
मोटी रकम का सौदा पक्का किया था। ये घटना वास्तव मे चिंता करने बाली है कि जिस
अधिकारी पर देश की सुरक्षा का जिम्मा हो वो ही आतंकवादियों के हाथ की कठपुतली हो
जाये तो इस से बड़ा देश का दुर्भाग्य क्या होगा। जब बाढ़ ही खेत को खाने लगे तो क्या हो? इस अधिकारी ने निश्चित
तौर पर चंद पैसों के लिये वतन के साथ गद्दारी की जिसकी जितनी भी निंदा, भर्त्सना की जाये कम है। इस जिम्मेदार अधिकारी का ये कृत
न काबिले माफी है। ऐसी बात नहीं कि ऐसे "मीर
जाफर" या "जय चंद" किसी काल मे नहीं थे और आगे भी कभी नहीं होंगे।
ऐसे द्रोही अपराधी किसी भी जाति, धर्म, भाषा या प्रांत मे मिल
जायेंगे जिन्होने चंद सिक्कों के लिये देश के साथ धोखा किया है। पैसा कमाने की इस
लालच और जीवन की सारी सुविधाओं को जल्दी से जल्दी
जुटाने की लालसा ने उसे अपने पथ से गिरा कर येन केन प्रकारेण धन की
प्राप्ति के लिये देश द्रोह जैसे कुकर्म को करने के लिये बाध्य किया। जिसके लिये
भले ही उसे गैर कानूनी काम करते हुए देश की रक्षा के साथ धोखा करना पड़े। इस काम मे
ऐसा ही हुआ है। इसमे भ्रष्ट गोपनीय धन की
एक अहम भूमिका अवश्य है। कम समय मे अधिक से अधिक धन कमाने की तृष्णा के कारण ही इस पुलिस अधिकारी ने गलत रह पकड़ कर आतंकवादियों के प्रलोभन के
कारण देश के साथ द्रोह कर पैसा कमाया। इस अपराध के लिये हम जैसे आम जन सहित
अनेकों लोगो की यही सोच होगी कि ऐसे धन
लोलुप देश द्रोही को फांसी की सजा होनी ही चाहिये।
लेकिन जब देश मे आर्थिक भ्रष्टाचार की खबरे परिवहन
विभाग, पुलिस
महकमे या अन्य प्रादेशिक या केन्द्रीय
कार्यालयों, नेताओं अथवा बैंकों मे
भी बहुत बड़ी मात्रा मे रिश्वत रूपी धन के
लेनदेन की खबरे आये दिन देखी और सुनी जाती है तो निराश और दुःख होता है। जहां
डीएसपी जैसे लोग अपने आर्थिक लाभ के लिये देश की सीमाओं का सौदा करते है तो अन्य
विभागों, महकमों या बैंक जैसे प्रतिष्ठानों मे पदस्थ उच्च अधिकारियों के
अपने निजी स्वार्थ के इस आर्थिक प्रलोभन
और लेन
देन को क्या कहेंगे?? गुप्त आर्थिक लाभ अर्थात रिश्वत के लिये विभागीय नियमों को ताक पर रख कर अपने पद
और प्रदत्त शक्तियों का दुर्पयोग कर निजी स्वार्थ के आर्थिक लाभ को किसी देश द्रोह
से इतर कम आकने को क्या कहा जाना चाहिये?? हर आदमी की ज़िंदगी मे कभी
न कभी ऐसे धन लोलुप नौकरशाहों से ज़िंदगी मे कभी न कभी पाला अवश्य पड़ा होगा? हमारे चारों ओर ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े होंगे जब धन
लोलुप ऐसे भ्रष्ट अफसरों से हम और आप ज़िंदगी के किसी न किसी दोराहे पर जरूर
रूबरू हुए होंगे। सेवाकाल विशेष कर निरीक्षण विभाग मे रहते हुए कुछ ऐसे अफसरों के
बारे मे जाना जिन्होने अपने पद का दुर्पयोग कर संस्था के धन को नुकसान पहुंचाया है पर लचर संस्थागत
नियमों के कारण या सबूतों के अभाव मे बचे
ऐसे रंगे सियार आज समाज मे सम्मानीय नागरिक बन छद्म देशभक्त बन कर अपना जीवन यापन कर रहे है। ऐसे लोग वेशक समाज की नज़रों से गिरने से बच गये हों पर क्या वे ईश्वर या अपनी ही नज़रों
से गिरे होने को इस जीवन मे बचा पाएंगे? हमारी नज़र मे देश के अंदर इन विभागों का आर्थिक
भ्रष्टाचार भी किसी देश द्रोह से कम नहीं है। इन बेईमान और भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध भी सजा की बैसी
ही कार्यवाही होनी चाहिये जैसी देश की सीमाओं का सौदा करने बाले डीएसपी को दी
जाये।
देश की जनता देश के साथ द्रोह करने बाले सुरक्षा अधिकारी के
घ्राणित और नीच कर्म के मुक़ाबले देश के
अंदर के विभिन्न विभागों के भ्रष्ट अधिकारियों, नेताओं के भ्रष्टाचार रूपी कुत्सित कार्य को हल्का करना नहीं चाहते अपितु
इनके धन पिपाशा और प्रलोभन भरे लेनदेन
रूपी अधोकृत को भी देश द्रोह की श्रेणी मे
लाने के पक्षधर है और इनके लिये भी उसी सजा की मांग करते है जो देश के साथ द्रोह करने बाले
को मिले।
विजय सहगल

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