मुनस्यारी-साधना शिविर (26 से सितम्बर से 03 अक्टूबर 2019)








वर्ष 2019
मे गायत्री चेतना केंद्र मुनस्यारी मे विशिष्ट साधन शिविर मे शामिल होना
हमारे जीवन की एक अद्भुत हर्षदायी घटना थी। इस चार दिवसीय अविस्मरणीय यात्रा ने
हमारे जीवन मे एक अमित छाप छोड़ी। शांतिकुंज हरिद्वार से 27.09.2019 से 03.10.2019 के विशिष्ट साधना सत्र मे शामिल होने की सहमति मिलने पर काफी खुशी हुई। इस शिविर के
समन्वयक श्री विष्णु मित्तल जी ने इस शिविर मे शामिल होने बाले परिजनों को आवश्यक
निर्देश मेल पर प्रेषित किये थे। उनमे से एक मे इस बात के स्पष्ट निर्देश थे कि सत्र के दौरान
मौन रहना पढ़ेगा एवं मोबाइल,
इंटरनेट, व्हाट्सप का प्रयोग
वर्जित रहेगा। हमने सोचा था मुनस्यारी साधना शिविर मे सत्र के दौरान रोज रात मे बच्चों से बात कर लिया करेंगे थोड़ा बहुत
व्हाट्सप भी देख लिया करेंगे ताकि परिवार और साधना शिविर मे संतुलन बना रहेगा
क्योंकि मुनस्यारी मे हमारा विशिष्ट साधना शिविर दिनांक 28.09.2019 से प्रातः 4.30
बजे शुरू होकर 1 अक्टूबर 2019 को शाम 7 बजे तक था। लेकिन फिर दिल मे ख्याल आया हम शिविर
के निर्देशों की अवेहलना और अनुशासन को तोड़ कर,
झूठ बोलकर किसे धोखा देंगे, शिविर के
संचालकों को, मुनस्यारी के
व्यवस्थापकों को या स्वयं गुरुदेव को जिनके प्रति हम अकूत श्रद्धा,
सम्मान और समर्पण रखते है?
फिर अन्तःकरण ने मन ही मन धिक्कारा,
कहा क्या हम कुछ दिन बगैर इंटरनेट,
मोबाइल या व्हाट्सप के नहीं रह सकते?
क्या बच्चों या परिवार की आत्मीयता से कुछ दिन विलग नहीं हुआ जा सकता?
क्या इंटरनेट के माध्यम से दुनियाँ से लगाव कुछ दिन टाला नहीं जा सकता?
क्या व्हाट्सप के माध्यम से मित्रों और रिश्तेदारों से संपर्क साधारण परिस्थितियों
मे कुछ दिन स्थगित नहीं रखा जा सकता?
इन विचारों ने हमे हीन भावना से ग्रसित कर दिया और तब हमने द्रढ़ निश्चय कर लिया कि अनुशासन को तोड़ने
के बनस्पत आसक्ति को तोड़ना श्रेयस्कर मान इन चार दिनों पूरी निष्ठा और अनुशासन से
निर्देशों का पालन करेंगे। ये अनुभव किया
कि असाधारण परिस्थितियों मे हमे किसी भी चीज,
वस्तु या रिश्ते के बगैर जीवन जीने की आदत होनी ही चाहिए और जो जीवन का परम सत्य
भी है!! शायद गुरदेव की परम सत्ता हमे ये ही संदेश इस अनुशासन के माध्यम से देना
चाह रही हो। हमने उसी वक्त बच्चों और परिवार को इस निर्णय से अवगत कराते हुए 28.09.19
से 01 अक्टूबर को साँय 7 बजे के बाद
मोबाइल पर अनुपलब्धता के बारे मे सूचित कर दिया। दूसरा निर्देश था मौन साधना। इन
चार दिनों आपस मे या चेतना केंद्र मे रह रहे परिजनों एवं साथ आये 28 साधक सहचरों
से भी आपस मे कोई वार्तालाप निषेध था। आवश्यकता के लिये चेतना केंद्र मे रह रहे
परिजनों को एक पेपर पर लिख आप अपनी आवश्यकताओं को लिख सकते है। इस हेतु जगह जगह
पेपर और पेन उपलब्ध कराये गये थे। खुशी है इन निर्देशों मे मोबाइल,
इंटरनेट, व्हाट्सप का शत प्रतिशत और मौन साधना का काफी हद तक हम सभी परिजनों ने पालन किया। मौन
कभी कभी अनजाने मे टूट जाता था।
ठहरने की अति उत्तम व्यवस्था सभी साधकों के लिये की गई थी।
प्रत्येक रूम ऊष्मारोधी था अर्थात कमरे का फर्श,
दीवारें और छत लकड़ी की बनी थी। हर रूम मे
स्नानालय एवं शौचालय संलग्न था। स्नानालय मे सौर ऊर्जा से संचालित गर्म पानी की
व्यवस्था थी। पीने का गर्म पानी चौबीसों घंटे उपलब्ध था। रूम के दो से लेकर 5-6 साधकों
द्वारा सांझा किया जा रहा था।
28.09.2019
से साधना शिविर की दिनचर्या सुबह 4.30 बजे से शुरू हो गई। प्रातः हर कमरे मे लगे
स्पीकर से शंखनाद द्वारा उठने का संकेत दे दिया जाता तत्पश्चात आत्मबोध साधना के
माध्यम से आज के जीवन के लिये ईश्वरीय सत्ता को धन्यवाद के साथ आज के कार्यक्रम की
रूप रेखा मे सफलता के लिये आशीर्वाद प्राप्त किया जाता। तत्पश्चात शौच,
स्नान जैसे दैनिक कार्यकलापों के उपरांत प्रातः कालीन प्रार्थना के माध्यम से भगवान का
स्मरण कर दिन की शुरूआत कर सभी साधकगण
तैयार होकर निर्धारित भारतीय वेशभूषा अर्थात पीले धोती कुर्ता या महिलायें पीली साड़ी मे ठीक 5.30 पर एक नंबर रूम
के बाहर टीनशेड के नीचे कल्क्पान के लिये एकत्रित
हो जाते जहां पर सभी साधकों को एक कटोरी मे मिश्रित जड़ी-बूटियों से तैयार गर्म पेय
दिया जाता। इस पेय का एक अलग ही स्वाद और मिठास थी जिसे मुनस्यारी मे पूरे साल
पड़ने बाली सर्दी के द्रष्टिकोण मे रख कर बनाया गया था। इस कल्क्पान के पश्चात सभी
अभ्यार्थी अपने अपने रूम मे बापस आकर आधा घंटे 5.45 से 6.15 तक ध्यान एवं अमृत
वर्षा मे भाग लेते। इस ध्यान योग मे गुरुदेव सभी साधकों को भावनात्मक रूप से कारण
शरीर को अमृत वर्षा के भाव का अहसास कराते। अपने निर्दशों मे गुरुदेव शांत चित्त,
सीधी कमर आँख बंद करा कर हिमालय की सबसे ऊंची चोटी का मन ही मन भावपूर्ण दर्शन कराते और साधकों को ईश्वरीय स्नेह अमृत
वर्षा को शरीर मे अनुभव करने का आदेश देते। इस लगभग 30 मिनिट के ध्वनि संदेश को आप
यू ट्यूब पर एक बार जरूर श्रवण करें।
प्रातः 6.15 बजे से 6.45 बजे तक सूक्ष्म
व्यायाम एवं योग क्रिया कराई जाती जिसको करने हेतु देव सांस्कृति विश्विध्यालय,
हरिद्वार के योग के वरिष्ठ छात्र श्री रवि को मुनस्यारी मे नियुक्त किया गया था। सभी साधक
गण अपनी आयु और शारीरिक बनावट और क्षमता
के अनुसार भिन्न-भिन्न योग व्यायाम करते है। योग व्यायाम का ये सत्र आधा
घंटे चलता है जिसके बाद प्रज्ञा पेय सभी साधक ग्रहण करते है। हाँ एक बात यहाँ
उल्लेख करना आवश्यक है कि मुनस्यारी चेतना केंद्र मे चाय या कॉफी का वितरण निषेध
है। प्रज्ञा पेय शांति कुंज हरिद्वार द्वारा तैयार किया गया पेय है जिसे चाय और
कॉफी के विकल्प के रूप मे सालों से प्रयोग मे लाया जा रहा है। आम लोगो से इतर
गायत्री परिवार से जुड़े परिजन इससे भलीभाँति परिचित है। प्रज्ञा पेय के पश्चात 6.45
से 7॰30 बजे अर्थात 45 मिनिट तक गायत्री
मंत्र जाप के लिये निश्चित था। इस समय मे सभी साधक मौन धारण कर मन ही मन गायत्री मंत्र का जाप करते।
15 मिनिट के विश्राम या मध्यांतर पश्चात एक
घंटा अर्थात 7.45 से 8.45 तक हर दिन के मुख्य आकर्षण हवन के लिये सभी साधक रूम
नंबर 1 से 6 तक के सामने तीन शेड के नीचे एकत्रित होते। हिमालय पर्वत श्रंखला की
गोद मे हवन करना एक अविस्मरणीय कार्य होता। यूं तो हवन साधकों के ठहरने के लिये रूम के उपर खुली छत्त पर कराया
जाता पर चूंकि मुनस्यारी का मौसम काफी अनिश्चित होने के कारण प्रायः वर्षा के डर
से हवन टीन शेड के ही नीचे कराया जाता। पाँच कुंडी यज्ञ हेतु सभी साधक 5-6 की
संख्या मे एक हवन कुंड के सामने स्थान ग्रहण कर हवन कार्य संपादित करते। मौन साधना
के कारण सभी साधक मन ही मन गायत्री मंत्र एवं अन्य कार्य हेतु मंत्रों का उच्चारण
मन ही मन करते। यज्ञ स्थापना के बाद यज्ञ के अग्नि से निकली ऊष्मा वातावरण को
दिव्य बना कर शरीर मे एक नई ऊर्जा का संचार करती। गायत्री माँ,
गुरुदेव और माताजी के चित्रों के सामने अर्पित डहेलिया के लाल,
नारंगी, पीले,
वैगनी फूल बड़े ही मनोहारी लगते। इन फूलों के पौधे चेतना केंद्र मे जगह जगह खिले
हुए थे जो केंद्र की शोभा मे चार चाँद लगा रहे थे। यज्ञाहुति से निकली सुगंधित वायु वातावरण मे एक विशिष्ट
दिव्यता प्रदान कर रही थी। मंत्र की स्वर लहरियाँ पहाड़ो से टकरा कर एक सुंदर संगीत
का गुंजन कर रही थी। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद आरती का चरण यज्ञ की पूर्णता का
संकेत देता। यज्ञ कार्य सम्पादन के पश्चात सभी साधकों को अन्नपूर्णा भोजनालय मे
नमकीन उबले चने,
मूफली, मूंग,
राजमा का मिश्रण अल्पाहार के रूप मे वितरित किया जाता था। जो खाने मे सुपाच्य और भरपूर ऊर्जा देने बाला था। अन्नपूर्णा भोजनालय मे जमीन पर विछी पट्टी पर आमने
सामने दो लाइन मे बैठ कर लोग नाश्ता ग्रहण
करते। जो जमीन पर बैठने मे सक्षम नहीं थे उन्हे कुर्सी मेज पर बैठ कर नाश्ता ग्रहण
करने की सुविधा थी। मेरे निवेदन पर बगैर
चीनी के प्रज्ञा पेय की भी व्यवस्था श्याम जी भाई साहब ने विशेष तौर पर करवा दी थी
जो शिविर के आखिरी दिन तक उपलब्ध रही। पुनः नौ बजे से आधा घंटे गायत्री मंत्र जाप
हेतु निर्धारित था। इस जपयोग मे सभी साधक गण गायत्री मंत्र का मन ही मन उच्चारण कर
मंत्र से उत्पन्न ऊर्जा का अनुभव करते। पंद्रह मिनिट ओंकार साधना के पश्चात ठीक 10 बजे सभी लोग भोजन के
लिये भोजनालय मे एकत्रित होते।
12.00 बजे से 12.30 तक आधा घंटा स्पीकर के
माध्यम से ही कमरे मे प॰पू॰ गुरुदेव का
किसी एक बिषय पर प्रवचन सुनाया जाता था। उक्त संदेश के बाद हर कमरे मे रखे 3-4
किताबों के सेट रखे हुए थे जिनको पढ़ कर स्वाध्याय किया जा सकता था। इस स्वाध्याय
के अंतर्गत हमने गुरुदेव के अत्यंत प्रसिद्ध यात्रा व्रतांत "सुनसान के सहचर
पढ़ी" काफी प्रेरणा दायी सुंदर यात्रा संस्मरण था। इसको एक बार अवश्य पढे,
ऐसा प्रतीत होता है गुरुदेव के साथ हम नितांत शांत और सुनसान जंगल और नदी के तटों
और पहाड़ो से बात करते करते हुए उनके साथ चल रहे हों। अगले आधा घंटे अर्थात 1.30 तक गायत्री मंत्रलेखन
के लिये समय निर्धारित था। प्रत्येक कमरे मे चार-चार मंत्र लेखन की कॉपियाँ पेन के
साथ उपलब्ध कराई गई थी ताकि लेकन का कार्य साधक निर्धारित अवधि मे कर सके। 1.30
बजे 15 मिनिट हेतु ज्योति अवधारणा के अंतर्गत जलते दीपक की लौ को निरंतर एक मिनिट देखने का भाव,
तत्पश्चात आँख बंद करके अपने अंतर्मन मे ज्योति के प्रकाश को अनुभव अपने
पूरे शरीर मे महसूस करने की भावना पूर्ण यात्रा का अनुभव कराया जाता है तत्पश्चात
आधा घंटा माताजी का औडियो संदेश चारों दिन चार अलग अलग विषय पर सुनाये गये।
विदित हो कि 12.00 बजे से 2.30 तक के सभी
कार्यक्रम साधकों को रूम मे ही रह कर संपादित करना थे। चाहे गुरुदेव का आँडियो
संदेश, स्वाध्याय,
मंत्र लेखन या ज्योति अवधारणा तथा माताजी का आँडियो संदेश।
दैनिक कार्यक्रम मे एक कार्यक्रम नित्य
समूहिक श्रमदान का था। अपने प्रज्ञा पेय के कप,
सुबह शाम की भोजन की थाली, गिलास,
चम्मच तो तुरंत ही स्वयं धो पोंछ कर रखनी होती है इसके अतरिक्त श्रमदान के कार्यक्रम के अंतर्गत हर दिन केंद्र का कोई भी कार्य करना होता था। चाहे मंदिर की साफ
सफाई, यज्ञ स्थल की झाड़ू बुहारना,
अपने अपने कमरे और टॉइलेट की सफाई,
पोंछा करना आदि कार्य थे। जिसको करने के
लिये चार पाँच टोली बनाई गई थी। हर टोली
मे 5-6 लोगो को शामिल किया जाता था। इन चार दिनों मे एक दिन हम लोगो ने मंदिर की
झाड़ू बुहारी की, एक दिन कार्यालय की साफ-सफाई,
एक दिन यज्ञ स्थल की साफ सफाई और एक दिन वृक्षा रोपण का कार्य संपादित किया। महिलाओं
की टोलियों को किचिन की सफाई या यज्ञ के कार्य मे आने बाले वर्तनों की सफाई आदि
रहती थी। श्रमदान के इन समस्त कार्यों को
चारों दिन सभी साधकों ने बगैर किसी भेद भाव के पूरा किया और अपने आपको बड़ा
सौभाग्यशाली माना। श्रमदान के पश्चात शिविर मे शामिल होने बाले परिजनों से अपेक्षा
की जाती कि वह अपने अपने कमरों की सफाई पोंछा और टॉइलेट की सफाई आदि भी कर ले।
दिनांक 28.09.2019 को शिविर के पहले दिन पितृ
विसर्जन का अंतिम दिन को होने के कारण चेतना केंद्र,
मुनस्यारी मे समूहिक तर्पण एवं पिंड दान
का कार्यक्रम विधिवत रूप से सम्पन्न कराया गया जिसमे सभी साधकों ने भाग लेकर अपने
पूर्वजों को पिंडदान किया। आवश्यक सामग्री जैसे कुशा,
चावल, तिल,
पुष्प, आटा आदि कि व्यवस्था भी चेतना केंद्र,
मुनस्यारी द्वारा की गई थी। धर्म शास्त्रानुसार मंत्रोचारण के बीच पिंडदान और
तर्पण संस्कार का कार्यक्रम विधिवत रूप से सम्पन्न कराया गया। देवभूमि हिमालय के
आँगन मे पिंडदान और तर्पण का संस्कार हमारे पूर्वजों को सर्वोत्तम श्रद्धांजलि के रूप मे थी जो कि गायत्री चेतना केंद्र,
मुनस्यारी के सौजन्य से संभव हो सकी।
दिनांक 30 अक्टूबर 2019 को श्री श्यामजी
अग्रवाल भाई साहब द्वारा शिव मंदिर मे शिव अभिषेक विधिवत रूप से भगवान शिव के 108
नामो का शास्वर उच्चारण कर जलाभिषेक, दूध,
दही, शहद आदि से अभिषेक कर चन्दन,
पुष्प, रोरी आदि से शिव का श्रंगार कर शिव स्तुति,
आरती की गई तत्पश्चात सभी परिजनों ने प्रसाद ग्रहण किया। हिमालय पर्वत मे स्थित
पंचाचूली पर्वत श्रंखलाओं के मध्य शिव अभिषेक कार्यक्रम अपने आप मे एक अनुपम,
अद्भुत, अद्व्तिय अनुभूति देने
बाला था।
शाम को ठीक चार बजे सभी परिजन गायत्री मंदिर
मे आरती के लिये एकत्रित होते। आरती मे शामिल होने के लिये चेतना केंद्र के आसपास
के बच्चे और उनके कुछ परिजन भी आ जाते थे। योग शिक्षक श्री रवि साधकों को योग व्यायाम के साथ स्थानीय बच्चों
को भी योग की शिक्षा के साथ छोटे बच्चों को स्कूल की पढ़ाई मे भी सहायता करते। ये
छोटे-छोटे बच्चे शाम 4 बजे होने बाली गायत्री मंदिर की आरती मे भाग लेते। इन सभी
3-4 वर्ष की आयु से 14-15 वर्ष की आयु के बच्चों को गायत्री माँ की आरती और
गायत्री चालीसा कंठस्थ याद था जिसे ये
बच्चे सस्वर पढ़ते है जिससे एक बड़ा मनोहारी दिव्य अध्यात्म वातावरण बन जाता
है।
प्रातः और रात्रि के भोजन मे बहुत ही
सात्विक, भोजन परोसा जाता। सुबह
के भोजन मे एक हरी सब्जी और दाल के साथ चावल और रोटी की व्यवस्था की जाती। अस्वाद
भोजन बालों के लिये भी भोजन की अलग व्यवस्था थी। रात्रि भोजन का समय 5 बजे निश्चित
था। रात्रि भोजन मे हल्का सात्विक भोजन के रूप मे सारी सब्जियों को मिलाकर खिचड़ी
या दलिया दिया जाता जो कि सुपाच्य और स्वादिष्ट होता। प्रायः पहाड़ों पर हरी सब्जी
आदि की व्यवस्था नहीं या कम होती है अतः शिविर मे शामिल होने के लिये आने बाली बस
के साथ ही फल, सब्जी आदि हरिद्वार से
ही प्रेषित किये जाते।
भोजन उपरांत शाम 6 बजे का समय "नाद योग"
के लिये निश्चित है जो शांतिकुंज हरिद्वार के साथ साथ समस्त भारत मे स्थापित शक्तिपीठों मे आवश्यक
रूप से निर्धारित समय पर संपादित किया जाता है। सभी शक्तिपीठों के मुख्य द्वार इस
दौरान 15 मिनिट बंद कर दिये जाते है और वहाँ उपस्थित सभी लोगो से
अपेक्षा की जाती इन 15 मिनिटों मे आँख बंद कर प्रकर्ति के इस आह्लाद नाद का श्रवण
करे। मुझे नाद योग हमेशा से ही प्रिय लगता रहा है। संध्या काल मे जब सूर्यास्त हो
रहा होता है तब बांसुरी की धुन और तबले की थाप एक ऐसा संगीत उत्पन्न करती है मानो
दिन भर के कार्योपरांत पशु पक्षी अपने रैनबसेरे मे बापस आ रहे हों। किसान अपने
खेतो के काम को समाप्त कर अपने हल,
बैलों के साथ अपने घर को बापस आ रहे हों और उनके बैल अठखेलियाँ करते हुए गौशाला मे
अपने स्थान की तरफ पहुँचने की जल्दी मे हों। पूरे नाद योग के दौरान बांसुरी और
तबले की स्वर लहरियाँ मन को मोह लेती है। नाद योग हर रोज एक नई अनुभूति और अहसास
कराता।
अब तक मुंसियारी मे अंधेरा घिर चुका होता था
और समय होता था श्रद्धेय प्रणव पाण्ड्य जी का भगवत गीता पर विडियो संदेश होता है।
जिसमे डॉक्टर साहब हर दिन किसी अध्याय के गीता श्लोकों कि सुमधुर व्याख्या करते
है। सात बजे सभी परिजनों से दिनभर के कार्यकलापों को डायरी मे लिखने के लिये
प्रेरित करते। 8 बजे रात्रि कालीन प्रार्थना के पश्चात ईश्वर को आज के जीवन और
सद्कार्यों के लिये तत्वोध साधना के माध्यम से धन्यवाद ज्ञापित करते है। चूंकि
अनुशासित दिनचर्या होने के कारण और दिन भर मे लगभग 40-50 सीढ़ियों को 4-5 बार चढ़ने और उतरने से उत्पन्न
हुई थकान के कारण तुरंत ही सभी निद्रा के
आगोश मे खो जाते है। पुनः एक नये दिन के आगमन और नवीन दिनचर्या के स्वागत हेतु। इस
तरह की दिनचर्या शेष चारों दिन जारी रही।
जहां
एक ओर शिविर की व्यवस्था और संचालन हरिद्वार मे श्री विष्णु मित्तल के समन्वयन मे
संचालित हो रहा था वही गायत्री चेतना केंद्र मुनस्यारी की सारी व्यवस्था श्री
श्याम अग्रवाल के नेतृत्व मे संपादित हो रही थी। श्री विवेक जी,
श्री राणावत जी, श्री प्रधान जी,
श्री परमार जी जैसे समयदानी कार्यकर्ताओं
की समर्पित सेवा भावना से शिविर सत्र को बहुत ही सुखद और सुव्यवस्थित और आसान बना
दिया था। श्री विनोद कुमार सिंह एवं श्री विलास देशमुख जी ने हमारे जत्थे के
टोलीनयक के रूप मे बहुत ही सुंदर भूमिका निभाई जिसे सभी ने सराहा। श्री सहदेव चौधरी द्वारा नित्य यज्ञ हवन एवं
सुबह शाम गायत्री मंदिर मे आरती का सम्पादन विधिवत रूप से सम्पन्न कराये जाते रहना
उनके अतुलनीय योगदान को दर्शाता है। इस तरह की उत्साह और आनंद देने बाली दिनचर्या मे चार दिन कब निकाल गये पता ही नहीं
चला। और इस तरह हम सभी ने 02 अक्टूबर 2019
को मुनस्यारी सत्र की समाप्ती कर हरिद्वार के लिये प्रातः 5.00 बजे प्रस्थान किया।
इस शिविर ने एक नई ऊर्जा उमंग दी। इस दौरान साथ मे रह रहे परिजनों के साथ मानव संवेदना का गहरा अनुभव हुआ। साधना शिविर मे
मौन की साधना करते हुए गायत्री जप साधना को निकट से अनुभव किया इसके अतिरिक्त आज
के इस भौतिक्ताबादी, सूचना तकनीकि भरे युग
मे कभी हमने सोचा न था कि चार दिन टीवी,
रेडियो, इंटरनेट,
व्हाट्सप, फ़ेस बुक,
मोबाइल के बगैर भी रहा जा सकता है!! यहाँ
यह उल्लेख करना अतिसायोंक्ति नहीं होगी कि शांति कुंज हरिद्वार द्वारा
संचालित गायत्री चेतना केंद्र मुंस्यारी के
कुल नौ दिन के प्रवास की सारी सुविधाओं के लिये
मात्र बस के किराये के अतिरिकत किस भी तरह की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से
शुल्क या दान की बाध्यता नहीं थी। इस तरह हम एक नई यात्रा का अनुभव कर बापस हरिद्वार के लिये निकल
पड़े।