रविवार, 26 जनवरी 2020

71वां गणतन्त्र दिवस 2020


"71वां गणतन्त्र दिवस 2020"






आज का गणतन्त्र दिवस मेरी ज़िंदगी मे कुछ अलग हट के था। जीवन मे बचपन के 6-8 साल अगर छोड़ भी दे तो स्कूल, कॉलेज और सर्विस मे आने पर अनेकों गणतन्त्र दिवस मे कहीं न कहीं शामिल होने का सौभाग्य मिला। पर उनमे कुछ यादगार क्षण भोपाल मे सेंट्रल ज़ोन कमेटी द्वारा आयोजित बैंक परिसर का समारोह, रायपुर मे जिला न्यायालय और कलेक्टर कार्यालय के  समारोह  रहे। पर आज का गणतन्त्र दिवस समारोह भी यादगार और परंपरा से हटके बड़े अनौपचारिक माहौल मे आम्रपाली ईडेन पार्क हाउसिंग सोसाइटी का रहा। पिछले एक दो दिन से मै सोच रहा था कि क्लास के  बच्चों को गणतंत्र दिवस समारोह किसी स्कूल, सोसाइटी या सरकारी कार्यालय मे दिखाने और उसमे मे बच्चों को शामिल कराने का प्रयास करना चाहिए। इस हेतु हमने एक दो जगह प्रयास किये इनमे से जब हमने आम्रपाली ईडेन पार्क मे हाउसिंग सोसाइटी के पदाधिकारियों से संपर्क किया तो उन्होने बच्चों को सोसाइटी मे मनाये जा रहे गणतन्त्र दिवस समारोह मे शामिल होने की सहमति को सहर्ष स्वीकार कर लिया। हमने एक दिन पहले सभी बच्चों को 26 जनवरी को प्रातः 9 बजे नहा धोकर साफ कपड़ो मे तैयार रहने की हिदायत दी। हमे खुशी है जब हम 26 को उन बच्चों को लेने झुग्गी वस्ती पहुंचे तो वे सभी नहा धोकर साफ सुथरे कपड़ो के साथ तैयार थे आश्चर्य इस बात का था कि सभी बच्चों के हाथों मे तिरंगा झण्डा था। जब हमने उन से पूंछा कि ये झंडे कहाँ  से आये तो सभी ने बताया कि उन्होने झंडे 5-5 रूपये मे खरीदे है। माँ-पिता से मिले जेब खर्च को चाकलेट, टोफ़्फ़ी, विस्कुट, गोलगप्पे पर न खर्च कर इस पैसे को तिरंगे झंडे पर खर्च करना इन बच्चों के देशभक्ति पूर्ण उत्साह को देख कर इन बच्चों की फकीरी पर हमे नाज़ है। अभावों मे जीने बाले इन बच्चों की इस देशभक्ति देख कर मेरा सिर इन बच्चों के प्रति सम्मान से  झुक गया। अपने स्तर पर कोई बच्चा मोजे जूते तो कोई मोजे  के उपर चप्पल पहने था, कुछ नये कपड़े और कुछ पुराने ही रोज बाले कपड़ो मे तैयार थे।  कपड़ो और पहनावे मे बेशक मुझे बहुत कोई अंतर नहीं लगा पर उनके तैयार होने के निशान सभी के करीने से कंघी किये बालों से नज़र आ रहे थे। उनके चेहरों मे उत्साह की ताज़गी आँखों मे समारोह मे शामिल होने की चमक और कदमों मे तेजी से चलने की उमंग साफ परलक्षित हो रही थी कि वे सब आज किसी समारोह मे शामिल होने जा रहे है। हमने सभी 14 बच्चों को कार मे बिठलाया हर बड़े बच्चे की गोदी मे एक छोटे बच्चे को बैठा पीछे 10 बच्चों को फिट किया और आगे चार बच्चों को लेकर हम  आम्रपाली ईडेन पार्क हाउसिंग सोसाइटी मे 9.20 बजे पहुँच गये। ध्वजारोहण का कार्यक्रम 9.30 बजे था। काफी संख्या मे सोसाइटी के वासिंदे वहाँ पहले से ही मौजूद थे। सभी बच्चो को पीछे की तीन लाइन मे कुर्सियों पर बैठा दिया। ठीक समय पर ध्वजा रोहण के बाद राष्ट्रीयगान का वंदन हुआ जिसमे बच्चों सहित सोसाइटी के सभी लोग सावधान की मुद्रा मे खड़े होकर शामिल हुए।  तत्पश्चात सोसाइटी के अध्यक्ष श्री नारद जी द्वारा सम्बोधन किया उन्होने कक्षा के सभी बच्चों का भी स्वागत किया। उन्होने मुझे बुलाकर बच्चों के बारे मे सोसाइटी के निवासियों को विस्तृत विवरण हेतु आमंत्रित किया। मैंने बच्चों को गणतन्त्र दिवस समारोह मे शामिल करने का उद्देश्य की जानकारी देते हुए बतया कि मेरी ईक्षा थी   कि इन बच्चों को भी समाज, देश  मे मनाये जा रहे  राष्ट्रीय पर्व गणतन्त्र दिवस  के समारोह मे शामिल होने देखने और अनुभव करने का मौका मिले ताकि उन्हे भी गणतन्त्र का नागरिक होने का अहसास हो। हमने आम्रपाली ईडेन पार्क हाउसिंग सोसाइटी के पदाधिकारियों  का बच्चों को गणतन्त्र दिवस समारोह मे शामिल होने के आमंत्रण को स्वीकार  हेतु धन्यवाद दिया।  आम्रपाली ईडेन पार्क हाउसिंग सोसाइटी ने न केवल बच्चों को इस कार्यक्रम मे शामिल कर उनका उत्साह और स्नेह भरा स्वागत किया बल्कि मुख्य कार्यक्रम स्थल पर बुला कर उनका सम्मान किया एवं चाकलेट बिस्कुट देकर उनकी प्रस्न्न्ता को बढ़ाया। इन बच्चों मे एक बच्चे सत्यम ने "नन्हा मुन्ना रही हू, देश का सिपाही हू, बोले मेरे संग जय हिन्द, जय हिन्द जय हिन्द" का गायन किया जिसे सभी दर्शकों ने तालियाँ  बजा कर उसके उत्साह को बढ़ाया। स्वल्पाहार ग्रहण कर बच्चे अन्य कार्यक्रमों को कौतूहल के साथ लगातार बैठे और देखते रहे।   

अंत मे सभी बच्चों को हमारी धर्म पत्नी ने घर बुलाया जहां  हल्के फुल्के नाश्ते का प्रवंध किया था। बच्चे लिफ्ट मे सवारी कर जब फ्लैट मे आये तो लिफ्ट की सवारी की चर्चा बड़े उत्साह उमंग के साथ कर रहे थे। उनमे से अधिकांश बच्चे लिफ्ट मे पहली बार सवार हुए थे। घर से स्वल्पाहार कर सभी बच्चों को  बापस उनके  निवास पर छोड़ गणतन्त्र दिवस की बधाई प्रेषित की।

आज के उक्त यादगार गणतन्त्र दिवस की सहभागिता ने मुझे अभिभूत कर दिया। सभी साथियों और विशेष तौर पर  आम्रपाली ईडन पार्क सोसाइटी सभी रहवासियों  को गणतन्त्र दिवस की बधाई।

विजय सहगल          

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

दविंदर सिंह, डीएसपी, जे॰ एंड के


"दविंदर सिंह, डीएसपी, जे॰ एंड के॰


अभी कुछ दिन पहले जब समाचार पत्र मे पढ़ा कि जम्मू-कश्मीर के श्री नगर मे पदस्थ उप पुलिस अधीक्षक रैंक का अधिकारी दो आतंकवादियों के साथ उसकी सरकारी  कार मे यात्रा करते पकड़ा गया। इस  अधिकारी ने  आतंकवादियों को अपनी आधिकारिक कार से श्री नगर से  दिल्ली छोड़ने के एवज मे लाखों रूपये की मोटी रकम का सौदा पक्का किया था। ये घटना वास्तव मे चिंता करने बाली है कि जिस अधिकारी पर देश की सुरक्षा का जिम्मा हो वो ही आतंकवादियों के हाथ की कठपुतली हो जाये तो इस से बड़ा देश का दुर्भाग्य क्या होगा। जब बाढ़ ही खेत  को खाने लगे तो क्या हो? इस अधिकारी ने निश्चित तौर पर चंद पैसों के लिये वतन के साथ गद्दारी की जिसकी जितनी भी निंदा, भर्त्सना  की जाये कम है। इस जिम्मेदार अधिकारी का ये कृत न काबिले माफी है। ऐसी बात नहीं  कि ऐसे "मीर जाफर" या "जय चंद" किसी काल मे नहीं थे और आगे भी कभी नहीं होंगे। ऐसे द्रोही अपराधी  किसी भी जाति, धर्म, भाषा या प्रांत मे मिल जायेंगे जिन्होने चंद सिक्कों के लिये देश के साथ धोखा किया है। पैसा कमाने की इस लालच और जीवन की सारी सुविधाओं को जल्दी से जल्दी  जुटाने की लालसा ने उसे अपने पथ से गिरा कर येन केन प्रकारेण धन की प्राप्ति के लिये देश द्रोह जैसे कुकर्म को करने के लिये बाध्य किया। जिसके लिये भले ही उसे गैर कानूनी काम करते हुए देश की रक्षा के साथ धोखा करना पड़े। इस काम मे ऐसा ही हुआ है। इसमे भ्रष्ट गोपनीय धन की  एक अहम भूमिका अवश्य है। कम समय मे अधिक से अधिक धन कमाने की तृष्णा  के कारण ही इस पुलिस अधिकारी  ने गलत रह पकड़ कर आतंकवादियों के प्रलोभन के कारण देश के साथ  द्रोह कर पैसा कमाया।  इस अपराध के लिये हम जैसे आम जन सहित अनेकों  लोगो की यही सोच होगी कि ऐसे धन लोलुप देश द्रोही को फांसी की सजा होनी ही चाहिये।

लेकिन जब देश मे आर्थिक भ्रष्टाचार की खबरे परिवहन विभाग, पुलिस महकमे या अन्य प्रादेशिक या  केन्द्रीय कार्यालयों, नेताओं  अथवा बैंकों मे भी बहुत बड़ी मात्रा मे रिश्वत रूपी धन  के लेनदेन की खबरे आये दिन देखी और सुनी जाती है तो निराश और दुःख होता है। जहां डीएसपी जैसे लोग अपने आर्थिक लाभ के लिये देश की सीमाओं का सौदा करते है तो अन्य विभागों, महकमों या बैंक जैसे प्रतिष्ठानों मे पदस्थ उच्च अधिकारियों के अपने निजी स्वार्थ के  इस आर्थिक प्रलोभन और  लेन  देन को क्या कहेंगे?? गुप्त आर्थिक लाभ अर्थात रिश्वत  के लिये विभागीय नियमों को ताक पर रख कर अपने पद और प्रदत्त शक्तियों का दुर्पयोग कर निजी स्वार्थ के आर्थिक लाभ को किसी देश द्रोह से इतर  कम आकने को क्या कहा जाना चाहिये?? हर आदमी की ज़िंदगी मे कभी न कभी ऐसे धन लोलुप नौकरशाहों से ज़िंदगी मे कभी न कभी पाला अवश्य पड़ा होगा? हमारे  चारों ओर ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े होंगे जब धन लोलुप ऐसे  भ्रष्ट अफसरों से  हम और आप ज़िंदगी के किसी न किसी दोराहे पर जरूर रूबरू हुए होंगे। सेवाकाल विशेष कर निरीक्षण विभाग मे रहते हुए कुछ ऐसे अफसरों के बारे मे जाना जिन्होने अपने पद का दुर्पयोग कर संस्था के  धन को नुकसान पहुंचाया है पर लचर संस्थागत नियमों के कारण या  सबूतों के अभाव मे बचे ऐसे रंगे सियार आज समाज मे सम्मानीय नागरिक बन छद्म देशभक्त बन कर  अपना जीवन यापन कर रहे है। ऐसे लोग  वेशक समाज की नज़रों से गिरने से  बच गये हों पर क्या वे ईश्वर या अपनी ही नज़रों से गिरे होने को  इस जीवन मे बचा  पाएंगे? हमारी नज़र मे देश के अंदर इन विभागों का आर्थिक भ्रष्टाचार भी किसी देश द्रोह से कम नहीं है। इन बेईमान  और भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध भी सजा की बैसी ही कार्यवाही होनी चाहिये जैसी देश की सीमाओं का सौदा करने बाले डीएसपी को दी जाये।

देश की जनता  देश के साथ द्रोह करने बाले सुरक्षा अधिकारी के घ्राणित और नीच कर्म के मुक़ाबले देश के अंदर के विभिन्न विभागों के भ्रष्ट अधिकारियों, नेताओं के भ्रष्टाचार रूपी   कुत्सित कार्य को हल्का करना नहीं चाहते अपितु इनके धन पिपाशा और प्रलोभन भरे  लेनदेन रूपी  अधोकृत को भी देश द्रोह की श्रेणी मे लाने के पक्षधर है और इनके लिये भी उसी सजा  की मांग करते है जो देश के साथ द्रोह करने बाले को मिले। 
        
विजय सहगल     

शनिवार, 18 जनवरी 2020

चाँदी बागड़ी


"चाँदी बागड़ी"


14.01.2020  दोपहर मे जब मै अपने घर से मेघदूतम पार्क मे भ्रमण के लिये निकला तो कानों मे ईयर फोन लगा कर विविध भारती से "एसएमएस के बहाने वीवीएस के तराने" सुनते हुए मस्ती मे पार्क की ओर बढ़ रहा था। मै प्रायः घूमते हुए विविध भारती या एफ़एम गोल्ड रेडियो स्टेशन सुनने का आदि हूँ। रेडियो पर निसफिकरी से पुराने फिल्मी  गाने सुनते हुए घूमने का जो आनंद है उसे शब्दों मे ब्याँ करना नामुमकिन है इसे तो सिर्फ और सिर्फ महशूस किया जा सकता है। पार्क तक पहुँचने बाली ये लगभग 200 मीटर लंबी सड़क मुख्य सड़क न होने के कारण प्रायः शांत रहती है और इस पर वाहनों का यातायात न के बराबर है। इसी सड़क पर एक नवीन हाउसिंग सोसाइटी निर्माणाधीन है जिसका पिछला भाग इस सड़क पर होने के कारण मजदूरों, इंजिनियरों और अन्य तकनीकी कारीगरों का आना जाना लगा रहता है जो इस सोसाईटी के  निर्माण कार्यों मे संलग्न है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशा निर्देशों के कारण सड़क पर साफ सफाई और पानी के छिड़काव भी लगातार होता रहता है ताकि धूल आदि कम  से कम उड़े। पिछले दिनों जब मै घूमने जा रहा था तो एक नौजवान को उस सड़क पर झाड़ूँ लगाते देखा।  पहले भी वह झाड़ू लगाता रहा हो उस पर कभी ध्यान नहीं दिया। ये नित्य का क्रम कब से था पता नहीं। पर कुछ दिन पहले जब मै पार्क मे जा रहा था तो महसूस किया कि उस नौजवान ने लगभग मेरे  दस कदम पहले झाड़ू लगाना रोक कर और जब तक  मै उसके पास से दस-बारह  कदम आगे नहीं पहुंचा उसने झाड़ूँ लगाना रोके रखा। मैंने थोड़ा बढ्ने के बाद इस व्यवहार को  महसूस किया लेकिन बहुत ज्यादा अहमियत उस सफाई करने बाले नौजवान के इस कृत को हमने नहीं दी और न ही उसके इस व्यवहार को महसूस किया।  पर आज जब मै फिर दोपहर की इस गुनगुनी धूप का आनंद लेते हुए और विविध भारती के गानों को सुनते हुए अपनी धुन मे आगे बढ़ा जा रहा था। हम सर्दीली हवाओं से  जैकिट और मफ़लर पहन कर  खुद को  बचाते हुए और गानों को सुनते हुए आज भी अपनी मस्ती और धुन मे उस सफाई वाले के व्यवहार को नज़रअंदाज़ करते हुए आगे बढ़ गया। पर अचानक मुझे उस लड़के द्वारा  झाड़ू से सफाई को तब तक रोके रखने का अहसास हुआ तब तक मै उसके पास से 15-20 कदम आगे बढ़ गया था। मैंने पीछे मुड़ कर देखा वह सफाई कर्मचारी अनासक्त भाव से अपने काम मे लिप्त था। मेरे कदम लगातार पार्क की ओर बढ़े चले पर न जाने क्यों मेरा मन अधीर हुआ और आतुरता बस पुनः मै उसी सड़क पर बापस उस सफाई बाले नौजवान की तरफ  चलने लगा ताकि सफाई कर्मचारी के उस सद् व्यवहार को पुनः कसौटी पर कसा जा सके?? पर बापसी मे उस नौजवान का व्यवहार बैसा ही था, जिसे मैंने अभी आते वक्त या एक दिन पहले भी अनुभव किया था। उसने झाड़ू लगाना तब तक रोके रखा जब तक मै कुछ कदम दूर नहीं चला गया।  ऐसा नहीं कि उसने यह व्यवहार सिर्फ मेरे साथ ही किया हो बल्कि उसने वहाँ से आ या जा रहे हर पैदल व्यक्ति के लिये उसका व्यवहार समान था।  

अब तक मैंने उस नौ जवान सफाई बाले के पास पहुँच कर उससे  से हाथ मिला कर  अपने उद्विग्न मन को शांत किया और उस सफाई बाले लड़के से उसका नाम पूंछा। अचानक उस नवयुवक से  हाथ मिलाने और नाम पूंछने पर वह कुछ चौंका उसे शायद अचानक से किसी अजनवी से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं थी। मैंने जब उसे लोगो के साथ उसके द्वारा किये जा रहे व्यवहार की तरफ ध्यानकर्षण कर उसकी प्रशंसा की तो उसने उसे नम्रता और सहजता से लिया। उसने अपना नाम चाँदी बांगड़ी बताया। मैंने बांगड़ी को गले लगा कर उसके लोगो के साथ इस सद्व्यवहार की तारीफ की और उसे अपने इस मानवीय व्यवहार को बनाये रखने की अपील की और ईश्वर से चाँदी को शुभाशीष प्रदान करने की प्रार्थना की।

चाँदी बागड़ी जैसे युवक अपने कार्य के जितनी ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण से मानवीय संवेदना को ध्यान रखते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते है जो उस संस्थान के लिये  एक प्रशंसनीय कार्य है। उसके इस कर्तव्य कर्म की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। चाँदी बागड़ी के  इस व्यवहार से इतना तो तय है किसी भी संस्थान की सफलता मे उच्चासीन पदों पर बैठे लोगो की तो बड़ी ज़िम्मेदारी बनती ही  है पर छोटे कर्मचारी भी अपने मानवीय व्यवहार और चरित्र से संस्थान की गरिमा को ऊँचे उठाने मे किसी से पीछे नहीं रहते इसे आज चाँदी बागड़ी जैसे सफाई कर्मी  ने पुनः सिद्ध किया।  

विजय सहगल         

रविवार, 12 जनवरी 2020

कक्षा पर वज्राघात


"कक्षा पर  वज्राघात"



11 जनवरी 2020 को जब मै अपने क्लास के बच्चों को पढ़ाने पहुंचा तो देख कर हैरान था कि हमारे कक्षा पूरी तरह टूट कर तहस नहस हो चुकी  थी। ये हमारे लिये किसी वज्राघात से कम नहीं था। इस सबाल से मै परेशान था कि अब हम कक्षा को कैसे आगे चलाएँगे? जो कि एक टीन शेड के नीचे पिछला 10-11 महीने से छोटी मोटी बाधाओं के वावजूद भी ठीक ठाक तरीके से चल रही थी। आस पास जानकारी लेने पर पता चला प्रशासन का कोई "विकास" निर्माण कार्य होना है जिसके कारण इस कक्षा रूपी निर्माण को तोड़ दिया गया है "वो भी बिना किसी पूर्व सूचना के"। मन ही मन अपने आप पर हँसा और अपनी ओछी "सूचना" की सोच पर ठहाका  लगाया और मन मे बुदबुदाया "श्रीमान सहगल आप कोई बहुत बड़ी तोप नहीं और न ही आपकी  क्लास के बच्चे किसी नामी गिरामी पब्लिक स्कूल की क्लास के बच्चे है जिनको कोई वैधानिक पूर्व सूचना दी जाये"।  इन  बच्चों के साथ अध्यापन का अनुभव करके एक बात मै अच्छी तरह  सीख चुका हूँ इस व्यवस्था मे विकास का मार्ग हमेशा-हमेशा गरीब, निचले, दबे कुचले वर्ग के घरोंदों को रौंद कर ही बनाया जाता है। अब बच्चों के साथ मिल कर आयी विपत्ति से डट कर मुक़ाबले करने के सिवा कोई चारा नहीं था? ऐसा हम सब ने मिल कर किया भी।  सबसे पहले पूर्व कक्षा मे विछी रबर के फर्श को ईंट पत्थर से मलबे से मुक्त कराना था। बच्चों की संख्या कम थी पर हौसले ज्यादा बुलंद थे। सबसे पहले हम सबने मिलकर एक टूटी प्लास्टिक चटाई पर खड़े होकर ईश्वर  की प्रार्थना कर सर्वशक्तिमान से अपने मन के विश्वास को मजबूत करने की गुहार की "इतनी शक्ति हमे देना दाता.............................. । फिर सभी बच्चों ने दृढ निश्चय कर सफाई शुरू की बड़े बड़े ईटों पत्थरों को एक किनारे फेंक पुराने रबर के फर्श को मुक्त किया तत्पश्चात 2-3 छात्रों ने फर्श पर झाड़ू लगाकर सफाई की।   यध्यपि वर्ण माला एवं ब्लैक बोर्ड को टाँगने की दीवार छात्रों से दूर हो गई थी पर कामयाबी फिर हम सबके कदमों मे थी। फिर से एक बार सभी बच्चे "बीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो" के जयघोष के साथ आयी विपदा  से मुक़ाबला करते हुए विजयी मुद्रा मे "सामने पहाड़ हो सिंह की दहाड़ हो"। "तुम कभी रुको नहीं तुम कभी झुको नहीं" की भावना के साथ पढ़ाई के  कार्यक्रम को पुनः आगे बढ़ाया।
हमे नाज़ है इन बच्चों पर, हमे फख्र है इनके हौंसलों पर। हम सलाम करते है इन बच्चों की ताकत पर जिसके सहारे ये सक्षम है बड़ी से बड़ी आपदाओं और विपदाओं से लड़ने मे।
नमस्कार।

विजय सहगल       

शनिवार, 11 जनवरी 2020

शाहीन बाग का सच




"शाहीन बाग का सच"





दिनांक 10 दिसम्बर 2019 को जब संसद के दोनों सदनों से लंबी बहस के बाद जब बिल पास किया गया तो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंगला देश से आये  अल्पसंख्यक शरणार्थी  काफी खुश थे कि उनकी लंबी  जद्दो जहद और मांग के बाद  नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ। उन्हे खुशी थी कि दशकों के बाद उनके उपर से शरणार्थी का ठप्पा हट कर भारत की नागरिकता का सपना सच हुआ है।

पर 13 दिसम्बर से जामिया, अलीगढ़ सहित अनेक राज्यों  मे सीएए के  विरोध मे हिंसक प्रदर्शन शुरू हुआ। दुःख इस बात का है विपक्ष के तमाम नेताओं और  एक पुराने  राष्ट्रिय राजनैतिक दल के एक  गणमान्य नेता ने लोगो से सीएए के विरोध मे घरों से बाहर आने के लिए उकसाया। उसके बाद अचानक  15 दिसम्बर को जामिया, न्यू फ्रेंड कॉलोनी, दरिया गंज आदि जगह पर  हिंसक प्रदर्शन हुए जिसमे दिल्ली  के  एक  विधायक पर हिंसा आगजनी फैलाने का आरोप लगा।  इसके बाद दिल्ली मे जामिया सहित दरिया गंज, सीलमपुर, जाफराबाद शाहीन बाग आदि इलाके मे सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ और आगजनी, वाहनों को खुले आम असामाजिक तत्वों, बलबाइयों, बबालियों और गुंडा तत्वों ने आग मे जला कर  पूरे दिल्ली को  अपहृत  कर हिंसा मे झोंक दिया।  बसों और दुपहिया की आगजनी और पुलिस के विरुद्ध हिंसक आक्रमण भी हुए।  घटनाए दिल्ली समेत उत्तर प्रदेश के कई शहरों मे हिंसा हुई। कई जगह पुलिस ने कड़ी कार्यवाही की। इस घटना क्रम मे इस राजनैतिक दल के उकसावे पूर्ण कार्यवाही मे कई जगहों पर कुछ निरीह लोग मारे गये जो की बड़ा दुःख दायी घटना क्रम था। किसी भी शक्स की हिंसा मे मौत बड़ा ही हिर्द्य विदारक घटना होती है। जिस राजनैतिक नेता के उकसावे के कारण सीधे साधे कुछ नौजवान हिंसा मे मारे गये।  उक्त  राजनैतिक दल के अन्य उभरते नेताओं ने मारे गये नौजवानों की लाशों पर अपनी राजनैतिक  रोटियाँ भी सैकीं  जो एक निंदनीय कृत था।  जिसकी जितनी भी निंदा की जाये कम है। देश मे अहिंसक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हर एक नागरिक और राजनैतिक दल का अधिकार है। आखिर देश के  सबसे पुराने राजनैतिक दल की इस मनसा और सोच को क्या कहा जाये जो संसद के दोनों सदनों से पास बिल को कानून मानने से इंकार करता है और देश के सीधे साधे नागरिकों उकसा और भड़का  कर हिंसक विरोध करवाता है!! तो क्या उक्त राजनैतिक दल अब कानून और संसद के अस्तित्व को नहीं मानता? ये एक बड़ा सबाल उठ खड़ा हुआ है। जिस राजनैतिक दल ने देश पर दशकों तक शासन किया ऐसा प्रतीत होता है वे अब बगैर सत्ता के तड़प रहे है और येन केन प्रकारेण सत्ता मे आना चाहते है जिसके लिये आम जन को भड़का कर द्रोह पर अमादा है।  तो अब क्या ये दल  देश का कानून बनबाने के लिये  देश के हर गली मुहल्ले मे राय शुमारी कर कानून  बनवायेंगे?? जहां जहां कुछ प्रदेशों मे इस दल का  शासन है वहाँ वहाँ नागरिक संशोधन बिल के विरोध मे  किसी भी तरह का विरोध प्रदर्शन, धरना, हिंसा, आगजनी, बलबा, बबाल जैसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे ये शक और भी पक्का होता है कि देश मे जगह जगह फसाद कराने मे इसी राजनैतिक दल का हाथ है। ये एक महत्वपूर्ण और विचारणीय  प्रश्न देश के आम जनता के  सामने है। जिस पर गहराई से चिंतन मनन करने की आवश्यकता है विशेष कर देश के वुद्ध्जीवियों को अवश्य ही इस पर विचार करना चाहिये।

देश के अनेकों शहरों से सीएए के समर्थन और विरोध मे जगह जगह धरने और प्रदर्शन हुए पर शाहीन बाग दिल्ली मे लगातार 28वे दिन  धरना प्रदर्शन दिल्ली और देश मे चर्चा का विषय  बना रहा। शाहीन बाग का सीएए के विरुद्ध  विरोध प्रदर्शन  टीवी चैनलों पर मुख्य सुर्खियां बटोरता रहा।  शाहीन बाग का विरोध प्रदर्शन तो श्रीमान  रवीश कुमार जी का अत्यंत प्रिय विषय रहा जिसकी चर्चा वे नित्य प्राइम टाइम मे करते रहे। अतः हमने भी तय किया कि आज दिनांक 10 जनवरी 2020 को क्यों न हमे  भी सुबह शाहीन बाग चल कर धरना-प्रदर्शन  स्थल का  का जायजा लेना चाहिये। अपने तय निश्चय के अनुसार मैं सुबह लगभग 11.30 बजे शाहीन बाग मेट्रो स्टेशन पर उतरा। नोएडा से सरिता  विहार को जोड़ने बाली मुख्य रोड पर पैदल चल कर जब मैंने दोनों ओर नज़र दौड़ाई तो घनश्याम दस बिरला मार्ग पर न के बराबर वाहन नज़र आये। जिस सड़क पर हर समय सैकड़ो वाहन यहाँ से वहाँ दौड़ते थे वहाँ एक भी वाहन नोएडा या दिल्ली से न आ और न जा रहा था क्योंकि सड़क के बायें तरफ नाले के पार प्रदर्शन स्थल, सड़क के बीचों बीच बना कर सड़क को अवरुद्ध कर दिया गया था।  नाले के ठीक किनारे पहले  अवरोध के  द्वारा सड़क को बंद किया गया था। पर पैदल चलने बाले इस अवरोध के किनारे से होकर आ जा रहे थे। मै भी इस अवरोध को औरों की तरह पार कर गया। नाले के किनारे इस क्षेत्र के विधायक के कार्यालय का एक बड़ा सा बोर्ड सड़क से साफ नज़र आ रहा था। कुछ 40-50 कदम आगे, प्रदर्शन स्थल से कुछ 20-25 मीटर पहले दूसरा अवरोध रस्सी आदि से बांध कर बंद किया गया था। जिसके किनारे कुछ रज़ाई गद्दे पड़े थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों प्रदर्शन का प्रबन्ध करने बाले लोग रात को यहाँ रुके होंगे। जब वहाँ  खड़े व्यक्ति से हमने पूंछा कि आगे जाने के लिए कहाँ से जाना होगा। उस व्यक्ति ने बगल मे लगे लोहे के गेट से जा कर दूसरी ओर पीले गेट से निकल कॉलोनी के रास्ते से जाने का संकेत दिया। अंदर कई अपार्टमेंट 4-5 मंज़िला  बने थे। दूसरे पीले गेट से निकलने पर सघन आबादी बाली  गली नुमा उप सड़क के दोनों ओर दुकाने बनी थी। डॉक्टर मलिक, नाक, कान-गला विशेषज्ञ के क्लीनिक से  होकर अग्रवाल स्वीट से दायें गली मे  एक चाय की दुकान पर पहुंचे। इस दौरान इस रिहाइशि क्षेत्र मे लोग  बहुत कम संख्या मे इधर उधर दिख रहे थे। वही एक मस्जिद मे दान देने हेतु एक टेप रेकॉर्ड चल रहा था और आसपास दान पेटियों मे दान देने की अपील की जा रही थी। अब  हमने सोचा क्यों न एक चाय पी ली जाये चूंकि मुख्य धरना स्थल मुख्य सड़क नजदीक ही थी। पूरे बाज़ार मे कुछ दुकाने खुली थी और कुछ  दुकाने बंद थी। ज़ेबा स्टोर के सामने आस मोहम्मद का चाय की गुमटी एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की सीढ़ियों के किनारे बनी थी। जब मैंने उससे फीकी चाय के बारे मे पूंछा तो उसने हाँ मे सिर हिलाया। मै उसकी गुमटी के किनारे खड़ा हो चाय का इंतज़ार करने लगा। तभी आस मोहम्मद ने फीकी चाय पीने के कारणों  पर जिज्ञासा वस पूंछा। कहा अंकल मालूम है शुगर क्यों होती है। मैं कुछ बोल पता तभी बोला "शुगर दरअसल बीबी द्वारा खाने मे कुछ जादुई चीजे मिलाने से होती है जिसके बारे मे उसके उस्ताद ने उसे बताया था। जब हमने उससे असहमति व्यक्त कर कहा मै विज्ञान पढ़ा हूँ तुम कहाँ तक पढे हो। मै तुम्हें शुगर का कारण बताता हूँ। मेरे कुछ बोलने के पूर्व ही वो वोला, मै कुछ पढ़ा नहीं हूँ पर "कुरान" थोड़ी बहुत मदरसे मे पढ़ी है। मैंने यूं ही उसकी तारीफ की "कहा तुम्हारी उम्र कम है पर तजुर्बा खूब है तुम्हें"। उसने आगे बताया कि बीबी की इसी खुराफात के कारण आज बो और मै अलग अलग है। बातचीत कुछ  दिलचस्प मोड़ ले चुकी थी। शुगर के बारे मे उसकी व्याख्या जारी थी।  कितनी आसानी से उसने अपनी बीबी से पल्ला झाड़ उसको  अपने से अलग कर दिया था!! मैंने देखा कि वही पास मे दीवार पर एक जगह हाई टेंशन रोड, शाहीन बाग लिखा था  तो हँसते हुए उससे कहा कि तुम्हारी दुकान हाई टेंशन रोड पर होने के कारण भी तुम्हें शुगर हुई लगती है। उसने भी हंस कर कहा इस सड़क के उपर हाई टेंशन बिजली के तार गुजरने के कारण इसे हाई टेंशन रोड कहते है। अब तक हम चाय पी चुके थे आस मोहम्मद को 12/- रूपये देकर आगे बढ़े। मै मन ही मन मुस्करा कर खुश था कि चलो  आज शुगर के  एक नये "कारण" की  जानकरी ने  हमारे ज्ञानकोश को समृद्ध किया।

अब तक चाय पी कर हम अब मुख्य धरना-प्रदर्शन पर आ चुके थे। स्थल पर बनी मंच पर 5-6 लोग यूं ही अपने काम मे मशगूल थे। मंच के नीचे भी 10-12 लोग यूं ही यहाँ वहाँ टहल रहे थे। मै  भी मंच के पास से होकर पीछे तक गया, कही कोई संकेत नहीं थे जो ये दर्शाते हों कि कल तक यहाँ 28 दिन से चला आ रहा धरना प्रदर्शन हो रहा है। हमे उम्मीद थी सारे हिंदुस्तान मे टीवी के माध्यम से जिस धरने प्रदर्शन की चर्चा इन दिनों जोरों पर है वहाँ इस तरह का सन्नाटा मिलेगा। न कोई स्लोगन, न नारे, न कोई इंकलावी घोष आसपास सुनाई दे रहा था। सुबह सुबह जो उत्साह उमंग धरने मे दिखाई देने चाहिये दूर दूर तक कहीं नहीं थी। न तो नज़मे गायी  जा रही थी न शेर ओ शायरी के पोस्टर या पम्फलेट कहीं दिखे और न कहीं गहमा-गहमी का शोरगुल? अब तक लगभग एक बजने को था। टीवी पर  सुना था हरदम चाय नाश्ता, समोसे कचोड़ी और अन्य अनेक खाने की चीजे लोगो के बीच बांटी जा रही है जिनहे कौन ला रहा है, नहीं पता पर ये सब यहाँ दूर दूर तक नहीं दीख रहा था। धरना स्थल के बगल से लगी दुकानों पर कुछ लोग धूप सेकते हुए अखबार   पढ़ते या चाय पीते नज़र आ रहे थे। घनश्याम दस बिरला मार्ग जिस पर ये धरना प्रदर्शन हो रहा था इस स्थल के 250-300 मीटर के अलावा कोई वाहन या लोग नज़र नहीं आये क्योंकि ये सड़क इन प्रदर्शनकारियों ने एक तरफ मंच बना कर तथा दूसरी तरफ इंडिया गेट की एक 6-7 फुट का मोडल एवं दो सीमेंट के खंबों को रख कर फुट ओवर ब्रिज के नजदीक रख रोड को बंद कर रखा था। टाइम पास करने के लिये मैंने भी एक मूफली के ठेले से 10/- रूपये की मूफली लेकर जेब मे डाली और टहलता रहा।  न कोई महिलाओं की भीड़, न कोई जामिया, डीयू या जेएनयू के छात्रों का जमावड़ा क्रांतकारी सिंघनाद करता दिखाई दिया। तो क्या ये धरना प्रदर्शन अपनी सुविधा अनुसार स्थानीय निवासियों द्वारा फिल्म के "मैटनी शो" की तरह हो रहा है जो सिर्फ और सिर्फ आम जनता को परेशान करने की द्रष्टि से लगाया जा रहा है ताकि वे लोग इस सड़क से न गुजरे और दूसरे अन्य मार्ग का इस्तेमाल कर अपने पैसे और समय को जाया करे। इस मार्ग के बंद होने से फ़रीदाबाद, दिल्ली के लोग नोएडा और ग्रेटर नोएडा के लिये प्रयोग करने बाले लोग परेशान नज़र आये पर स्थानीय निवासी शाहीन बाग के अंदर के बने उप मार्गों का उपयोग कर अपने आवश्यक कार्यों को पूरा करते नज़र आये, जिसके कारण शाहीन बाग थाने बाली सड़क और पुलिया  पर काफी चहल पहल देखी। फ़रीदाबाद, दिल्ली से नोएडा जाने बाले लोग जिनको अब लगभग डेढ़ घंटा और पैसा ज्यादा खर्च कर अपने गंतव्य तक जाना पढ़ रहा है??  ये सरासर आम जनों के साथ अन्याय है और प्रदर्शनकरियों द्वारा कानून का दुर्पयोग है जिसे दिल्ली पुलिस द्वारा तुरंत समाप्त कर इन प्रदर्शन करने बालों को  किसी अन्य जगह शिफ्ट करवाना चाहिये जिससे आम जनता को कोई समस्या न हो। आम जनता को हो रही परेशानी और वेरुखी प्रदर्शन करने बालों की अमानवीयता को भी दर्शाती है। सीएए या अन्य राजनैतिक मुद्दों पर इन विरोध जताने बाले लोग  अपनी सहूलियत और सुविधा अनुसार प्रदर्शन को अपने टाइम पास का जरिया न बनाये ऐसा प्रशासन को सुनिश्चित करना चाहिये।

विजय सहगल                        


गुरुवार, 9 जनवरी 2020

कनॉट प्लेस



"कनॉट प्लेस"



फोटो -सीपी डायरी के सौजन्य से 


हर शहर के किसी एक स्थान विशेष  से उस शहर के पहचान होती है या यूं कहे दोनों एक दूसरे के पूरक होते है। आगरा की पहचान "ताज महल" से, कलकत्ता या हाबड़ा की पहचान गंगा नदी के उपर कलकत्ता को हाबड़ा से जोड़ने बाले पुल "हाबड़ा ब्रिज" से, मुंबई की पहचान "गेट वे ऑफ इंडिया" से और ठीक उसी प्रकार नई दिल्ली की पहचान "कनॉट प्लेस" से है इसमे कुछ भी संशय नहीं है। "कनॉट प्लेस" को इसका नाम ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्य ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया था। इस मार्केट का डिजाइन डब्यू एच निकोल और टॉर रसेल ने कनॉट प्लेस को लगभग 90 साल पहले बनाया था"। (इसको पढ़ कर हमे सामान्य ज्ञान का पंडित मत समझ लेना ये तो गूगल बाबा के सौजन्य से है) न केवल देश से बल्कि विदेशी सैलानी भी इन स्थानों पर कम से कम एक बार सैर करने का अवसर नहीं छोड़ते। मै भी जब बचपन मे अपने पापा के साथ पहली बार दिल्ली आया तो लाल किला, कुतुब मिनार के अलाबा कनॉट प्लेस भी घूमने आया और आगे नौकरी मे आने के बाद विभागीय कार्य या प्रशिक्षण हेतु दिल्ली आया तो हमेशा कोशिश रही कि कुछ समय निकाल कर कनॉट प्लेस घूमने का लोभ पूरा कर सकूँ। जब जब भी दिल्ली आया तो कुछ समय कनॉट प्लेस मे अवश्य व्यतीत किया। जब 2015 मे हमे पता चला कि हमारी पदस्थपना दिल्ली हुई है वो भी कनॉट प्लेस मे तो जान कर काफी प्रसन्नता हुई। इस प्रसन्नता को दिल्ली प्रवास मे हमने भरपूर जिया, अनुभव किया और आनंद उठाया। दोपहर मे लंच के समय शुरू मे श्री विनय मल्होत्रा कनॉट प्लेस भ्रमण मे हमारे सहचर हुआ करते थे। बाद मे बीच बीच मे हमारे कनॉट प्लेस भ्रमण मे रमन कपूर, अतर सिंह तोमर, विनोद जैन, समीर शरण, आहुलवालिया जी, गोयल जी आनंद जी साथी  भी कभी कभी  जुड़ जया करते  थे। हम लोग प्रायः आउटर सर्कल के ब्लॉक "एम"-"एन" के बीच मूफली लेकर स्टटमेंट बिल्डिंग के सामने धूप सेंकते और लंच समय का भरपूर आनंद उठाते। कनॉट प्लेस के इस आनंद को सेवानिव्रति तक हमने यादगार तरीके से जिया।

कनॉट प्लेस के बारे मे मैंने कुछ रोचक जानकारी जो देखी सुनी जिसे मै आप सभी  के साथ सांझा कर रहा हूँ। एक बार जब मै "ई" ब्लॉक से "एच" ब्लॉक जाने के लिये रास्ता भटकने के कारण उल्टी दिशा मे जाने की बजह से काफी देर से पहुंचा तभी हमने कनॉट प्लेस के ब्लॉक की रचना के बारे मे गहराई से अध्यन एवं शोध  किया। मैंने  जाना कि कनॉट प्लेस दो वृत्ताकार आकृति के बीच  बना है जिसे आउटर सर्कल और इन्नर सर्कल नाम से जाना जाता है। इन्नर सर्कल मे छ: ब्लॉक बने है और इन के ठीक पीछे बाहरी सर्कल मे भी छ: ब्लॉक अर्थात कुल 12 ब्लॉक कनॉट प्लेस मे बने है।  दोनों वृत्तों के दोनों ओर सड़कों का निर्माण किया गया है। बाहरी सड़क को आउटर सर्कल रोड या कनॉट सर्कस कहते है। हमे लगता है कनॉट प्लेस  के इस वृत्ताकार निर्माण जो कि सर्कस के मुख्य रिंग या  वृत्त  के कारण इसे कनॉट सर्कस का भी नाम दिया गया हो।  दोनों वृत्त के बीच की सड़क  को मिडिल सर्कल रोड और अंदर बाली सड़क को इन्नर सर्कल रोड कहते है। अंदर के सर्कल मे रीगल टॉकीज के पास स्थित पंचकुइयां रोड के सामने कनॉट प्लेस का "ए" ब्लॉक शुरू होता  है। घड़ी की सुई की दिशा मे क्रमशः ब्लॉक "बी", "सी", "डी", "ई" और "एफ़", ब्लॉक पड़ते है। ठीक इसी तरह बाहरी सर्कल मे क्रमश: ब्लॉक "जी", "एच" है।  "आई" और "जे" ब्लॉक नहीं है, इसके बाद घड़ी की सुइयों की दिशा मे अँग्रेजी शब्द माला के अनुसार "के", "एल", "एम", एवं "एन" ब्लॉक है। आम जन की सुविधा हेतु मिडिल सर्कल के हर ब्लॉक के शुरू और अंत मे लेडिज और जैंट्स टॉइलेट दिल्ली प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराये गए है।  हर ब्लॉक के आउटर और इन्नर सर्कल मे एक समान  दो मंज़िला भवन बने है, सफ़ेद ऊंचे गोल स्तंभों से व्यापारिक प्रतिष्ठान के बीच पूरे कनॉट प्लेस मे  आम जन के आवागमन हेतु छत्त से ढके बराण्डे बने है जो अपने विशेष स्थापत्य के कारण अनूठे और सुंदर प्रतीत लगते है। पूरे कनॉट प्लेस के ये सफ़ेद ऊंचे स्तम्भ कनॉट प्लेस की अपनी एक  विशिष्ट  पहचान देते  है। सर्कस जैसे   अर्ध वृत्त मे  छूटी हुई जगह अर्थात ब्लॉक "ए" और "एफ़" के बीच की जगह मे पालिका बाज़ार है। इस तरह समझने की दृष्टी से हम कह सकते है कि "ए" ब्लॉक के पीछे "जी" ब्लॉक और इसी तरह "बी" के पीछे "एच", "सी" के पीछे "के", "डी" के पीछे "एल" और "ई" के पीछे "एम" और "एफ़" के पीछे "एन" ब्लॉक है तत्पश्चात पालिका बाज़ार का एरिया आता है। कनॉट प्लेस वृत्ताकार मे बने होने के कारण ब्लॉक "ए" या "जी" से आप सीधे ब्लॉक "एफ़" या "एन" ब्लॉक पहुँच सकते है। इन्नर सर्कल के बीच मे बहुत बड़ा वृत्ताकार गोल ढलान बाला हरी घास का मैदान है जिसे सेंट्रल पार्क कहते है जिसमे बैठ कर हमने कई बार श्री विनय मल्होत्रा जी के साथ कार्यालय समय के बाद बैठ कर मूफली खाई और चाय पी और गपशप मे घंटों समय व्यतीत किया है। सेंट्रल पार्क मे कहीं भी बैठ कर आपको  पूरे कनॉट प्लेस का बड़ा सुंदर और मनोहारी दृश्य दिखाई देता है। अपने स्थापना के समय देश के सबसे ऊंचे  207 फीट के  तिरेंगे की एक अलग ही शान सेंट्रल पार्क, कनॉट प्लेस नई दिल्ली दिखाई देती है।
 
एक तथ्य ये भी है कि यातायात  कनॉट प्लेस की हर सर्कल की सड़क मे सिर्फ एक दिशा मे चलता है। जिसे समझना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा आपका  चालान दिल्ली पुलिस द्वारा किया जा सकता है। दिशा और स्पीड के कारण मेरा भी एक बार चालन दिल्ली पुलिस द्वारा काटा जा चुका है  जिसके कारण 400/- का जुर्माना और ड्राइविंग लाईसेंसे 2 महीने सस्पैंड की पेनल्टी हमारे उपर लग चुकी है। बाहरी सर्कल की सड़क  एवं इन्नर सर्कल का सड़क  का यातायात क्लॉकवाइज़ दिशा (घड़ी की सुइयों की दिशा मे) मे चलता है  जबकि मिडिल सर्कल का यातायात घड़ी की सुइयों के विपरीत अर्थात एंटि क्लॉक दिशा मे चलता है। हर दो ब्लॉक के बीच मे सड़क इन्नर सर्कल को बाहरी सर्कल से जोड़ती है। हर दो ब्लॉक के बीच मे स्थित एक सड़क से आप इन्नर सर्कल के अंदर की दिशा मे प्रवेश कर सकते है और उसके ठीक  अगली सड़क से आप इन्नर सर्कल से बाहर निकल सकते है। कनॉट प्लेस मे वाहन चालक को  हर ज़ेब्रा क्रोस्सिंग पर पैदल सड़क पार करने बालों को आवश्यक रूप से प्राथमिकता देना ही है साथ ही साथ  गाड़ी निर्धारित स्थान पर ही पार्क करना है  अन्यथा आप यातायात पुलिस दिल्ली के निशाने पर हो सकते है। एक बात और  आउटर सर्कल के हर ब्लॉक के बीच से  पैदल यात्री मिडिल सर्कल रोड मे आ जा सकते है या इन्नर सर्कल के लिये शॉर्ट कट के रास्ते आ जा सकते है।  कनॉट प्लेस के इन्नर सर्कल सबसे आकर्षक और भीड़ भाड़ बाला इलाका है जिसमे  मे देश की नामी कम्पनियों के शो रूम होना प्रतिष्ठा की बात है।  जगह जगह पर्यटकों और खरीद करने बाले ग्रहाकों को बैठने हेतु सीमेंट की बेंच पड़ी है जिन पर बैठ कर भी लोग कनॉट प्लेस मे घूमने का आनंद उठाते है। कनॉट प्लेस मे इन्नर सर्कल के    किसी भी ब्लॉक के चंद कदमों की दूरी पर मेट्रो रेल के राजीव चौक स्टेशन पर आसानी से आया या जाया जा सकता है।

कनॉट प्लेस की इन सुनहरी एवं यादगार पलों को हमने लगभग तीन साल संजीदगी से जिया है जो आज भी हमारे मानस पटल पर अमित छाप की तरह जीवित है।

विजय सहगल



शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

मुनस्यारी-साधना शिविर (26 से सितम्बर से 03 अक्टूबर 2019)


मुनस्यारी-साधना शिविर (26 से सितम्बर से 03 अक्टूबर 2019)









वर्ष 2019  मे गायत्री चेतना केंद्र मुनस्यारी मे विशिष्ट साधन शिविर मे शामिल होना हमारे जीवन की एक अद्भुत हर्षदायी घटना थी। इस चार दिवसीय अविस्मरणीय यात्रा ने हमारे जीवन मे एक अमित छाप छोड़ी। शांतिकुंज हरिद्वार से  27.09.2019 से 03.10.2019 के विशिष्ट साधना  सत्र मे शामिल होने की  सहमति मिलने पर काफी खुशी हुई। इस शिविर के समन्वयक श्री विष्णु मित्तल जी ने इस शिविर मे शामिल होने बाले परिजनों को आवश्यक निर्देश मेल पर प्रेषित किये थे। उनमे से एक मे  इस बात के स्पष्ट निर्देश थे कि सत्र के दौरान मौन रहना पढ़ेगा एवं  मोबाइल, इंटरनेट, व्हाट्सप का प्रयोग वर्जित रहेगा। हमने सोचा था मुनस्यारी साधना शिविर मे सत्र के दौरान रोज  रात मे बच्चों से बात कर लिया करेंगे थोड़ा बहुत व्हाट्सप भी देख लिया करेंगे ताकि परिवार और साधना शिविर मे संतुलन बना रहेगा क्योंकि मुनस्यारी मे हमारा विशिष्ट साधना शिविर दिनांक 28.09.2019 से प्रातः 4.30 बजे शुरू होकर 1 अक्टूबर 2019 को शाम 7 बजे तक था। लेकिन फिर दिल मे ख्याल आया हम शिविर के निर्देशों की अवेहलना और अनुशासन को तोड़ कर, झूठ बोलकर किसे धोखा देंगे, शिविर के संचालकों को, मुनस्यारी के व्यवस्थापकों को या स्वयं गुरुदेव को जिनके प्रति हम अकूत श्रद्धा,  सम्मान और समर्पण रखते है? फिर अन्तःकरण ने मन ही मन धिक्कारा, कहा क्या हम कुछ दिन बगैर इंटरनेट, मोबाइल या व्हाट्सप के नहीं रह सकते? क्या बच्चों या परिवार की आत्मीयता से कुछ दिन विलग नहीं हुआ जा सकता? क्या इंटरनेट के माध्यम से दुनियाँ से लगाव कुछ दिन टाला नहीं जा सकता? क्या व्हाट्सप के माध्यम से मित्रों और रिश्तेदारों से संपर्क साधारण परिस्थितियों मे कुछ दिन स्थगित नहीं रखा जा सकता? इन विचारों ने हमे हीन भावना से ग्रसित कर दिया और तब  हमने द्रढ़ निश्चय कर लिया कि अनुशासन को तोड़ने के बनस्पत आसक्ति को तोड़ना श्रेयस्कर मान इन चार दिनों पूरी निष्ठा और अनुशासन से निर्देशों का पालन करेंगे।  ये अनुभव किया कि असाधारण परिस्थितियों मे हमे किसी भी चीज, वस्तु या रिश्ते के बगैर जीवन जीने की आदत होनी ही चाहिए और जो जीवन का परम सत्य भी है!! शायद गुरदेव की परम सत्ता हमे ये ही संदेश इस अनुशासन के माध्यम से देना चाह रही हो। हमने उसी वक्त बच्चों और परिवार को इस निर्णय से अवगत कराते हुए 28.09.19 से  01 अक्टूबर को साँय 7 बजे के बाद मोबाइल पर अनुपलब्धता के बारे मे सूचित कर दिया। दूसरा निर्देश था मौन साधना। इन चार दिनों आपस मे या चेतना केंद्र मे रह रहे परिजनों एवं साथ आये 28 साधक सहचरों से भी आपस मे कोई वार्तालाप निषेध था। आवश्यकता के लिये चेतना केंद्र मे रह रहे परिजनों को एक पेपर पर लिख आप अपनी आवश्यकताओं को लिख सकते है। इस हेतु जगह जगह पेपर और पेन उपलब्ध कराये गये थे। खुशी है इन निर्देशों मे मोबाइल, इंटरनेट, व्हाट्सप  का शत प्रतिशत और मौन साधना  का काफी हद तक हम सभी परिजनों ने पालन किया। मौन कभी कभी अनजाने मे टूट जाता था।   

ठहरने की अति  उत्तम व्यवस्था सभी साधकों के लिये की गई थी। प्रत्येक रूम ऊष्मारोधी था अर्थात कमरे का फर्श, दीवारें और छत  लकड़ी की बनी थी। हर रूम मे स्नानालय एवं शौचालय संलग्न था। स्नानालय मे सौर ऊर्जा से संचालित गर्म पानी की व्यवस्था थी। पीने का गर्म पानी चौबीसों घंटे उपलब्ध था। रूम के दो से लेकर 5-6 साधकों द्वारा सांझा किया जा रहा था।    

28.09.2019 से साधना शिविर की दिनचर्या सुबह 4.30 बजे से शुरू हो गई। प्रातः हर कमरे मे लगे स्पीकर से शंखनाद द्वारा उठने का संकेत दे दिया जाता तत्पश्चात आत्मबोध साधना के माध्यम से आज के जीवन के लिये ईश्वरीय सत्ता को धन्यवाद के साथ आज के कार्यक्रम की रूप रेखा मे सफलता के लिये आशीर्वाद प्राप्त किया जाता। तत्पश्चात  शौच, स्नान जैसे  दैनिक कार्यकलापों के उपरांत  प्रातः कालीन प्रार्थना के माध्यम से भगवान का स्मरण कर दिन की  शुरूआत कर सभी साधकगण तैयार होकर निर्धारित भारतीय वेशभूषा अर्थात पीले धोती कुर्ता या  महिलायें पीली साड़ी मे ठीक 5.30 पर एक नंबर रूम के बाहर टीनशेड के नीचे कल्क्पान के लिये  एकत्रित हो जाते जहां पर सभी साधकों को एक कटोरी मे मिश्रित जड़ी-बूटियों से तैयार गर्म पेय दिया जाता। इस पेय का एक अलग ही स्वाद और मिठास थी जिसे मुनस्यारी मे पूरे साल पड़ने बाली सर्दी के द्रष्टिकोण मे रख कर बनाया गया था। इस कल्क्पान के पश्चात सभी अभ्यार्थी अपने अपने रूम मे बापस आकर आधा घंटे 5.45 से 6.15 तक ध्यान एवं अमृत वर्षा मे भाग लेते। इस ध्यान योग मे गुरुदेव सभी साधकों को भावनात्मक रूप से कारण शरीर को अमृत वर्षा के भाव का अहसास कराते। अपने निर्दशों मे गुरुदेव शांत चित्त, सीधी कमर आँख बंद करा कर हिमालय की सबसे ऊंची चोटी का मन ही मन भावपूर्ण  दर्शन कराते और साधकों को ईश्वरीय स्नेह अमृत वर्षा को शरीर मे अनुभव करने का आदेश देते। इस लगभग 30 मिनिट के ध्वनि संदेश को आप यू ट्यूब पर एक बार जरूर श्रवण करें।  

प्रातः 6.15 बजे से 6.45 बजे तक सूक्ष्म व्यायाम एवं योग क्रिया कराई जाती जिसको करने हेतु देव सांस्कृति विश्विध्यालय, हरिद्वार के योग के वरिष्ठ छात्र श्री रवि  को मुनस्यारी मे नियुक्त किया गया था। सभी साधक गण अपनी आयु और शारीरिक बनावट और क्षमता  के अनुसार भिन्न-भिन्न योग व्यायाम करते है। योग व्यायाम का ये सत्र आधा घंटे चलता है जिसके बाद प्रज्ञा पेय सभी साधक ग्रहण करते है। हाँ एक बात यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि मुनस्यारी चेतना केंद्र मे चाय या कॉफी का वितरण निषेध है। प्रज्ञा पेय शांति कुंज हरिद्वार द्वारा तैयार किया गया पेय है जिसे चाय और कॉफी के विकल्प के रूप मे सालों से प्रयोग मे लाया जा रहा है। आम लोगो से इतर गायत्री परिवार से जुड़े परिजन इससे भलीभाँति परिचित है। प्रज्ञा पेय के पश्चात 6.45 से 7॰30 बजे अर्थात  45 मिनिट तक गायत्री मंत्र जाप के लिये निश्चित था। इस समय मे सभी साधक मौन धारण कर मन ही  मन गायत्री मंत्र का जाप करते। 

15 मिनिट के विश्राम या मध्यांतर पश्चात एक घंटा अर्थात 7.45 से 8.45 तक हर दिन के मुख्य आकर्षण हवन के लिये सभी साधक रूम नंबर 1 से 6 तक के सामने तीन शेड के नीचे एकत्रित होते। हिमालय पर्वत श्रंखला की गोद मे हवन करना एक अविस्मरणीय कार्य होता। यूं तो हवन साधकों के  ठहरने के लिये रूम के उपर खुली छत्त पर कराया जाता पर चूंकि मुनस्यारी का मौसम काफी अनिश्चित होने के कारण प्रायः वर्षा के डर से हवन टीन शेड के ही नीचे कराया जाता। पाँच कुंडी यज्ञ हेतु सभी साधक 5-6 की संख्या मे एक हवन कुंड के सामने स्थान ग्रहण कर हवन कार्य संपादित करते। मौन साधना के कारण सभी साधक मन ही मन गायत्री मंत्र एवं अन्य कार्य हेतु मंत्रों का उच्चारण मन ही मन करते। यज्ञ स्थापना के बाद यज्ञ के अग्नि से निकली ऊष्मा वातावरण को दिव्य बना कर शरीर मे एक नई ऊर्जा का संचार करती। गायत्री माँ, गुरुदेव और माताजी के चित्रों के सामने अर्पित डहेलिया के लाल, नारंगी, पीले, वैगनी फूल बड़े ही मनोहारी लगते। इन फूलों के पौधे चेतना केंद्र मे जगह जगह खिले हुए थे जो केंद्र की शोभा मे चार चाँद लगा रहे थे। यज्ञाहुति  से निकली सुगंधित वायु वातावरण मे एक विशिष्ट दिव्यता प्रदान कर रही थी। मंत्र की स्वर लहरियाँ पहाड़ो से टकरा कर एक सुंदर संगीत का गुंजन कर रही थी। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद आरती का चरण यज्ञ की पूर्णता का संकेत देता। यज्ञ कार्य सम्पादन के पश्चात सभी साधकों को अन्नपूर्णा भोजनालय मे नमकीन   उबले चने, मूफली, मूंग, राजमा का मिश्रण अल्पाहार के रूप मे वितरित किया जाता था। जो खाने मे  सुपाच्य और भरपूर ऊर्जा देने बाला था।  अन्नपूर्णा भोजनालय मे जमीन पर विछी पट्टी पर आमने सामने दो लाइन मे  बैठ कर लोग नाश्ता ग्रहण करते। जो जमीन पर बैठने मे सक्षम नहीं थे उन्हे कुर्सी मेज पर बैठ कर नाश्ता ग्रहण करने की सुविधा थी। मेरे निवेदन पर  बगैर चीनी के प्रज्ञा पेय की भी व्यवस्था श्याम जी भाई साहब ने विशेष तौर पर करवा दी थी जो शिविर के आखिरी दिन तक उपलब्ध रही। पुनः नौ बजे से आधा घंटे गायत्री मंत्र जाप हेतु निर्धारित था। इस जपयोग मे सभी साधक गण गायत्री मंत्र का मन ही मन उच्चारण कर मंत्र से उत्पन्न ऊर्जा का अनुभव करते। पंद्रह मिनिट ओंकार  साधना के पश्चात ठीक 10 बजे सभी लोग भोजन के लिये भोजनालय मे एकत्रित होते।

12.00 बजे से 12.30 तक आधा घंटा स्पीकर के माध्यम से ही कमरे मे  प॰पू॰ गुरुदेव का किसी एक बिषय पर प्रवचन सुनाया जाता था। उक्त संदेश के बाद हर कमरे मे रखे 3-4 किताबों के सेट रखे हुए थे जिनको पढ़ कर स्वाध्याय किया जा सकता था। इस स्वाध्याय के अंतर्गत हमने गुरुदेव के अत्यंत प्रसिद्ध यात्रा व्रतांत "सुनसान के सहचर पढ़ी" काफी प्रेरणा दायी सुंदर यात्रा संस्मरण था। इसको एक बार अवश्य पढे, ऐसा प्रतीत होता है गुरुदेव के साथ हम नितांत शांत और सुनसान जंगल और नदी के तटों और पहाड़ो से बात करते करते हुए उनके साथ चल रहे हों।  अगले आधा घंटे अर्थात 1.30 तक गायत्री मंत्रलेखन के लिये समय निर्धारित था। प्रत्येक कमरे मे चार-चार मंत्र लेखन की कॉपियाँ पेन के साथ उपलब्ध कराई गई थी ताकि लेकन का कार्य साधक निर्धारित अवधि मे कर सके। 1.30 बजे 15 मिनिट हेतु ज्योति अवधारणा के अंतर्गत  जलते दीपक की लौ को निरंतर एक मिनिट  देखने का भाव, तत्पश्चात  आँख बंद करके अपने  अंतर्मन मे ज्योति के प्रकाश को अनुभव अपने पूरे शरीर मे महसूस करने की भावना पूर्ण यात्रा का अनुभव कराया जाता है तत्पश्चात आधा घंटा माताजी का औडियो संदेश चारों दिन चार अलग अलग विषय पर सुनाये गये।    
विदित हो कि 12.00 बजे से 2.30 तक के सभी कार्यक्रम साधकों को रूम मे ही रह कर संपादित करना थे। चाहे गुरुदेव का आँडियो संदेश, स्वाध्याय, मंत्र लेखन या ज्योति अवधारणा तथा माताजी का आँडियो संदेश।

दैनिक कार्यक्रम मे एक कार्यक्रम नित्य समूहिक श्रमदान का था। अपने प्रज्ञा पेय के कप, सुबह शाम की भोजन की थाली, गिलास, चम्मच तो तुरंत ही स्वयं धो पोंछ कर रखनी होती है इसके अतरिक्त  श्रमदान के कार्यक्रम के अंतर्गत  हर दिन केंद्र का  कोई भी कार्य करना होता था। चाहे मंदिर की साफ सफाई, यज्ञ स्थल की झाड़ू बुहारना, अपने अपने कमरे और टॉइलेट की सफाई, पोंछा करना आदि कार्य थे।  जिसको करने के लिये चार पाँच टोली बनाई गई थी।  हर टोली मे 5-6 लोगो को शामिल किया जाता था। इन चार दिनों मे एक दिन हम लोगो ने मंदिर की झाड़ू बुहारी की, एक दिन कार्यालय की साफ-सफाई, एक दिन यज्ञ स्थल की साफ सफाई और एक दिन वृक्षा रोपण का कार्य संपादित किया। महिलाओं की टोलियों को किचिन की सफाई या यज्ञ के कार्य मे आने बाले वर्तनों की सफाई आदि रहती थी। श्रमदान के इन समस्त कार्यों  को चारों दिन सभी साधकों ने बगैर किसी भेद भाव के पूरा किया और अपने आपको बड़ा सौभाग्यशाली माना। श्रमदान के पश्चात शिविर मे शामिल होने बाले परिजनों से अपेक्षा की जाती कि वह अपने अपने कमरों की सफाई पोंछा और टॉइलेट की सफाई आदि भी कर ले।  

दिनांक 28.09.2019 को शिविर के पहले दिन पितृ विसर्जन का अंतिम दिन को होने के कारण चेतना केंद्र, मुनस्यारी मे  समूहिक तर्पण एवं पिंड दान का कार्यक्रम विधिवत रूप से सम्पन्न कराया गया जिसमे सभी साधकों ने भाग लेकर अपने पूर्वजों को पिंडदान किया। आवश्यक सामग्री जैसे कुशा, चावल, तिल, पुष्प, आटा आदि कि व्यवस्था भी चेतना केंद्र, मुनस्यारी द्वारा की गई थी। धर्म शास्त्रानुसार मंत्रोचारण के बीच पिंडदान और तर्पण संस्कार का कार्यक्रम विधिवत रूप से सम्पन्न कराया गया। देवभूमि हिमालय के आँगन मे पिंडदान और तर्पण का संस्कार हमारे पूर्वजों को सर्वोत्तम श्रद्धांजलि  के रूप मे थी  जो कि गायत्री चेतना केंद्र, मुनस्यारी के सौजन्य से संभव हो सकी।

दिनांक 30 अक्टूबर 2019 को श्री श्यामजी अग्रवाल भाई साहब द्वारा शिव मंदिर मे शिव अभिषेक विधिवत रूप से भगवान शिव के 108 नामो का शास्वर उच्चारण कर जलाभिषेक,  दूध, दही, शहद आदि से अभिषेक कर चन्दन, पुष्प, रोरी आदि से शिव का श्रंगार कर शिव स्तुति, आरती की गई तत्पश्चात सभी परिजनों ने प्रसाद ग्रहण किया। हिमालय पर्वत मे स्थित पंचाचूली पर्वत श्रंखलाओं के मध्य शिव अभिषेक कार्यक्रम अपने आप मे एक अनुपम, अद्भुत, अद्व्तिय अनुभूति देने बाला था।    
शाम को ठीक चार बजे सभी परिजन गायत्री मंदिर मे आरती के लिये एकत्रित होते। आरती मे शामिल होने के लिये चेतना केंद्र के आसपास के बच्चे और उनके कुछ परिजन भी आ जाते थे। योग शिक्षक श्री रवि  साधकों को योग व्यायाम के साथ स्थानीय बच्चों को भी योग की शिक्षा के साथ छोटे बच्चों को स्कूल की पढ़ाई मे भी सहायता करते। ये छोटे-छोटे बच्चे शाम 4 बजे होने बाली गायत्री मंदिर की आरती मे भाग लेते। इन सभी 3-4 वर्ष की आयु से 14-15 वर्ष की आयु के बच्चों को गायत्री माँ की आरती और गायत्री चालीसा कंठस्थ याद था  जिसे ये बच्चे सस्वर पढ़ते है जिससे एक बड़ा मनोहारी दिव्य अध्यात्म वातावरण बन जाता है। 

प्रातः और रात्रि के भोजन मे बहुत ही सात्विक, भोजन परोसा जाता। सुबह के भोजन मे एक हरी सब्जी और दाल के साथ चावल और रोटी की व्यवस्था की जाती। अस्वाद भोजन बालों के लिये भी भोजन की अलग व्यवस्था थी। रात्रि भोजन का समय 5 बजे निश्चित था। रात्रि भोजन मे हल्का सात्विक भोजन के रूप मे सारी सब्जियों को मिलाकर खिचड़ी या दलिया दिया जाता जो कि सुपाच्य और स्वादिष्ट होता। प्रायः पहाड़ों पर हरी सब्जी आदि की व्यवस्था नहीं या कम होती है अतः शिविर मे शामिल होने के लिये आने बाली बस के साथ ही फल, सब्जी आदि हरिद्वार से ही प्रेषित किये जाते।

भोजन उपरांत शाम 6 बजे का समय "नाद योग" के लिये निश्चित है जो शांतिकुंज हरिद्वार के साथ साथ  समस्त भारत मे स्थापित शक्तिपीठों मे आवश्यक रूप से निर्धारित समय पर संपादित किया जाता है। सभी शक्तिपीठों के मुख्य द्वार इस दौरान 15 मिनिट बंद कर दिये जाते है और वहाँ उपस्थित सभी लोगो से अपेक्षा की जाती इन 15 मिनिटों मे आँख बंद कर प्रकर्ति के इस आह्लाद नाद का श्रवण करे। मुझे नाद योग हमेशा से ही प्रिय लगता रहा है। संध्या काल मे जब सूर्यास्त हो रहा होता है तब बांसुरी की धुन और तबले की थाप एक ऐसा संगीत उत्पन्न करती है मानो दिन भर के कार्योपरांत पशु पक्षी अपने रैनबसेरे मे बापस आ रहे हों। किसान अपने खेतो के काम को समाप्त कर अपने हल, बैलों के साथ अपने घर को बापस आ रहे हों और उनके बैल अठखेलियाँ करते हुए गौशाला मे अपने स्थान की तरफ पहुँचने की जल्दी मे हों। पूरे नाद योग के दौरान बांसुरी और तबले की स्वर लहरियाँ मन को मोह लेती है। नाद योग हर रोज एक नई अनुभूति और अहसास कराता।
अब तक मुंसियारी मे अंधेरा घिर चुका होता था और समय होता था श्रद्धेय प्रणव पाण्ड्य जी का भगवत गीता पर विडियो संदेश होता है। जिसमे डॉक्टर साहब हर दिन किसी अध्याय के गीता श्लोकों कि सुमधुर व्याख्या करते है। सात बजे सभी परिजनों से दिनभर के कार्यकलापों को डायरी मे लिखने के लिये प्रेरित करते। 8 बजे रात्रि कालीन प्रार्थना के पश्चात ईश्वर को आज के जीवन और सद्कार्यों के लिये तत्वोध साधना के माध्यम से धन्यवाद ज्ञापित करते है। चूंकि अनुशासित दिनचर्या होने के कारण और दिन भर मे लगभग 40-50  सीढ़ियों को 4-5 बार चढ़ने और उतरने से उत्पन्न हुई थकान के कारण तुरंत ही सभी  निद्रा के आगोश मे खो जाते है। पुनः एक नये दिन के आगमन और नवीन दिनचर्या के स्वागत हेतु। इस तरह की दिनचर्या शेष चारों दिन जारी रही।

जहां एक ओर शिविर की व्यवस्था और संचालन हरिद्वार मे श्री विष्णु मित्तल के समन्वयन मे संचालित हो रहा था वही गायत्री चेतना केंद्र मुनस्यारी की सारी व्यवस्था श्री श्याम अग्रवाल के नेतृत्व मे संपादित हो रही थी। श्री विवेक जी, श्री राणावत जी, श्री प्रधान जी, श्री परमार जी  जैसे समयदानी कार्यकर्ताओं की समर्पित सेवा भावना से शिविर सत्र को बहुत ही सुखद और सुव्यवस्थित और आसान बना दिया था। श्री विनोद कुमार सिंह एवं श्री विलास देशमुख जी ने हमारे जत्थे के टोलीनयक के रूप मे बहुत ही सुंदर भूमिका निभाई जिसे सभी ने सराहा।  श्री सहदेव चौधरी द्वारा नित्य यज्ञ हवन एवं सुबह शाम गायत्री मंदिर मे आरती का सम्पादन विधिवत रूप से सम्पन्न कराये जाते रहना उनके अतुलनीय योगदान को दर्शाता है। इस तरह की उत्साह और आनंद देने बाली  दिनचर्या मे चार दिन कब निकाल गये पता ही नहीं चला। और इस तरह हम सभी ने  02 अक्टूबर 2019 को मुनस्यारी सत्र की समाप्ती कर हरिद्वार के लिये प्रातः 5.00 बजे प्रस्थान किया। इस शिविर ने एक नई ऊर्जा उमंग दी। इस दौरान साथ मे रह रहे परिजनों के साथ  मानव संवेदना का गहरा अनुभव हुआ। साधना शिविर मे मौन की साधना करते हुए गायत्री जप साधना को निकट से अनुभव किया इसके अतिरिक्त आज के इस भौतिक्ताबादी, सूचना तकनीकि भरे युग मे कभी हमने सोचा न था कि चार दिन टीवी, रेडियो, इंटरनेट, व्हाट्सप, फ़ेस बुक,  मोबाइल के बगैर भी रहा जा सकता है!! यहाँ यह उल्लेख करना अतिसायोंक्ति नहीं होगी कि शांति कुंज हरिद्वार द्वारा संचालित  गायत्री चेतना केंद्र मुंस्यारी के कुल नौ दिन के प्रवास की सारी सुविधाओं के लिये  मात्र बस के किराये के अतिरिकत किस भी तरह की प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शुल्क या दान की बाध्यता नहीं थी। इस तरह हम एक नई यात्रा का  अनुभव कर बापस हरिद्वार के लिये निकल पड़े।            
विजय सहगल  

मुंस्यारी यात्रा का प्रथम भाग देखने हेतु निम्न लिंक पर जाये:-
https://sahgalvk.blogspot.com/2019/10/blog-post_9.html