गुरुवार, 27 जून 2019

"केशर बऊ"


"केशर बऊ"




हर व्यक्ति के जीवन कुछ ऐसे अनाम  व्यक्ति जुड़ जाते हैं जिनसे उनका  कोई रिश्ता नहीं होता पर श्रद्धा, सम्मान और प्यार से एक अनजान रिश्ते का जन्म हो जाता हैं जिनका महत्व कभी कभी नजदीकी रिश्तों से ज्यादा होता हैं।  प्रायः मध्यम और छोटे हर शहरों या कस्बों मे ऐसे लोग  मिल जाते  हैं जिनकी प्रसिद्धि उस जगह उनके आचार और व्यवहार के कारण होती है और उस  रिश्ते को उस शहर मे "जगत" का दर्जा दे दिया जाता हैं उन्हे लोग अपना  जगत मामा, जगत दादा या दादी, भगत जी आदि  नाम का सम्बोधन कर  रिश्ता बना लेते हैं। उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की छाप उस जगह के असंख्य व्यक्तियों पर स्थाई रूप से बन जाती हैं। बचपन मे हमारे यहाँ भी "केशर बऊ" (बऊ का अर्थ बुंदेलखंड मे नानी/दादी के समकक्ष महिला) का  आना जाना था। झाँसी शहर मे अधिकांश लोग उन्हे इसी नाम से बुलाते थे, उन्हे "जगत बऊ" का दर्जा प्राप्त था। क्या बाल, क्या जवान या वृद्ध सभी उन्हे "केशर बऊ" कहकर बुलाते थे। 70-75 बर्ष से अधिक आयु रही होगी उनकी, हम सभी बच्चे उन्हे बऊ "राम-राम"  कह कर बुलाते थे।  जबाब मे वो बढ़े प्यार और अपनत्व मे आशीर्वाद देते कहती थी, "हमारे लाल खुश रहे और लाल के लाल खुश रहे"। उनके आशीष मे एक अपनत्व और प्रेम था। मेरी माँ बताती थी कि बो एक बाल विधवा थी उनका अपना भरा पूरा परिवार था झाँसी शहर मे उनका  काफी बड़ा मकान था। उनका जीवन शायद उस समय 30 रूपये की मिलने बाली सरकारी वृद्धावस्था पेंशन पर आश्रित था। उनका शहर मे सभी जाति समुदाय मे आना जाना था। लोग स्नेह और सम्मान बश भी अपने घरों मे तीज त्योहार या सहज भले मे बुलाते थे और यथोचित सम्मान भोजन वस्त्र या आर्थिक रूप से उनकी मदद भी करते थे। मेरी माँ से उनका स्नेह कुछ अधिक था क्योंकि बह प्राप्त पेंशन या जो भी नगदी उनके पास होती उसे हमारी माँ के पास रखती थी और वक्त जरूरत पर 2-4 रुपये के रूप मे धीरे धीरे वापस ले लेती थी। यूं तो उनके दूर, नजदीक के कई रिश्तेदार शहर मे रहते थे पर हमारे घर मे उनके लगाव का एक कारण और भी था क्योंकि हमारे पिता उनको मौसी कह कर संबोधित करते थे। कभी कभी वह हमारे घर कई-कई दिन रुक जाती थी और प्रातः 4-4.5  बजे अपनी मधुर आवाज मे राधा-कृष्ण के भजन, दातुन आदि  बुन्देली गीत गाती थी। कुछ माह पूर्व जब मैं झाँसी गया था तो माँ से उक्त बुन्देली भजन दातुन सुनाने का आग्रह किया था जिसे बाद मे रिकोर्ड कर मैंने "यू ट्यूब" पर भी डाला। प्रायः दीपावली पर हफ्तों पहले बनने बाले पकवानों की जब माँ तैयारी करती और केशर बऊ घर मे होती तो सुबह उनके गाये भजन वातावरण मे सुरीला रस घोल देते और वरवश ही ऐसा लगता जैसे जमुना नदी के किनारे उगते सूरज के पूर्व की  लालिमा आकाश मे मंद-मंद सुरीली वयार के साथ पक्षियों और चिड़ियों का कलरव सुनाई दे रहा हो। वो विस्मृत क्षण  आज भी याद कर  प्रसन्नता और खुशियों देते हैं।

केशर बऊ का बगैर किसी चूक के हर मंगलवार को बिजौली के हनुमान मंदिर  जाना निश्चित होता। बिजौली झाँसी से करीब 20-25 कि॰ मी. दूर था।  ललितपुर जाने बाली सारी  बसे बिजौली, बबीना, तालबेहट  होकर ही जाती थी। 75 साल की निडर  केशर बऊ लाठी टेकती हुई उम्र और परिस्थितियों परास्त करते  हुए पहले तांगा से बस स्टैंड जाती और फिर बस से बिजौली प्रत्येक मंगल को जाती।  हर तांगे  बाला या बस बाला केशर बऊ को सम्मान देते हुए  कभी कोई किराया  नहीं लेता था। कभी कभी तांगा न मिले तो पैदल ही  या कोई साइकल बाला या ठेले बाला उनकी सहायता कर उन्हे बस स्टैंड पहुँचा कर  इस पुण्य कार्य का बड़भागी बन जाता था। उनका  बिजौली गाँव मे भी ग्रामीण परिवारों से भी विशेष स्नेह था,  कभी कभी वे  दो चार दिन गाँव  मे भी  उन ग्रामीणों के घर रुक जाती थी।  किसी कारण किसी से नाराजी पर वो उसे प्यार भरी अंग्रेजी, बुन्देलखन्डी मिश्रित हिन्दी की गालियों की ऐसी बरसात कर डांटती की उसकी सिटी-पिटी गुम हो जाती। "इडियट-फूल, नकटा-थुकैल-बजताड़ी" हमसे जवान लड़ाता हैं। उनके इस क्रोध पर बरबस ही लोग मुस्करा कर उनके क्रोध को सिर माथे लगा लेते।   ये प्रेम भरी बुंदेलखंडी गलियाँ खड़ी भाषा की भीड़ मे आज  कही खो गई जो आज के इस आधुनिकता बादी माहौल मे खोजने से भी नहीं मिलती। मंदिर से खाने पीने का जो भी  प्रसाद मिलता उसे मंदिर से घर तक पूरे रास्ते 100-50 लोगो मे जरूर वितरित किया जाता। "अमृत रूपी" ये प्रसाद पाने का हमे अनेक बार मौका मिला। उनका घर अच्छा खासा  बड़ा था।  जो पैसे और देखरेख के अभाव मे खंडहर के रूप मे दिन-व-दिन तब्दील हो रहा था। लेकिन उस सूने  मकान मे मिट्टी के तेल का एक छोटा  दिया जला कर केशर बाऊ  लकड़ी चूल्हा जला कर जो बन पड़ता पकाती-खाती और उस अंधेरे घर मे  निर्भय होकर रहती। उनके घर मे जगह जगह बेरी के पेड़ उग आए थे अतः दिन भर बच्चे दीवारों पर चढ़ कर बेर तोड़ने और खाने आते रहते। बेरों के मौसम मे और घर पर अगर कोई पतंग कट कर आ जाती तो पतंग को सम्हाल कर रख लेती और  मुझे जरूर बुलाती। बेर और पतंग के साथ अगर कुछ खाने का समान या पकवान, मिठाई  घर मे रखी  होती  तो बड़े श्रद्धा और प्रेम भाव  से मुझे  खिलाती थी।  पता नहीं क्यों उस सबको देखकर बचपन मे  रामलीला मे देखे "शबरी के प्रसंग" की याद हो आती। इतना वात्सल्य और प्रेम रखती थी वे मेरे लिये। उम्र के इस आखिरी पढ़ाव मे मुझे लगता था कि अपनी  निर्धनता, संतान न होने का दुःख, नजदीकी परवारिक सदस्यों  और उनके बच्चों का उनके प्रति दुराव को झेलते हुए भी उनके दिल मे एक पल भी अपनों के प्रति शिकायत का भाव कभी देखने को  नहीं मिला। स्वाभिमान उनमे कूट कूट कर भरा था। कभी किसी बात पर वे मेरी माँ से भी नाराज हो जाती तो हफ्तों घर नहीं आती। जब कभी रास्ते मे मिल जाती तो हम अपने भाई के साथ उन्हे आग्रह पूर्वक घर ले आता।  जब घर पर आती तो माँ को उलाहने देकर डांटकर कहती इन बच्चों के आग्रह की  बजह से आ गई वर्ना नहीं आती और फिर पुरानी बाते भूल कर  हफ्तों घर पर बनी रहती जैसे कुछ हुआ ही न हो।  रात मे हम बच्चे प्रायः उन से कहानियों की फर्माइश करते तो वे "चुखरों माता" की कहानी सुनाती वो  बुंदेलखंडी कहानी मुझे आज भी याद और प्रिय है जिसे मैं अपने बच्चों और भतीजे-भतीजियों को भी उनके बचपन मे अनेक बार सुना चुका हूँ। हम कभी उस  कहानी को अपने ब्लॉग मे जरूर लिखेंगे। कुछ छोटी बुंदेलखंडी कवितायें भी बो सुनाती थी जिनको हमने अपने बेटे को सिखा कर उसके स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम मे बोलने के लिये भेजा था जिसे स्कूल मे काफी सराहा गया था।

उम्र के अपने आखिरी पढ़ाव मे उम्र दराज़ बीमारियों के कारण उन्हे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस आड़े वक्त मे उनके पड़ौसियों और रिशतेदारों  ने उनके परिवार के देवर और भतीजों को खबर की पर शायद अपनी  जिम्मेदारियों और समयाभाव के कारण उनके जीते जी बे लोग कभी न आ सके और एक दिन केशर बऊ के निधन का समाचार मिला। केशर बऊ  ईह लोक छोड़ कर परलोक सिधार गई और पीछे छोड़ गई  बो यादगार पल, मीठी यादें  हर उस व्यक्ति, बच्चे या युवा के साथ जो उसने  "बऊ, राम-राम" कह कर  उनके साथ बिताये थे। उनके निधन का समाचार उनके परिवार  और उनके भतीजों को दिया गया। जीते जी जिसको अपनों से कभी एक रोटी नसीब न हुई हो केशर बऊ के निधन  पर उनके परिवार ने   अपना अंतिम उत्तरदायित्व  बखूबी,  ज़िम्मेदारी पूर्वक, पूर्ण धार्मिक विधि-विधान और रश्मों-रिवाज  से  "अंतिम संस्कार" कर निभाया और ब्राह्मण भोज, तर्पण पिंड दान  आदि किया।  उस खानदानी  संपत्ति को जिसे केशर बऊ ने घोर निर्धनता के समय तमाम मुश्किलों, कठिनाइयों और अभावों के बाबजूद और उनके जीते जी  उन कुछ विघ्न  संतोषी  लोगों के सलाह को दरकिनार कर "कि इस मकान को बेच कर अपनी निर्धनता और अभावों को दूर करलो", अपनी  खानदान की  विरासत "उस मकान" को जिसे केशर बऊ ने  तउम्र  सहेज कर रखा था, उस मकान को  उनके परिवारजनों ने अपने  कानूनी अधिकार के तहत विक्रय कर उस महान आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की और "केशर बाऊ" की कर्मस्थली मे कभी दुबारा न आने की सोच के साथ  अपने गंतव्य को प्रस्थान कर गये।

विजय सहगल       

सोमवार, 24 जून 2019

"अम्बाह टू पोरसा"


"अम्बाह टू पोरसा"





मध्य प्रदेश मे  दस्यु प्रभावित चम्बल क्षेत्र  स्थित मुरेना जिला का अपना अलग ही अर्थशास्त्र और समाज शास्त्र हैं। सरसों की नगदी फसल इस क्षेत्र की समृद्धी की कहानी कहती हैं। बैसे तो मुरेना की बहुतायत लोग धर्मपरायण है इसका उदाहरण ग्रामीण क्षेत्रों मे जगह जगह श्रीमद भागवत कथा का श्रवण-वाचन देखने सुनने को मिल जाता हैं।  भागवत कथा के पूर्ण होने पर भंडारों  का विशाल आयोजन और उसमे शामिल होने बाले धर्मप्रेमी  बंधुओं का  भंडारों मे बढ़-चढ़ कर शामिल होना  इस बात की पुष्टि करता हैं। इस सबके बाबजूद कुछ ऐसे लोग भी यहाँ मिल जाते हैं जो अपना कानून "जिसकी लाठी उसकी भैंस" के तर्ज पर अपनी मनमानी करते हैं। ऐसे लोगो के कारण  भिंड और  मुरेना की  कानून व्यवस्था पूरे प्रदेश से बदतर हैं। पूर्व मे सबसे ज्यादा डाकू (यहाँ पर इन्हे दस्यू कहा जाता हैं और इनमे से सबसे बड़े डाकू को दस्यु सम्राट कहा जाता हैं) इन्ही क्षेत्रों से हुए हैं। नगरा ग्राम मे स्थित हमारे बैंक की एक शाखा सिर्फ इस लिये जानी जाती थी कि  डाकूओं पर बनी अभिनेता सुनील दत्त द्वारा अभिनीत फिल्म "मुझे जीने दो" की शूटिंग इसी गाँव मे हुई थी। डाकूँ पुतली बाई, डाकू मान सिंह, पान सिंह तोमर, मलखन सिंह, मोहर सिंह  आदि दस्यु इन्ही क्षेत्रों से हुए हैं। दिन मे तो यात्रा इस क्षेत्र मे थोड़ी बहुत सुरक्षित हैं पर दिन ढलने पर लोग सुरक्षा कि द्रष्टि से निजी या सार्वजनिक वाहनों से भी यात्रा करना उचित नहीं समझते। कब किस व्यक्ति की पकड़ (अपहरण) हो जाये कह नहीं सकते। डबरा पोस्टिंग के समय स्टेट बैंक के एक साथी श्री गुप्ता जी का अपहरण डबरा से ग्वालियर जाते समय कर लिया गया था जो हम लोगो के साथ ही ग्वालियर से आते जाते थे। ऐसे एक-दो वाक्यों से हमारा भी पाला पढ़ा जब हमारी पोस्टिंग जिला मुरेना के पोरसा तहसील मे थी। पहली घटना मे एक संगीतमय वातावरण मे हुई थी। पोरसा पहुँचने के लिये मुरेना से वैध  बस सेवा म.प्र. राज्य परिवहन की ही उपलब्ध रहती थी जो प्रायः मुरेना से भिंड जाती थी रास्ते मे पहले अम्बाह फिर पोरसा पढ़ता था। वैध साधनों से दुगनी संख्या अवैध वाहनों की थी। जिनका अपना संसार था और जिनके अपने सारे नियम और कानून  इन अवैध जीपों और बसों के  ड्राईवर और कंडक्टर के बनाये होते थे। मुरेना से अम्बाह के लिये सबारियाँ ज्यादा उपलब्ध रहती थी तब लोग पोरसा के लिये अम्बाह से जीप या बस बदल कर पोरसा पहुँचते थे। एक बार हम भी अम्बाह तक तो बस से पहुँच गये पर अम्बाह से पोरसा (15 की.मी.) पहुँचने के लिये एक अवैध जीप की सेवाये लेना हमारी मजबूरी थी। 12 यात्री तो कम से कम बैठाना जीप का अधिकार था, 12 से ज्यादा 20 तक या उससे अधिक हो जाये तो जीप बाले को अतरिक्त बोनस मिल जाता था। ड्राईवर और कंडक्टर इस के अतरिक्त होते थे। अब जब जीप मे 20-25  सबारियाँ हो जाये तो कंडक्टर कैसे जाने कि किस किस सवारी ने टिकिट ले लिया और किस ने नहीं। तब उस कंडक्टर ने तुरंत ही सड़क पर धूल धूसरित पड़े एक सिगरेट के खाली डिब्बी को उठा कर फाड़-फाड़ कर टिकिट के रूप मे  उन सबरियों को दे दिया जिन्होने टिकिट के पैसे दे दिये थे। उन मे से एक मै  भी था।  उस गंदे सिगरेट की डिब्बी के फटे टुकड़े को टिकिट की तरह  मजबूरी मे सम्हाल कर हमे अपनी जेब मे रखना पड़ा। पोरसा से लगभग 1 कि.मी. पूर्व एक ग्रामीण को उतरना था। उसका टिकिट (सिगरेट की डिब्बी का टुकड़ा) शायद कही खो या गिर गया। जब उस जीप के कंडक्टर ने टिकिट मांगा तो वह ग्रामीण टिकिट न दे सका। अब तो कंडक्टर ने कहा अपने टिकिट नहीं लिया तो किरया देना होगा। वह ग्रामीण बार बार कहे जा रहा था कि उसने किराया दे दिया है और सिगरेट डिब्बी का टुकड़ा  रूपी टिकिट काही गिर या खो गया। कंडक्टर ने पुनः टिकिट के पैसे मांगे।
यात्री ने कहा - "दय" (अर्थात किराए के पैसे दे दिये)
कंडक्टर ने कहा - "न दय" (अर्थात नहीं दिये)।  दोनों मे बड़ी रोचक संगीत मय बहस होने लगी अर्थात
"दय"
"न दय"
"दय"
"न दय"
"दय"
"न दय"
और अचानक कंडक्टर ने एक जोरदार तमाचा सवारी मे जड़ दिया जिसकी "छपाक" की जोरदार आवाज चारों ओर सुनाई दी। सवारी के साथ जो हुआ सो हुआ ये सब देख कर हमारी हालत अंदर से पतली हो गई।  हमारी इतनी भी हिम्मत न हुई कि उस कंडक्टर से कहे क्यों 4-5 रुपये के लिये 10-15 मिनिट से बहस कर रहे हो और हम भी लेट हो रहे हिन? अंततः मै उनके झगड़े को छोड़ एक ग्रामीण से मोटरसाइकल से लिफ्ट ले कर ब्रांच पहुंचा। मुरेना के समाजशास्त्र से ये हमारा पहला परिचय था।
 
एक अन्य घटना मे मै ग्वालियर से मैनेजर मीटिंग के बाद पोरसा आ रहा था। ग्वालियर से मुरेना पहुँचने मे ही काफी कुछ देर हो गई थी। दिन ढले मै मुरेना से पोरसा जाने के लिये बस का इंतजार कर रहा था। कुछ लोग और थे जो अम्बाह या पोरसा जाने को बस का इंतजार कर रहे थे, पता चला आखिरी सरकारी बस जा चुकी थी। अचानक एक बस आई जिसको देख कर मेरे सहित सभी यात्री बस कि तरफ लपके। बस अम्बाह-पोरसा ही जा रही थी मुरेना के समाजशास्त्र से बाकिफ़ हो जाने के कारण  भी हमने कंडक्टर से पूंछ ही लिया "बस पोरसा जायेगी"?  उसके हाँ कहने पर ही मै बस मे चढ़ा और पोरसा का किराया देकर आराम से सीट पर बैठ गया। शायद इतनी देर रात मै पहली बार मुरेना से पोरसा जा रहा था। जंगलों के बीच रास्ते भर घुप्प अंधेरे को चीरती बस अपने गंतव्य पोरसा को जा रही थी। अम्बाह आने पर जैसे ही बस रुकी तो एक-एक कर सारी सवारियाँ अम्बाह पर उतर गई पोरसा के लिये मै अकेला ही बस मे बैठा था। इसे देख कर कंडक्टर ने कहा बस पोरसा नहीं जायेगी। जब मैंने उसे वास्ता दिलाया कि मैं आपसे पूंछ कर ही बस मे बैठा था कि बस पोरसा जायेगी, अचानक आप कैसे माना कर रहे हैं?
बस कंडक्टर ने कहा आप अकेले है और अकेले के लिये हम बस को पोरसा तो ले नहीं जाएंगे। मैंने कहा क्या कुतर्क दे रहा हैं,  10 लाख की गाड़ी चलाते हो आपकी "जबान की भी कोई कीमत हैं या नहीं"? हम यहाँ इतनी रात अंजान शहर मे कहाँ रुकेंगे, तुम अगर हमे मुरेना मे ही माना कर देते तो हम कही होटल आदि मे रुक जाते, यहाँ तो होटल भी नहीं है रात भर मैं कहाँ रहूँगा। लेकिन उस धूर्त प्राणी ने तो जैसे तय कर लिया था कि अकेली सवारी को तो पोरसा नहीं ही ले जाना हैं। तब मैंने क्रोध से कहा तुम्हें अपनी दी गई जबान का भी ख्याल नहीं कितने पैसे लोगे पोरसा तक के तो उस मक्कार और लालची कंडक्टर ने बड़े वेशर्मी से कहा हमारा 100 रुपये का डीजल लगेगा। अब "मरता क्या न करता" सोच कर हमने उसे 100 रुपये दिये तो उस निष्ठुर,  वेहया, मक्कार, निर्लज्ज, धूर्त, कपटी    कंडक्टर  व्यक्ति ने बड़ी ही निर्लज्जता से 100 रुपये रख लिये। हमे फिर भी तस्सली थी कि चलो घर तो पहुँच जायेंगे  और इस तरह हम 100 रुपये देकर "चार्टर्ड बस" से रात 11 बजे लगभग पोरसा पहुंचे!! अब तक मैं यहाँ के समाजशास्त्र से परिचित हो चुका था क्योंकि ये हमारा मुरेना के समाजशास्त्र से दूसरा परिचय था। 

विजय सहगल

मंगलवार, 11 जून 2019

दान


"देने का मर्म"










"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।
अपने लिये जानवर जीते, परहित का  कुछ कर्ज़ चुकाओ॥  

खेल खेल मे बचपन  बीते, अक्षर ज्ञान सम  रिश्ते  सीखे।
कदम बढ़ाना, जिह्वा चलाना, इस  दुनियाँ के  रस्म अनूठे॥
साक्षर बन दुनियाँ को जताया, परहित का पर नाम न आया।
चतुर सुजान  जानकर  हमने युवा पहर  मे कदम  बढ़ाया॥ 
खुद ना पीकर नदियां बह कर, जल देने का मर्म बताओ।
"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।

युवा अवस्था, जीवन यापन,  सेवा वृत्ति अर्थ प्राप्ति।  
समझ न आई, इस समाज को बापस कुछ करने की रीति॥
दुनियाँ के इस जीवन क्रम मे, सुख सुविधा घरबार बनाये।
ओझल दुःखी  दरिद्र खड़ा  था, राह-निहारे,  आश लगाये॥   
आधा जीवन, ख़ातिर स्वजन, कहता समाज का कर्ज़ बटाओ।
"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।

जीवन की इस संध्या बेला, स्वार्थ की गठरी पथिक अकेला।
सारा जीवन ढोकर गठरी, नहीं समाज को बापस धेला॥ 
गीता का संदेश विश्व को, देश काल और पात्र का  कारण।
जिस वस्तु की जहां कमी हो, उस वस्तु का दान  अकारण॥
रोगी सेवा, दरिद्र को भोजन, निरक्षर का ज्ञान बढ़ाओ।
"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।


देने का सुख कुदरत देती, सीख न पाये हम सारी उमरिया।
दिन भर उजियारा फैला कर, सूरज जाये अपनी कुठरिया॥ 
नदी-मेघ,  नीर  बरसाते,  वृक्ष   खुद  के  फल खाते।
जन-जन के खातिर अपना वे सबकुछ न्योछावर कर जाते॥
समाज से लेकर बढ़े हुए हम, बापस इसे चुका कर जाओ।
"दीन", धर्म की सच्ची सेवा, मानवता का फर्ज़ निभाओ।

विजय सहगल

बुधवार, 5 जून 2019

"जन नायक - स्व॰ श्री राजेंद्र अग्निहोत्री"


"जन नायक - स्व॰ श्री राजेंद्र अग्निहोत्री"



श्री राजेंद्र अग्निहोत्री जी से हमारा कब परिचय हुआ ठीक-ठीक तो  याद नहीं पर शायद 1978-1979 की बात रही होगी उस समय उनका कार्यालय संकट मोचन मंदिर के सामने स्थित घर मे प्रथम मंजिल पर था। उनसे ये मेरा प्रथम परिचय था। धीरे धीरे उनके साथ परिचय हमारे परम मित्र अनिल समधिया के साथ प्रगाण होता गया। 1980 मे झाँसी से विधायक के लिये जब उनको भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी घोषित किया गया तब उनसे संपर्क का सिलसिला भी बढ़ता चला गया। 1980 के विधायक के चुनाव मे उनके विधान सभा क्षेत्र मे एक अलग ही लहर चल रही थी जो उनके आम जनता से जुड़े होने का सबूत दे रही थी। उन दिनों हम पहली बार वोटर का दर्जा प्राप्त कर रहे थे। चुनाव मे सक्रिय रूप से जुड़ने का यह हमारा प्रथम अवसर था। राजेंद्र जी के हर वर्ग और हर उम्र के लोगो से उनका व्यक्तिगत जुड़ाव उनके सद्व्यवहार को इंगित करता था। हम ये सोचते थे हम उनके काफी निकट और खास हैं, कमोबेस सभी युवा, बुजुर्ग जवान सभी अपने आपको इसी भाव से उन्हे  देखते थे। ये खूबी थी उनके व्यक्तित्व की। सभी से पारवारिकता का संबंध। 1980 मे उनकी झाँसी के विधायक के रूप मे विजय  झाँसी के आम जनों की जीत थी। सौभाग्य से 1980 मे हमारी नौकरी लखनऊ मे बैंक मे लगी और साथ ही हमारे मित्र अनिल समधिया की नौकरी भी  कुछ समय बाद लखनऊ मे ही बैंक मे लगी। अनिल जी की अग्निहोत्री जी से निकटता के कारण हमारा भी उनसे मिलना और निकटता बढ़ती चली गई। उनका लखनऊ स्थित विधायक निवास झाँसी के लोगो के लिये धर्मार्थ आश्रय स्थल था कभी भी कोई भी विधायक निवास मे आश्रय पा सकता था। 1984 मे ग्वालियर स्थानांतरण तक लगभग हर दिन उनके लखनऊ प्रवास पर उनसे मुलाक़ात होती रहती थी। कई बार उनका हमारी हजरतगंज स्थित बैंक शाखा मे आना हुआ था तभी एक बार चर्चा मे उन्होने बताया था कि राजनीति मे आने के पूर्व वे भी उत्तर प्रदेश कोपरेटिव बैंक कानपुर मे कार्य करते थे। उनकी ईमानदारी और लोगो से गहरे जुड़ाव के कारण साधु-संतों जैसी फक्कड़ता हमने करीब से देखी और महसूस कि थी।

उनका एक किराये का मकान अशोक मार्ग चारबाग स्टेशन के पास था वहाँ पर भी झाँसी के लोगो का आना जाना लगा रहता। ये घर भी एक आश्रम की तरह ही था। इस घर मे हमने अपने मित्र स्व. अनिल समधिया के साथ  बिताये अविस्मरणीय संघर्ष पूर्ण पल बिताये।  जब थक हर कर हम दोनों जब घर पहुँचते तो खाना बनाने, मिट्टी के तेल और राशन  की जुगत करने तक और घोर गर्मियों मे बगैर एसी-कूलर के सिर्फ पंखे मे खुली छत्त पर रात व्यतीत करना और जब उसी दौरान स्व॰ राजेंद्र जी का अपने चाहने बालों  के साथ आ जाए तो लगने  बाले जमघट की बैठके, राजनैतिक चर्चाए बहुत ही यादगार घटनाये होती। कभी कभी स्व॰ राजेंद्र जी के साले श्री अशोक  जिन्हे हम लोग मामा कहकर पुकारते लखनऊ घर आते तो मामाजी के सौजन्य से बढ़िया होटल मे आइसक्रीम के साथ पार्टी होती। ये सारे यादगार पल   हमारे जीवन की अमूल्य धरोहर हैं।

1984 मे मेरा  ट्रान्सफर लखनऊ से ग्वालियर हुआ, पर हमारी रिहायश झाँसी ही रही क्योंकि  झाँसी मे हमारे बैंक की  शाखा नहीं थी और  झाँसी-ग्वालियर के बीच दैनिक आवागमन संभव था। जब हमारी शाखा का झाँसी मे न होने का स्व॰ राजेंद्र जी को पता चला तो उन्होने तुरंत ही हमारे बैंक के अध्यक्ष को झाँसी मे शाखा खोलने का आग्रह किया जिसके परिणाम स्वरूप  बाद मे हमारे बैंक कि शाखा भी झाँसी खुल गई। पर इसी बीच हम ग्वालियर मे स्थापित हो चुके थे।

अब तक हमारे मित्र अनिल भी लखनऊ से झाँसी आ चुके थे। अब तो प्रायः सिविल लाइन स्थित स्व॰ राजेंद्र जी के आवास पर  अनिल के साथ आना बना रहा। कलांतर मे बहिन नीलम का रिश्ता ग्वालियर मे श्री ओम प्रकाश आर्य जी के सुपुत्र श्री राजेश से तय हुआ जो ग्वालियर के एक प्रतिष्ठित नागरिक थे और हमारे बैंक के सम्मानित ग्राहक भी थे। इस रिश्ते से हमारा दोनों ही परिवारों मे एक परिवार के सदस्य के रूप  मे जीवन पर्यन्त का रिश्ता बना। श्री ओम प्रकाश आर्या जी भी ग्वालियर मे हमारे सैटल होने के कारण हमारे सुख-दु:ख मे पिता तुल्य रूप मे अपने जीवन भर हमारे साथ खड़े रहे। 

राजेंद्र जी का स्नेह और अपना पन हमारे साथ बना रहा। आगे झाँसी के चार बार सांसद के रूप मे हम उन से  जुड़े रहे। झाँसी मे एक बार हमारे साथ कुछ ऐसी परीथितियाँ बनी जिसके कारण हमारे  उपर भारी संकट आन पड़ा जिससे मैं तो संकट मे था ही  मेरे कारण मेरे माता-पिता और पूरा परिवार दुखी थे। उस संकट मे राजेंद्र जी का अति महात्वपूर्ण अविस्मरणीय  योगदान रहा। संकट के समय आज जैसे मोबाइल के संपर्क कि सुविधा नहीं थी, स्व॰ राजेंद्र जी का  घर मे  न होने के कारण तुरंत संपर्क न हो सका। लेकिन जब रात के लगभग 12 बजे वे अपने  घर आये और  उनको  हमारे उपर आयी विपत्ति के बारे मे पता चला तो रात लगभग 1 बजे बे मेरे घर पहुंचे और निश्चिंत रहने का अभय दिया।  उस संकट मे हमारे मित्र स्व॰ अनिल समधिया द्वारा हमारी अनुपस्थिति मे राजेंद्र जी से संपर्क करने हेतु  दौड़-धूप करने  मे लगे रहे और एक सच्ची मित्रता का परिचय दिया। हमारे मित्र स्व॰ अनिल के बीमारी मे ऑपरेशन बाले दिन, स्व॰ राजेंद्र जी का दिन भर बिना कुछ खाये पिये ऑपरेशन की समाप्ती तक सभी के साथ  अपोलो हॉस्पिटल मे इंतज़ार करते रहना और कुशल-क्षेम करना उनके सरल और सुहृदय स्वभाव को दर्शाता था। हम दैनिक यात्री भी उनसे गहरे से जुड़े थे। प्रायः सांसद के रूप मे दिल्ली आते या जाते समय हम लोगो को ट्रेन मे मिल जाते तो फिर, एसी या प्रथम एसी डिब्बा छोड़ कर हम लोगो के साथ ही ग्वालियर-झाँसी के बीच यात्रा कर चर्चायेँ करते। बुंदेलखंड एक्सप्रेस को ग्वालियर तक बढ़ाने की मांग मे उनका काफी योगदान रहा जिससे झाँसी-ग्वालियर के दैनिक यात्रियों को आवागमन मे काफी सुहुलियत हुई। राजेंद्र जी का एक बार किसी से जुड़ जाने पर उसके साथ मजबूती से खड़ा रहना और उसको अपनी निकटता का आभास कराना और अभय प्रदान करना उनके स्वभाव का अभिन्न अंग था जिसे उन्होने हर उस व्यक्ति के प्रति निभाया और उसे कभी निराश नहीं किया जो उनके साथ जुड़ा था या जो भी
उनके पास किसी भी कार्य की आशा लेकर आया।  अपने इस "जन सेवा" के स्वभाव को उन्होने जीवनपर्यंत झाँसी के लोगो या दीगर चाहने बालों के लिये निभाया। बो सच्चे मायने मे  लोगो की सेवा मे तत्पर खड़े होने के कारण एक "जन नायक" थे। जिन्हे हर वर्ग, हर संप्रदाय, हर जाति से जुड़े लोग अपना निकतस्थ शुभ चिंतक मानता था बिल्कुल हमारी तरह। ऐसे निश्चल, सरल हृदय, निष्कलंक सच्चे जन नायक को उनकी 11वि पुण्य तिथि पर उन्हे हम अपनी  सच्ची, हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित कर याद करते हैं। 

स्व॰ श्री राजेंद्र अग्निहोत्री जी को सादर नमन्।

विजय सहगल            

सोमवार, 3 जून 2019

दिल्ली मेट्रो मे महिलाओं को फ्री यात्रा

दिल्ली मेट्रो मे महिलाओं को फ्री यात्रा -केजरीवाल, आप पार्टी दिल्ली ॰  (एक समाचार)



रविवार, 2 जून 2019

पर्यावरण-प्रदूषण


पर्यावरण-प्रदूषण


2 दिसम्बर 1984 को भोपाल गैस त्रासदी बस्तुतः दूषित पर्यावरण का लापरवाह पूर्ण क्रत था जिसमे 3000 से ज्यादा लोग मौत की नींद सो गये। मिथाइल आइसो साइनाइड गैस ने जिस तेजी के साथ वातावरण मे फैल इतने बड़े स्तर पर जन हानि कर विश्व की सबसे बड़ी त्रासदी बनी  जिसके प्रभाव आज तक पीढ़ित व्यक्तियों को दुःख और तकलीफ का कारण  रहे हैं। पर कुछ पर्यावरण संबन्धित घटनाये इस तरह होती हैं जिसका धीमा जहर अपने दूषित प्रभाव को सालों बाद अस्थमा, स्वांस समाबंधित बीमारियों के रूप मे दिखाई देता हैं। इस तरह की वायु प्रदूषण को दूषित करने बाली घटना सालों पहले महीनों तक झाँसी रेल्वे स्टेशन पर होती रही जिसका उल्लेख कभी किसी समाचार पत्र की सुर्खियां नहीं बनी। कोई आंदोलन न तो राजनैतिक  दलों या आम जनता द्वारा किया गया। इससे प्रभावित लोगो का यध्यपि  कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं हैं पर  इस पर शोध किये जाने की आवश्यकता हैं।  

उन दिनों हम झँसी से ग्वालियर के बीच दैनिक आवागमन किया करते थे। मई जून की गर्मी मे भी जब हम घर से झाँसी स्टेशन पहुँचते तो ऐसा लगता मानो सर्दियों जैसी धुंद छाई हुई हैं। झाँसी स्टेशन के दूसरी ओर स्थित यार्ड से ये धूल भरी हवाये हमे इस बात का अहसास कराती जैसे झाँसी रेल्वे स्टेशन पर भरी गर्मी मे कोहरा छाया हैं। ये बात 1985-86 या आसपास  की रही होगी जानकारी करने पर ज्ञात हुआ कि झाँसी के पास स्थित कोछाभांवर गाँव मे नई स्थापित सीमेंट फ़ैक्टरि  का जो कच्चा माल हैं बह झाँसी यार्ड मे उतारा जाता हैं। उस कच्चे माल मे चूना पत्थर और मिश्रित कि जाने बाली मिट्टी (क्ले) हैं जिसे चूने पत्थरों की खदानों से लाकर मालगाड़ियों से झाँसी यार्ड मे उतारा जाता हैं जिससे सीमेंट का निर्माण होता हैं।  ये कच्चा माल मालगाड़ी के डिब्बे से पहले जमीन पर गिराया जाता हैं तब धूल उड़ती हैं फिर पुनः जमीन से जेसीबी की सहायता से फिर बड़े बड़े डंपर मे कच्चे माल को पुनः लोड कर सीमेंट फ़ैक्टरि मे भेजा जाता है जिससे पुनः धूल उड़ती हैं।  पर्यावरण के मानकों की अनदेखी के कारण चूना पत्थर और मिट्टी की धूल मालगाड़ी से इन खनिजों को उतरते समय और पुनः डंपरों मे चढ़ाते समय यार्ड के आसपास 3-4 कि॰मी॰ के क्षेत्र मे प्रदूषण फैला कर पर्यावरण को प्रदूषित करती रही। इसमे पूरे स्टेशन के क्षेत्र के साथ यार्ड और यार्ड के दूसरी तरफ सीपरी क्षेत्र के आवास, नगरा के रास्ते मे पड़ रही  रेल्वे कॉलोनी के घर प्रभावित हो रहे थे। हम दैनिक यात्री भी सुबह के समय इससे प्रभवित हुए बिना नहीं रहते क्योंकि सुबह अनेकों बार गाड़ियों कि बिलंब से चलने के कारण प्लेटफॉर्म घंटों इंतजार करना पड़ता था। धूल के इस प्रदूषण से झाँसी स्टेशन पर हजारों रेल कर्मचारी, आसपास के क्षेत्रों मे रह रहे रहवासी  हर रोज इस से प्रभावित होते और धीरे-धीरे  श्वांस संबन्धित बीमारियों से ग्रसित होकर अस्वस्थ होते।  पर दुर्भाग्य ही कहेंगे इन रहवासियों ने और स्टेशन पर कार्यरत कर्मचारियों ने इस के विरुद्ध कभी कोई आवाज नहीं उठाई। हम डेलि पैसेंजर भी यदा कदा इस की आपस मे एवं रेल्वे कर्मचारियों से चर्चा कर समाधान निकालने की बात करते। ऐसे ही एक दिन  यात्रा के दौरान एक व्यक्ति से दैनिक यात्रियों मे से किसी एक ने परिचय कराया जो सीपरी बाजार के किसी बार्ड से पारिषद थे। जब हमने उनसे रेल्वे स्टेशन मे हो रहे वायु प्रदूषण की समस्या की तरफ ध्यानाकर्षित कराया तो वह मँझे हुए राजनैतिज्ञ की तरह समस्या से बचते दिखे और व्यवस्था को कोसते नजर आये। जब हमने उनको इस जन समस्या के विरुद्ध आंदोलन, धरना, प्रदर्शन को शुरू करने के लिये कहा तो वो इसके लिये शायद हिम्मत न जुटा सके। हमने उन्हे उत्साहित करते हुए कहा ये जन आंदोलन आपको पारिषद से उपर विधायक बनने का रास्ता दे सकता हैं। हमने पारिषद जी से लोगो को एकत्रित कर वायु प्रदूषण के विरुद्ध संघर्ष की अगुआई कर लड़ाई लड़ने का आग्रह किया पर शायद उनकी दिलचस्वी इसमे नहीं थी। एक बार हम कुछ दैनिक यात्रियों ने जिनमे श्री देवेंद्र दुवेदी, कमल पांडे, डीबी सक्सेना, विजय गुप्ता, राजकुमार खरे, मुकेश रिहानी, राजीव कपूर  आदि लोग थे स्थानीय समाचार पत्र मे इस समस्या के निराकरण हेतु ज्ञापन देने उनकी प्रैस मे पहुंचे और उनके संपादक को स्टेशन पर हो रहे प्रदूषण के बारे मे अपने समाचार पत्र मे मुख्य जगह देने को कहा। मैंने उन्हे शिकायत भी की कि आप  ऐसी जन समस्या को अपने समाचार पत्र मे स्थान नहीं देते जिनसे आम जन पीढ़ित हैं बल्कि ऐसे छोटे-मोटे  समाचार छापते हैं जैसे  "चौराहे पर बैलो-गायों का झुंड बैठे हैं" या "लड़ाई झगड़े" के समाचार या बेहद साधारण समाचार। हमे सुन कर उन्होने पूंछा कि आप किस राजनैतिक दल से हैं। जब हमने कहा हम लोग नौकरी पेशा लोग है प्रदूषण से पीढ़ित आम जन के लिये आवाज उठाने आये हैं। यध्यपि उन्होने समाचार को प्रकाशित किया पर आम जनों कि समस्या अपने समाचार पत्र के हितों के अनुसार ही उठाते रहे हैं।  इस का जीता जागता प्रमाण आज के समाचार पत्रों या टीवी समाचार चैनलों कि कार्य प्रणाली से देखा जा सकता हैं। जो कभी भी बड़े उध्योग पतियों या बड़ी राजनैतिक हस्तियों के विरुद्ध कभी भी समाचार प्रकाशित या प्रसारित नहीं करते।

ऐसे ही एक दिन गाड़ी के आने मे विलंब था। हम लोग प्रदूषण की इस समस्या पर स्टेशन पर खड़े होकर चर्चा कर रहे थे। हममे से किसी ने कहा रेल मण्डल प्रबन्धक से इस बारे मे चर्चा करनी चाहिये, पर समस्या ये थी कि कार्यालीन समय यानि सुबह 10 बजे हम लोग ग्वालियर मे होते थे। किसी ने कहा क्यों न मण्डल रेल प्रबन्धक के घर फोन कर इस समस्या को उठाया जाये यदि आवश्यक हो तो स्टेशन के पास ही उनके बंगले मे उनसे मिला जाये। कुछ रेल कर्मचारियों ने भी इस बात का समर्थन किया पर चूंकि रेल्वे मे कार्यरत होने कि बजह से वे लोग अपरोक्ष रूप से रह कर तो समर्थन कर सकते थे पर  सामने नहीं आना चाहते थे। रेल विभाग का अपना टेलीफ़ोन एक्स्चेंज हुआ करता था। पुराने सिस्टम के डायल करने बाले फोन तो जहां तहां स्टेशन पर मिल जाते थे। जैसे प्लेटफॉर्म मे चाय कि स्टाल और पार्सल ऑफिस मे पर मण्डल रेल प्रबन्धक के घर का नंबर उपलब्ध नहीं था। डीआरएम के घर के नंबर का पता लगाने मे  हमारे एक रेल्वे मे कार्यरत खान बाबू ने सहायता की जो हम सभी दैनिक यात्रियों के अच्छे मित्र थे। डीआरएम बात करने की ज़िम्मेदारी मेरे उपर थी। सच की ताक़त हम सबके साथ थी। मैंने चाय की स्टाल से उस दिन सुबह लगभग 8.00 बजे उनको फोन लगाया। उन दिनों श्री सी एल काव मण्डल रेल प्रबन्धक थे। फोन उन्होने ही उठाया, नमस्कार की औपचारिकता के पश्चात हमने शिष्टाचारवश  उन्हे सुबह सुबह फोन करने के लिये खेद प्रकट कर सीमेंट के चूना पत्थर और मिट्टी के कारण झाँसी स्टेशन परिसर मे फैल रहे वायु प्रदूषण की समस्या पर ध्यान आकर्षित किया और इससे पीढ़ित हो रहे आम जनता के दुःख की बात बताई  तो ऐसा लगा की वे मेरी बात सुनकर असहज होकर चौके। उन्होने पूंछा आप कौन बोल रहे हैं तो मैंने बताया कि मैं एक साधारण नागरिक बात कर रहा हूँ जो इस समय यात्रा के उद्देश्य से प्लेटफॉर्म पर प्रदूषण को महसूस कर रहा हैं। उन्होने फिर उनके घर का नंबर और कहाँ से फोन कर रहे के बारे मे भी पूंछा। तब मैंने शालीनता पूर्वक अपना नाम बताते  हुए कहा कि श्रीमान फोन तो मैं प्लेटफॉर्म पर स्थित  चाय कि स्टॉल से कर रहा हूँ और  नंबर मैंने जिस कर्मचारी से लिया उसे नहीं जनता पर समस्या गंभीर हैं और इसका निराकरण आवश्यक हैं। उनका फोन के विवरण पूंछने से क्या मंतव्य था मैं नहीं समझ पाया पर उन्होने हमे विस्तार से बताया कि ये समस्या उन के संज्ञान मे हैं इसके निराकारण के लिये नई रेल्वे लाइन फ़ैक्टरि तक डाली जा रही है तब तक कच्चे माल से फ़ेल रहे प्रदूषण से बचाव के लिये हम माल उतरते समय और बाद मे भी पानी का छिड़काव  करवाएँगे। हमे बताते हुए खुशी है कुछ ही दिनों मे इस कार्य को अंजाम देकर पानी से छिड़काव  के कारण पूरी तो नहीं पर थोड़ी बहुत  समस्या पर काबू पाया जा सका। फ़ैक्टरि तक नई रेल लाइन बन जाने पर प्रदूषण कि समस्या स्वतः ही समाप्त हो गई।

पर दु:ख और अफसोस का विषय यह हैं कई महीने तक रेल प्रशासन अपने व्यवसाय के नाम पर आम जनता और यात्रियों की ज़िंदगी से कैसे खेलता रहा?? उससे भी आश्चर्य करने बाली बात हैं स्थानीय समाचार पत्रों और राजनैतिक दलों द्वारा इस पर्यावरण के मुद्दे और आम जनों, यात्रियों और रेल्वे स्टाफ  की ज़िंदगी से खिलवाड़  पर चुप्पी  साधे रखना??

विजय सहगल        
                    

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