मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

डॉक्टर वेरहम कसाई


"डॉक्टर वेरहम कसाई"

समाज मे डॉक्टर एक अहम एवं सम्मानीय स्थान रखता हैं। आज के अर्थ प्रधान युग मे भी समाज के लोग डॉक्टर को भगवान की तरह पूजते हैं और ये सच भी हैं डॉक्टर अपने अनुभव और सलाह पर लोगो का इलाज कर भगवान की तरह  उनको कष्ठ और दु:खो से मुक्त करते हैं। क्या डॉक्टर भी बर्बर और निर्दयी होकर कसाई की तरह व्यवहार कर सकते हैं,  भारतीय जनमानस मे इस की  कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन अपवाद स्वरूप भी ऐसे व्यक्तित्व देखने को नहीं मिलते, लेकिन बड़े अफसोस और दु:ख के साथ ऐसा एक अनुभव मैं आप लोगो के साथ बांटना चाहता हूँ। मैं आज तक नहीं समझ पाया कोई डॉक्टर इस तरह का व्यवहार क्यों और कैसे कर सकता हैं? उसका व्यवहार अमानवीय कैसे हो सकता हैं?

मैं उन दिनो सन 1992 मे ग्वालियर मे पदस्थ था मेरा छोटा बेटा हाल ही मे हुआ था। उसको कुछ  प्रोब्लम हो रही थी हम लोगो ने उसे लोहिया बाज़ार ग्वालियर मे एक प्रसिद्ध डॉक्टर को दिखाया उन्होने आवश्यक उपचार के बाद सलाह दी कि जब ये 6-7 महीने का हो जायेगा, इस का एक छोटा सा  ऑपरेशन होगा कोई दिक्कत या चिंता की बात नहीं हैं। इसी बीच मेरा ट्रान्सफर ग्वालियर से शाखा पोरसा मे हो गया जहां कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनी की हम सारा समान पोरसा मे ले जाने के बाबजूद परिवार को वहाँ शिफ्ट न कर सके। इसलिये बच्चों को अपने माता-पिता के पास  झाँसी छोड़ना पड़ा जहाँ बच्चों का स्कूल मे एड्मिशन आदि कराना पड़ा। पोरसा से झाँसी साप्ताहिक कष्टप्रद आवागमन  लगभग साढ़े चार साल करना पड़ा इसलिये  माता-पिता एवं भाइयों के संयुक्त परिवार मे रहने के कारण हम निश्चिंता पूर्वक नौकरी कर सके।  झाँसी मे रहने के कारण 6-7 माह बाद बेटे का जो छोटा ऑपरेशन कराना था उसे झाँसी मे ही कराया जो ठीक तरह न हो पाने  के कारण ग्वालियर के लोहिया  बाजार स्थित पुराने डॉक्टर को दिखाया। उक्त डॉक्टर एवं उनके एक सहायक डॉक्टर ने बेटे को देखा आपस मे एक दूसरे को देख कर मुस्कराये और हम पति पत्नी को बोले आप इस बच्चे को उसी डॉक्टर को दिखलाए जिससे आपने झाँसी मे ऑपरेशन कराया। उक्त जबाब से हम दोनों  चिंतित और विचलित होते हुए उनसे पूंछा आखिर ऐसी क्या बात हैं जो आप इस तरह कह रहे हैं। उनका वही जबाब था आप उसी या  किसी और डॉक्टर को दिखाये! मैंने पुनः निवेदन किया की   हर व्यक्ति जब पूर्व के डॉक्टर के इलाज़ से संतुष्ट नहीं होता तो दूसरे बड़े डॉक्टर को दिखाता हैं और इसीलिये हम आपके पास आये हैं पर उन दोनों डॉक्टर ने अपना बही जबाब जारी रखा  कि आप दिल्ली या अन्य जगह ले जाये। अब हम पति-पत्नी काफी चिन्तित एवं परेशान हो गये और पुनः उस डॉक्टर को निवेदन कर  कहा कुछ तो आप बताये हम उसे दिल्ली या अन्य जगह भी ले जायेंगे पर अपनी कुछ तो राय दे बच्चे के इलाज के लिये,  लेकिन वह अपनी बात से टस से मस नहीं हुआ और अपना बही जबाब अलापता रहा। उस के इस निर्दयी रूप को देख कर मैं काफी सकते मे था। मेरी पत्नी की आँखों मे आँसू आ गाये, मैं भी काफी परेशान और चिन्तित था कि न जाने कौन सी विपदा आ पड़ी? आखिर मे मैंने उस डॉक्टर को कहा कि जब आपको इसे देखना नहीं था तो पिछले डॉक्टर के पर्चे आदि के साथ वेटे को क्यों चेक किया और चेक करने के बाद आप दोनों एक दूसरे को देख कर क्यों मुस्कराये? लेकिन उस कठोर, निर्दयी, कसाई डॉक्टर ने अपना एक ही जबाब जारी रखा। उस डॉक्टर का सहायक जो हमारा परिचित था हमने निवेदन किया कि आप वेशक इलाज़ न करे पर सलाह तो दे हम निश्चित ही उसे कहीं और दिखा लेंगे। उसने कुतर्क दिया दूसरे बैंक के चैक को आप अपने बैंक मे कैसे भुगतान करेंगे वैसे ही दूसरे डॉक्टर के मरीज को हम कैसे देख सकते हैं। मुझे उसके कुतर्क पर काफी दुख और क्षोभ हो रहा था मैंने कहा आपको बैंक के बारे मे कुछ जानकारी नहीं हैं मेरा सिर्फ ये कहना था कि जब आप दूसरे डॉक्टर के मरीज को नहीं देख सकते तो आपने शुरू मे ही मना करना चाहिये था। लेकिन सब निवेदन, प्रार्थनायें निरर्थक रही और आखिर कर हमे इस डॉक्टर के रूप मे कसाई के  दु:खद अनुभव  के साथ उसके हॉस्पिटल से बापस आना पड़ा। अब सबसे बड़ी चिंता हमे किसी दूसरे डॉक्टर से तुरंत सलाह-मशविरा करना था। हम लोग  बही पास मे स्थित  श्री ओम प्रकाश आर्य जो हमारे पितातुल्य थे  और नया बाजार, ग्वालियर  के पुराने रहवासी   एवं गणमान्य व्यक्ति थे  के घर   पर गये और अपने साथ हुई इस घटना के बारे मे बताया। वह उस डॉक्टर को जानते थे उन्होने नाराजी जाहिर कर कहा वह डॉक्टर ऐसा कैसे कर सकता हैं  मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ।  पर हम लोगो ने किसी और डॉक्टर के बारे मे जानकारी चाही। उन्होने डॉक्टर छाबड़ा जो कि जे॰ए॰ हॉस्पिटल के वरिष्ठ डॉक्टर थे, को फोन कर हमे उनके पास भेजा और किसी भी तरह की चिंता न करने के लिये हिम्मत बंधाई। हम लोग विना एक पल गवाये डॉक्टर छाबड़ा के पास गये उनको हमने सारी केस हिस्ट्री बताई। उन्होने तसल्ली पूर्वक हम लोगो को सुना और वेटे को देखा और हमे बताया कोई चिंता की बात नहीं हैं आपने जो ऑपरेशन झाँसी मे कराया है वह कुछ ठीक नहीं हुआ हैं। पर आप जब चाहोगे इसका ऑपरेशन हो सकता हैं मैं भी इसका ऑपरेशन कर सकता हूँ,  पर इस तरह के ऑपरेशन के एक स्पेशलिस्ट डॉक्टर अशोपा आगरा मे हैं आप उनसे भी ऑपरेशन करा सकते हैं। कोई घबड़ाने या चिंता करने की जरूरत नहीं हैं। उस दर्दनाक किस्से के बाद भगवान के रूप मे हमे सलाह देने बाले डॉक्टर छाबड़ा मिले। हम लोगो ने अगले दिन ही आगरा पहुँच कर वेटे को  डॉक्टर अशोपा के हॉस्पिटल मे दिखया। मेरे बड़े भाई और बहिन भी उन दिनो  आगरा मे थे एक हफ्ते के अंदर ही डॉक्टर अशोपा ने वेटे का सफल ऑपरेशन कर पुनः इस सत्य को स्थापित कर दिया कि भगवान के रूप मे डॉक्टर उपस्थित हैं। शायद एक निर्दयी, कठोर, कसाई के रूप मे लोहिया बाज़ार, ग्वालियर का वह डॉक्टर  अपवाद स्वरूप एक हादसा था।

विजय सहगल     

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

पुलवामा के शहीदों को नमन


पुलवामा के शहीदों को नमन

अभी कुछ महीने पहले की ही तो बात हैं हम अपने देश की मातृभूमि के उस भू भाग से श्री अमरनाथ तीर्थ  यात्रा के लिए गुजरे थे हमे क्या पता था पुलवामा मे दिनांक 14 फरवरी 2019 को हमारे केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के 41  बहादुर जवानो ने अपनी शहादत से श्री अमरनाथ गुफा तीर्थ के पहले  एक नये तीर्थ की  स्थापना  कर दी। नमन हैं देश के इन बहादुर नौजवानों को जिन्होने अपना बलिदान देकर हमारा कल, काल के गाल से बचा लिया। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकबाद के कायराना हमले मे हमारे सुरक्षा बालों के इन जवानों के  बलिदान ने हमे फिर से उस अमरनाथ यात्रा को पुनर्जीवित कर दिया। उस यात्रा वृतांत मे हमने महसूस किया था कि इन सुरक्षा बलों के बिना अमरनाथ यात्रा संभव ही नहीं थी।  हम शुक्रगुजार हैं इन सुरक्षा बालों के उन बहादुर वलदानियों के कि जिनके कारण दुश्मन-देश की सीमाये हमारे घर से कोशो दूर हैं। आज छद्म मानवाधिकार के पैरोकार स्वतः याद आ गये जो कल तक  सोहरबुद्दीन और तुलसीरम प्रजापति जैसे आतंकियों की मुठभेड़ मे हुई मौत पर उनके भाई और परिवार के अधिकारों पर स्यापा कर रहे थे, आज शायद इन पत्थरबाजों और आतंकवादियों के पक्षधर बन कर खड़े हों। इन लोगो को इन आतंकियों के भाई और बच्चों की तो चिंता थी, आज उन्होने क्यों नहीं सवाल किया  उन कायर आतंकवादियों से, उन देश के गद्दारों से, मानवता के दुश्मनों से, क्यों नहीं रोकी  उस बहादुर केन्द्रीय रिजर्व पुलिस की 76वी बटालियन के चालक जवान स्व॰ जयमल सिंह की निर्शंन्स हत्या, जो देश की रक्षा के लिये बस चला कर अपने छोटे-छोटे बच्चों की ग्रहस्थी चला रहा  था!!  इन  उन्मादी धर्मांन्ध आतंकियों ने जिन्होने अपनी ईद मनाने के लिये हमारे जांबाज फौजी स्व॰ नसीर अहमद के परिवार की ईद स्याह कर दी!! ऐसे ही हमारे अन्य शहीदों के परिवारों की  भी कमोवेश यही कड़ुवी और सच्ची कहानी हैं जिन्होने अपने बेटों को इस जंग मे खोया हैं। हर परिवार का करुण क्रंदन हमारे ह्रदय को झकझोर रहा है।    

मौलाना मसूद अज़हर, हफीज़ सईद, जैसे क्रूर आततायी ये समझते हैं कि वे निरीह मासूम और बेकसूर लोगो की हत्या कर  इस्लाम की  रक्षा कर रहे हैं। ये भूल रहे है कि मुहम्मद साहब का सारा जीवन सच, साहस, दया, करुणा, भाई-चारे, ईश्वर के प्रति अटूट भरोसे का प्रतीक रहा था  और जिन्होने  अपनी ज़िंदगी, इंसानों कि भलाई  और आपसी भाई चारे के लिये  जी थी।  उन की तमाम शिक्षाओं मे एक थी कि  इस्लाम का मानने बाला, कभी भी इंसानों के बीच आपस मे वैमनस्य, मनमुटाव, हिंसा, दुश्मनी या विद्वेष नहीं फैलाता ऐसा करना कुफ्र हैं और  करने बाले की सारी नेकियाँ और अच्छाइयाँ पर पानी फिर जायेगा। इन  अल्प बुद्धि मूर्ख आतंकियों को समझ लेना चाहिए कि  इस्लाम उनकी बजह से जिंदा नहीं है बल्कि  वे इस्लाम की बजह से तब तक ही  जिंदा है जिस दिन उनके जुल्मों-सितम  कि इंतहां  होगी अल्लाह का रहमो करम उनके  उपर से उठ जायेगा और उनका  भी बही हश्र होगा जो विन-लादेन और बगदादी जैसे आततायी-आतंकियों का हुआ था।  

आईये आज संकट की इस घड़ी मे हम सब एक जुट होकर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी घटना की तीव्र भर्त्स्ना करे। हम अपनी सरकार से मांग करते हैं इस कायराना हमले के विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही करे। सुरक्षा बालों के 41 जवानों की शहादत के लिये हम उन्हे शत-शत नमन करते हैं, अपनी हार्दिक अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करते है। ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनके परिवार जनों को हुई इस असामयिक,  अपूर्णिय क्षति को सहन  करने की शक्ति प्रदान करें।

विजय सहगल
  
  



रविवार, 3 फ़रवरी 2019

"चैक की वापसी"


"चैक की वापसी"



मुझे गायत्री परिवार के कलेंडर का वह सदवाक्य याद आता हैं जिसके अनुसार "दूसरों के साथ बैसा व्यवहार न करें जो आपको अपने लिये पसंद न हो"। एक बैंक अधिकारी स्वयं और अपने अधीनस्थ अधिकारी के साथ दो अलग-अलग  पैमाने कैसे लागू कर सकता हैं? जिसका अनुभव हमे 1992 मे ग्वालियर मे हुआ। उन दीनों मैं शाखा नया बाज़ार मे पदस्थ था। एक दिन शाखा के तत्कालीन मुख्य प्रबन्धक ने मुझ से  कहा कि एक चैक समाशोधन (क्लेयरिंग) मे आने बाला हैं जो एक खाता धारक द्वारा भारतीय जीवन बीमा निगम के पक्ष मे जारी किया गया हैं। खाता धारक की दुर्घटना मे देहांत हो गया हैं। उक्त चैक भारतीय जीवन बीमा की किश्त का था। जब चैक समाशोधन के माध्यम से बैंक मे प्रस्तुत हुआ तो हमारे मित्र श्री कमलेश गौतम जो उन दिनों करेंट अकाउंट के लेजर का कार्य देखते थे। उन्होने उस चैक को लेजर मे प्रिविष्टि कर पास करने हेतु हमारे पास भेजा। मैंने देखा खाते मे अपर्याप्त  धनराशि थी। उक्त चैक को पास करना हमारे अधिकार क्षेत्र मे न होने के कारण  मैंने उक्त चैक एवं लेजर को माननीय मुख्य प्रबन्धक के पास भेज दिया। लेजर देख कर मुख्य प्रबन्धक महोदय कुछ नाराज हो गये। उन्होने हमे अंदर कैबिन मे बुला भेजा और पूंछा इस चैक को आपने लेजर के साथ अंदर क्यों भेजा? मैंने कहा श्रीमान - खाताधारक का देहांत हो गया हैं एवं  खाते मे पर्याप्त राशि नहीं है।  इस पर उन्होने कुछ नाराजी भरे लहजे मे कहा मैं चैक पर लिखित मे अनुमति दे रहा  हूँ तो आपको चैक पास करने मे क्या आपत्ति हैं? मैंने निवेदन किया कि खाताधारक के खाते मे अपर्याप्त राशि और  चैक का  भा॰ जी॰ बी॰ नि॰ की किश्त का  संदिग्ध होने को अगर छोड़ भी दे तो खाता धारक की मृत्यु के बाद खाते मे कोई भी पृविष्ठी गैर कानूनी हैं और उससे उपर खाते मे पहले से ही क्लीन ओवेरड्राफ्ट हैं अर्थात पर्याप्त धनराशि नहीं हैं, अतः फिर भी आप चैक को पास करना चाहे तो अपने हस्ताक्षर से उसे पास कर दे? इतना सुनकर वह और क्रोधित होते हुए बोले "अपने आपको बड़ा CAIIB समझते हो, मैंने भी CAIIB किया हैं। मैं देखता हूँ तुम कैसे चैक पास नहीं करते? बातों ही बातों मे उन्होने मेरा  कैरियर नष्ट (स्पोइल) कर देने की धमकी देते हुए लेजर पुनः हमारी सीट पर भेज दिया। मैं काफी डरा और सहमा था फिर भी मायूस होकर कहा-आप वेशक हमारा कैरियर नष्ट कर दे मुझे ईश्वर पर भरोसा हैं आपको  जो करना हैं करें।  इतना कह कर मैं बापस अपनी सीट पर आगया। अब मौखिक बातचीत समाप्त हो चुकी थी। हमे लिखित मे निर्णय करना था। उन दिनो एक रैफर रजिस्टर होता था जिसमे ऐसे चैक की पृविष्ठी की जाती जिसे पास करने के लिये प्रबन्धक की अनुमति आवश्यक हैं। मैंने उस रजिस्टर मे चैक की सभी विवरण भर कर चैक बापस करने के मुख्य कारण "खाताधारक की मृत्यु" का कारण लिख अंदर मुख्य प्रबन्धक जी के पास भेजा। अफ़सोस इसके बाद भी उन्होने चैक को पास करने की अनुमति दे दी। अब बड़ी समस्या आ खड़ी हुई, क्या किया जाये। शाम के लगभग सारा स्टाफ जा चुका था हाल मे सिर्फ मैं और मेरे  एक मित्र श्री अजय गुप्ता जी ही थे जिनसे मैं चैक के बारे मे  बात कर रहा था। तभी  मुख्य प्रबन्धक जी हम दोनों की बात चीत को देख कर हमारी सीट पर आये। उन्होने गुप्ता जी को डांटते हुए कहा आप इनके "कानूनी सलाहकार" हैं और मुझसे पूंछा जब मैंने लिखित अनुमति दे दी तो अब क्या समस्या हैं। चैक यूं ही अब भी लेजर मे पड़ा था। मैंने कुछ मायूसी पूर्वक कहा श्रीमान आप के अनुमति देने से कानून तो नहीं बदल जायेगा, इसके बबजूद यदि  आप उस खाताधारक को सहयोग और सहायता  करना चाहते हो तो उसमे हमे क्यों शामिल करना चाहते हैं? आप ही चैक को पास क्यों नहीं कर देते। पता नहीं क्या चमत्कार हुआ कि उन्होने कुछ क्रोध और हिकारत से मुझे देखते हुए चैक पर हस्ताक्षर करते हुए चैक पास कर दिया। मैंने अंदर ही अंदर भगवान को धन्यवाद कर कहा चलो बला टली। हम लगभग रात 7.30- 8.00 बजे घर पहुंचे।

मेरा ऐसा मानना हैं, किसी अन्य बैंक का तो नहीं मालूम लेकिन हमारे बैंक की ये एक बड़ी कमजोरी हैं कि यदि आप अपने उच्च अधिकारी पर किसी कार्यालीन मुद्दे पर असहमति रखते हैं या उसके किसी सही या  गलत निर्णय पर मत भिन्नता रखते हैं तो वह उच्च अधिकारी इसे अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर आपका किसी भी सीमा तक अहित या आपको प्रताड़ित  कर सकता हैं, स्थानातरण तो एक साधारण बात हैं।  इस  कमी, बुराई, या दुर्भावनात्मक सांस्कृति ने हमारे बैंक का बहुत अहित कर मानव संसाधन का बड़ा नुकसान किया हैं।

रात लगभग 10.30-11.00 बजे मेरे घर कि घंटी बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देख कर आश्चर्य हुआ कि मुख्य प्रबन्धक महोदय अपनी कार से हमारे घर के  सामने खड़े थे। सुर्ख सर्दी मे भी उन्हे देख कर मेरे माथे पर पसीना आ गया और सोचा कि अब क्या समस्या आने बाली हैं। मैंने अभिवादन कर इतनी रात मे आने का कारण पूंछा। सुनकर हमे घोर आश्चर्य हुआ जब उन्होने बताया कि "उन्होने प्रधान कार्यालय, वकील और प्रादेशिक कार्यालय मे बात की हैं, उस चैक को बापस करना हैं"। मैं मन ही मन सकते मे था। वे बोले कल सुबह उस चैक को समाशोधन के माध्यम से बगैर किसी चूक के बापस करना हैं। पता नहीं क्यों मुझे उनके असमय घर आने मे किसी संकट के बादल दिखे। मैं उनके यहाँ पदस्थपना के पूर्व लखनऊ मे हुए स्टाफ के साथ हुए किस्से के बारे मे सुन चुका था। अचानक मेरे मुह से निकला सर, कल तो मैं छुट्टी रहूँगा। क्योंकि कल मुझे अपने छोटे बेटे को डी॰पी॰टी॰ का इंजेक्शन लगवाना हैं। तब उन्होने कहा, "कोई बात नहीं तुम इंजेक्शन लगवाने के बाद आ जाना"। मैंने कहा सर, आने मे 12-1 बज जाएंगे क्योंकि मुझे मालूम था क्लेयरिंग का समय दोपहर 12.00 बजे का हैं। इस तरह उनसे पीछा छूटा।

पर ये क्या दूसरे दिन सुबह 6.00 बजे फिर मेरे घर की घंटी बजी, मैंने देखा पुनः मुख्य प्रबन्धक महोदय कार से घर के सामने खड़े थे। मैंने मन ही मन भगवान को याद किया, फिर क्या आफ़त आ गई, कि इतनी सुबह ये महोदय क्या करने फिर से आ गये। मैंने अभिवादन कर उन्हे बैठने के लिये कहा वे बोले नहीं, अभी तुरंत बैंक चलना हैं। वे बोले "मुझे रात भर नींद नहीं आई", चैक को अभी तुरंत ही बापस करना हैं। मैंने चाय लेने का निवेदन किया किन्तु वे बोले नहीं, अभी तुरंत चलना हैं। मैं उस सर्द सुबह पजमा के उपर ही पेंट जैकेट आदि पहनकर उनके साथ कार मे बैठ कर बैंक की ओर चल दिया। बैंक की चाबी हमारे वरिष्ठ प्रबन्धक श्री जुगल किशोर खिच्ची के पास रहती थी। हैली पैड कॉलोनी स्थित उनके घर पर पहुँच कर उनको भी कार मे बिठलाया और इस तरह हम तीनों नया बाज़ार स्थित शाखा मे सुबह लगभग 6.30 बजे पहुंचे। मैंने और खिच्ची साहब ने मिल कार शाखा के ताले खोले। मेन स्विच को चालू कार लाइट जलायी। मुख्य प्रबन्धक महोदय तो अपनी कैबिन मे बैठ गये और बोले चैक के उपर बापसी का मीमो तैयार करो और लाओ। अविश्वास इतना हो चुका था की इस सब घटना क्रम के होते हुए भी उन्हे मैं लगातार शक की निगाह से देखे जा रहा था। न जाने क्यों मुझे कुछ अनिष्ट का आभास हो रहा था कि मुख्य प्रबन्धक खाता धारक के परिजनों को इस क्रत के लिये मुझे जिम्मेदार ठहरा कर अपना बचाव करेंगे।  चूंकि नया बाज़ार ब्रांच की गिनती  उन दिनो बैंक की कुछ बड़ी  गिनी-चुनी  शाखाओं मे की जाती थी अतः शाखा मे फोटो कॉपी मशीन उपलब्ध कराई गई थी। मैंने अपनी सीट पर पहुँचकर चैक को ढूंढा और उसकी फोटो कॉपी कर अपनी जेब मे डाली। चैक पर "खाताधारक की मृत्यु" का कारण लगा कर मेमो बना, चैक को बापस किया। मुख्य प्रबन्धक ने रजिस्टर से दी गई "अनुमति" को काट कर "अस्वीकृत" किया। लेजर से पृविष्टि  को काट कर सही बैलेन्स निकाला एवं चैक पर अपने हस्ताक्षर को निरस्त किया। इस तरह शाखा को  पुनः ताला लगा कर बंद कर उन्होने हम दोनों को बापस घर छोड़ा।

यदि चैक हमारे द्वारा पास होता तो शायद ही इतनी दौड़-भाग उनके द्वारा की जाती। इस पूरे घटनाक्रम मे हमने एक बार भी मुख्य प्रबन्धक जी के मुंह से इस घटना क्रम पर कोई अफ़सोस जनक एक शब्द सुनना  तो दूर हमने उनके  चेहरे पर कोई भी पश्चाताप या आत्मग्लानि के भाव नहीं देखे। इतना सब तो ठीक था उनका आगे का व्यवहार तो और भी निंदनीय था, एक व्यक्ति अपनी स्थिति से किस हद तक गिर सकता हैं जिसका अनुभव उक्त घटना के 1-2 दिन बाद देखने को मिला।  जिस बात का अंदेशा  था बही हुआ, जब खाता धारक के भाई जो शहर और बैंक की प्रभावशाली व्यक्ति थे, ने हमारे पास आकर कहा "मिस्टर सहगल", मुख्य प्रबन्धक साहब से पता चला कि  आपने  चैक बापस किया हैं, ये आपने  ठीक नहीं किया? उनके बात करने का लहज़ा कुछ तल्खी वाला था।  तब मैंने भी सारी लोक-लाज, नीति-अनीति, नियम-कानून भूल कर  उनको बताया कि मैंने तो साहब से निवेदन किया था कि आपकी जान पहचान हैं आप चैक पास कर उनकी सहायता कर सकते हैं, उन्होने ऐसा किया भी था पर रात मे बकील और प्रादेशिक कार्यालय से सलाह करने के बाद  उन्होने उक्त चैक को बापस कर दिया। मैंने सभी रजिस्टर, लेजर और चैक कि कॉपी उनको दिखा सारा घटना क्रम उनको सुनाया। उक्त चैक की कॉपी आज भी हमारे पास सुरक्षित रक्खी हैं।

किसी जिम्मेदार शाखा के मुखिया द्वारा किसी कार्य के लिये दोहरे मापदंड अपनाना और उस अप्रिय क्रत की ज़िम्मेदारी से बचते हुए अपने अधीनस्थ अधिकारी के सिर मढ़ना कहाँ तक उचित था? यह विचारणीय प्रश्न  हैं।

विजय सहगल