रविवार, 5 अप्रैल 2026

"श्री हनुमान गढ़ी-अयोध्या"

 

"श्री हनुमान गढ़ी-अयोध्या"








बचपन मे जब मै अपने चाचा के यहाँ गर्मियों की छुट्टी मे जाता था तब वहाँ पहली बार मैंने गढ़ी का नाम सुना था। दरअसल हमारे एक परिचित को "गढ़ी बाले" कह कर संबोधित किया जाता था। एक प्रभावशाली व्यक्तित्व जिनका मकान काफी बड़ा और भव्य था। तब से मेरे मन मस्तिष्क मे गढ़ी के छवि से तात्पर्य, बड़े और गणमान्य व्यक्ति के घर की  हो गई थी। समय के साथ इस छवि को बचपन मे अयोध्या स्थित हनुमान गढ़ी ने और भी पक्का किया।  2 नवम्बर 2025 को अपने अयोध्या प्रवास के दौरान राम जन्मभूमि के दर्शन पश्चात जन्मभूमि से से लगी हनुमान गढ़ी के दर्शन भी करने थे। गढ़ी का अर्थ है एक छोटा किला जो प्रायः राजमहलों या राजप्रासादों के पूर्व ऊंचाई पर बनी एक सुरक्षा चौकी के रूप मे बनाए जाते थे और जहां पर एक छोटी से फौज की टुकड़ी पहरा देती थी। एक किवदंती के अनुसारा लंका विजय के पश्चात अयोध्या बापसी पर श्री हनुमान जी को 76 सीढ़ियों युक्त यह गढ़ी  स्थान रहने के लिए दिया गया था जो कालांतर मे हनुमान गढ़ी कही जाने लगी। यह स्थान हनुमान जी से जुड़ी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के कारण सनातनियों के लिए अत्यंत सम्मानीय और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। हनुमान गढ़ी दशरथ महल और कनक भवन के  प्रवेश द्वार के ही नजदीक है जहां भगवान श्री राम का निवास था।   पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राम भक्त हनुमान यहाँ बनी एक गुफा मे रहते और पहरा देते हुए भगवान की सेवा  के लिए तत्पर रहा करते थे।

आज एकादशी अर्थात देव उठानी ग्यारस की सुबह होने के कारण बाज़ार की भीड़ भरी गलियों से होते हुए जब मै हनुमान गढ़ी की ओर बढ़ा तो बाजार के रास्ते के बीच बनी रेलिंग मे  श्रद्धालुओं की  दूर तक लंबी लाइन और उसके बाद हनुमान गढ़ी की सीढ़ियों पर दर्शनार्थियों की भीड़ जमा थी। इस जनसमूह को देख मै कुछ चौंक गया। भरी दोपहरी मे तेज धूप के बीच लोग श्री हनुमान गढ़ी पर बने हनुमान मंदिर के दर्शन हेतु लालायित हो आगे बढ़ रहे थे।  चूंकि राम जन्मभूमि स्थान का बड़ा गहन और सघन भ्रमण के पश्चात कुछ विश्राम की प्रबल इच्छा के चलते हनुमान गढ़ी के दर्शन सायंकाल करने के निश्चय के साथ होटल चलने का निश्चय किया। निर्णय ठीक ही रहा, शाम के लगभग छह बजे जब हम सपत्नीक हनुमान गढ़ी पर पहुंचे तो भीड़ सुबह के मुक़ाबले, अपेक्षाकृत कुछ कम थी। पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबन्द थी। गढ़ी के नीचे पादुकाओं के रखने की कहीं कोई व्यवस्था नहीं थी, जैसी कि रामजन्मभूमि मे थी।   फूल या प्रसाद वालों के यहाँ ही पादुकाओं को रखा जा रहा था। भीड़ भी कुछ खास नहीं थी सीधे सीढ़ियों पर चढ़ते हुए हम मंदिर प्रांगण मे जा पहुंचे। पिछले दिनों राम मंदिर के उदघाटन के अवसर पर अनेकों बार हनुमान  गढ़ी के दर्शन टीवी पर कर चुके थे, इसलिए कुछ नयापन नहीं लगा, लेकिन बचपन मे 1972 मे अयोध्या मे किये हनुमान गढ़ी के दर्शन की कुछ धुंधली यादें शेष थी तब या क्षेत्र कुछ साधू संतों की उपस्थिती मे वीरान सा दिखाई देता था। बंदरों की फौज आज की तरह उन दिनों भी थी। होती भी क्यों न हनुमान जी का गढ़ जो था। काले सफ़ेद संगमरमर के वर्गाकार पत्थरों से बने फर्श के परिक्रमा पथ के मध्य बना लगभग ढाई-तीन फुट ऊंचे वर्गाकार चबूतरे पर निर्मित  हनुमान मंदिर रंग बिरंगी बारहदरी के अर्ध बलायकर दरबाजों से घिरा था। बाहर बरामदे से गर्भगृह मे बिराजित, श्री हनुमान जी की भव्य और मध्याकार प्रतिमा बहुत ही नयनभिराम थी। प्रतिमा के मुख मण्डल  के चारों ओर एक ओजस्वी और तेजस्वी जीवंत ऊर्जा का अनुभव हो रहा था। मंदिर के गर्भगृह के विपरीत दिशा मे पीछे से भगवान श्री हनुमान को  प्रणाम कर  परिक्रमा पथ के दूसरी ओर बना  गलियारा कुछ खाली था जहां  कुछ मिनिट बैठ कर राम भक्त हनुमान को स्मरण करते हनुमान जी की महिमा का पुनरावलोकन हनुमान चालीसा की इन पंक्तियों के स्मरण कर किया, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,  जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥" "रामदूत अतुलित बल धामा, अंजनिपुत्र पवनसुत नामा॥" हनुमान जी के बल, बुद्धि, सामर्थ्य और  ऐश्वर्य को स्मरण करते हुए हम लोग मंदिर से बापसी हेतु प्रस्थान किया। यध्यपि एक अन्य रास्ता भी था पर पादुकाओं के चलते हम उसी रास्ते से बापस हुए जहां से प्रवेश किया था।

बापसी मे एक महिला पुलिस कर्मी को मैंने लगातार मोबाइल पर व्हाट्सप्प/यू ट्यूब/विडियो चलाते  देखा। मंदिर के प्रवेश के समय भी यह महिला पुलिस कर्मी मोबाइल देखने मे मशगूल थी। मुझ से रहा न गया मैंने उस महिला पुलिस को कहा, माफ करें आप सुरक्षा व्यवस्था जैसे जिम्मेदार पद पर होते हुए भी, आपका लगातार मोबाइल देखना उचित नहीं। आपको इस से बचना चाहिए!! यध्यपि उस महिला पुलिस कर्मी की प्रतिक्रिया ठंडी ही थी शायद ही उसने इस ओर ध्यान दिया हो?  

कुछ अन्य शेष सीढ़ियाँ उतरकर अब हम पुनः हनुमान गढ़ी के नीचे बाज़ार मे बापस आ खड़े हुए। दोपहर के मुक़ाबले शाम होने के कारण बाज़ारों मे श्रद्धालुओं की रौनक पुनः लौट आयी थी। रात के बिजली के प्रकाश मे रमजन्मभूमि सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर एक अद्भुद छठा दिखलाई पद रही थी जो दिन के उजाले से अलग हट के थी।

एक बार पुनः हनुमान जी का स्मरण करते हुए हम लोग अयोध्या मे दशरथ महल और कनक भवन की ओर बढ़ लिए।

पवनसुत हनुमान की जय!!              

विजय सहगल