"दीपावली पर
विशेष- झँसी-शहर का मिठाई बाज़ार"
बैसे
तो हर शहर की मिठाई की अपनी एक अलग पहचान
होती है फिर वह शहर चाहें छोटा हो या बड़ा। झाँसी मेरी जन्म भूमि के साथ साथ पूरा
बचपन झाँसी शहर मे ही बीता। कुछ याद रहे या न रहे पर आम लोगो की तरह मुझे भी मिठाई के प्रति चाहत और लगाव, औरों की
तरह ही था। मिठाई की दुकान हमेशा से ही आकर्षण का विषय थी जिसे देख कर मुंह मे
पानी आना स्वाभाविक ही था। बचपन मे मिठाई का स्वाद मिले न मिले पर मिठाई की दुकान
से गुजरने पर मिठाइयों को देख कर, स्वाद मुंह मे पानी के रूप
मे खुद-व-खुद आ ही जाता था। लेकिन होली, राखी और सबसे बड़के
दिवाली पर लगने वाली, बड़ी-बड़ी दुकाने और छोटे मोटे खोमचे, ठेले पर बिकने वाली मिठाइयों को देख, मन ललचा
ही उठता था। प्रायः इन त्योहारों पर घर पर बेसन और आटे के लड्डू, खोये की बर्फी, गुजिया तो बनते ही थे पर बंगाली
मिठाई, इमारती, बालूशाही बाज़ारों से ही
आती थी, जिनकी उपलब्धता बड़ी सीमित हुआ करती थी। मिठाई की
उपलब्धता नाते रिशतेदारों के यहाँ शादी, सगाई या अन्य
धार्मिक समारोहों यथा अखंड रामायण, सत्यनारायण की कथा या उन
दिनों संतोषी माता के ऊध्यापन मे लड़कों की पूंछ-परख मे ही हो पाती थी, लेकिन उन दिनों प्रचलित किसी बूढ़े-बुजुर्ग के देहांत पश्चात होने वाली तेरवीं
पर भी मिठाइयों परोसने का चलन था। इन सबके बावजूद इन कार्यक्रमों मे प्रायः
प्रचलित मिठाइयां जैसे बेसन और बूंदी के लड्डू, इमरती, रसगुल्ला,
खोये की बर्फी, सबसे अप्रिय लगने वाला पेठा, बालूशाही ही मिलती थी। अप्रचलित मिठाइयाँ जैसे काजू कतली, बंगाली मिठाई, मलाई चाप, सोन
पापड़ी, सोन हलुवा, रस मलाई या काजू की
मिठाइयों की अन्य अनेक किस्मे तो सिर्फ हलवाइयों के यहाँ ही मिलती थी। शहर मे
अल-सुबह जलेबी की उपलब्धता आस पड़ौस के हलवाई ही से पूरी हो जाती थी इसलिये जलेबी
को मिठाई की बिरादरी से अलग ही रक्खा जाता था।
पाँच-छह
साल की उम्र मे सबसे पहले यदि किसी हलवाई
से मेरा संपर्क हुआ था, तो वो थे,
महादेव!! इमली के नीचे, घास मंडी मे स्थित महादेव अपने
बेतरतीब पारंपरिक भारतीय परिधान, धोती और सलूका मे ही हमेशा
नज़र आने वाले महादेव!। दूध-दही के साथ-साथ, महादेव की
दुकान पर मिठाइयों की सीमित प्रकार ही उपलब्ध थे। सामान्यतः बर्फी, पेड़ा, कलाकंद, रबड़ी और
रसगुल्ला की ही बिक्री करने वाले महादेव त्योहारों पर अन्य सामान्य श्रेणी के ही
मिष्ठान, बेचा करते थे। लेकिन धार्मिक वृत्ती के महादेव की एक विशेषता
थी कि जब कोई भी बच्चा महादेव! भोग दो! कह प्रसाद मांगता तो,
चुटकी भर बर्फी या कलाकंद हमेशा देते थे। उनकी दुकान पर काम करने वाले सहयोगी राधे, कल्लू और मोटे तगड़े फद्दे भी महादेव की परंपरा को अपनी सेवाओं से आगे
बढ़ाते रहे। इसी दरम्यान महादेव की दुकान के पास ही कल्लू लिखधारी की दुकान थी
जिनके यहाँ छैने की मिठाई भी मिल जाती थी। झाँसी मे प्रायः हलवाइयों के यहाँ मिठाई
के साथ गर्म मीठा दूध पीने का रिवाज़ था, जो कि बड़ी-चौड़ी सी
कढ़ाई मे उबलता रहता। सब्जी मंडी के सामने नत्थू हलवाई भी इसी श्रेणी मे थे। फर्क
इतना था कि नत्थू के यहाँ गर्म पूड़ी और सब्जी भी उपलब्ध रहती थी।
कहने
को तो मेरे घर से थोड़ा दूर, मालिन चौराहे के पास मिठाई बाज़ार
था, जहां 8-10 मिठाई की दुकाने, बताशा
की दुकाने थी पर एक सरवरिया की दुकान को छोड़ कर, सारी दुकाने
सामान्य श्रेणी की ही थीं जो आज भी हैं। इन दुकानों पर प्रायः 15 अगस्त, स्वतन्त्रता दिवस या 26 जनवरी, गणतन्त्र दिवस या
ऐसे ही शादी-विवाह, सगाई जैसे अन्य अवसरों पर सामान्य श्रेणी
की बूंदी लड्डू जैसी मिठाइयाँ ही बनाई जाती थी। सरवरिया मिठाई वाले की विशेषज्ञता
रबड़ी और श्रीखंड मे थी साथ ही साथ वह सूखे आलू की सब्जी और दही रायता के लिए भी
मशहूर था। आलू पर गाढ़ी मसाले दार ग्रेवी और बूंदी रायते मे उपयोग होने वाले गाढ़े
मीठे दही आलू, हरी
मिर्च और बारीक अदरक का तड़का उसके स्वाद को और भी स्वादिष्ट बना देता था।
उन
दिनों संकट मोचन मंदिर, बड़ा बाज़ार मे लज्जा राम हलवाई का भी बड़ा नाम था। लज्जा राम छैने की भी
मिठाई बनाते थे। नारंगी छैना मिठाई के ऊपर मलाई का लेप से बनी मलाई चाप उसकी
विशेषता थी। परवल और लौकी की मिठाई और सर्दी मे गाजर का हलुवा भी प्रसिद्ध था। उसके
समोसे भी अपने स्वाद के लिये जाने जाते थे। सुबह के समोसे नाश्ते मे दही-जलेबी और
समोसा या कचौड़ी के साथ बेसन की कढ़ी, अलग ही स्वाद लिये होती थी। जबकि शाम के समय
समोसे के साथ बूंदी रायता मिलता था। गरम समोसे मे गर्माहट इतनी होती थी कि कभी कभी
मुंह भी जल जाय। मेरी बड़ी बुआ जो हर रोज मेरे घर के नजदीक मुरली मनोहर मंदिर के
दर्शनार्थ आती थी और लज्जा राम का कलाकंद या बर्फी का प्रसाद अक्सर लाती थी।
मजदूरों
वाली गली मे कानपुर मिठाई वाले की मेवा की गुजिया प्रसिद्ध थी साथ ही बेसन के सेव
के लिये भी पहचाना जाता था। हर मंगलवार को हमारे हमारे चाचा जिन्हे हम बाबू कहते थे, हनुमान जी के प्रसाद के रूप
कानपुर वाले की मेवा गुजिया मंगाई जाती
थी। मै भी इस प्रसाद का हर मंगलवार को सहभागी बनता था। मोटी कद काया के महरोत्रा
जी, बिना किसी
तामझाम बड़े से चबूतरे पर अपनी दुकान लगाते थे। सीमित प्रकार की मिठाइयों मे रबड़ी, कलाकंद और मेवा गुजिया मे ही इनकी विशेषज्ञता थी। शहर मे कुछ आगे मानिक
चौक मे शंकर हलवाई भी शहर के नाम चीन हलवाइयों मे एक थे। सुबह समोसे कचौड़ी के साथ
शुद्ध देशी घी की जलेबी का स्वाद लाजवाब
था। जलेबी के साथ दही का प्रयाग बुंदेलखंड क्षेत्र की पहचान है। शंकर हलवाई
की अन्य छैना मिठाई, भी प्रसिद्ध थी। मिठाई तो स्वादिष्ट थी
पर प्रतिष्ठान के मालिक के व्यवहार मिठाई के अनुरूप मीठा और सरस न था।
बिसाती
बाज़ार मे उन दिनों हाथरस मिष्ठान की दुकान
भी थी जिसे दो भाई मिल कर चलाते थे जिनके नाम तो नहीं मालूम पर व्यवहारकुशल भाइयों
का मूल निवास शायद हाथरस शहर था। इन लोगों
की स्पेशल मिठाई मे शाम को बनने वाली शुद्ध देशी घी की इमारती थी जो बहुत ही
स्वादिष्ट और कुरकुरी थी, साथ ही हाथरस मिष्ठान की बालूशाही भी काफी मधुर,
सुस्वाद और सरस हुआ करती थी। मेरी छोटी बुआ प्रायः इस दुकान से मेरे लिये इमारती
लाती थी।
नरिया
बाज़ार मे एक अन्य रघुबीर मिष्ठान का उल्लेख करना आवश्यक समझूँगा जो आज भी अपने
पुराने स्वादिष्ट और स्वाद के लिये प्रसिद्ध है जैसा हमारे पापा के दिनों मे था जब
वे हम भाई बहिनों के लिये श्रीखंड लेकर आते थे। इनके उत्पाद सीमित मात्रा मे ही
तैयार किये जाते हैं जिनमे रबड़ी, कलाकंद, श्रीखंड ही मुख्य
हैं। इनकी विशेषज्ञता और सेवा मे एक और खास बात रहती है कि यदि आप 50 या 100 ग्राम भी या कितनी भी मात्रा मे रबड़ी लेते हैं तो एक चम्मच श्रीखंड सौजन्यता के रूप
मे मुफ्त देते हैं। इसी तरह यदि आप श्रीखंड लेंगे तो एक चम्मच रबड़ी कोंपलीमेंटरी
निशुल्क देते हैं। गरमागरम दूध आज भी उसी मधुरता और सरसता के साथ, उपलब्ध कराया जाता हैं जैसे मै अपने कॉलेज के
सत्तर के दशक के दिनों मे लक्ष्मी व्यायाम
शाला से बापसी के समय एक पाव दूध लेते समय देखता था। इनके दूध की बड़ी और चौड़ी
काढही मे अनेकों छुहारों के साथ पूरी कढ़ाई मे सिर्फ एक सबूत लाल मिर्च टोटके के
रूप मे पड़ी रहती थी। हाँ, वो दूध के साथ एक छोटी कलछी से
दूध के ऊपर जमी मलाई का टुकड़ा काट कर कुल्हड़ मे डालना नहीं भूलते जो दूध के स्वाद
को और मधुर और स्वादिष्ट बना देता। आज भी जब कभी अपने गृह नगर झाँसी जाना होता तो
शुगर होने के बावजूद रघुबीर मिष्ठान की दुकान से श्रीखंड लाना न भूलता।
वर्तमान
मे मिठाइयों और हलवाइयों का चलन कम हो गया
हैं, मिठाई का स्थान केक, बेकरी और चॉकलेट ने ले ली है।
महादेव, कल्लू लिखधारी, नत्थू हलवाई, लज्जा राम और हाथरस मिष्ठान की दुकाने बंद हो चुकी हैं पर उनका स्वाद आज
भी सिर चढ़ कर बोलता है।
अपने
मित्रों, शुभचिंतकों और सुधि पाठकों का दीपावली के पावन पर्व पर, हार्दिक शुभकामनायें और बधाई
देकर उनका अभिनंदन करते है।
विजय
सहगल




5 टिप्पणियां:
*On the occasion of the festival of lights and crackers, you selected a suitable subject, which is sweets of different varieties. Above all, you chose your hometown, Jhansi. Regarding Jhansi, a couplet came to my mind, "झांसी गले की फांसी, दतिया गले का हार।लश्कर कबहुं न छोड़िए जब तक मिले उधार।" During the reading of your blog, it is guaranteed that the readers' mouths will water while reading the names of sweets. Those readers who are suffering from diabetes are advised to read it only once; otherwise, their sugar levels can shoot up. I am just kidding. It is truly a matter of delight that your childhood days were spent among the quality shops of Jhansi that sell various sweets. Overall, the timing of your blog was absolutely accurate, and the content provided in the blog deserves high praise...!*
🌹🙏🌹👌👌👌👍👍👍🕯️🕯️🕯️🕯️🕯️🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔
सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा, ग्वालियर
प्रिय सहगल जी
आपके द्वारा की गयी मिठाइयों की विवेचना अत्यंत सराहनीय है l
मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि वास्तव में आपने जिंदगी को सही मायने जिया है l शायद यही शैली मेरी भी रही है l
आपको मेरा स्नेहिल सलाम l
🙏👍🏼
S.P. Gupta, Hyderabad
Happy Deepavali.
Tasted the sweets by reading the text sent by you.
Interesting reading and your memory of names of shop keepers etc.
I S Kadian, Chandigarh
🙏🏻🙏🏻🪔🪔🪔🌹🌹
Happy Deepavali.
Tasted the sweets by reading the text sent by you.
Interesting reading and your memory of names of shop keepers etc.
🙏🏻🙏🏻🪔🪔🪔🌹🌹
I S Kadian, Chandigarh
आपके द्वारा भेजे गए मिठाई विवरण में बहुत कुछ पढ़ा एवं स्वाद लिया अत्यंत स्वादिष्ट एवं रोचक है आपका वर्णन
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