शनिवार, 25 अक्टूबर 2025

गोकर्ण, कर्नाटक

 

"गोकर्ण, कर्नाटक"











8 जुलाई 2025 को, समुद्र तटीय यात्रा मे मुर्देश्वर से अपने अगले पढ़ाव की यात्रा के लिये मेरा गंतव्य उत्तरी कन्नड जिले का गोकर्ण कस्बा  था। कन्याकुमारी-पनवेल राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 66 पर कारवार से होते हुए हमे शाम के लगभग 07 बज चुके थे। एनएच 66 से अब हमे गोकर्ण के लिये लगभग 10 किमी समुद्र तट के ओर जाना था। कुछ कुछ अंधेरा हो गया था और वर्षात भी हल्की हल्की शुरू हो चुकी थी। अचानक मंग्रोव होम स्टे का बोर्ड दिखा तो हमने भी गोकर्ण के इस बाहरी इलाके मे ही रुकना उचित समझा। चूंकि कार ड्राइव करते हुए थकावट भी हो रही थी, होम स्टे गोकर्ण रेल स्टेशन के नजदीक ही था, साफ सुथरा था लेकिन खाने की व्यवस्था नहीं थी। फिर ये सोच कर कि कुछ फ्रेश होकर राजमार्ग पर भोजन पानी कर लेंगे ये सोच कर अंततः होम स्टे मे रुकने का मन बना लिया। चाय स्नेक्स के पश्चात पानी भी तेज हो गया। होम स्टे के केयर टेकर मोहन से आग्रह के बाद ये सहमति बनी कि जो भोजन वह अपने लिये बनाएगा उसमे चार रोटी अतिरिक्त बना ले तो हमे बाहर भोजन के लिये नहीं जाना पड़ेगा। मोहन भला आदमी था उसकी  सहमति से वर्षात मे बाहर निकलने की बजाय रूम मे ही बैठ कर वर्षात का आनंद लेते हुए भोजन का आनंद लिया। भोजन के दौरान पास से ही गुजरती रेल की आवाज तो सुनाई दी पर अंधेरे के कारण गुजरती मालगाड़ी को देखने के अपने पसंदीदा शौक से वंचित रहा। रात हो चुकी थी, प्रातः गोकरण घूमने की अभिलाषा लिये नींद के आगोश मे सो गया।

9 जुलाई 2025 को सुबह सात बजे नहा धोकर हम लोग गोकर्ण कस्बे की ओर भ्रमण के लिये चल दिये। दक्षिण के काशी के नाम से प्रसिद्ध गोकर्ण मे आखिर के एकाध किमी॰ को छोड़ पूरे रास्ते छोटे-मोटे रेस्टोरेन्ट, दुकाने और कुछ होम स्टे बने थे। सारी रात गिरी वर्षात के कारण सड़क के दोनों ओर पानी के बीच हम लगभग आठ बजे गोकर्ण कस्बे मे थे। पतली गलियों और बाजार से होते हुए हम यहाँ के प्रसिद्ध शिव मंदिर महाबलेश्वर मंदिर होकर निकले। मंदिर के आसपास कोई कार पार्किंग न होने के कारण नजदीक ही समुद्र तट पर बनी कार पार्किंग की ओर बढ़े जो मंदिर से दो-ढाई सौ मीटर दूर रही होगी। कार पार्किंग के बाद जब पैदल मंदिर की ओर बढ़े तो पूरे रास्ते गरम मसाले के उपयोग मे आने वाले मुख्य घटक मसाले यथा काली मिर्च, लौंग, दाल चीनी, बड़ी इलाइचि, के अलावा जायफल, धनिया, जीरा, जावित्री तेज पत्ता की बड़ी बड़ी दुकाने दिखाई दी, गरम मसाले की महक दुकान से निकलने वाले यात्रियों को बरवश ही मुफ्त मिल रही थे।  साथ मे ही हरे-पीले और लाल रंग के रंग बिरंगी गुग्गल, लोबान (सुगंधित) भी कई दुकानों पर बिक्री के लिये उपलब्ध था।

प्राचीन, प्रसिद्ध महाबलेश्वर मंदिर का प्रवेशद्वार साधारण पीले रंग से रंगा हुआ था, दर्शनार्थियों की लाइन भगवान के दर्शनार्थ लगी हुई थी। मंदिर के ड्रेस कोड के अनुसार महिलाओं को भारतीय परिवेश की  साड़ी और पुरुषों को पारंपरिक धोती पहनना आवश्यक थी। पहले तो मैंने धोती न होने के कारण महाबलेश्वर मंदिर के दर्शन का विचार त्याग दिया और श्रीमती जी को ही दर्शन के लिये भेज दिया। लेकिन हमारे यहाँ वो कहावत हैं कि जब तक भगवान का बुलावा न हो उनके दर्शन सहज संभव  नहीं होते। लेकिन  साक्षात देवधिदेव महाबलेश्वर मानों मुझे दर्शन के लिये बुला रहे थे। मंदिर मे स्थापित विलक्षण शिव लिंग के दर्शन के पश्चात श्रीमती जी ने मुझे भी दर्शन करने के लिये आग्रह किया। फिर क्या था बाजार से एक भगवा धोती लेकर मैंने मंदिर के नियमानुसार धोती धारण कर मंदिर मे प्रवेश किया। 1500  साल से भी अत्यंत प्राचीन मंदिर जो शास्त्रीय द्रविड़ स्थापत्य शैली मे बना था, मंदिर के दो प्रवेश द्वार के पश्चात मै, मुख्य गर्भ गृह मे पहुंचा। मंदिर पुरोहित को प्रणाम कर मैंने शिव लिंग पर जल और पुष्प अर्पित किये। मंदिर के पुजारी द्वारा शिव लिंग मे बने छिद्र के भीतर पंजे की अंगुलियों के माध्यम से विलक्षण शिव लिंग का स्पर्श करने को कहना, अद्भुत और अनोखा अनुभव था। मंदिर के पुजारी द्वारा बतलाया गया कि महाबलेश्वर शिवलिंग जिसे आत्मलिंग भी कहा जाता हैं,  पिंडी का ऊपरी भाग, जो कि चाँदी के पत्तर से जढ़ित थी को विष्णु का रूप बतलाया और छिद्र के अंदर महाबलेश्वर की स्थापना बतलाई। ऐसी किवदंती है कि मंदिर के देवता भक्तों को अपार आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

महाबलेश्वर मंदिर कर्नाटक के सात  मुक्ति क्षेत्रों (मोक्ष स्थल) मे से एक है। कर्नाटक के लाखों सनातन मतावलंबी अपने दिवंगत परिजनों का अंतिम संस्कार और मृत्यु संस्कार  यहाँ करते हैं। 1676 मे एक अंग्रेज़ यात्री फ्रायर ने महा शिवरात्रि पर्व का के दौरान गोकर्ण का दौरा कर विस्तृत विवरण लिखा। एक प्राचीन कथा अनुसार राक्षस राजा रावण की माँ अपने पुत्र की समृद्धि के लिये शिव की परम उपासना करती थी। इस बात से ईर्ष्या कर इन्द्र ने शिवलिंग को चुराकर समुद्र मे फेंक दिया। अपनी माँ की इच्छा पूर्ति हेतु रावण ने कैलाश पर्वत पर शिव की उपासना कर भगवान शिव से आत्मलिंग का अनुरोध किया। आत्मलिंग को कोई चुरा या डिगा नहीं सकता। भगवान विष्णु ने अपने  मायाजाल से गोकर्ण मे सूर्य को ढँक कर संध्या का आभास दिया। रावण को अपनी संध्यावन्दन की क्रियाएँ करनी थी लेकिन आत्मलिंग हाथ मे होने के कारण वह ऐसा नहीं कर सकता था। और वरदान के अनुसार आत्मलिंग को जमीन पर रखने से वह स्थिर हो जाता। तभी गणेश देव एक बालक के रूप मे वहाँ प्रकट कर आत्मलिंग को अपने हाथों मे लेने के लिये तैयार हो गए। समझौते अनुसार गणेश जी ने जल्दी-जल्दी तीन बार रावण को पुकारा लेकिन रावण के न आने पर गणेश जी ने आत्मलिंग को उसी स्थान पर रख दिया। स्थिर हुए आत्मलिंग को रावण ने जब उपर खींचने का प्रयास किया तो आत्मलिंग मुड़ गया और गाय के आकार का हो गया किन्तु बाहर नहीं आया, इसी कारण इस स्थान का नाम गोकर्ण पड़ा, जहां आज का महाबलेश्वर मंदिर है। गुरुचरित्र मे लिखा है कि भगवान ब्रहमा, विष्णु, महेश, कार्तिकेय और गणेश सभी देवता यहाँ निवास करते हैं।

मंदिर दर्शन के पूर्व गोकर्ण से 4-5 किमी दूर ही ॐ बीच की अभिलाषा से गूगल की सहायता से पहुंचा। समुद्र तट के रास्ते मे बने एक रेसोर्ट ने तट तक कार से जाने के रास्ते को रोक दिया गया था क्योंकि जन सामान्य को जाने की अनुमति नहीं थी। बेहद अफसोस होता हैं कि स्थानीय प्रशासन और सरकार अपने स्वार्थ और आर्थिक हिट लाभ के लिए जन सामान्य को ऐसे प्रकृतिक जगहों पर जाने से  क्यों वंचित रक्खा जाता है? लेकिन समुद्र बीच के सीढ़ियों के मार्ग मे  नितांत सुनसान और जहां तहां पड़ी गंदगी बता रही थी कि यहाँ इतनी सुबह 7-8 बजे लोग नहीं आते क्योंकि रेहड़ी पटरी की सारी दुकानें, यहाँ तक कि चाय आदि की दुकान भी बंद थी। ऑटो टेम्पो स्टैंड खाली पड़े थे।   रास्ता छोटी पहाड़ी पर बनी सीढ़ियों से होकर समुद्र तट की ओर बढ़ा। मेरी तो इच्छा थी कि आगे समुद्र तट पर जाएँ लेकिन सुनसान जगह पर एक अदृश्य डर के कारण वहीं से समुद्र दर्शन किए। ॐ के आकार की पथरीली पहाड़ियों का भ्रम तो हुआ पर मै दावे के साथ नहीं कह सकता कि ये ही ॐ बीच रहा होगा। फिर भी कुछ मिनटों हल्की बरसात मे छाता लगाकर यहाँ वहाँ टहल कर बापस हो लिया।

विजय सहगल             

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

दीपावली पर विशेष- झँसी-शहर का मिठाई बाज़ार

 

"दीपावली पर विशेष- झँसी-शहर का मिठाई बाज़ार"






बैसे तो हर शहर की  मिठाई की अपनी एक अलग पहचान होती है फिर वह शहर चाहें छोटा हो या बड़ा। झाँसी मेरी जन्म भूमि के साथ साथ पूरा बचपन झाँसी शहर मे ही बीता। कुछ याद रहे या न रहे पर आम लोगो की तरह मुझे भी  मिठाई के प्रति चाहत और लगाव, औरों की तरह ही था। मिठाई की दुकान हमेशा से ही आकर्षण का विषय थी जिसे देख कर मुंह मे पानी आना स्वाभाविक ही था। बचपन मे मिठाई का स्वाद मिले न मिले पर मिठाई की दुकान से गुजरने पर मिठाइयों को देख कर, स्वाद मुंह मे पानी के रूप मे खुद-व-खुद आ ही जाता था। लेकिन होली, राखी और सबसे बड़के दिवाली पर लगने वाली, बड़ी-बड़ी दुकाने और छोटे मोटे खोमचे,  ठेले पर बिकने वाली  मिठाइयों को देख, मन ललचा ही उठता था। प्रायः इन त्योहारों पर घर पर बेसन और आटे के लड्डू, खोये की बर्फी, गुजिया तो बनते ही थे पर बंगाली मिठाई, इमारती, बालूशाही बाज़ारों से ही आती थी, जिनकी उपलब्धता बड़ी सीमित हुआ करती थी। मिठाई की उपलब्धता नाते रिशतेदारों के यहाँ शादी, सगाई या अन्य धार्मिक समारोहों यथा अखंड रामायण, सत्यनारायण की कथा या उन दिनों संतोषी माता के ऊध्यापन मे लड़कों की पूंछ-परख मे ही हो पाती थी, लेकिन उन दिनों प्रचलित किसी बूढ़े-बुजुर्ग के देहांत पश्चात होने वाली तेरवीं पर भी मिठाइयों परोसने का चलन था। इन सबके बावजूद इन कार्यक्रमों मे प्रायः प्रचलित मिठाइयां जैसे बेसन और बूंदी के लड्डू, इमरती,  रसगुल्ला, खोये की बर्फी, सबसे अप्रिय लगने वाला पेठा, बालूशाही ही मिलती थी। अप्रचलित मिठाइयाँ जैसे काजू कतली, बंगाली मिठाई, मलाई चाप, सोन पापड़ी, सोन हलुवा, रस मलाई या काजू की मिठाइयों की अन्य अनेक किस्मे तो सिर्फ हलवाइयों के यहाँ ही मिलती थी। शहर मे अल-सुबह जलेबी की उपलब्धता आस पड़ौस के हलवाई ही से पूरी हो जाती थी इसलिये जलेबी को मिठाई की बिरादरी से अलग ही रक्खा जाता था।

पाँच-छह साल की उम्र  मे सबसे पहले यदि किसी हलवाई से मेरा संपर्क हुआ था, तो  वो थे, महादेव!! इमली के नीचे, घास मंडी मे स्थित महादेव अपने बेतरतीब पारंपरिक भारतीय परिधान, धोती और सलूका मे ही हमेशा नज़र आने वाले महादेव!।  दूध-दही  के साथ-साथ, महादेव की दुकान पर मिठाइयों की सीमित प्रकार ही उपलब्ध थे। सामान्यतः बर्फी, पेड़ा, कलाकंद, रबड़ी और रसगुल्ला की ही बिक्री करने वाले महादेव त्योहारों पर अन्य सामान्य श्रेणी के ही मिष्ठान, बेचा करते थे।  लेकिन धार्मिक वृत्ती के महादेव की एक विशेषता थी कि जब कोई भी बच्चा महादेव! भोग दो! कह प्रसाद मांगता तो, चुटकी भर बर्फी या कलाकंद हमेशा देते थे। उनकी दुकान पर काम करने वाले सहयोगी राधे, कल्लू और मोटे तगड़े फद्दे भी महादेव की परंपरा को अपनी सेवाओं से आगे बढ़ाते रहे। इसी दरम्यान महादेव की दुकान के पास ही कल्लू लिखधारी की दुकान थी जिनके यहाँ छैने की मिठाई भी मिल जाती थी। झाँसी मे प्रायः हलवाइयों के यहाँ मिठाई के साथ गर्म मीठा दूध पीने का रिवाज़ था, जो कि बड़ी-चौड़ी सी कढ़ाई मे उबलता रहता। सब्जी मंडी के सामने नत्थू हलवाई भी इसी श्रेणी मे थे। फर्क इतना था कि नत्थू के यहाँ गर्म पूड़ी और सब्जी भी उपलब्ध रहती थी।  

कहने को तो मेरे घर से थोड़ा दूर, मालिन चौराहे के पास  मिठाई बाज़ार था, जहां 8-10 मिठाई की दुकाने, बताशा की दुकाने थी पर एक सरवरिया की दुकान को छोड़ कर, सारी दुकाने सामान्य श्रेणी की ही थीं जो आज भी हैं। इन दुकानों पर प्रायः 15 अगस्त, स्वतन्त्रता दिवस या 26 जनवरी, गणतन्त्र दिवस या ऐसे ही शादी-विवाह, सगाई जैसे अन्य अवसरों पर सामान्य श्रेणी की बूंदी लड्डू जैसी मिठाइयाँ ही बनाई जाती थी। सरवरिया मिठाई वाले की विशेषज्ञता रबड़ी और श्रीखंड मे थी साथ ही साथ वह सूखे आलू की सब्जी और दही रायता के लिए भी मशहूर था। आलू पर गाढ़ी मसाले दार ग्रेवी और बूंदी रायते मे उपयोग होने वाले गाढ़े मीठे दही  आलू, हरी मिर्च और बारीक अदरक का तड़का उसके स्वाद को और भी स्वादिष्ट बना देता था।

उन दिनों संकट मोचन मंदिर, बड़ा बाज़ार मे लज्जा राम हलवाई का भी बड़ा नाम था। लज्जा राम छैने की भी मिठाई बनाते थे। नारंगी छैना मिठाई के ऊपर मलाई का लेप से बनी मलाई चाप उसकी विशेषता थी। परवल और लौकी की मिठाई और सर्दी मे गाजर का हलुवा भी प्रसिद्ध था। उसके समोसे भी अपने स्वाद के लिये जाने जाते थे। सुबह के समोसे नाश्ते मे दही-जलेबी और समोसा या कचौड़ी के साथ बेसन की कढ़ी,  अलग ही स्वाद लिये होती थी। जबकि शाम के समय समोसे के साथ बूंदी रायता मिलता था। गरम समोसे मे गर्माहट इतनी होती थी कि कभी कभी मुंह भी जल जाय। मेरी बड़ी बुआ जो हर रोज मेरे घर के नजदीक मुरली मनोहर मंदिर के दर्शनार्थ आती थी और लज्जा राम का कलाकंद या बर्फी का प्रसाद अक्सर लाती थी। 

मजदूरों वाली गली मे कानपुर मिठाई वाले की मेवा की गुजिया प्रसिद्ध थी साथ ही बेसन के सेव के लिये भी पहचाना जाता था। हर मंगलवार को हमारे हमारे चाचा जिन्हे हम  बाबू कहते थे, हनुमान जी के प्रसाद के रूप कानपुर वाले की  मेवा गुजिया मंगाई जाती थी। मै भी इस प्रसाद का हर मंगलवार को सहभागी बनता था। मोटी कद काया के महरोत्रा जी,  बिना किसी तामझाम बड़े से चबूतरे पर अपनी दुकान लगाते थे। सीमित प्रकार की मिठाइयों मे रबड़ी, कलाकंद और मेवा गुजिया मे ही इनकी विशेषज्ञता थी। शहर मे कुछ आगे मानिक चौक मे शंकर हलवाई भी शहर के नाम चीन हलवाइयों मे एक थे। सुबह समोसे कचौड़ी के साथ शुद्ध देशी घी की जलेबी का स्वाद लाजवाब  था। जलेबी के साथ दही का प्रयाग बुंदेलखंड क्षेत्र की पहचान है। शंकर हलवाई की अन्य छैना मिठाई, भी प्रसिद्ध थी। मिठाई तो स्वादिष्ट थी पर प्रतिष्ठान के मालिक के व्यवहार मिठाई के अनुरूप मीठा और सरस न था।

बिसाती  बाज़ार मे उन दिनों हाथरस मिष्ठान की दुकान भी थी जिसे दो भाई मिल कर चलाते थे जिनके नाम तो नहीं मालूम पर व्यवहारकुशल भाइयों का मूल निवास शायद  हाथरस शहर था। इन लोगों की स्पेशल मिठाई मे शाम को बनने वाली शुद्ध देशी घी की इमारती थी जो बहुत ही स्वादिष्ट और कुरकुरी थी, साथ ही हाथरस मिष्ठान की बालूशाही भी काफी मधुर, सुस्वाद और सरस हुआ करती थी। मेरी छोटी बुआ प्रायः इस दुकान से मेरे लिये इमारती लाती थी।

नरिया बाज़ार मे एक अन्य रघुबीर मिष्ठान का उल्लेख करना आवश्यक समझूँगा जो आज भी अपने पुराने स्वादिष्ट और स्वाद के लिये प्रसिद्ध है जैसा हमारे पापा के दिनों मे था जब वे हम भाई बहिनों के लिये श्रीखंड लेकर आते थे। इनके उत्पाद सीमित मात्रा मे ही तैयार किये जाते हैं जिनमे रबड़ी, कलाकंद, श्रीखंड ही मुख्य हैं। इनकी विशेषज्ञता और सेवा मे एक और खास बात रहती है  कि यदि आप 50 या 100 ग्राम भी  या कितनी भी मात्रा मे रबड़ी   लेते हैं तो एक चम्मच श्रीखंड सौजन्यता के रूप मे मुफ्त देते हैं। इसी तरह यदि आप श्रीखंड लेंगे तो एक चम्मच रबड़ी कोंपलीमेंटरी निशुल्क देते हैं। गरमागरम दूध आज भी उसी मधुरता और  सरसता के साथ,  उपलब्ध कराया जाता हैं जैसे मै अपने कॉलेज के सत्तर के दशक के  दिनों मे लक्ष्मी व्यायाम शाला से बापसी के समय एक पाव दूध लेते समय देखता था। इनके दूध की बड़ी और चौड़ी काढही मे अनेकों छुहारों के साथ पूरी कढ़ाई मे सिर्फ एक सबूत लाल मिर्च टोटके के रूप मे पड़ी रहती थी।  हाँ, वो  दूध के साथ एक छोटी कलछी से दूध के ऊपर जमी मलाई का टुकड़ा काट कर कुल्हड़ मे डालना नहीं भूलते जो दूध के स्वाद को और मधुर और स्वादिष्ट बना देता। आज भी जब कभी अपने गृह नगर झाँसी जाना होता तो शुगर होने के बावजूद रघुबीर मिष्ठान की दुकान से श्रीखंड लाना न भूलता।         

वर्तमान मे मिठाइयों और हलवाइयों का चलन कम हो गया  हैं, मिठाई का स्थान केक, बेकरी और चॉकलेट ने ले ली है। महादेव, कल्लू लिखधारी, नत्थू हलवाई, लज्जा राम और हाथरस मिष्ठान की दुकाने बंद हो चुकी हैं पर उनका स्वाद आज भी सिर चढ़ कर बोलता है।

अपने मित्रों, शुभचिंतकों और सुधि पाठकों का दीपावली के पावन पर्व पर,  हार्दिक शुभकामनायें और बधाई देकर उनका अभिनंदन करते है।

विजय सहगल          

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

मुरुदेश्वर महादेव मंदिर, कर्नाटक

 

"मुरुदेश्वर महादेव मंदिर, कर्नाटक"











8 जुलाई 2025 को बेंगलुरु से बापसी का आज दूसरा  दिन था। उत्तर कन्नड जिले के भटकल नगर तालुका मे स्थित मुरुदेश्वर महादेव पश्चिमी अरब सागर तट पर स्थित, एक ऐतिहासिक स्थल है जिसका वर्णन पौराणिक ग्रन्थों मे मिलता है। कर्नाटक की कंडुका पहाड़ी पर स्थित, इस स्थल पर देश मे सर्वाधिक ऊंची पद्मासन मे विराजित शिव की प्रतिमा बनी है जिसकी ऊंचाई 123 फुट है। शिव प्रतिमा के सामने ही शिव के वाहन नंदी की भी भव्य प्रतिमा परंपरागत तरीके से बनाई गयी है। मंदिर के खुले क्षेत्र और मैदानों मे हरीघास के मैदान बने है जिन का रखरखाब की भी उत्तम व्यवस्था की गयी है।  इस प्रतिमा का निर्माण 2006 मे व्यवसायी और धर्मपरायण समाज सेवी, आर.एन. शेट्टी नामक व्यक्ति ने करवाया  था। पूर्वोन्मुख इस प्रतिमा पर  प्रातः काल की सूर्य रश्मियां जब इस शिव प्रतिमा पर पड़ती हैं तो तीन ओर से अरब सागर से घिरी प्रतिमा की भव्यता और दिव्यता देखते ही बनती है। दूर अनंत मे ऐसा प्रतीत होता है मानों समुद्र और आसमान एकाकार हो गायें हों और मंदिर के  प्रवेश द्वार पर समस्त सृष्टि के स्वामी, स्वयं देवाधिदेव श्री महादेव अपने भक्तों की अगवानी कर रहें हों। एक पौराणिक कथा के अनुसार जब लंकाधिपति राक्षस राजा रावण ने कठिन तपस्या के बाद लंका मे स्थापित करने के लिए शिव से आत्मलिंग प्राप्त किया तो देवताओं ने इस स्थापना को रोकने के लिए छल पूर्वक गणेश जी के बालक रूप मे प्रकट कर संध्या वंदन के दौरान आत्मलिंग को गणेश जी द्वारा धारण करने के लिये दिया लेकिन रावण के पीछे मुड़ने के पूर्व ही गणेश जी ने इसे भूमि पर रख आत्मलिंग को अचल कर दिया। रावण के आत्मलिंग को पुनः उखाड़ने के निष्फल प्रयास के कारण एक टुकड़ा इसी कंडुका पहाड़ी पर गिरा। जो मुरुदेश्वर महादेव के रूप मे एक महत्वपूर्ण देवस्थान बन गया।

मंदिर के पूर्व ही मंदिर का 20 मंज़िला विशाल प्रवेश द्वार या गोपुरम है जिस पर लिफ्ट की सहायता से ऊपर तक जया जा सकता है। इस गोपुरम के दोनों ओर दो हाथी कद विशाल हाथी बने हैं। ऐसी मान्यता है कि ये हाथी गोपुरम की पहरेदारी करते हैं। गोपुरम की इस सर्वोच्च मंजिल से भगवान शिव की प्रतिमा, समुद्र और नगर का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। गोपुरम की इस मंजिल से भगवान शिव के भव्य दर्शन के साथ समुद्र की विशाल लहरों के अति सूक्ष्म दर्शन मन मे बड़ा रोमांच और कौतूहल उत्पन्न करते हैं। दूर दूर तक समुद्र की लहरे से पैदा हुईं पल पल बदलती  अनेकानेक  ज्योमिति के बदलते आकार प्रकार के दर्शन होते हैं। मंदिर के अंदर की हरियाली प्रकृति के विभिन्न रंगों का सतरंगी इंद्रधनुष उत्पन्न करती हैं जिसे शब्दों मे ब्याँ करना कठिन है। मंदिर के गोपुरम से चारों दिशाओं के दर्शन ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानों हम किसी वायुयान मे बैठ कर समुद्र और भगवान शिव की प्रतिमा के साथ पूरे मंदिर परिसर के हवाई दर्शन कर रहे हों। कर्नाटक स्थित भगवान  शिव के पाँच पवित्र और पूजनीय स्थलों यथा धर्मस्थला, नंजनगुड,  गोकर्ण और धारेश्वर मे से मुरुदेश्वर भी एक है। मुख्य मंदिर प्रांगण मे भूकैलासा गुफा भी हैं जिसमे विभिन्न मूर्तियों और प्रतिमाओं के माध्यम से रावण और आत्मलिंग की कहानी को प्रदर्शित किया गया है। यहाँ पर शिवरात्रि का उत्सव बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर हजारों की संख्या मे तीर्थयात्री इस पर्व मे शामिल होकर अपने धार्मिक कर्तव्यों, का निर्वहन कर पूजा अनुष्ठान, कर्नाटक की लोकसांस्कृति और आतिशबाज़ी का आनंद उठाते हैं।                      

मंदिर परिसर मे आकाश से अवतरित गंगा को शिव द्वारा अपनी जटाओं मे उतारने का चित्रण भी एक विशाल प्रतिमा के माध्यम से दर्शाया गया हैं। प्रतिमा के दूसरी ओर कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर एक मंदिर परिसर मे पहुंचा जा सकता है। जिसमे भगवान शिव के अतिरिक्त अन्य देवी देवताओं के मंदिर भी इस परिसर मे हैं। 

मंदिर परिसर मे शीतल जल और स्वल्पाहार के स्टाल भी जगह जगह बनाए गए हैं जहां से आप वस्तुओं को क्रय कर सकते हैं। चूंकि मुर्देश्वर मे  मेरी यात्रा का समय भरी दोपहरी मे थी, फिर भी समुद्र से आने वाली ठंडी हवाएँ मन और शरीर  को शीतलता प्रदान करने वाली थी। सूरज ढलने के बाद के दृश्य तो निश्चित ही अति सुंदर और मनभावन रहते होंगे। मंदिर परिसर मे  प्रसाधन की भी उत्तम व्यवस्था है। दो पहिया वाहन एवं कार आदि रखने के लिए भी निशुल्क पार्किंग की अच्छी व्यवस्था है। यध्यपि मंदिर परिसर के अंदर भी बहुमंजिला इमारत मे ठहरने की व्यवस्था भी होगी फिर भी छोटे से नगर मे समुद्र तट के चारों ओर खाने पीने के रेस्टोरेन्ट बड़ी संख्या मे दिखलाई दिये। कोंकड़ रेल पर बसे इस कस्बे मे मुर्देश्वर नाम का स्टेशन भी हैं।  होटल आदि भी दिखलाई पड़ रहे थे जहां पर ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था है। 

इस तरह कर्नाटक के इस छोटे लेकिंग धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से अति महात्व्पूर्ण कस्बे मुर्देश्वर के दर्शन एक विलक्षण अनुभव था।

 

विजय सहगल  

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

पाकिस्तान के विरुद्ध एशिया कप मे भी ऑपरेशन सिंदूर

 

"पाकिस्तान के विरुद्ध एशिया कप मे भी ऑपरेशन सिंदूर"







रविवार 28 सितम्बर 2025 को दुबई मे  एशियन कप क्रिकेट के फाइनल  मे पाकिस्तान के विरुद्ध, तीसरा मैच खेलते हुए भारत ने एक बार फिर, न केवल खेल के मैदान के अंदर लगातार तीसरी बार अपनी परिपक्व और मजबूत खेल रणनीति का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तान को  करारी शिकस्त दी, अपितु खेल के बाद कप्तान सूर्य कुमार यादव ने, एक परिपक्व कूटनीतिज्ञ की तरह व्यवहार करते हुए एशिया क्रिकेट काउंसिल (एसीसी) के अध्यक्ष और आतंकी परस्त  पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नक़वी के हाथों एशिया कप ट्रॉफी लेने से इंकार कर दिया। मोहसिन नक़वी की धूर्तता और मक्कारी देखिये  कि भारतीय क्रिकेट टीम द्वारा उससे एशिया कप ट्रॉफी लेने के स्पष्ट संदेश के बावजूद भी वह लगभग आधा घंटे मंच पर अपने ही हाथों जोकर बन, ट्रॉफी देने की अपनी जिद पर अड़ा और खड़ा रहा? उसने एसीसी के अन्य पदाधिकारियों के हाथों, एशिया कप देने के प्रयासों को भी सिरे से नकार दिया। भारतीय खिलाड़ी भी अपनी रणनीति के तहत मंच के सामने मैदान मे डटें रहे, कोई मैदान मे लेटा था कुछ आपस मे बैठ हंसी ठिठोली करते रहे लेकिन मंच और ट्रॉफी की तरफ देखा भी नहीं। जब अपनी हठधर्मिता के बावजूद मोहसिन नक़वी अपने अपवित्र इरादों मे असफल रहा तब बड़ी बेशर्मी, बेहयाई और बेहूदगी दिखाते हुए एशिया कप ट्रॉफी को मंच से उठा कर अपने साथ, होटल  ले गया? भारतीय विजयी टीम के खेल कौशल से एशिया कप 2025 मे मिली विजय को नकारते हुए मोहसिन नक़वी ने  एशिया कप ट्रॉफी न देकर, जिस ढिठाई और निर्लज्जता का प्रदर्शन किया वह अत्यंत निंदनीय है। ट्रॉफी की चोरी और सीनाजोरी  कर होटल ले जाना, न केवल मोहसिन नक़वी की अधम सोच और नैतिक पतन की पराकाष्ठा दिखी, अपितु पाकिस्तान द्वारा एशिया क्रिकेट काउंसिल के अध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पद और प्रतिष्ठा को भी कलंकित किया। मोहसिन नक़वी का ये व्यवहार पाकिस्तान के नैतिक और राष्ट्रीय चरित्र के अधोपतन की चरम सीमा को ही प्रदर्शित करता हैं जिसकी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड सहित सारे खेल प्रेमियों ने कठोर शब्दों मे भर्त्स्ना की।

लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम  के सदस्यों ने  सूर्य कुमार यादव की अगुवाई और बुलंद हौसलों के बीच बगैर ट्रॉफी के जीत का जो जश्न मनाया वो काबिले तारीफ है। आभासी ट्रॉफी को हाथों मे उठाएँ हुए, जिस जोश-खरोश के साथ भारतीय खिलाड़ियों ने अपने  उत्साह और उमंग  का प्रदर्शन किया वो अभूतपूर्व था। भारतीय टीम कप्तान सूर्य कुमार ने ठीक ही कहा कि मेरी टीम के सारे खिलाड़ी ही मेरी असली ट्रॉफियाँ हैं। उन्होने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि, "मैच पूरा होने के बाद सिर्फ चैंपियंस को याद रखा जाता है, ट्रॉफी की तस्वीर को नहीं"। बैसे भी विजयी ट्रॉफी   खिलाड़ियों के कठिन श्रम, उनके  खेल कौशल और साहस से हांसिल एक पुरस्कार है जिस पर सिर्फ और सिर्फ विजयी टीम का अधिकार हैं। ट्रॉफी चोरी कर पाकिस्तान अपने आपको विजेता मानता हैं तो ये उसका खाम ख्याली होगी  जैसा कि उसने ऑपरेशन सिंदूर मे भारत द्वारा किये गये मिसाइल हमलों मे अपने आतंकवादी अड्डों, हवाई अड्डों और अपने फाइटर विमानों के नष्ट होने के बावजूद अपनी विजयी जश्न मना कर किया था। मोहसिन नक़वी ये भूल गया कि ट्रॉफी उसकी या पाकिस्तान की कोई निजी संपत्ति नहीं है, ट्रॉफी हमेशा विजेता टीम की कानूनी और नैतिक संपत्ति होती है जो उसे खेल मे विजयी होने पर पुरुस्कार के रूप मे मिलती है।   मोहसिन नक़वी की ये जिद कि  वह अपने ही हाथों  भारतीय टीम को ट्रॉफी देंगे!! कयामत के दिन तक भी  पूरी नहीं होने वाली!! कदाचित पाकिस्तान की इसी नीच, अधम और घिनौनी  हरकत के कारण भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एशिया कप मे भारत की जीत पर भारतीय टीम को एक्स (ट्विटर) पर  बधाई देते हुए सही ही लिखा, "खेल के मैदान पर भी ऑपरेशन सिंदूर!!" परिणाम भी एक जैसा रहा, भारत विजयी रहा, हमारी क्रिकेट टीम को बधाई।

काश! पाकिस्तानी टीम के खिलाड़ियों ने खेल के मैदान मे प्लेन गिराने या एके-47 के एक्शन दिखाने की बजाय क्रिकेट के लिये आवश्यक  अभ्यास, शिक्षण और प्रशिक्षण पर ध्यान दिया होता तो क्रिकेट मे  ऐसी फजीति, शर्मिंदगी और बदनामी न झेलनी पड़ती।  लेकिन जिस पाकिस्तान के हुक्मरान और सेना का प्रमुख मुल्ला मुनीर की अमानवीय सोच और नकारात्मक मानसिकता, कदम कदम पर अतिवादियों और आतंकवादियों का पालन पोषण कर मानव और मानवीयता की भावना का तिरस्कार करती हो, वह क्या संदेश अपने देश और देश के  नागरिकों को देता होगा? दरअसल दुनियाँ मे आज पाकिस्तान की पहचान आतंकवादियों, अतिवादयों  और उग्रवादियों  की शरणस्थली और आश्रय स्थली  के रूप मे हो गयी है, तब  पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ी, इस भावना से अछूते  कैसे रह सकते हैं?

एक ओर जहाँ पाकिस्तान के बॉलर रऊफ पर पाकिस्तान मे  लानते भेजी गयी और बुरा भला बोल, उन्हे रन मशीन बॉलर कह कर धिक्कारा गया,  क्योंकि उन्होने एशिया कप क्रिकेट के इस फ़ाइनल मुक़ाबले मे 50 रन लुटा दिये। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान ने जहाँ लगातार खेल मैदान के अंदर पाकिस्तान के विरुद्ध तीन मैच जीतने के बाद, खेल के मैदान के बाहर जिस अनुभवी और परिपक्व कूटनीति का परिचय देते हुए मैच मे विजयी होने के बाद  पाकिस्तानी टीम हाथ न मिलाने की नीति और फाइनल मैच मे एसीसी के अध्यक्ष और पाकिस्तान के गृहमंत्री के हाथों एशिया कप ट्रॉफी को लेने से इंकार करने की सफल और माकूल  डिप्लोमेसी के प्रदर्शन के बावजूद, शिवसेना उद्धव गुट के  संजय राऊत कहाँ पीछे रहने वाले थे उन्होने भारतीय टीम को बधाई तो दूर अपितु, भारतीय टीम की इस विजयी को नौटंकी करार दिया। खेद और अफसोस तो तब भी हुआ जब देश के  सबसे पुराने  राजनैतिक दल कॉंग्रेस के किसी भी पदाधिकारी ने भारतीय क्रिकेट टीम को बधाई तक नहीं दी। समाजवादी पार्टी के चंदौली, सांसद वीरेंद्र सिंह ने ते भारत की जीत पर सवाल उठाते हुए मैच की विश्वसनीयता पर शक जताते हुए, इसे प्रायोजित मैच करार दिया और इसे क्रिकेट दर्शकों की संवेदनशीलता को पैसा एकत्रित करने का साधन करार दिया।     

एक बार फिर भारत ने दुनियाँ को ये जतला दिया कि खेल अपनी जगह हैं पर आतंकियों को पनाह देने वाला पाकिस्तान के साथ भारत, किसी भी तरह के भावनात्मक संबंध नहीं रखेगा, भारत के लिये भारत और उसका स्वाभिमान सर्वप्रथम हैं। आज का भारत बदला हुआ भारत है।       

विजय सहगल

 

 

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2025

एशिया कप-मैदान के अंदर और बाहर, पाकिस्तान के छक्के छूटे

 

"एशिया कप-मैदान के अंदर और बाहर, पाकिस्तान के छक्के छूटे"








यध्यपि भारतीय क्रिकेट टीम ने रविवार 14 सितंबर 2025 को एशिया कप T20 मैच मे पाकिस्तान की टीम को 7 विकेट से परास्त कर दिया तथापि  मै यहाँ इस लेख मे भारतीय क्रिकेट टीम के खेल कौशल, भारतीय टीम और उनकी बैटिंग, बोलिंग और रन आदि के  आंकड़ों पर प्रकाश नहीं डाल रहा अपितु ऑपरेशन सिंदूर को दृष्टिगत, भारतीय क्रिकेट टीम को,  पाकिस्तान के साथ मैच खेलने के औचित्य तक सीमित रक्खूंगा। रविवार को भारत और पाकिस्तान के बीच दुबई मे खेले गये मैच के पूर्व ही भारत मे इस बात की चर्चा बड़ी गर्म थी कि भारत को एशिया कप क्रिकेट के इस मैच को ऑपरेशन सिंदूर की घटना के दृष्टिगत पाकिस्तान के साथ खेलना चाहिये या नहीं? सामान्य नागरिकों,  क्रिकेट प्रेमियों, पीढ़ित परिवारों और राजनैतिक दलों के नुमाइंदों की राय इस विषय मे बँटी थी। अधिकतर खेल प्रेमी और जनसमान्य इस मैच का बहिष्कार करने के पक्ष मे था लेकिन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड  और सरकार का कहना था कि अंतर्राष्ट्रीय शिष्टाचार, खेल संस्थाओं के नियम, बहुर्राष्ट्रीय खेलों के प्रावधान और मर्यादायों  मे खेलना जरूरी हो जाता है। यदि पेनल्टी के रूप मे धनराशि के पक्ष को नज़रअंदाज़ भी कर दिया जाय तो भारतीय टीम को  मैच गंवाना पड़ता और अंक गँवाने पड़ते। इन वाद-विवादों के बावजूद, दुबई के मैदान मे हुए  मैच मे, भारत की विजय और पाकिस्तान की शर्मनाक पराजय के बाद भारतीय क्रिकेट टीम के  कप्तान सूर्य कुमार यादव और उनकी टीम के बाकी खिलाड़ियों ने पाक खिलाड़ियों से हाथ न मिलाने की परंपरा को तिलांजलि दे अपने ड्रेस्सिंग रूम मे पहुँच कर उसके दरबाजे बंद कर लिए। पाक की पूरी टीम, विजयी भारतीय टीम से हाथ मिलाने के लिए इंतज़ार करती रही। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान के इस छोटे लेकिन अति महत्वपूर्ण कृत ने पाकिस्तान को न केवल खेल मैदान के अंदर अपितु मैदान के बाहर, पूरे पाकिस्तान को इस शर्मनाक और अपमानजनक  स्थिति मे ला खड़ा किया। भारतीय टीम से मिले  इस लज्जाजनक, निरादर  और तिरस्कार से पाकिस्तान की टीम और पूरा पाकिस्तान तिलमिला उठा।

भारतीय टीम के  कप्तान सूर्य कुमार द्वारा पाकिस्तानी टीम से हाथ न मिलाने के  इस साहसी कदम ने पाकिस्तान के साथ न खेलने के समर्थक वर्ग की टीस, दर्द, और वेदना को बहुत हद तक कम कर दिया। कप्तान सूर्य कुमार यादव के पाकिस्तानी क्रिकेट टीम से हाथ न मिलाने की नीति या पर्दे के पीछे की इस रणनीतिकारों की प्रशंसा की जानी चाहिये कि उन्होने खेल की भावना पर खेल भी खेला और क्रिकेट मैच की जीत के बाद पाकिस्तानी टीम से हाथ न मिलाकर, पाकिस्तान की आतंकवादी सरपरस्त सेना और सरकार को भी, भारत की   आतंक विरोधी नीति का स्पष्ट संदेश दे दिया। उन्होने सिद्ध कर दिया कि खेल भावना से भी बड़ी है देश भावना। इसे कहते हैं कि साँप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी।  सूर्य कुमार ने भारत की इस जीत को भी ऑपरेशन सिंदूर मे अपना शौर्य और पराक्रम दिखाने वाली भारतीय सेना को समर्पित कर सोने पे सुहागा की  कहावत को चरितार्थ किया। बैसे कप्तान सूर्य कुमार ने टॉस के पूर्व ही मैच रैफरी से विपक्षी टीम से टॉस के बाद हाथ न मिलाने के लिये सूचित कर साहस का परिचय दिया था।

पाकिस्तानी आम जन और क्रिकेट प्रेमी तो ठीक लेकिन कुछ पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी तो इतने बौखला गये कि वे भारतीय कप्तान और खिलाड़ियों के लिए गाली गलौज भाषा का उपयोग कर अपने ही कुसंस्कारों को ही प्रदर्शित करते रहे। पीसीबी (पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड) ने एशियाई क्रिकेट काउंसिल (एसीसी) से भारतीय क्रिकेट टीम द्वारा पाकिस्तानी टीम से परस्पर हाथ न मिलाने की परंपरा और शिष्टाचार की आलोचना कर शिकायत की अपितु इस के लिये मैच रैफरी एंडी पायक्राफ्ट को आचार संहिता का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए, इसके लिये उनको जिम्मेदार ठहराते हुए  हटाने की मांग कर डाली, क्योंकि उन्होने पाकिस्तानी कप्तान सलमान अली से कहा था कि वह अपने भारतीय समकक्ष से हाथ न मिलाएँ। पीसीबी के टीम मैनेजर नवीद चीमा  ने अति उत्साह मे आकर कहा कि हाथ न मिलाना खेल भावना के विपरीत है और  इस मांग के पूरा न होने पर पाकिस्तान ने श्रंखला के शेष मैचों को न खेलने की धमकी दे डाली। दुर्भाग्य से एशिया क्रिकेट काउंसिल के वर्तमान प्रमुख पाकिस्तान के गृहमंत्री मोहसिन नक़वी हैं जो एसीसी के अध्यक्ष का पद भी सम्हालते हैं। पीसीबी और मोहसिन नक़वी जैसे दोहरे चरित्र के अमानवीय लोग  किस मुंह से "खेल भावना" की बात करते हैं, जो पाकिस्तान सरकार मे गृहमंत्री रहते हुए, पहलगाम  मे   धर्म के आधार पर नरसंहार करने वाले अतिवादियों, आतंकियों को आश्रय और पराश्रय देते हैं। पाकिस्तान के इन संवेदनहीन अधिकारियों की धूर्तता, शठता और दुष्टता इस बात से परिलक्षित होती है कि हाथ न मिलाने के कृत पर हाय तौबा कर आसमान सिर पर उठा लेते हैं पर पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा निर्दोष नागरिकों की पहलगाम मे हुई हत्याओं पर कपटता पूर्ण मौन साध लेते  हैं? कप्तान सूर्य कुमार यादव का पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ न मिलाने का तीर सही निशाने पर लगा। भारतीय टीम का ये संदेश पाकिस्तान के उस मूढ़ मार्शल मुनीर को भी स्पष्ट संदेश है कि ऑपरेशन सिंदूर अभी समाप्त नहीं हुआ हैं और पाकिस्तान द्वारा फिर ऐसे किसी भी दुस्साहस के पूर्व उसे 6-7 मई को नौ पाकिस्तानी आतंकवादी अड्डों पर हुई हमलों और बाद मे 11 एयर बेस के तबाह होने को स्मरण कर लेना चाहिये।  

आईसीसी (इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल) ने पीसीबी की,  मैच रैफरी एंडी पायक्राफ्ट को हटाने की मांग को निरस्त कर दिया और आगे के मैचों मे भी मैच रैफरी के निर्णयों को मानने का फरमान जारी कर दिया। एशिया कप के आगे के मैच न खेलने की धमकी पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने,  दे तो दी थी और इसको अमलीजामा पहनाने की नाकामयाब कोशिश पीसीबी ने बुधवार 17 सितंबर 2025 को यूएई से मैच खेलने मे की।  लेकिन मैच न खेलने पर  पाकिस्तान को एसीसी से मिलने वाली 1.6 करोड़ डॉलर (454 करोड़ पाकिस्तानी रूपय) की आय से वंचित होने की वास्तविकता का ज्ञान होने पर, दाने दाने के लिये मुंहताज पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड की  सारी हेकड़ी धरी की धरी रह गयी और उसने अपनी कोरी गीदड़ भभकी से सम्झौता कर अपने स्वाभिमान को तिलांजलि दे कर मैच खेलना स्वीकार  कर अपनी जग हँसाई करवाई। प्रसिद्ध कवि गिरधर कवि राय की पंक्तियाँ, पाकिस्तान पर सही से चरितार्थ होती हैं- -

बिना विचारे जो करे, सो पाछै पछताएँ।

काम बिगारे आपनौ, जग में होत हंसाय॥       

 

विजय सहगल