"गोकर्ण,
कर्नाटक"
8 जुलाई
2025 को, समुद्र तटीय यात्रा मे
मुर्देश्वर से अपने अगले पढ़ाव की यात्रा के लिये मेरा गंतव्य उत्तरी कन्नड जिले का
गोकर्ण कस्बा था। कन्याकुमारी-पनवेल
राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 66 पर कारवार से होते हुए हमे शाम के लगभग 07 बज चुके
थे। एनएच 66 से अब हमे गोकर्ण के लिये लगभग 10 किमी समुद्र तट के ओर जाना था। कुछ
कुछ अंधेरा हो गया था और वर्षात भी हल्की हल्की शुरू हो चुकी थी। अचानक मंग्रोव
होम स्टे का बोर्ड दिखा तो हमने भी गोकर्ण के इस बाहरी इलाके मे ही रुकना उचित
समझा। चूंकि कार ड्राइव करते हुए थकावट भी हो रही थी,
होम स्टे गोकर्ण रेल स्टेशन के नजदीक ही था,
साफ सुथरा था लेकिन खाने की व्यवस्था नहीं थी। फिर ये सोच कर कि कुछ फ्रेश होकर
राजमार्ग पर भोजन पानी कर लेंगे ये सोच कर अंततः होम स्टे मे रुकने का मन बना
लिया। चाय स्नेक्स के पश्चात पानी भी तेज हो गया। होम स्टे के केयर टेकर मोहन से
आग्रह के बाद ये सहमति बनी कि जो भोजन वह अपने लिये बनाएगा उसमे चार रोटी अतिरिक्त
बना ले तो हमे बाहर भोजन के लिये नहीं जाना पड़ेगा। मोहन भला आदमी था उसकी सहमति से वर्षात मे बाहर निकलने की बजाय रूम मे
ही बैठ कर वर्षात का आनंद लेते हुए भोजन का आनंद लिया। भोजन के दौरान पास से ही
गुजरती रेल की आवाज तो सुनाई दी पर अंधेरे के कारण गुजरती मालगाड़ी को देखने के
अपने पसंदीदा शौक से वंचित रहा। रात हो चुकी थी,
प्रातः गोकरण घूमने की अभिलाषा लिये नींद के आगोश मे सो गया।
9 जुलाई 2025 को सुबह सात बजे नहा धोकर हम
लोग गोकर्ण कस्बे की ओर भ्रमण के लिये चल दिये। दक्षिण के काशी के नाम से प्रसिद्ध
गोकर्ण मे आखिर के एकाध किमी॰ को छोड़ पूरे रास्ते छोटे-मोटे रेस्टोरेन्ट,
दुकाने और कुछ होम स्टे बने थे। सारी रात गिरी वर्षात के कारण सड़क के दोनों ओर
पानी के बीच हम लगभग आठ बजे गोकर्ण कस्बे मे थे। पतली गलियों और बाजार से होते हुए
हम यहाँ के प्रसिद्ध शिव मंदिर महाबलेश्वर मंदिर होकर निकले। मंदिर के आसपास कोई
कार पार्किंग न होने के कारण नजदीक ही समुद्र तट पर बनी कार पार्किंग की ओर बढ़े जो
मंदिर से दो-ढाई सौ मीटर दूर रही होगी। कार पार्किंग के बाद जब पैदल मंदिर की ओर
बढ़े तो पूरे रास्ते गरम मसाले के उपयोग मे आने वाले मुख्य घटक मसाले यथा काली
मिर्च, लौंग,
दाल चीनी, बड़ी इलाइचि,
के अलावा जायफल, धनिया,
जीरा, जावित्री तेज पत्ता की बड़ी बड़ी दुकाने
दिखाई दी, गरम मसाले की महक दुकान
से निकलने वाले यात्रियों को बरवश ही मुफ्त मिल रही थे। साथ मे ही हरे-पीले और लाल रंग के रंग बिरंगी गुग्गल,
लोबान (सुगंधित) भी कई दुकानों पर बिक्री के लिये उपलब्ध था।
प्राचीन,
प्रसिद्ध महाबलेश्वर मंदिर का प्रवेशद्वार साधारण पीले रंग से रंगा हुआ था,
दर्शनार्थियों की लाइन भगवान के दर्शनार्थ लगी हुई थी। मंदिर के ड्रेस कोड के
अनुसार महिलाओं को भारतीय परिवेश की साड़ी
और पुरुषों को पारंपरिक धोती पहनना आवश्यक थी। पहले तो मैंने धोती न होने के कारण
महाबलेश्वर मंदिर के दर्शन का विचार त्याग दिया और श्रीमती जी को ही दर्शन के लिये
भेज दिया। लेकिन हमारे यहाँ वो कहावत हैं कि जब तक भगवान का बुलावा न हो उनके
दर्शन सहज संभव नहीं होते। लेकिन साक्षात देवधिदेव महाबलेश्वर मानों मुझे दर्शन
के लिये बुला रहे थे। मंदिर मे स्थापित विलक्षण शिव लिंग के दर्शन के पश्चात
श्रीमती जी ने मुझे भी दर्शन करने के लिये आग्रह किया। फिर क्या था बाजार से एक
भगवा धोती लेकर मैंने मंदिर के नियमानुसार धोती धारण कर मंदिर मे प्रवेश किया।
1500 साल से भी अत्यंत प्राचीन मंदिर जो
शास्त्रीय द्रविड़ स्थापत्य शैली मे बना था,
मंदिर के दो प्रवेश द्वार के पश्चात मै,
मुख्य गर्भ गृह मे पहुंचा। मंदिर पुरोहित को प्रणाम कर मैंने शिव लिंग पर जल और
पुष्प अर्पित किये। मंदिर के पुजारी द्वारा शिव लिंग मे बने छिद्र के भीतर पंजे की
अंगुलियों के माध्यम से विलक्षण शिव लिंग का स्पर्श करने को कहना,
अद्भुत और अनोखा अनुभव था। मंदिर के पुजारी द्वारा बतलाया गया कि महाबलेश्वर
शिवलिंग जिसे आत्मलिंग भी कहा जाता हैं, पिंडी का ऊपरी भाग,
जो कि चाँदी के पत्तर से जढ़ित थी को विष्णु का रूप बतलाया और छिद्र के अंदर
महाबलेश्वर की स्थापना बतलाई। ऐसी किवदंती है कि मंदिर के देवता भक्तों को अपार
आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
महाबलेश्वर मंदिर कर्नाटक के सात मुक्ति क्षेत्रों (मोक्ष स्थल) मे से एक है।
कर्नाटक के लाखों सनातन मतावलंबी अपने दिवंगत परिजनों का अंतिम संस्कार और मृत्यु
संस्कार यहाँ करते हैं। 1676 मे एक
अंग्रेज़ यात्री फ्रायर ने महा शिवरात्रि पर्व का के दौरान गोकर्ण का दौरा कर
विस्तृत विवरण लिखा। एक प्राचीन कथा अनुसार राक्षस राजा रावण की माँ अपने पुत्र की
समृद्धि के लिये शिव की परम उपासना करती थी। इस बात से ईर्ष्या कर इन्द्र ने
शिवलिंग को चुराकर समुद्र मे फेंक दिया। अपनी माँ की इच्छा पूर्ति हेतु रावण ने
कैलाश पर्वत पर शिव की उपासना कर भगवान शिव से आत्मलिंग का अनुरोध किया। आत्मलिंग
को कोई चुरा या डिगा नहीं सकता। भगवान विष्णु ने अपने मायाजाल से गोकर्ण मे सूर्य को ढँक कर संध्या
का आभास दिया। रावण को अपनी संध्यावन्दन की क्रियाएँ करनी थी लेकिन आत्मलिंग हाथ
मे होने के कारण वह ऐसा नहीं कर सकता था। और वरदान के अनुसार आत्मलिंग को जमीन पर रखने
से वह स्थिर हो जाता। तभी गणेश देव एक बालक के रूप मे वहाँ प्रकट कर आत्मलिंग को
अपने हाथों मे लेने के लिये तैयार हो गए। समझौते अनुसार गणेश जी ने जल्दी-जल्दी
तीन बार रावण को पुकारा लेकिन रावण के न आने पर गणेश जी ने आत्मलिंग को उसी स्थान
पर रख दिया। स्थिर हुए आत्मलिंग को रावण ने जब उपर खींचने का प्रयास किया तो
आत्मलिंग मुड़ गया और गाय के आकार का हो गया किन्तु बाहर नहीं आया,
इसी कारण इस स्थान का नाम गोकर्ण पड़ा,
जहां आज का महाबलेश्वर मंदिर है। गुरुचरित्र मे लिखा है कि भगवान ब्रहमा,
विष्णु, महेश,
कार्तिकेय और गणेश सभी देवता यहाँ निवास करते हैं।
मंदिर दर्शन के पूर्व गोकर्ण से 4-5 किमी
दूर ही ॐ बीच की अभिलाषा से गूगल की सहायता से पहुंचा। समुद्र तट के रास्ते मे बने
एक रेसोर्ट ने तट तक कार से जाने के रास्ते को रोक दिया गया था क्योंकि जन सामान्य
को जाने की अनुमति नहीं थी। बेहद अफसोस होता हैं कि स्थानीय प्रशासन और सरकार अपने
स्वार्थ और आर्थिक हिट लाभ के लिए जन सामान्य को ऐसे प्रकृतिक जगहों पर जाने
से क्यों वंचित रक्खा जाता है?
लेकिन समुद्र बीच के सीढ़ियों के मार्ग मे
नितांत सुनसान और जहां तहां पड़ी गंदगी बता रही थी कि यहाँ इतनी सुबह 7-8
बजे लोग नहीं आते क्योंकि रेहड़ी पटरी की सारी दुकानें,
यहाँ तक कि चाय आदि की दुकान भी बंद थी। ऑटो टेम्पो स्टैंड खाली पड़े थे। रास्ता
छोटी पहाड़ी पर बनी सीढ़ियों से होकर समुद्र तट की ओर बढ़ा। मेरी तो इच्छा थी कि आगे
समुद्र तट पर जाएँ लेकिन सुनसान जगह पर एक अदृश्य डर के कारण वहीं से समुद्र दर्शन
किए। ॐ के आकार की पथरीली पहाड़ियों का भ्रम तो हुआ पर मै दावे के साथ नहीं कह सकता
कि ये ही ॐ बीच रहा होगा। फिर भी कुछ मिनटों हल्की बरसात मे छाता लगाकर यहाँ वहाँ
टहल कर बापस हो लिया।
विजय सहगल

























