शनिवार, 20 सितंबर 2025

एलोरा की गुफाएँ, महाराष्ट्र

"शिव को समर्पित एलोरा की गुफाएँ, महाराष्ट्र"







 


महाराष्ट्र राज्य के छत्रपति संभाजी नगर स्थित एलोरा गुफाओं की गुफा संख्या 16, जिसे कैलाशनाथ मंदिर के रूप मे जाना जाता है, मे प्रवेश करते ही  अंदर का दृश्य देख कर, अनायास! ही  मुँह से निकल पड़ा,  आश्चर्य!, अद्भुत!!,  अद्वतीय!!!, अलौकिक!!!, अकल्पनीय!!! एवं अविस्मरणीय!!!॰ 735-737 के मध्य मे राष्ट्र कूट नरेश दंतिदुर्ग के काल खंड मे इन गुफाओं के निर्माण की रूप रेखा बनी और निर्माण कार्य का श्रेय कृष्ण राय प्रथम (सन 757-773)   के काल मे शुरू हुआ। 200 साल मे श्रमिकों की 20 पीढ़ियों द्वारा निर्मित इस वास्तु रचना को देख कर वरबस ही संत कबीर का वो दोहा याद हो आया :-

"सब धरती कागज करूँ, लेखनी सब बनराय।

सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।।" अर्थात यदि सारी धरती को कागज बना  लूँ, सारे वृक्षों को कलम बनायेँ और सारे समुद्र को स्याही मान, गुरु के गुणों का वर्णन करें, तब भी उनके गुणों को लिखने मे ये वस्तुओं कम पड़ जाएंगी। यहाँ मै गुरु के गुणों  की जगह  एलोरा स्थित इस कैलाशनाथ मंदिर की भव्यता, दिव्यता और सुंदरता के वर्णन करने की धृष्टता कर रहा हूँ। मेरा मानना है कि किसी भी भाषा के शब्दों के जितने भी अलंकार, एलोरा गुफाओं की इस कैलाशनाथ मंदिर की गुफा के वास्तु निर्माण की  सौंदर्यता, सुरूपता एवं मनोहरता को देख कर लिखे जाएँ, कम पड़ेंगे। मैंने उस देश, काल और परिस्थिति को दृष्टिगत,  ऐसी अद्भुत वास्तु निर्माण अपनी  ज़िंदगी मे अब तक पहले  नहीं देखा, जिसमे एक पहाड़ को काट कर पूरे मंदिर की विशाल रचना का निर्माण किया गया हो। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण श्रमिकों के कठिन परिश्रम की उन पीढ़ियों को जाता हैं जिन्होने एक पहाड़ को उपर से नीचे की तरफ काटकर तथा उसी पहाड़ को बाहर से अंदर की ओर गढ़कर ढाल कर शिवालय का रूप दिया गया है, जो बेमिसाल, बेजोड़ है। एलोरा की इन 37 गुफाओं को  विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त है जो न केवल महाराष्ट्र के लिए अपितु सारे भारत के लोगों के  लिये गर्व और सम्मान की बात है। 

पूरे देश मे स्थित 12 ज्योतिर्लिंग मे 12वें ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर मंदिर से मात्र 1.5-2 किमी॰ दूर स्थित एलोरा गुफाएँ 34 गुफाओं का समूह है जिसमे हिन्दू और जैन मंदिरों तथा  बौद्ध मठों मे इन  धर्मों के आरध्यों की मूर्तियाँ, पूजा स्थल आदि  बनाये  गये  हैं। हर गुफा अपने स्थापत्य और वास्तु की बारीक कलात्मकता की दृष्टि से बेजोड़ और अनोखी हैं,  लेकिन इस मे कोई दोराय नहीं कि गुफा क्रमांक 16, कैलाशनाथ मंदिर अपनी अनूठी नक्काशी, बेमिसाल वास्तु निर्माण और दक्षता-पूर्ण स्थापत्य मे अतुलनीय है। पुरातत्व विभाग द्वारा लगभग 2 किमी॰ क्षेत्र मे फैली इन गुफाओं का रखरखाव बहुत ही अच्छी तरह से किया गया हैं। गर्मी और उमस भरे मौसम के बावजूद हरे-भरे घास के मैदान और समपर्क पथ, साफ-सुथरे हैं। जगह जगह पेड़ों की छाँव मे बैठने की उत्तम व्यवस्था है। ठंडे पानी और प्रसाधन की उत्तम व्यवस्था है। पर्यटकों के भ्रमण के लिए एक गुफा से दूसरी गुफा मे जाने के लिए बैटरी वाहन उपलब्ध है।

कैलाशनाथ मंदिर अर्थात गुफा क्रमांक 16 लगभग एलोरा गुफाओं के मध्य मे स्थित है। भगवान शिव को समर्पित यह गुफा दुनियाँ की सबसे बड़ी, एक अखंड शिला उत्खनन है।  यध्यपि इस गुफा का प्रवेश द्वार अन्य गुफाओं की तरह ही असाधारण बना हुआ है, जिसके दोनों ओर अप्सराओं की नृत्य करती प्रतिमाओं को उकेरा गया है। लेकिन इस शिवालय मे प्रवेश करते ही एक अनूठे शिवलोक के दर्शन होते है मानों हम किसी स्वपन लोक मे पहुँच गए है। प्रवेश कक्ष को पार करते ही, बरामदे दूसरे सिरे पर पद्मासन मे बैठी देवी गजलक्ष्मी की सुंदर नयनाभिरम प्रतिमा के दर्शन होते है, जिनके दोनों ओर सूँड उठाये अभिवादन कर,  चारों  गजराज देवी के प्रति अपना सम्मान, श्रद्धा और आदर प्रकट करते हुए खड़े है साथ ही उनके दोनों ओर गंधर्व गदा के साथ खड़े हैं। पूरे मंदिर मे इसी तरह की नक्काशीदार देवी-देवताओं, यक्षों, किन्नरों, गन्धर्वों, नृत्य करती अप्सराओं और अन्य हिन्दू पौराणिक कथाओं और प्रसंगों को दर्शाती प्रतिमाएँ चारों तरफ देखने को मिलेंगी। इन प्रतिमाओं मे शिव-पार्वती के विवाह रावण का कैलाश पर्वत को हिलाने का प्रयास को दिखती मूर्तियाँ महत्वपूर्ण हैं। गजलक्ष्मी प्रतिमा के काफी पीछे और उपर भगवान शिव का मुख्य मंदिर है। यह पूरा दो मंज़िला मंदिर एक रथ के आकार मे बना है जिसके चारों ओर खुला गलियारा है तथा गलियारे के दूसरी ओर तीन मंज़िला कवर्ड बरामदा बना है। ऐसा प्रतीत होता है कि रथ, खुले गलियारे के मध्य मे खड़ा हो। मंदिर के तीनों तरफ रथ को खींचते अनेक हथियों की हाथीकद प्रतिमाएँ एवं कहीं कहीं सिंह वाहनी भी दिखलाई देती है। गलियारे की दूसरे किनारे पर उपर की ओर ऊंची पहाड़ की शिला चारों ओर स्पष्ट दिखलाई पड़ती कि ये पूरा कैलाश मंदिर पहाड़ को ऊपर से नीचे की ओर काट कर बनाया गया है। पहाड़ी शिला के नीचे चारों ओर तीन मंज़िला बड़े बड़े हाल बने हैं जिनके बीच बीच मे बड़े बड़े पाषाण स्तंभों से बरामदे की छत्तों को सहारा दिया गया हैं। सोच और देख कर आश्चर्य और अचंभा होता हैं कि उस काल के श्रमिकों का वास्तु निर्माण कला का ज्ञान और कौशल कितना  उन्नत, उत्कृष्ट और विकसित रहा  होगा,  कि इतने अप्रितिम, अद्भुत लोक का निर्माण किया। गलियारे के प्रवेश द्वार के बाएँ और दायें दोनों ओर, समान रूप से एक-एक  चौकोर पाषाण स्तम्भ जिसपर बारीक नक्काशी की गयी है खड़े हैं। इन दोनों ओर के स्तम्भों  के नजदीक ही दो गजराज हथियों की प्रतिमाएँ बनी थी, जिन पर मौसम का प्रभाव स्पष्ट दिखलाई पड़  रहा था, क्योंकि प्रतिमाएँ, बरसात, धूप और हवाओं के प्रभाव से अपने रूप और रंग मे बदलाव से अछूती नहीं थी।

मुख्य मंदिर मे प्रवेश के लिए हम सीढ़ियों से पहली मंजिल पर स्थित शिव मंदिर के लिए पहुंचे। जूते चप्पल निकाल कर जैसे हमने मंदिर के रंग मंडप मे प्रवेश किया जो एक विशाल सभागार की तरह था। जिसमे अनेकों पत्थर के चौकोर और ऊंचे स्तम्भ बनाए गए थे। कक्ष मे रोशनी की कमी थी। प्राकृतिक प्रकाश से ही जो थोड़ी बहुत रोशनी आ रही थी उसी से रंगमंडप की शोभा देखने को मिली।  पुरातत्व भवनों की सुरक्षा की दृष्टि से इलेक्ट्रिक लाइट की व्यवस्था नहीं की गयी थी। पाषाण स्तम्भ पर भी उसी तरह नक्काशी की गयी थी जैसे कैलाश मंदिर के खिड़की, दरवाजे, आले और मेहरावों मे की गयी थी। आगे मंदिर के गर्भ गृह मे एक विशाल शिवलिंग विराजित था। विभाग ने यहाँ बैटरी से चालित प्रकाश की व्यवस्था कर रक्खी थी ताकि श्रद्धालु शिवलिंग के दर्शन कर सकें।

दर्शन पश्चात मंदिर के मुख्य द्वार के सामने एक कक्ष मे स्थित  शिव के वाहन नंदी के दर्शन कर अब हम गुफा के मुख्य प्रवेश द्वार के उपर बनी छत्त पर थे जहां से मंदिर के दोनों ओर बने तीन मंज़िला बरामदे और दीप स्तम्भ तथा  हाथी के प्रतिमाओं के पीछे बना खुला गलियारा दूर दूर तक एक विहंगम दृश्य उत्पन्न कर रहा था। इस छत्त से गुफा के बाहर के बगीचे, पेड़ पौधे और हरी घास के मैदान भी सुंदर दिखाई दिये।

कैलाश मंदिर के पश्चात हम लोग गुफा संख्या 15 से 0 की ओर बढ़े। उनमे कुछ गुफाएँ साधारण थी, कुछ गुफाओं मे जैन तीर्थंकरों की अद्भुत प्रतिमाएँ और कुछ मे भगवान बुद्ध, अपनी ध्यान की मुद्रा मे नज़र आये। हर गुफा मे ऐसी अनेक नक्काशीदार प्रतिमाएँ, बड़े बड़े सभा कक्ष  और पूजा घर बने हुए थे।  दीवारों पर जातक कथाओं को उकेरा गया था। कुल मिला कर एलोरा गुफाओं मे हमारे शिल्पियों की स्थापत्य  कला, पुराने वास्तु  कौशल कदम कदम पर देखने को मिला जो दुनियाँ मे इकलौता हैं लेकिन गुफा क्रमांक 16 कैलाश मंदिर एक अद्भुत, अकल्पनीय वास्तु निर्माण था। एक बार हर भारतीय को 12वें ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर के दर्शन के साथ एलोरा गुफाओं के दर्शन अवश्य करना चाहिए।

 

विजय सहगल                        

 


3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर विवरण सहगल साहब । आपने एलोरा की गुफ़ा नम्बर सोलह का चित्रण बहुत सुन्दर ढंग से किया । आपकी विवरण करने की आकर्षक शैली एलोरा गुफ़ा को देखने की उत्सुकता पैदा करती है । आकर्षक चित्रण करने के लिए आपको बहुत-२ साधुवाद ।

विजय सहगल ने कहा…

*Old name Aurangabad, now changed to Chhatrapati Sambhaji Nagar, is one of the renowned cities of Maharashtra. Ajanta and Ellora caves are situated within a 100 km radius. I, along with my life partner, visited these caves around 30 to 35 years ago. At that time, the Ellora caves were open for visiting from dawn to dusk. There was just one restaurant, and the rates were too high. Such secluded places across the country have remained expensive to this day. Ajanta and Ellora are UNESCO World Heritage sites. The craftsmanship of rock-cut architecture is incredible and unimaginable. Indian architecture is the most ancient in the world. After visiting such places, we feel proud and realise the fact that once upon a time, we were the global teachers of the world. At last, but not least, your command of Hindi is excellent, and your eagerness to observe minute details of the places, whether they are religious, historical, cultural, or tourist sites, is commendable. The secret is the experience of several years, continued dedication, and unparalleled passion.*
🌹🙏🌹👌👌👌👍👍👍
Surrender Singh Kushwah Gwalior

बेनामी ने कहा…

बहुत ही सुंदर वर्णन